Monday, October 16, 2017

chanchal: बतकही / चंचलचल खुसरो घर आपनो--------------------...

chanchal: बतकही / चंचल
चल खुसरो घर आपनो
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: बतकही / चंचल चल खुसरो घर आपनो -----------------------------------------------------------------------------------------------------------...
बतकही / चंचल
चल खुसरो घर आपनो
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  बेअदबी माफ़ हो , हम जौनपुर वाले निहायत गलीज समाज बनते जा रहे हैं .आंख बंद कर के सोचिये की आपकी सोच अपने तक ही महदूद है या अपने से हट कर भिक्छ सोचते हैं ?
अगर आप थोड़े से भी इमानदार हैं आप बे झिझक  यह मान लेंगे कि बात तो सही है . कल तक ऐसा नही था .आप लाख अपने कोअपनी खाल में घुसेड़ने कीकोशिश  करते लकिन नही कर
पाते क्यों की आपके रिहाइश  के  ठीक बगल  में एक सडक लेती हुयी है जिस पर लोग आवा जाहि करते रहते हैं ,लेकिन बाज दफे उस सडक का पारा गर्म होजाता रहा और उस
चलने वाले लोग जोर जोर से चीख चीखकर कह रहे हैं  - ' दम है  कितना दमन में तेरे देख लिया , फिर देखेंगे ' . दरवाजे को  कुण्डी चदाकर बंद कर भी लेंगे , खिड़की के पल्ले चढ़ा
  लंगे तब भीआवाज अंदर आयेगी  ही . क्यों की हर मकान में एक रोशनदान होता है , इंसान के अंदर के जमीर की तरह वह आपको आगाह करता ही रहेगा . बहर हाल बाहर सडक
की गर्मी घर में आयी , बीवी ने दरियाफ्त किया , बच्चोंका कुतुहल उठा , दीवान पर लुढके बाबा ने अंदाज लगा लिया और मुस्कुरा दिए .आपने बीवी को समझा दिया - सिरफिरे लोग हैं कुछ
काम काज है नही सरकार के खिलाफ नारे बाजी कर रहे हैं .बच्चों के कुतुहल  को आपने घुड़की दे दी .किताब में मन लगाओ . बाबा ज़िंदा है यह बताने के लिए उनका खांसना जरूरी होता जा
रहा है . बच्चो ! इधर हमारे पास आओ हम बताते हैं .बच्चे फदर फदर भाग कर बाबा इ बगल बैठ जाते हैं - गौर से समझ लो. यह नौजवानों का जुलुस था . भीड़ और जुलुस में फर्खोता है
, भीड़ जूनून लेकर बहकती है , जुलूस होश में अपने हक के लिए तनकर चला करता है .यह नौजवानों का जुलूस था .

- आपने इस अँधेरे से के

से देख लिया की यह नौजवानों का जुलूस था ?
- तुमने नहीं  सुना किवे क्या बोल रहेथे ? बोल रहे थे -तवा कढाई सस्ती हो , दवा पढाई मुफ़्ती हो .   रोजी रोटी दे न सके , वो सरकार निकम्मी है , जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है
यह नौजवान का ही नारा हो सकता है , वो अपने लिए नही सब की बेहतरी के लिए उठ खडा हुआ है .लेकिन इस जुलुस में वो हन्नू भाई थे अब तो बूढ़े हो चले हैं ?
- बच्चे ! नौजवान का नाप उम्र से नही होता ,जज्बे से होता है नौजवान होने के लिए तीन शर्तें हैं जो इन्हें पूरा करे वो नौजवान है .एक - जो भविष्य के बारे में रंगीन सपना देखे ,
 दो - परमार्थवादी दृष्टि कोण हो और तीन - जोखिम उठाने की क्षमता हो .
- और ये जो नौजवान लोग सरस्वती शिशु में रोज शाखा लगाते हैं ?
-ये विधर्मी हैं , नौजवान कत्तई  नही हैं .ये भविष्य की बात ही नही करते , अतीत के अलावा इनके पास कुछ भी तो नही है . यह संवैधानिक संगठन भी नही है .इसका पंजीकरण
नही हुआ है .नका लेनदेन गुप्त रखा जाता है . इस गिरोह में महिलायें वर्जित हैं ये नौजवान नही हो सकते .
- तो जौनपुर का सबसे तेज तर्रार नौजवान कोइ है ?
- बहुत हैं , ओम प्रकाश श्रीवास्तव . हनुमान सिंह . हनीफ भाई . राजेश सिंह दया सागर राय . सुरेन्द्र त्रिपाठी , लेकिन दिक्कत क्या है की ये अभी बैठे मुद्दे की तलाश में हैं और
 मुद्दा लबे सडक पडा छटपटा रहा है .
- हमे स्कूल में बताया गया है की सरकार की आलोचना करना जुर्म है .
- तो उसने यह बताया होगा , जो इस तरह की बात करते हैं वे या तो जालिम होते हैं या जाहिल .
- फ्रांस का सबसे क्रूर तानाशाह हुआ है  द गाल . सरकारी कारकूनो ने ड गाल से शिकायत किया की जाँ पाल सार्त्र आपके खिलाफ लिखते बोलते हैं उसे देश निकाला दे दिया जाय
- द गाल ने जवाब दिया था - लोग फ्रांस को डगाल की वजह से जानते हैं .
- बाबा ! हम भी जुलुस में जाँय. ?
- इसका फैसला तुम्हे करना है .
- पापा मना करेंगे ?
- प्रहलाद के पापा ने भी तो मना किया था . ध्रुव , प्रहलाद आज भी जुलुस में साथ साथ चलते हैं . इन्ही लोंगो का दिया हुआ हथियार है सिविल नाफरमानी .गांधी जी ने सारी दुनिया
को दे दिया .
दोनों बच्चे दरवाजा खोल कर बाहर निकल गये . बाप मुस्कुरा रहा है .
आपको याद है जौनपुर कब बूढा  हुआ ?

Monday, October 9, 2017

chanchal: बतकही / चंचलकहाँ तो तय था , चरागाँ  हर एक घर के ...

chanchal: बतकही / चंचल

कहाँ तो तय था , चरागाँ  हर एक घर के ...
: बतकही / चंचल कहाँ तो तय था , चरागाँ  हर एक घर के लिए . ---------------------------------------------------------------------------------...
बतकही / चंचल

कहाँ तो तय था , चरागाँ  हर एक घर के लिए .
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   सियासत बहुत दुरुस्त सलीका है , बशर्ते आप उसे ओढने बिछाने की तमीज जानते  हों .इतिहासिक तथ्यों  को सिलसिलेवार सामने रख कर देखा जाय तो देश में महज एक पार्टी है
जो मुल्क  की नब्ज पर हाथ रख कर फैसला करती है , वह है कांग्रेस .अगर आप अभी हाल में  में जवान हुए हैं तो आप को यह बात कम पचेगी .क्यों की आपकी भूख आप नही तय  कर पा रहे हैं
वह कहीं और से तय हो रहा है .आपको उत्तेजित करने वाला नारा चाहिए . छोटी सी झपकी के बाद आपको लाखों लाख रुपया चाहिए . आपको सुंदर पर कभी न पूरा होने वाला ख्वाब दिखा कर भूखा बनाया गया है . जब तक तुम उस से बाहर नही निकलो गे, कांग्रेस को हजम करने में तुम्हे दिक्कत होगी . कांग्रेस तुम्हे , तुम्हारे हाथ में फावड़ा देगी और कहेगी 'रचना ' में लग जाओ , कांग्रेस तुम्हे जाजिम देगी ,इस पर बैठ कर फैसला करो तुम खुद मुख्तार हो .समाज में जहां कहीं भी अन्याय दिखे उसका विरोध करो . डरो मत . तुम कमजोर नही हो
क्यों की तुम अहिंसा के साथ हो . ' न मारेंगे , न मानेगे ' यही तो है सिविल नाफ्र्नानी . बड़ी से बड़ी ताकत झुकी है इस सविनय अवज्ञा पर .कांग्रेस यह सात्विक सबक देगी .लेकिन वो क्या दे रहे हैं ? कभी सोचा है ? उत्तेजक और हिंसक नारे . बीस इकट्ठे हो जाओ तो हमला कर दो किसी भी निरीह पर .आरोप बहुत हैं कुछ भी लगा दो . मसलन यह मांस खाता है . देश द्रोही बोल दो . तुम्हे सिखाया जा रहा है - तुम हो बाकी सब तुम्हारे साथ हैं , जो असहमत हैं वे देश द्रोही हैं . वे तुम्हे यह कभी नही जानने देंगें की हिंसा की उम्र बहुत छोटी होती है . हिंसा की डगर काँटों से भरी होती है . खुबसूरत तो होगी ही नही . चलो अहिंसा को देखो , ध्रुव , प्रहलाद , बुद्ध , और गांधी .सब एक बात कहते हैं एक डगर दिखाते हैं . अप्प दीपो भव , अपना प्रकाश
खुद बनो . आजादी  की जंग कैसे लड़ी गयी , इसमें सिविल नाफ़रमानी का हथियार कैसे चला और जीता उसकी कुछ बानगी देखो / हम आपको ले चलते हैं . आपके पुरखों की जिन्दगी के पास . आँख बंद कर के आकृति बनाओ . आज से सौ साल पहले यानी १९१७ में एक अधनंगा फकीर ( बापू के लिए यह नाम ब्रिटेन के प्रधान मंत्री चर्चिल ने दिया था , ) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में आता है . और कांग्रेस का रुख बदल देता है . पहला आन्दोलन
  चम्पारण
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बिहार में एक जिला है चम्पारण . वहा के किसानो से अंग्रेज सरकार  नील की खेती जबरन कराती थी .जितनी जमीन है उसका तीसरा भाग नील की खेती के लिए आरक्षित रखा रहता था . ऐसा न करने पर किसानो को तरह तरह से प्रताड़ित किया जाता था . एक गरीब किसान राज कुमार शुक्ला गांधी जी से मिले और उन्हें चम्पारण चलने के लिए राजी कर लिए . गांधी जी चम्पारण  पहुच रहे हैं इसकी खबर उस इलाके में आगकी तरह फ़ैल गयी  और स्टेशन पर अपार भीड़ जुटी . अंग्रेज सरकार ने गांधी जी से कहा आप तुरत वापस जाइए . गांधी जी कहा - हम भारत के नागरिक हैं हमे कहीं भी घुमने की आजादी है . पुलिस ने गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया . यह खबर पुरे देश में फ़ैल गयी . नतीजा हुआ की बेतिया अदालत जहां गांधी को पेश होना था लाखों की भीड़ ने अदालत को घेर लिया . याद रखिये भारत की आजादी का यह ' टर्निंग प्वाइंट ' माना जाता है जब पहली बार गांधी जी अपना बचाव नही करते बल्कि अंग्रेजी कानून को ही चुनौती देते हैं तुम्हारा कानून ही गलत है . जज ने कहा - सौ रूपये के मुचलके पर रिहा किया जाता है . गांधी जी ने सौ रुपया भी देने से मना कर दिया विवस होकर जज को गांधी जी को छोड़ना पडा . इस तरह चम्पारण का किसान जीता ही नही उसके हाथ में एक निहायत ही खतनाक हथियार मिल गया जालिम से लड़ने के लिए , वह है - सिविल नाफरमानी / आगे चल कर इस सिविल नाफ़रमानी को इस तरह परिभाषित किया - जालिम का कहा , न मानना ही सिविल नाफरमानी है .यदा रखना यही है ' न मारेंगे , न मानेगे ' आज तक यह अहिंसक हथियार आपके पास है बाद बाकी आप जाने .

Sunday, October 8, 2017

काशी विश्व विद्यालय ; जीत गयी छात्राएं
चंचल

     देश नही, दुनिया का सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय है . परिसर में तकरीबन डेढ़ लाख की आबादी एक साथ रहती है / दिलचस्प बात यह है की जिसके लिए यह संस्थान बना
वह है विद्यार्थी और उसकी तादात सबसे कम है . यहाँ बमुश्किल से कुल बीस हजार छात्र होंगे बाद बाकी कर्मचारी और अध्यापक हैं . कुलपति इस संस्थान ' केयर टेकर ' होता है .जो इस परिवार को जनतांत्रिक तरीके से चलाता है और मुख्यतया शिक्षण और प्रशिक्षण गतिविधिया .लेकिन यहाँ जो भी कुलपति आता ही , यहाँ की सुविधाये, साधन , और रुआब का खाका देख कर उस चका चौंध का शिकार हो जाता है और तानाशाह की तरह व्यवहार करने लगता है . इसके इस तानाशाही स्वरुप को और भी खुला मैदान मिलता है जब छात्र संघ कमजोर हो या हो ही नही . इस समय काशी विश्व विद्यालय जो चर्चा में आया उसके पीछे यही कुलपति की ताना शाही खेल ही रहा है . ऐसा नही की य्ह्पहले कुलपति हैं जन्होने अपनी मर्जी से विश्वविद्यालय का संचालन किया , इसके पहले भी इससे ज्यादा मजबूत और 'ताकतवर ' कुलपति आये और जम कर हुकुमत करके गये लेकिन उनके उपर इस तरह के आरोप नही लगे जी इस कुलपति पर लग रहे हैं . यह कुलपति संघ का कार्यकर्ता है , यह घोषणा खुद कुलपति ने किया है . केंद्र में और राज्य में भी संघ की सरकार है .जाहिर है की कुलपति कोम्न्मानी करने की खुली छुट  मिल  गयी .. अब यहाँ से कुलपति ने ओ काम शुरू किये .एक - संघ के उसूल को लादना शुरूकिया .और दुसरा धन की उसूली .संघिकार्यक्र्म की गतिविधियों को विश्वविद्यालय द्वारा संचालित करने लगा . संघी व्याख्यान . सेमीनार , व अन्य कार्य क्रम विश्वविद्यालय के  स्थायी कार्यक्रम बन गये .इसमें राजनीति विभाग के अध्यक्ष को साथ जोड़ा जो की खुद संघ का घोषित कार्यकर्ता रहा . अगर विश्वविद्यालय के तीन सालों की जांच हो और कार्यक्रमों पर आनेवाले खर्च और उसमे भागीदारों के नाम उजागर हों तो सब एक मस्ट संघी निकले गें .
  दुसरा - इस मौजूदा कुलपति गिरीश चन्द्र कुलपति बनते ही सबसे पहले पूर्व कलपती  द्वारा नियुक्त लोंगों को दिक्कत में डालना शुरू कर दिया यहाँ तक की उनके नियुक्तियों को भी अवैध करके उन्हें निकालने का एक तरफा फैसला कर लिया .और फिर नई नियुक्तियों में मनमानी पैसा लेता रहा कुल तीन सौ के उपर हुयी नियुक्तियों पर शक की सुई लटकी पडी है .और यह जांच के दायरे में है .दिल चस्प बात है की नियुक्ति कमिटी और इक्ज्क्युतिव कमेटी दोनों का सदर कुलपति ही होता है . इसने वहाँ भिम्न्मानी की है और इसतरह से की एक बलात्कार का आरोपी नही बल्कि सजायाफ्ता डाक्टर ओ पी उपाध्याय को हास्पिटल का स्थायी अधीक्षिक नियुक्त कर दिया . विश्व विद्यालय में इन दोनों बातों कोलेकर चिंगारी सुलगती रही . इसी बीच कुलपति ने छात्र्राओं के अधिकारों का अतिक्रमण कर के लिंग के आधार पर बाँट कर पीछे धकेल दिया . कुलपति का आदेश निकला पहले ड्रेस कोड - लडकियां क्या पहने , क्या न पहने , फिर दुसरा कानून आया - छात्राएं निरामिष भोजन ही खा सकती हैं . तीसरा कानून आया - कर्फ्यू टाइम . ८ बजे के पहले हर हाल में छात्र्राओं को छात्रावास में अपने आपको बंद कर लेना पडेगा . रात में मोबाइल सुविधा से लडकियां वंचित कर दी गईं .शाम से केन्द्रीय पुस्तकालय में छात्र्राओं को जाने पर रोक्ल्गा दी गयी .यह सब सुलगता रहा . अचानक एक विस्फोट हो ही गया .
        २० सितम्बर को फाइन आर्ट्स कालेज की एक लड़की को कई अवांछनीय सोह्दों ने  छेड़ा , और जब लड़की ने नजदीक ही बैठे प्राक्तोरिय्ल बोर्ड के लोंगो से शिकायत किया तो उधर से जवाब मिला - इतनी देर सर क्यों वापस जा रही हो , चुपचाप हास्टल जाओ की रेप होने तक यहीं रुकी रहोगी . यह वारदात महिला छात्रावास में आग की तरह फैली और लडकिया प्रदर्शन करने लगी . मुख्य द्वार बंद हो गया . हजारों छात्र्राओं ने अद्भुत एकता का परिचय दिया और बिलकुल अहिंसक तरीके से .दुसरे दिन उसी रास्ते से प्रधानमन्त्री को जाना था .यह संयोग ही था की इसी बीच प्रधान मंत्री का काशी आगमन हो गया . यदि मोदी जी कार्यक्रम न बदलते और छात्र्राओं को सुरक्षा मिलेगी , का आशास्वान भर दे देते तो सब वहीँ  शांत हो जाता लेकिन ऐसा नही हुआ और नतीजा यह निकला की जिला प्रशासन और विश्वविद्यालय प्रशासन ने सामूहिक रूप से यह नतीजा निकाल लिया की मोदी जी ने छात्र्राओं से निपटने के लिए खुली छुट दे दी है .फिर तोजो नंगा नाच शुरू हुआ वह शायद ही किसी सभ्य देश में हुआ होगा . छात्रा वास का गेट तोड़ कर  पुरुष पुलिस ने महिलाओं को घसीट घसीट कर मारना शुरू किया . दो दिन बाद उत्तर प्रदेश किसरकार हरकत में आयी और पुलिस के इस निकम्मी हरकत पर जांच बैठाया है . विश्वविद्यालय बंद कर दिया गया है लेकिन आग सुलग रही है .

Monday, September 11, 2017

chanchal:  श्रद्धांजली / चंचल११ सितम्बर महादेवी वर्मा  की प...

chanchal:  श्रद्धांजली / चंचल
११ सितम्बर महादेवी वर्मा  की प...
:  श्रद्धांजली / चंचल ११ सितम्बर महादेवी वर्मा  की पुण्यतिथि थी --------------------------------------------  ७८ का वाकया है . हम काशी विश...
 श्रद्धांजली / चंचल
११ सितम्बर महादेवी वर्मा  की पुण्यतिथि थी
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 ७८ का वाकया है . हम काशी विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष थे , हमारे साथ भाई महेंद्र नाथ पांडे महामंत्री थे (इस समय उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष हैं ) एक दिन अल सुबह हम
अखबार पढ़ रहे थे .अचानक एक खबर ने चौका दिया , खबर थी मुंशी प्रेमचंद पर एक सेमीनार का आयोजन साहित्य अकादमी ने किया है और यह आयोजन बनारस के एक्पांच सितारा
होटल में है जिसे महादेवीवर्मा जी संबोधित करेंगी .अजीब कशमकश के बीच मन उलझ गया . कहाँ  मुंशी प्रेमचंद , कहाँ उनका गाँव , होरी , घीसू ,पूस की रात , कफन , सद्गति ठाकुर का कुंवा , कहाँ पांच सितारा होटल . महेंद्र नाथ पांडे के लिए एकछोटा सा नोट लिख कर राधे चपरासी को दे दिया किजब पांडे जी आवे उन्हें यह कागद दे देना . और हम दो चार दोस्तों को लेकर होटल की तरफ निकल लिए . होटल के मुख्यद्वार पर हम खड़े होकर महादेवी जी का इन्तजार करने लगे . इतने में एक गाडी रुकी और महादेवीजी नीचे उतरी.प्रणाम नमस्कार हुआ
उन्होंने हमसे पूछा - कार्यक्रम   में चल रहे हो ?
हमने कहा - नही ! हम बुआ का अपहरण करने आये हैं . ( हम लोग महादेवी जी बुआ कहते थे )
जोर से हंसी - हाँ रे , सही किया , बड़ा पाप लगता .भैया ( मुंशी प्रेमचंद को वे भैया बोलती थी ) की आत्मा हमे कभी नही माफ़ करती . महादेवी जी हमारी गाडी में बैठ गयी , बाकी जो साथ गये थे सब नीचे रह गये . महादेवी जी ने पूछा वे बच्चे कैसे आयेंगे ? हमने बताया सब आ रहे हैं , जिस होटल की गाडी से महादेवी जी आयी थी , वह अब उन बच्चों के कब्जे में और वह गाडी पीछे पीछे आ रही थी . जब हम विश्व  विद्यालय पहुंचे तब तक भाई महेंद्र नाथ पांडे ने कला संकाय का प्रेक्षा गृह खुलवा कर लॉस स्पीकरवगैरह का  इंतजाम कर के कहीं दुसरे कार्यक्रम में जा चुके थे .हमने कुलपतिजी कोपुरिकथा सूना कर कहाकि आप आ जाँय , महादेवी जी का स्वागत करके  चले जाइए . महादेवी जी को सुनने के लिए जो भीड़ इकट्ठा हुयी हमे स्थान बदलना पडा . तो मधुवन  के मुक्ताकाश में घास पर महादेवी जी बैठ गयी और वहीँ से मुंशी प्रेमचंद जोजो संस्मरण सुनाये वे मील के पत्थर हैं . एक हिस्सा आप भी सुन लीजिये .
     मुंशी प्रेमचंद और महादेवी वर्मा में, मुह बोले  भाई बहन का रिश्ता था . गर्मियों के दिन थे . एक दिन अचानक मुंशी प्रेमचंद महादेवी से मिलने उनके घर इलाहाबाद पहुँच गये . पहुचने की कोइ पूर्व सुचना महादेवी जी को नही थी . दोपहर को भोजन के बाद महादेवी जी  सोने चली गयी थी तब मुंशीजी पहुंचे .उनके बगीचे में एक माली काम करता दिख गया जिसने मुंशी जीको बताया की महादेवी जी अब तोतीं बजे सो कर उठेंगी . मुंशी प्रेमचंद ने कहा -कोइ बात नही , हम तीन बजे ही मिल लेंगे .पूरी दोपहरी मुंशी जी और वह माली एक दुसरे से बतिआते रहे . मुन्शिजिको उसने गुड खिला कर पानी पिलाया .दोपहर बाद जब महादेवी जी उठी तो  उन्हें हैरानी हुयी . सहजता की शख्सियत थे मुंशी प्रेमचंद .महादेवी जी धारा प्रवाह बोल रही थी , विश्वविद्यालय घेरे खड़ा उन्हें सुनता रहा . दिल्ली से साहित्य अकादमी के साहित्यकार आये थे वे सब होटल की एक बस लेकर महादेवी के इस कार्य क्रम में भाग लिए . इसी आर्य्क्रम ने हमे साहित्य में कई आचे दोस्त भी दिए . विष्णु खरे , गुलशेर खान  शानी , गिरधर राठी वगैरह .
        इससे भी ज्यादा दिलचस्प वाकया यूँ हुआ .
अपने छात्र जीवन में महादेवी वर्मा जी चाहती थी उनकी पढाई  काशी विश्व विद्यालय से हो . उन्होंने प्रवेश फ़ार्म भरा .लेकिन विश्व विद्यालय ने उस फ़ार्म को रिजेक्ट कर दिया सो महादेवी जी दाखिला नही ले पायी .एकदिन वह भी आया जब विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा जलसा दीक्षांत समारोह किमुख्य अतिथि बन कर विश्वविद्यालय आयी .
आज भारत का साहित्य समाज अपनी इस  महान रचनाकार महादेवी वर्मा को सादर श्रद्धांजली दे रहा है .
( बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी का हिंदी नाम है काशी विश्व विद्यालय )

chanchal: चिखुरी / चंचलराजनीति - राजनीति = सब कुछ--------...

chanchal: चिखुरी / चंचल

राजनीति - राजनीति = सब कुछ
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: चिखुरी / चंचल राजनीति - राजनीति = सब कुछ -----------------------------------------------------------------------------------------------...
चिखुरी / चंचल

राजनीति - राजनीति = सब कुछ
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राजनीति की सीधी और सरल परिभाषा है - एक सोच जो आख़िरी इंसान तकको बेहतर जीवन दे .ऋग्वेद की एक ऋचा है जानाति इछति अथ करोति .इच्छा , ज्ञान और शक्ति .
कुछ भी करने के लिए ये तीन तत्व जरूरी होते हैं . राजनीति  इन्ही तीन तत्वों से स्थापित होती है . इसमें साध्य अगर पवित्र है तो साधन भी उतने ही पाक साफ़ होने चाहिए .आजादी की लड़ाई में हमने यही रास्ता अख्तियार किया और गांधी जी के नेतृत्व में आजादी हासिल किया .यहाँ एक छोटा सा सवाल उठाया जा सकता है जो अक्सर नही उठाया जाता . जिस समय कांग्रेस अंग्रेजी साम्राज्य से टक्कर ले रही थी एनी दल क्या कर रहे थे ? और कौन  कौन दल सक्रीय रहे . कई संघन ऐसे रहे जिनका मानना था की सत्ता हथियार से बदली जा सकती है .इसमें कई नाम हैं शहीद भगत सिंह , चंद्रशेखर आजाद , सुभाष चन्द्र बोस , वगैरह . दूसरा बड़ा दल था कांग्रेस .जो बापू के सत्य और अहिंसा को सामने  रख कर सिविलनाफ़रमानी के हथियार से अंग्रेजी निजाम को टक्कर दे रहा था . सोवियत रूस के उदय के बाद भारत में साम्यवादी दल भी बन चुके थे लेकिन उनकी नीतियाँ भारतीय न होकर अंतर्राष्ट्रीय रही और वह दल उसी के अनुसार अपनी नीतिया बना रहे थे .उदाहरण के लिए जब ४७ का कांग्रेस ने  अंग्रेजो भारत छोडो का आन्दोलन चलाया तो साम्यवादियों ने न्ग्रेजों का साथ दिया . क्यों की उस समय सोवियत सरकार हिटलर के खिलाफ अंग्रेजों के साथ हो चुका था . १९२५ में बना रास्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उससे भी जलील हरकत पर उतर कर अंग्रेजों का साथ दे रहे थे .दिक्कत क्या है की हम इस पीढ़ी को इतिहास नही दे पाए .हमने अनेक रास्तों से नई पीधिको काँवरिया और डी जे तो दे दिए लेकिन उसे यह नही बता पाए कि बाचा खान जिन्हें लोग सरहदी गांधी के नाम से जानते हैं , ने इस मुल्क में लाल कुर्ती नाम से खुदाई खिदमदगार नाम की संस्था बना कर हिन्दू और मुसलमान दोनों का विशवास अर्जित किया .लेकिन आज ?
     सत्ता के मद में चूर सरकारी दल के लोग अपनी आलोचना तक सुनने को तैयार नही हैं . अभी क्ल५ सितम्बर को कर्नाटक की एक जांबाज पत्रकार गौरी लंकेश कोगोलिमार कर हत्या कर दी गयी . हम हिंदी पट्टी के लोग अपने कुंए में बैठ कर देश  दुनिया खबर पर वक्त जाया करेंगे लेकिन अपने पड़ोस की बड़ी घटना सेकत्तई दूर रहते आये हैं .कर्नाटक दक्षिण भारत का प्रसिद्द सूबा है . अब तक यह  साम्प्र्दैक आग की लत से बहुत दूर रहा है लेकिन विगत कुछ वर्षों से यहाँ भी साम्प्रदायिक सौहार्द्य बिगड़ा है .इस सौहार्द्य को बनाये रखने के लिए यहाँ समाजवादी लोहियावादी लोंगो का एक बड़ा जमावड़ा रहा जिसमे केवल राजनीतिक लोग ही नही रहे बल्कि कला और पत्रकारिता के भिलोग रहे हैं .इनमे ग्गिरिश कर्नाड , यु आर अनंत मूर्ति .बी व् कारंत , पी लंकेश , जैसे बहुत नाम हैं . कल जिसकी ह्त्या की गयी वह प्रसिद्द समाजवादी , लेखक , पत्रकार , फिल्म निर्माता पी लंकेश की बेटी गौरी लंकेश है .गौरी का गुनाह इतना भर रहा की वह हिन्दू साम्प्रदायिकता और उसकी हिंसक राजनीति की खुली मुखालफत करती रही . आज पत्रकारिता के इतिहास का का यह काला दिन है जब एक पत्रकार को उसे मौत के घात इस लिए उतार दिया गया कईं की उसकी जुबान में ताकत थी . सच बोलने का जज्बा था . पत्रकारिता की दुनिया में लंकेश पत्रिका बगैर किसी विज्ञापन के छपती रही .अपने आखिरी सम्पादकीय में गौरी ने संघ के अफवाह उड़ाने की कला पर विस्तार से लिखा था . गणेश चतुर्दशी के अवसर पर संघ ने पूरे कर्नाटक में वशिला माहौल बनाया लेकिन उसे सरकार ने उघार कर दिया .
       अब वक्त है किलोग सही रास्ते को चुने और अपनी बेहतरीन दुनिया बनाएं
गौरी लमेश का बलिदान अकारथ नही जायगा .
सादर श्रद्धांजली गौरी लंकेश को .

Monday, August 28, 2017

chanchal: chanchal: चिखुरी चिचिआने / चंचलजब पाखण्ड के आतंक स...चिखुरी चिचियाने / चंचल अंदर बलात्कार होता रहा ,हम राम धुन गाते रहे ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ हम दुनिया के सामने , तीसरी बार नंगा हो रहे हैं . ३० जनवरी १९४८ , जब हमने एक निहत्थे फ़कीर को सरे आम उस समय गोली मार कर ह्त्या कट दी , जब वह राम धुन के साथ लोंगो को सद्भाव से रहने की अपील करने जा रहा था . किस जाहिल सोच ने गोली चलाई थी ? जवाब सब को मालूम है , सारी दुनिया जानती है वह छद्म 'हिन्दू ' सोच . गौर करिए उस अंग्रेज महिला के जवाब को जो उसने एक भातरीय को दिया था . भारतीय नौजवान अपने देश की तारीफ़ में बोल रहा था- हम कितने महान हैं जिस धरती पर बुद्ध और गांधी पौदा हुए हैं . अंग्रेज महिला ने पलटकर पूछा था - इसीलिये तुम महान हो किएक निहत्थे फ़कीर को गोलियों से छलनी कर डाले ? इसका जवाब हम आज तक नही दे पाए हैं . हमे सारी दुनिया के सामने किस सोच ने शर्मिंदा होने को मजबूर किया है ? यह सवाल जब तक नही दे पाओगे , तब तक मेहरबानी करके राष्ट्रप्रेम की बात मत करो लोग तुम पर हँसेंगे . बापू की ह्त्या पर वायसराय की टिप्पणी थी - अगर यह महात्मा गुलाम भारत में मरता तो अंग्रेज अपने उपर लगे कलंक को कभी नही मिटा पाते .एक अन्ग्रेज्की सोच थी और एक ये हिन्दू की सोच ? दूसरी बार हम शर्मिन्दा हुए ६ दिसम्बर १९९२ को जब अयोध्या में बारी मस्जिद गिरा दी गयी .अब तक हम सारी दुनिया में दो बातों के लिए इज्जत पाते थे , एक -हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और दुसरा सबसे बड़ा तर्क की हम दुनिया में सबसे बड़े सद्भावी देश हैं हना हे एक को अपने अपने मजहब में में जीने की खुली आजादी है .६ दिसम्बर ९२ कोक्या हुआ ? एक धर्म की आड़ में कुल डेढ़ लाख की भीड़ अयोध्या में जुटी और उसने दुसरे धर्म के इबादत गाह पर हमला करके उसे ध्वस्त कर दिया .और दुनिया में यह दर्ज हो गया की भारत एक धर्म विशेष का मुल्क है जहां एनी धर्मों को सलीके से जीने की सुविधा नही है . हम इर शर्मिन्दा हुए और किस सोच ने हमे शर्मिन्दा किया ? अगली नस्ल इसका जवाब खोजेगी लेकिन कमबख्त यह पीढ़ी तो नाकारा साबित ही हुयी , किसने हमे सोच के आधार पर बधिया किया है ? तीसरी बार पंचकुला ने हमे लबे सडक नंगा कर दिया और हम बेबस होकर इधर उधर झाँक रहे हैं . बलात्कार एक बीमारी है कुछ शीत देशों को छोड़ दिया जाय तो यह बीमारी कमोबेश हर मुल्क में है , हर मुल्क के पास इसका इलाज भी है , बीमार को सजा मिलती है बगैर किसी भेद भाव के . रंग . नस्ल. धन. वोह्दा , रूतबा नके यहाँ कोइ मायने नही रखता , न्याय सब केलिए बराबर है . लेकिन कल पंचकुला की घटना ने हमे नये सिरे से शर्मिन्दा किया है . जब शबे की सरकार और खुद केंद्र की सरकार चाँद वोटो केलिए अपने जमीर का ही सौदा कर ले , यह कल उघार हो गया जब बलात्कार का अपराधी जगमीत न्यायालय में अप्राधिघोषित हुआ तो पहली बार जगमीत राम र हीम को लगा की कल तक हम जिन अबोध भोली भाली जनता को छल कर उसे लूट रहे थे , उसका तन, मन और धन आज वो खुद लुट गया है ,जिसने उससे वायदा किया था . इन अपराधों से मुक्त कराने के लिए वे खुद जनता की अदालत में अपराधी बने खड़े हैं .कल हरियाणा और केंद्र का नेतृत्व बिलकुल नंगा हो गया जब जगमीत की बेटी ने खुले आम यह रहस्य खोल दिया की भाजपा और पापा से जो डील हुआ था की तुम हमे वोट दो हम तुम्हे बलात्कार समेत जितने भी जुर्म हैं उनसे बरी करा देंगे .यह दुनिया की पहली बदचलन सरकार है जो काठ की कुर्सी के लिए तमाम जरायम पेशे को अख्तियार किये बैठी है और एक धर्म की आड़ में दुहाई देगी हिन्दू होने की . हिन्दू सभ्यता का सबसे बड़ा कातिल अगर कोइ है तो वो ये ही हैं . अभी और लिखते लेकिन चिखुरी उठ गये , मद्दू पत्रकार एक नई खबर लाये है . आश्रम में दोलाख की एक गाडी अभी जला दी गयी है

chanchal: chanchal: चिखुरी चिचिआने / चंचलजब पाखण्ड के आतंक स...: chanchal: चिखुरी चिचिआने / चंचल जब पाखण्ड के आतंक से समाज न ... : चिखुरी चिचिआने / चंचल जब पाखण्ड के आतंक से समाज न  जूझ पाए ------------...चिखुरी चिचियाने / चंचल

 अंदर बलात्कार होता रहा ,हम राम धुन गाते रहे

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हम दुनिया के सामने , तीसरी बार नंगा हो रहे हैं .

३० जनवरी १९४८ , जब हमने एक निहत्थे फ़कीर को सरे आम उस समय गोली मार कर  ह्त्या कट दी , जब वह राम धुन के साथ लोंगो को सद्भाव से रहने की अपील करने जा रहा था .

किस जाहिल सोच ने गोली चलाई थी ?

जवाब सब को मालूम है , सारी दुनिया जानती है वह छद्म 'हिन्दू ' सोच . गौर करिए उस अंग्रेज महिला के जवाब को जो उसने एक भातरीय को दिया था . भारतीय नौजवान अपने देश की तारीफ़ में बोल रहा था- हम कितने महान हैं जिस धरती पर बुद्ध और गांधी  पौदा हुए हैं . अंग्रेज महिला ने पलटकर पूछा था - इसीलिये तुम महान हो किएक निहत्थे फ़कीर को गोलियों से छलनी कर डाले ? इसका जवाब हम आज तक नही दे पाए हैं . हमे सारी दुनिया के सामने किस सोच ने शर्मिंदा होने को मजबूर किया है ? यह सवाल जब तक नही दे पाओगे , तब तक मेहरबानी करके राष्ट्रप्रेम की बात मत करो लोग तुम पर हँसेंगे . बापू की ह्त्या पर वायसराय की टिप्पणी थी - अगर यह महात्मा गुलाम भारत में मरता तो अंग्रेज अपने उपर लगे कलंक को कभी नही मिटा पाते .एक अन्ग्रेज्की सोच थी और एक ये हिन्दू की सोच ?

दूसरी बार हम शर्मिन्दा हुए ६ दिसम्बर १९९२ को जब अयोध्या में बारी मस्जिद गिरा दी गयी .अब तक हम सारी  दुनिया में दो बातों के लिए इज्जत पाते थे , एक -हम दुनिया के सबसे बड़े

लोकतंत्र हैं और दुसरा सबसे बड़ा तर्क की हम दुनिया में सबसे बड़े सद्भावी देश हैं हना हे एक को अपने अपने मजहब में में जीने की खुली आजादी है .६ दिसम्बर ९२ कोक्या हुआ ? एक धर्म की आड़ में कुल डेढ़ लाख की भीड़ अयोध्या में जुटी और उसने दुसरे धर्म के इबादत गाह पर हमला करके उसे ध्वस्त कर दिया .और दुनिया में यह दर्ज हो गया की भारत एक धर्म विशेष का मुल्क है जहां एनी धर्मों को सलीके से जीने की सुविधा नही है . हम इर शर्मिन्दा हुए और किस सोच ने हमे शर्मिन्दा किया ? अगली नस्ल इसका जवाब खोजेगी लेकिन कमबख्त यह पीढ़ी तो नाकारा साबित ही हुयी , किसने हमे सोच के आधार पर बधिया किया है ?

तीसरी बार पंचकुला ने हमे लबे सडक नंगा कर दिया और हम बेबस होकर इधर उधर झाँक रहे हैं . बलात्कार एक बीमारी है कुछ शीत देशों को छोड़ दिया जाय तो यह बीमारी कमोबेश हर मुल्क में है , हर मुल्क के पास इसका इलाज भी है , बीमार को सजा मिलती है बगैर किसी भेद भाव के . रंग . नस्ल. धन. वोह्दा , रूतबा नके यहाँ कोइ मायने नही रखता , न्याय सब केलिए बराबर है . लेकिन कल पंचकुला की घटना ने हमे नये सिरे से शर्मिन्दा किया है . जब शबे की सरकार और खुद केंद्र की सरकार चाँद वोटो केलिए अपने जमीर का ही सौदा कर ले , यह कल उघार हो गया जब बलात्कार का अपराधी जगमीत न्यायालय में अप्राधिघोषित हुआ तो पहली बार जगमीत राम र हीम को लगा की कल तक हम जिन अबोध भोली भाली जनता को छल कर उसे लूट रहे थे , उसका तन, मन और धन आज वो खुद लुट गया है ,जिसने उससे वायदा किया था . इन अपराधों से मुक्त कराने के लिए वे खुद जनता की अदालत में अपराधी बने खड़े हैं .कल हरियाणा और केंद्र का नेतृत्व बिलकुल नंगा हो गया जब जगमीत की बेटी ने खुले आम यह रहस्य खोल दिया की भाजपा और पापा से जो डील हुआ था की तुम हमे वोट दो हम तुम्हे बलात्कार समेत जितने भी जुर्म हैं उनसे बरी करा देंगे .यह दुनिया की पहली बदचलन सरकार है जो काठ की कुर्सी के लिए तमाम जरायम पेशे को अख्तियार किये बैठी है और एक धर्म की आड़ में दुहाई देगी हिन्दू होने की .

हिन्दू सभ्यता का सबसे बड़ा कातिल अगर कोइ है तो वो ये ही हैं .

अभी और लिखते लेकिन चिखुरी उठ गये , मद्दू पत्रकार एक नई खबर लाये है . आश्रम में दोलाख की एक गाडी अभी जला दी गयी है


चिखुरी चिचियाने / चंचल
 अंदर बलात्कार होता रहा ,हम राम धुन गाते रहे
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हम दुनिया के सामने , तीसरी बार नंगा हो रहे हैं .
३० जनवरी १९४८ , जब हमने एक निहत्थे फ़कीर को सरे आम उस समय गोली मार कर  ह्त्या कट दी , जब वह राम धुन के साथ लोंगो को सद्भाव से रहने की अपील करने जा रहा था .
किस जाहिल सोच ने गोली चलाई थी ?
जवाब सब को मालूम है , सारी दुनिया जानती है वह छद्म 'हिन्दू ' सोच . गौर करिए उस अंग्रेज महिला के जवाब को जो उसने एक भातरीय को दिया था . भारतीय नौजवान अपने देश की तारीफ़ में बोल रहा था- हम कितने महान हैं जिस धरती पर बुद्ध और गांधी  पौदा हुए हैं . अंग्रेज महिला ने पलटकर पूछा था - इसीलिये तुम महान हो किएक निहत्थे फ़कीर को गोलियों से छलनी कर डाले ? इसका जवाब हम आज तक नही दे पाए हैं . हमे सारी दुनिया के सामने किस सोच ने शर्मिंदा होने को मजबूर किया है ? यह सवाल जब तक नही दे पाओगे , तब तक मेहरबानी करके राष्ट्रप्रेम की बात मत करो लोग तुम पर हँसेंगे . बापू की ह्त्या पर वायसराय की टिप्पणी थी - अगर यह महात्मा गुलाम भारत में मरता तो अंग्रेज अपने उपर लगे कलंक को कभी नही मिटा पाते .एक अन्ग्रेज्की सोच थी और एक ये हिन्दू की सोच ?
दूसरी बार हम शर्मिन्दा हुए ६ दिसम्बर १९९२ को जब अयोध्या में बारी मस्जिद गिरा दी गयी .अब तक हम सारी  दुनिया में दो बातों के लिए इज्जत पाते थे , एक -हम दुनिया के सबसे बड़े
लोकतंत्र हैं और दुसरा सबसे बड़ा तर्क की हम दुनिया में सबसे बड़े सद्भावी देश हैं हना हे एक को अपने अपने मजहब में में जीने की खुली आजादी है .६ दिसम्बर ९२ कोक्या हुआ ? एक धर्म की आड़ में कुल डेढ़ लाख की भीड़ अयोध्या में जुटी और उसने दुसरे धर्म के इबादत गाह पर हमला करके उसे ध्वस्त कर दिया .और दुनिया में यह दर्ज हो गया की भारत एक धर्म विशेष का मुल्क है जहां एनी धर्मों को सलीके से जीने की सुविधा नही है . हम इर शर्मिन्दा हुए और किस सोच ने हमे शर्मिन्दा किया ? अगली नस्ल इसका जवाब खोजेगी लेकिन कमबख्त यह पीढ़ी तो नाकारा साबित ही हुयी , किसने हमे सोच के आधार पर बधिया किया है ?
तीसरी बार पंचकुला ने हमे लबे सडक नंगा कर दिया और हम बेबस होकर इधर उधर झाँक रहे हैं . बलात्कार एक बीमारी है कुछ शीत देशों को छोड़ दिया जाय तो यह बीमारी कमोबेश हर मुल्क में है , हर मुल्क के पास इसका इलाज भी है , बीमार को सजा मिलती है बगैर किसी भेद भाव के . रंग . नस्ल. धन. वोह्दा , रूतबा नके यहाँ कोइ मायने नही रखता , न्याय सब केलिए बराबर है . लेकिन कल पंचकुला की घटना ने हमे नये सिरे से शर्मिन्दा किया है . जब शबे की सरकार और खुद केंद्र की सरकार चाँद वोटो केलिए अपने जमीर का ही सौदा कर ले , यह कल उघार हो गया जब बलात्कार का अपराधी जगमीत न्यायालय में अप्राधिघोषित हुआ तो पहली बार जगमीत राम र हीम को लगा की कल तक हम जिन अबोध भोली भाली जनता को छल कर उसे लूट रहे थे , उसका तन, मन और धन आज वो खुद लुट गया है ,जिसने उससे वायदा किया था . इन अपराधों से मुक्त कराने के लिए वे खुद जनता की अदालत में अपराधी बने खड़े हैं .कल हरियाणा और केंद्र का नेतृत्व बिलकुल नंगा हो गया जब जगमीत की बेटी ने खुले आम यह रहस्य खोल दिया की भाजपा और पापा से जो डील हुआ था की तुम हमे वोट दो हम तुम्हे बलात्कार समेत जितने भी जुर्म हैं उनसे बरी करा देंगे .यह दुनिया की पहली बदचलन सरकार है जो काठ की कुर्सी के लिए तमाम जरायम पेशे को अख्तियार किये बैठी है और एक धर्म की आड़ में दुहाई देगी हिन्दू होने की .
हिन्दू सभ्यता का सबसे बड़ा कातिल अगर कोइ है तो वो ये ही हैं .
अभी और लिखते लेकिन चिखुरी उठ गये , मद्दू पत्रकार एक नई खबर लाये है . आश्रम में दोलाख की एक गाडी अभी जला दी गयी है

Monday, August 21, 2017

chanchal: चिखुरी चिचिआने / चंचलजब पाखण्ड के आतंक से समाज न ...

chanchal: चिखुरी चिचिआने / चंचल
जब पाखण्ड के आतंक से समाज न ...
: चिखुरी चिचिआने / चंचल जब पाखण्ड के आतंक से समाज न  जूझ पाए ------------------------------------------------------------------------------...
चिखुरी चिचिआने / चंचल
जब पाखण्ड के आतंक से समाज न  जूझ पाए
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   नवल उपधिया का कहना है ,- नाला पार पसिआने में दो औरतों का बाल काट दिया बा , और उ दोनों बेहोश अस्पताल में पडी हैं .
बार कटवा . पूर्वी उत्तर प्रदेश से  बढ़ते बढ़ते  पश्चिम की तरफ जा रहा है .जाहिर है उसी अनुपात में नमक मिर्च भी बढेगा . समाज में दहशत है . कयूम मिया के पास गंभीर इलाज है
' औरतें गर बाल छिलवा लें तो जान रहें कहें मगर यह तांता ही ख़त्म समझो . न रहेगा बांस , न बजेगी बासुरी .लखन कहार ने पूछा - तो जे केवल औरतों का ही कट  रहा है , मर्दों का नही ?
उमर दरजी ने टुकडा जोड़ा - जेकरा रही , उही का कटी न / कि लाल साहेब क कटी जे बर बख्त सफाचट रहते हैं . कोलई दुबे नई कहानी के साथ पेश हुए . पाकिस्तान की तरफ से अंग्रेजी
प्लास्टिक क काला भंवरा छोड़ा गया है और वह रात में उड़ता है औरतों को तलाश कर उन पर हमला करता है , छेदी बो ने अपनी आँखन देखी बताय रही हैं तमाम भीड़ जुटी है .गिरी ओझा
झाड फूंक में लग गये हैं . केसरिया कपड़ा से तन धको , कोइ असर नही होगा . कीन उपधिया ने तस्दीक किया - बात तो बिलकुल सही है . जन्तर मंतर में बहुत बल होता है रंग का बहुत असर होता है . उस दिन नही देखा अब अस्पताल के बिस्तर भी भगवा रंग में होंगे .गोरखपुर अस्पताल की नई सजावट नही देखा ? कीन की बात को नवल ने बीच में ही रोक दिया - गेरुआ रंग देख के कीड़ा मकोड़ा चूहा मच्छर सब भाग जाते हैं अब देखो अब तो जो बुलेट ट्रेन आय रही हैं उसके अंदर की रंगाई पोताई भी केसरिया रंग में है . जा रे जमाना ! कितना आसान इलाज्खोज निकाला इस सरकार ने .
बहुत देर तक चुप बैठे भिखई मास्टर ने एक छोटा सा सवाल पूछा -येसी वारदातें इसी मुल्क में होती हैं या दुसरे मुल्कों में भी ऐसा होता है ?
सवाल कठिन था , जाहिर है चुप्पी का फैलना .क्यों की इनमे से कोइ भी इस मुल्क के बाहर जाने की सोच भी नहीं सकता न ही उस तरह की पढाई लिखाई की है .सवाल का एक छोर
मद्दु पत्रकार ने कीन उपधिया की और उछाला - कीन बता सकते हैं विदेश के बारे में , काहे से की आज ये सरकारी पार्टी के गहरे सदस्य हैं और हर तीन घंटे बाद इनका प्रधान मंत्री
विदेश चला जाता है . सो विदेश की जानकारी कींन  को ज्यादा है . कीनसंजीदा हो गये . खैनी मले , सुरती ठोंके फिर मुह खोले - दुनिया में बहुत कम देश ऐसे हैं जहां ये सब अनोखी चीजें
मिलती हों हमारे प्रधानमंत्री जी यही तो बोलते हैं की दुनिया में सबसे कमाल के देश हैं . अचानक चिखुरी चीखे - चोप्प ! तब से बक बक किये जा रहा है , ससुरो तुमलोगों ने देश को कबाड़ा
बना कर छोड़ दिया है . रोयेंगी आने वाली नस्लें . गणेश को  दूध पिलाओ .अत्तर के हनुमान , गणेश सब दूध पीने लगे . भागे रे मुहनोच्वा आवा बा . अकेले जौनपुर में सौ के उपर लोग मारे गये तुम्हारी नालायकी के चलते . कितने विक्षिप्त , पागल , गजेडी . भिखमंगे मुह नोच्वा इ नाम पर मारे गये . नेवादा में रात में ट्रेन रुकी एक फौजी नीचे उतरा शराब के नशे में था . लोगों ने घेर कर मार डाला , मुकदमा आज तक चल रहा है . गलती जनता की नही थी . प्रतिनिधि था , सांसद था , बेदान्ती . घूम घूम कर भाषण दिया है मोह नोचावा के बारे में . अफवाहों के उस्ताद हो , अभी तुम्हारा एक जिम्मेदार नेता बोल रहा है मन्त्र से चीन की सेना को भगा देंगे . यही तो सोमनाथ मंदिर में किया था , मूढ़ता का तुम्हारा पुराना इतिहास है .विदेशी  लुटेरे  आ रहे हैं
साधू सन्यासी मन्त्र पढ़ रहे हैं . मन्त्र मार देगा लुटेरों  को . नतीजा अन्दिर ही नही लुटा , समूचा देश लुट गया . हम गुलामी की नीव डाल बैठे . आज फिर उसी और मुल्क को ले जा रहे हो . इसे रोकना पडेगा . वैज्ञानिक सोच की बुनियाद पर पंडित नेहरु ने जिस समाज की संरचना की शुरुआत की है अगर उसे हमने छोड़ा तो हम कहीं के नहीं रहेंगे .
       पढ़े लिखे लोंगों की जिम्मेवारी  है की वे इस तरह के दकियानूसी अफवाहों से समाज को मुक्त करें .
'सटीक ' कह कर नवल ने साइकिल उठा लिया -
  मिर्जापुर कैल गुलजार हो . कचौड़ी गली सून कैल बलमू

Monday, August 14, 2017

chanchal: चिखुरी चिचियाने /चंचल----------------------------...

chanchal: चिखुरी चिचियाने /चंचल
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: चिखुरी चिचियाने /चंचल --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------...
चिखुरी चिचियाने /चंचल
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बीमार सियासत का चुहुलबाज मुल्क
   अड्डे केवल शहर में ही नही होते , कलकत्ते से चला यह अड्डेबाजी का चलन अब गाँव तक जा पहुंचा है और एक नशा की तरह पुरे समाज में तारी है . कल हमने बताया था की अड्डेबाजी को सरकार ने भरपूर  बढ़ावा दिया . सरकार ने मुलायम पग्दंद्दी को तोड़ कर गड्ढे वाली सडक दिया और माटी की दिया हटा कर बल्व लटकवा दिया ,गाँव सडक पर आ गया और घर घर में
टीवी आ गया / नेता जी मुस्कुराए - कमबख्त विकास देखो , मसायल मत उठाओ . भाड में गयी गरीबी , बेरोजगारी , गैर बराबरी .तुमे हंसने के लिए डिब्बा दे रहा हूँ , उलझो उन कहानियों में जो डिब्बा दिखाएगा . बिजली गायब रहे तो चौराहे पर जाओ देश के नाम सन्देश जारी करो , अमरीका रूस पर ब्यान दो कोइ न मिले तो पाकिस्तान तो है ही . तुम्हारे दिल को बहलाने के लिए पाकिस्तान गरीब की लुगाई की तरह है . लाल साहेब की बेंच पर बैठ कर तीन मिनट में छह बार पाकिस्तान की माँ बहन  करोगे . जब छोटका तुम्हारी माँ  बहन करते हुए दूकान की तरफ बढ़ेगी और भैस के भागने की खबर देगी तो चौराहे की बहादुरी भाग के छोटका के फुकती में घुस जाती है . हर रोज चौराहे पर यह होता है . चिखुरी ने चुटकी ली _ नवल ! पाकिस्तान को मारो गोली , कभी चीन को भी तो कुछ बोलो . पुरी दूकान में सन्नाटा पसर गया .करिअवा कुकुर जो भीड़ की आवाज में सोने का आदी हो चुका है , सन्नाटा पसरते ही कुनमुना कर मूड
उठाया . मौक़ा मुआयना किया और फिर सो गया . कयूम मिया ने टुकडा जोड़ा - चीन पर जब सरकार सनाटा खा जाती है तो नवल उपधिया किस दम पर बोले. अशोक अंडावाले बीडी सुलगा कर सामने आये - ये भाई ! देखते देखते राजनीति ही उल्ट गयी . क्ल्संस्द में बहस होती थी सरकार को जवाब देना होता था . अब न सवाल है , न जवाब .बस पैसा चाहिए . उमर दरजी जनम का मुरहा है बेबात कुबात ही बोलता है - का गलत है भाई , राजा राज कर रहा है प्रजा ऐश कर रही है कोइ समस्या है इस देश में ? ना है न .बस ऐश करो . मद्दु ने करवट बदला गौर से सब को निहारा और शुरू हो गये -
         
    ' हस्बे जेल अर्ज कर दूँ कि हम ऐसे मुल्क की नब्ज पर हाथ रखने जा रहे हैं जिसे पहली नजर में आप खारिज कर देंगे , क्यों की आप  उस  समाज के नुमाइंदे हैं जो गंदगी को देख कर
डगर बदल कर आगे बढ़ जाते हैं या उस पर गमकती रुमाल रख कर ढँक देंते हैं लेकिन गंदगी को साफ़ नही करते .मसलन आजका भारत देखिये हर तरफ झूठ फरेब का ऐसा जाल  फैला दिया गया है की हर इंसान तकरीबन उस झूठ  के सहारे हम हर सवाल का हल ढूंढने लगा है . ' आज मद्दु पत्रकार कुछ ज्यादा ही संजीदा दिखे और जो बात उन्होंने बोला उसके बारे में नवल उपधिया का कहना है की आप जो बोल रहे हैं एंटिना में नही फंस रहा है . मद्दु उखड़ गये - सुनो ! एक बात बताओ १४ में संसद का चुनाव हुआ किस मुद्दे पर ? भूल गये होगे , हम बता रहे हैं .  बड़ी चालाकी से , समाज के हर हिस्से के लिए अलग अलग सवाल दिए गये थे . एक - आम आदमी के लिए , महगाई .इसका हल - हर खाते में मुफ्त का पैसा सरकार दाल देगी  . पढ़े लिखे डपोर लोंगो के लिए भ्रष्ट्राचार . नौजवानों के लिए काला धन वापस होगा . नतीजा .संसद में वजीरे तिजारत जनाब अरुण जेटली जवाब देते हुए कहा वो तो चुनाव के बोला गया जूमला था . कमाल है देश का नेता जनता में जूमला बोल कर वोट माँगा है मुकर जाता है क्यों ? है किसी के पास जवाब ? क्यों नही उठता संसद में सवाल ? अब चिखुरी की बारी थी -
संसद की हालत देखो , कौन बैठा है आज संसद में ? सरकारी आंकडा है पिच्चासी फीसद संसद सदस्य  करोड़ पति है . साथ फीसद लोगों पर अपराधिक मामले हैं ,  बलात्कार . चोरी . चम्चोरी , लूट दंगा . कौन बैठा है देश की सबसे बड़ी पंचायत में . ?   जहां  कभी पंडित नेहरु बैठते थे , लाल बहादुर शास्त्री , डॉ  लोहिया , कृपलानी , ज्योतिर्मय बासु , सवाल उठते थे आम आदमी के . जनता संसद को अपना मानती थी .उसी संसद में गाजी पुर के विश्व नाथ गहमरी का गरीबी पर भाषण है पंडित नेहरु की आँख भर आयी थी . उसी संसद में डॉ लोहिया ने चुनौती दी थी पंडित नेहरु की सरकार को . संसद की पुस्तकालय में आज भी वह बहस मील का पत्थर बन कर . तीन आने बनाम तेरह आने . लेकिन दोषी संसद सदस्य नही है . गलती उनकी है जिन्होंने ऐसे लोंगों को चुन कर संसद पहुचाया .
लखन कहार का सवाल टेढा है -अब क्या करें ?
कुछ ख़ास नही , बस अपने चुने हुए प्रतिनिधि से पूछिये -संसद में . विधान सभा में आपने जो काम किया है उसे जनता को बताओ .
नवल मुस्कुराए . साइकिल उठाये . घंटी बजाए . पैदल चले . कयूम ने पूछा - का बात है बेटा - पैदल ? नवल मुस्कुराए - साइकिल क कुत्ता फेल .
नवल गाते हुए जा रहे हैं - मिर्जापुर कैल गुलजार हो कचौड़ी गली सुन कैल बलमा       

Monday, August 7, 2017

chanchal: चिखुरी चिचियाने / चंचल---------------------------...

chanchal: चिखुरी चिचियाने / चंचल
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: चिखुरी चिचियाने / चंचल -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------...
चिखुरी चिचियाने / चंचल
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९ अगस्त महज एक तारीख नही है .
     
         अगरचे यही रहा तो कुछ दिन में चिखुरी ' काठे मार ' दिए जायंगे . पागल होने में अब कोइ कोर कसर नही है .  नवल उपधिया की पुरानी आदत है , कोइ भी बात बताने के लिए
कमबख्त  ढेढ़ हाथ की भूमिका लगाएगा . आँख बंद कर के खैनी मलेगा .तब तक लोग उब चुके होते हैं और उत्सुकता बढ़ चुकी होती है .कयूम मिया ने पूछ् पकड़ा - हुआ का , अभी कल तक तो भले चंगे थे अचानक पगला कैसे गये ? अभी आ रहे हैं  देखना . आज सुभ से ही हर एक से सवाल पूछ रहे हैं - नौ अगस्त के बारे में बताओ . अब भला  कोइ क्या बताये की नौ अगस्त
का है ? लखन कहार ने इशारा किया वो देखो चिखुरी काका भी आ गये . लोग चौंके . आज तो चिखुरी का पूरा हुलिया ही बदला हुआ है . खादी का कुर्ता .जवाहिर जैकेट , टोपी , खादी की
बी कायदे धुली हुयीधोती पैर में चट्टी और हाथ में तिरंगा लिए चले आ रहे हैं .पीछे पीछे जमा पूँजी चार लड़के कांग्रेस जिंदाबाद , महात्मा गान्ही अमर रहें . 'कुट्ट इंडिया जिन्नावाद . हर जोर जुर्म के टक्कर में ....... /  चौराहा सावधान . दुकानदार गाहक छोड़ कर सडक पर . जनता एक दुसरे की आँख में आँख दाल कर पूछ रही है , - माजरा क्या है ? लेकिन जब किसी को मालुम हो तब बताये न की माजरा क्या है . लाल साहेब ने उमर दरजी से पूछा - आज पन्द्रह अगस्त है का ? हमरे समझ से तो ना है .आहे से की कल सात रहा रछा बंधन वास्ते एक दिन बीच में आवा तदौड़ के पन्द्रह कैसे होय जाई . कीन उपधिया आजकल ज्यादा बोलने लगा है ,उसकी सरकार है वह नही बोलेगा तो कौन बोलेगा . किन  की दूकान बंद है दुसरी दूकान चालु है . हैण्ड पम्प चाहिए ? करताहूँ कुछ और इस कुछ से ही कीन कीदुकान चल रही है . लेखी होंगी प्रवक्ता दिल्ली की , यहाँ तो सरकार को उबार रहे हैं कीन उपधिया ही . चिखुरी से कीन की कत्तई नही जमती , पर का करे अक्खा समाज चिखुरी के साथ . आज कीन को मौक़ा मिल गया है - चिखुरी को देखो भाई ! आज य पन्द्रह अगस्त मनाय ले रहे हैं . कुछ और भी बोलते पर इतने में चिखुरी का जुलुस लाल्साहेब की चाय की दूकान तक आ पहुंचा . लड़के नारा लगाए जारहे हैं , कुछ हो हल्ला , कुछ भीड़ भड़क्का देख कर और भी लोग आ पहुंचे बच्चे तो कुछ ज्याडा ही .
नारा दुगुनी गति से उपर उठ गया . चिखुरी लाल साह्ब्की दूकान के अंदर चौकी पर जा बैठे , जहां हर रोज बैठते रहे हैं. बात उठाया मद्दु पत्रकार ने - आज से ही पंद्रह अगस्त मन्ने लगा काका ? चिखुरी ने तरेर कर देखा - पत्रकार हो न ? बड़ा गर्क हुआ केवल राजनीति से ही नही . तुम लोंगों की कम अकली ने बहुत जल्दी डुबोया है समाज को . नौ अगस्त भी नही जानते ? जब तुम्हारे जैसे पत्रकार इतने पर खड़े रहेंगे तो इनका क्या होगा जो सामने बैठे हैं लखन कहार , उमर दरजी , नवल उपधिया , लाल साहेब सिंह वगैरह .मद्दु ने अपनी असमर्थता जाहिर की - वाकई हम नही जानते दादा . हममे से कोइ जानता है भाई ? एक मस्ट आवाज आयी - कोइ नही  जानता , बताया जाय . नवल ने प्रस्ताव रखा - ऐसे नही , दादा के लिए चौकी बाहर निकाली जाय . झंडा है ही एक भाषण हो जाय . ससुरे चुनाव न आये तो भाषण भी न सुनायी पड़े . नवल ने नारा लोकाया , बच्चों ने बीच में ही लोक लिया . कीन उपधिया जानते हैं किचिखुरी पुरानेज्माने के सुराजी हैं कांग्रेस की तारीफ़ करेंगे .पर डर की वजह से चुप ही रहे .
           पूरा चौराहा भर गया . घास की तलाश में निकला महिलाओं का झुण्ड भी एक किनारे खडा हो गया . मंझारी से बगैर बोले नही रहा जाता , लम्मरदार से बोली - हे देवर ! हिया कुछ बटी का ? लम्मर दार ने गौर से मंझारी को देखा और बोले _ हुंडी बटी , चाहि का ? मंझारी के लिए हुंडी नई बात थी वह चौंकी _ हुंडी ? कैसा होला ई ? लम्मार्दार ने इशारे से बगैर कुछ बोले , बोल गये . महिलाओं की और से खिलखिलाहट हुयी , कई मनचले जो मौक्ये वारदात पर थे जोर से हंस दिए और सारी भीड़ इधर देखने लगी . लम्मार्दार ने हांका मारा - बोला जाय पब्लिक व्याकुल होय रही बाय , अब चिखुरी मंच में चढ़े .तालिया बजी . और भाषण शुरू
        ' हम कोइ नेता ना हैं , आम आदमी हैं , और उसी आदमी के बारे में बोल रहा हूँ . बुरा मत मनाइएगा हम मरे हुए समाज को दफनाने की जुगत में हैं . जो समाज अपने इतिहास से वाकिफ नही होता , उसका वर्तमान लम्पटों , आढतियों और टेनीमार व्यापारियों के हाथ में खेलता है और उस समाज का भविष्य गर्त में जाता है . आज हम उसी मुकाम्पर खड़े हैं
आज नौ अगस्त है हमारे इतिहास का एक सुनहरा पन्ना आज के ही दिन लिखा गया है , पर दुर्भाग्य देखिये इस मुल्क को विशेष कर नई पीढ़ी को यह तारीख भी नही मालुम है .
आज से ठीक पचहत्तर साल पहले सुराज की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस पार्टी का बम्बई में जलसा था . उस सम्मेलन में महात्मा गांधी ने बर्तानिया सरकार को चुनौती दी और नारा दिया -
 अंग्रेजो भारत छोडो , क्विटइंडिया . डू आर डाई / करो या मरो . यह है नौ अगस्त बयालीस का आन्दोलन . आधे घंटे के अंदर समूची कांग्रेस गिरफ्तार कर ली गयी . कुल डेढ़ लाख लोग एक घंटे के अंदर जेल भेज दिए गये .अब जनता ने आन्दोलन अपने हाथ में ले लिया इसका नेतृत्व चला गया समाजवादियो के हाथ डॉ लोहिया , अचुत पटवर्धन , जी जी  पारीख वगैरह .लेकिन सबसे ज्यादा बढ़ चढ कर महिलाओं ने आन्दोलन को चलाया आज जिसे आजाद मैदान बोलते हैं वहाँ देश की एक क्रांतिकारी लड़की ने कांग्रेस का झंडा फहरा कर दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य को चुनौती दी , उनका नाम है अरुणा आसफ अली . गुप्त रेडियो का संचालन किया है उषा मेहता ने . आजादी की उस लड़ाई में अंग्रेजों का साथ देनेवालों में जिन्ना की मुस्लिम लीग थी , राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ था और कम्यनिस्ट पार्टी थी . ये सब अंग्रेज के साथ थे . कांग्रेस अकेले लड रही थी , उस अंग्रेजी साम्राज्य से जिसके हुकुमत में सूरज नही डूबता था .
तालियाँ बज रही है , नम आँख में चिखुरी सुराजी बच्चों को निहार रहे हैं .
नवल गाते हुए रवाना हुए - झंडा उंचा रहे हमारा 
पर कथा / चंचल

सुनती हो  ! जी यस टी  सिजेरियन है
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   हुकूमत की अपनी भाषा होतीहै और जनता की अपनी . हुकूमत जनता की भाषा समझती है पर जनता हुकूमत की भाषा से दूर ही  रहती है . यह मैकाले की युक्ति है .
मैकाले के पहले भी , तंत्र कोइ भी रहा हो हुकूमत अपनी अलग की जुबान रखता है . जब धर्म सत्ता पर काबिज था और समाजका नियंत्रण वह करता था तब भी यही चलन था
बाइबिल इब्रानी भाषा में इसाईयत को विस्तार देतीहै /इस्लाम का कुरआन अरबी में है . सनातन धर्म संस्कृत में , इन तमाम  धर्मो को मानने वाले  लोग अपनी धार्मिक भाषा से
कोसों दूर है . धर्म के नाम पर लूट की जो व्यवस्था बनी उसमे अजनवी भाषा को एक हथियार के रूप में रखा गया. हमने जिनका जिक्र किया ये सब अपने काल में सत्ता रहे हैं
और आज जब सत्ता का स्वरूप बदला जनतंत्र आया तो भाषा भी बदल गयी लेकिन मूल भावना वही रही की सत्ता की भाषा से जन भाषा अलग रहे .सबसे मजेदार मौजूदा
सरकार की भाषा है .ये जब तक सत्ता में नही थे तब तक- हिंदी , हिन्दू और हिन्दुस्थान चीखते रहे . सत्ता में आते ही अंग्रेज हो गये , एकभी नारा इनका हिंदी में नही मिलगा .
मेक इंडिया , इंडिया टीम , ब्लैक मनी , डी मोंतेजायेसन . अब जी यस टी . चारो तरफ शोर हुआ जी यस टी . खबर पहिये पर तो चलती नही ,ये तो उडती है तो हवाकी भी हवा
 निकाल दे. ती है .  गाँव की अपनी सिफत होती है , उसका अपना नजरिया होता है , भाषा और मुहावरे तो ऐसे होते हैं की घोड़ा नस कटा गाजीपुर में औ पता चला गाजियाबाद में
संवाद सुनिए -
- देवर ! इ जेय्स्टी का है ?
- देख्बू का ?
- सुना है रात में बाढ़ बजे निकला ?
- हाँ , अटक गवा रहा .
- कोलई कहत रहे की सिजेरियन निकला .
 गाँव में पिछले बीस साल से यह शब्द घर घर में आ गया है जिसे सिजेरियन कहते हैं . अब न ओ माएं रही जो आराम से आम्खाते खाते बच्चा दे जाती रही ,चमाइन की हंसिया से
 नाल काट कर अँधेरे बंद कमरे में दाल दिया जाता रहा . अँधेरे से निकला बच्चा आहिस्ता आहिस्ता रौशनी से मिलता था तब तक आँख की रेटिना रौशनी सहने लायक होजाती थी
अब बच्चे अस्पताल में होते हैं , पैदा होते ही हैं ट्यूब  लाईट में  नतीजा ? तीन साल बाद आँख पर चस्मा . तो यह जी यस टी भी सिजेरियन है . पेट्रोल, डीजल , और कश्मीर को
छोड़ कर बाद बाकी हर जगह , हर सामान पर जी यस टी का भार बढ़ा मिलेगा . यह पहली सरकार आयी है जो अखंड भारत तो चीखती है लेकिन अपने ही एक सूबे कश्मीर को
भारत से बाहर कर दिया . पुरे देश में यह टैक्स लगेगा लेकिन कश्मीर में नही . डीजल पेट्रोल पर इस लिए नही लगेगा की अगर डीजल पेट्रोल पर जी यस टी लगा तो पेट्रोल और डीजल
४० प्रतिशत दाम नीचे गिर जायगा . क्यों की जी यस टी कुल २८ फीसद टैक्स लगाता है और देश को जो डीजल पेत्रोल्स्र्कार बेच रही है ४५ फीसद मुनाफे पर . इस जी यस टी से जो तीन बातें होने जा रही हैं य=उसे गौर से देखिये .
अह्गाई - बढ़ेगी
क्रयशक्ति - घटेगी
पूंजी - केन्द्रित होगी .
उपचार ?
कारखाने के माल का वहिष्कार .
और खलिहान के उत्पाद का चलन बढाओ.


Sunday, July 23, 2017

chanchal: चिखुरी चिचियाने / चंचल--------------------- जी य...

chanchal: चिखुरी चिचियाने / चंचल
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 जी य...
: चिखुरी चिचियाने / चंचल ---------------------  जी यस टी का भाव बताओ भाई ! ---------------------------------------------------------------...
चिखुरी चिचियाने / चंचल
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 जी यस टी का भाव बताओ भाई !
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   कल हमने जिक्र किया था की बिकास के नाम पर गाँव की मुलायम पगडंडियों को ककरीला,  किया गया फिर उस पर तारकोल ढँक कर काला किया गया .कहा गया की विकास
इसी पर चलता है . विकास की दूसरी क़िस्त आयी बिजली का खम्बा ले कर . गान ने यकीन किया की सरकार की बात है , घोंचू तेली की बात थोड़े ही है की दुबई की बनी साडी
 बेच कर ससुरा अपनी बर्दवान ठीक कर लेगा . जनता , जनता है फरेब में आ गयी किसी ने उससे पूछा तक नही की अबे घोंचू ! कब से दुबई में सादी बन्ने लगी ?
- भैये ! नाम का रक्खा है ,बक्सावाली सादी पहनेगी कि दुबई ? जैसे सुरत वैसी सर्जाह . बात सही है . तो सरकार काहे ऐसा घपला  करेगी . तो साहब विकास हो गया इका पक्का साबुत देखना हो तो सुबेके किसी गाँव में जाकर देख्लीजिये सडक के किनारे एक खोखा जरुर खडा मिलेगा . जहां दिन भर चाय मिलेगी , हॉट सांझ  राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू . सुबह , शाम पूरा गाँव खाली मिलेगा सडक का खोहा आबाद रहेगा . अरसे तक चिखुरी  इस चौराहे की तमीज के खिलाफ रहे लेकिन जब थक गये तो खुद चौराहे पर जाके बैठ गये . जैसे समाजवादी कांग्रेस से बाहर निकला ,क्रान्ति करने , क्रान्ति नही कर पाया तो लौट कर अपने घर कांग्रेस में जा बैठा . वही हाल चिखुरी का भी रहा .उमर दरजी , लखन कहार , नवल उपधिया कयूम डग्गा मास्टर
को अकेले छोड़ कर चिखुरी जाते कहाँ . सो लाल साहेब सिंह की दूकान पर अड्डेबाजी शुरू हो गयी .
         हिंदी पट्टी में राजनीति चबैना है / खीसे में रहती है जब जहां मौक़ा मिला शुरू . ये बात दीगर है की वह आपको नही सुनायी पड़ेगी क्यों की आप मोदी , जेटली , राहुल , यचूरी को
सुनने के आदी हैं और आपको यह आदत दो जगह से पडी है . एक अखबार से , दुसरा डिब्बे से . और इन दोनों की मजबूरी है ओहदे दारों की बातों को फैलाएं कमबख्त चाहे जहर
ही बोले  . चोर . चम्चोर . बलात्कारी , मवाली , बवाली कल तक टाट पांत से बाहर कर दिए जाते थे , हुक्का पानी बंद कर दिया जाता रहा आज उनका अपराध और उस अपराध का पैमाना
उनकी औकात बन रहा है .अब यह सवाल जेरे बहस होने लगा है . देश में केवल एक संसद नही  है . कांग्रेस की कृपा से यह देश और इसका निजाम संसद दर संसद से चलेगा . गाँव गाँव में संसद है . बैठकें होती हैं , बयान जारी होते हैं लोग सुनते हैं लेकिन कम लोग . लाल साहब की दूकान पर संसद बैठी है . कार्यवाही शुरू
_ ई  जेस्टी के है , भाई ?
- जेस्ती ? एक साथ तकरीबन सब चौंके , बस दो जन को छोड़ कर . एक मद्दु पत्रकार ( नाम है महंथ दुबे लेकिन जब से पत्रकार हुए हैं उनका नाम अखबार ने ही काट कर बांणा कर दिया चाभुती की तर्ज पर महान्थ्दुबे से मदु हुए , लयकारी के चलते मद्दु हो गये )और दुसरे रहे चिखुरी दुबे जो अमूमन चुप्र्हते हैं और जब मुह खोलते हैं तो बोलते नही चीखते हैं . इस चीख को नवल उपधिया कहते हैं चिखुरी चिचिआने .
- जेस्टी ...... कोलई दुबे बताय रहे थे यह तरह की गाय है जो जर्सी से भी ज्यादा दूध देगी , अब पुराने जमाने की तरह देश में दूध और घी की नदी बहेगी , यह बात कोलई दुबे किसी नामी उकील से सुन के आये हैं जो कचहरी में नीमतले बोल रहा था . औ ...... लखन कहार की बात उमर दरजी ने बीच में ही काट दिया - जान रहें कहें मगर अब पानी नही मिलेगा एवज में
दूध लो या घी ? नवल ने टोका - और दही कहाँ गयी ? कयूम मुस्कुराए - बरखुरदार नवल ! दही का मजा तो उसी दिन बिगड़ गया जिस दिन तोहार माई फुकती से दही क मटिया ही ढक
के उठ गयी . और का ठहाका उठा कई चीजें अस्त व्यस्त हो गईं .  गौरयों का झुण्ड जो धूल में नहा रहा था पंख झाड कर फुर्र से उड़ गया , करियवा कुरुर रात भर जगा रहा कुनमुनाया
निहारा और फिर सो गया . मद्दु पत्रकार जो अब तक दायें गोलार्ध पर टिके थे , पहलु बदल कर बाएं पर आ गये . चिखुरी मुस्कुराए - ; कमबख्त शहर होता तो अब तक आग  के हवाले हो गया होता लेकिन गाँव का ताना बाना देखिये कयूम मियाँ नवल के चचा लगेंगे गाँव के रिश्ते में . गालियों के खुले पन ने धर्म , जाती , लिंग वगैरह की जो दीवारे हैं वो भास्का देती हैं .
- मजाक नही , सच्ची   बताया जाय का है ई जेस्टी ?
अलग अलग मत मनान्त्र का रोर जब कानफोडू हो गया तब चिखुरी चीखे - अथी है  जेस्टी . जब से आवा है एक न एक काम बे वजह का लगा देता है . इधर नोट बंदी , उधर विदेश
रवाना . इधर जी यस टी , उधर विदेश रवाना . किसको मालुम है की क्या है जी यस टी ?सरकार खुद नही मालुम है का  कर लोगे ? नवल उठ गये . अक्सर यह होता है जब चिखुरी
चिचिआयेंगे , नवल पंचम में एक सुर उठाएंगे और साइकिल से आगे बढ़ जायेंगे -
  दिनवा गिनत मोर घिसल रे अंगुरिया ...........






Monday, May 22, 2017

पर कथा

रे हे मीम अलिफ नून।
असलम परवेज खान की एक दुकान हुआ करती थी दालमंडी में । दालमंडी  , को नहि  जानत है जग में । काशी की आबरू यही आकर टिकती है । ऊपर  कोठा नीचे कोठरी । कोठरी में दुकान । इन्ही दुकानों में एक दुकान सुंघनी साव की  भी रही जिसपर उनकी औलाद ने न केवल दुकान चलाया बल्कि हिंदी साहित्य को अमर कर गया । जयशंकर प्रसाद । कोठे की ताकती आंख पर मर मिटा था - जो घनीभूत पीड़ा थी , मस्तक में । कागज पर गिरी । कामायनी आ खड़ी हुई । इसी   गली में एक आंगन में  एक उस्ताद बैठा है  बिस्मिल्लाखां । रहमान खड़ा है इसी दाल मंडी में । अपने दोस्त असलम परवेज खान की दुकान पर । ढिबरी , लालटेन , पेट्रोमेक्स, चिमटा जो चाहिए ले लीजिए लेते समय गद्दी की ऊपर लटकी तख्ती को जरूर देखिए ' उधार प्रेम की कैंची है '
बुर्के से निकले गोरे हाथ के जाने के बाद असलम ने पलट कर रहमान से पूछा - जी ! क्या चाहिए आपको ?
- कैंची
- अयं ! तुम  ? अबे अब तक बाहर हो ? और ये लिबास ?
- अबे!मियां भूख लगी है ?
- अंदर आ जाओ । जो भी खाना हो इसे बता दो । और खा पी कर दफा ही जाओ ।
- भाड़ा
-  ए रख लो   दस दस के कई नोट रहे । दबा के खाया यही सीखा उर्दू की पहली इबारत अलिफ । असलम आज दमदार इंजीनियर है हमारा उस्ताद है । हम उस परिवार के सदस्य हैं । असलम पर अलग से लिखूंगा ।
              और दालमंडी को नीचे से ऊपर की ऒर देखा ।आदाब ! दालमंडी ! हम नही बोले , दस दस के नोट बोल रहे थे । पूरे इत्मिन्नान के  साथ चौक थाने के सदर गेट पर आकर खड़े हो गए । हिंदुस्तान की पुलिस कमाल की है । आप इससे डरेंगे डरायेगा , घुड़क दीजिये ,रास्ता दे देगी   अपराध  कर के थाने में जाकर बैठ जाइए ,आपको भगा देगी । 71 में हम इनकी लड़ाई लड़ चुके थे । तब बाबा  रामा नंद तिवारी जी जिंदा थे । (कमाल का इतिहास है तिवारी जी का , हम लोग इन्हें बाबा बोलते थे इनके परिवार में भाई शिवानंद तिवारी जी ही नही हैं हजारों लोग हैं ये किस्सा फिर कभै ) थाने के सामने खड़े होकर सिगरेट पिया रिक्सा रोका
चौकाघाट जेल चलोगे ?

Thursday, January 26, 2017

विवेकी राय / श्रद्धांजलि 
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मास्साब की चिट्ठी 
 ० चंचल 
उन्नीस बीस की लोकोक्ति भोजपुरी पट्टी में दौड़ने वाली कहावत है , विवेकी राय ने अपने लेखन में इस लोकोक्ति का जम कर प्रयोग किया है , उन्हें  का
 मालुम रहा की अपने अंतिम दिन वे खुद इस लोकोक्ति को वोढ लेंगे .१९ नवंबर १९२४ को पैदा हुए विवेकी राय २१ नवंबर २०१६ को विदा हो गये . ' एकाध 
दिन ' का हेर फेर कोइ मतलब होता है का ? पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक ' महकौवा ' जिला गाजीपुर (अरसे तक गाजी पुर गुलाबजल
  और केवडा जल का उत्पादन केन्द्र  रहा है , ) के एक ठेठ गाँव में पैदा हुए विवेकी राय की जिन्दगी 
बहत खुरदुरी रही . विवेकी राय के पैदा होने के डेढ़ महीना पहले इनके पिता की मृत्यु हो गयी थी . माँ ने अपने मायके में इन्हें पाला , बड़ा किया और समाज की 
बोलियों ने विवेकी राय को बचपन से ही जिम्मेदार बना दिया . मिडिल तक की पढाई करके विवेकी राय प्राइमरी के अध्यापक बन गये . यहाँ से विवेकी 
राय के पीठ चिपका ' बेचारा ' खुद को गड़ने लगा . इस एक फांस ने हौसला दिया . प्राइवेट परीक्षा देकर आगे बढ़ते गये . सामने माटी का दिया था , बगल में माँ 
का दुलार विवेकी पढ़ा रहे हैं विवेकी पढ़ रहे हैं ,और एक विवेकी राय उठ रहा है .  खुदमुख्तारी का यह जज्बा रंग लाया और विवेकी राय अपनी मोदार्रिसी भी बढाते गये .
 प्राइमरी से मिडिल , फिर इंटर कालेज , डिग्री कालेज और फिर स्नातकोत्तर महा विद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक . लेकिन यह सब बड़ी आसानी नही हुआ 
बहुत जद्दोजेहद से चलती है जिन्दगी .प्राइमरी पास करते करते एक तूफ़ान  से उलझ गयी .तूफ़ान था गांधी का , सुराज का जलसा और जुलुस का 
 गाजीपुर अलग ऐसे रहता . गान्ही बाबा घर घर में कहानी 
की तरह कहे जा रहे थे . विवेकी का बाल मन कुतूहल के साथ गांधी जी के साथ हो गया . ज्यों ज्यों विवेकी राय बड़े होते गये , गांधी का विस्तार भी
 बढ़ता गया .विवेकी राय गांधी में डूबते  गये . खादी का पहनावा , सादगी से भरा जीवन , गाँव से लगाव सब गांधी से मिला , विवेकी तो बस वाहक रहे ,
 विनम्र , सचेत और संकोची भी . भाषा की कोइ कशमकश उनके पास नही है , पैदा ही दो भाषा में हुए हैं , एक माँ से दुसरी माटी से . हिंदी और भोजपुरी 
दोनों भाषाओं को कांख में दबाये विवेकी राय बगैर किसी आडम्बर और अहंकार के संवाद करते रहे . एक दिन अचानक विवेकी राय 'इज्जतदार ' हो गये 
यह उस जमाने की बात है जब इज्जतदार की ओअरिभाषा कत्तई दूसरी थी . किसी भी तरह के छल प्रपंच से दूर , पर हित की भावना , सादगी का जीवन 
खादी का लिबास , आँख पर मोटा चश्मा , साइकिल भी तो थी ,विवेकी भाई इलाके में इज्जतदार हो गये . भोजपुरी भाषा में बहुतकम शब्द होंगे जिनकी 
कोइ सीमा तय हो . इसके  शब्द आजाद परिंदों की तरह उड़ान भरते हैं , इलाका उसमे से एक है . यह भूगोल नही है .यश और भाव की धारा है .
 कल तक गाँव बहुत सोच समझ कर इज्जतदार की पदवी देता था. यह पदवी पहला काम करती है उसके असल नाम को इज्जत में लपेट देती है और 
एक उपनाम दे देती है . अब विवेकी राय मास्टर साहब हो गये . पर गाँव , वो भी भोजपुरी ? बगैर लय ताल और संगीत के ? चुनांचे अब मास्साब चल पड़े 
मास्साब की तीन लत थी . खैनी , बीडी और तम्बाकू . चाहते तो महगा शौक पाल सकते थे ,लेकिन तब गाँव से टाट बाहर हो जाते . लेकिन इतना सब क्यों 
बता रहा हूँ ? हम उनके लिखे पर बहस चला सकते थे , उन्ही के बहाने हम खुद गंभीर बन सकते थे लेकिन फिर हमारे पाठक को विवेकी राय के लेखन 
का मर्म न मिल पाता . एक उदाहरण देखिये . मनबोध की डायरी , . उन दिनों देश आजाद हुआ था समस्याए सामने थी . गाँव भिउस्से अछूता नही था .
पूर्वी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा अखबार रहा ' आज ' . मनबोध की डायरी नियमित पढ़ी जाती थी . सच कहा जाय तो गाँव मनबोध के साथ ताल दे रहा था 
गाजीपुर में भी मनबोध सिद्दत के साथ खोज खोज के पढ़े जा रहे थे लेकिन खुद गाजीपुर को नही मालुम रहा की ये मनबोध मास्टर है कौन  ? एक वाकया 
जिसे खुद विवेकी राय बताते थे , गाजीपुर की एक सडक जिससे होकर विवेकी राय कालेज जाते थे , टूट चुकी थी बीच बीच में इतने बड़े गड्ढे हो चुके थे 
की उसमे भैंसे भी नहा लें . मनबोध मास्टर की डायरी के हिस्से में उस सडक का जिक्र करते हुए , विवेकी राय ने सडक को नया नाम दिया '  भैंसा लोटन '
सडक . जिस दिन आज अखबार में यह चिट्ठी छपी उसके दुसरे दिन से ही उसपर काम शुरू हो गया . विवेकी राय रुके और बोले इतनी जल्दी काम शुरू 
हो गया ? ठेकेदार ने बताया की साहेब ! कोइ मन बोध मास्टर हैं जिन्होंने मंत्री जी को चिट्ठी लिख दिया था , विवेकी राय कुछ बोले नही चुपचाप
 आगे निकल गये .
विवेकी राय ने भोजपुरी के अलावा हिंदी में भी बहुत कुछ लिखा है , उपन्यास ,कहानियां , कविता और निबन्ध . और आहूत ही अच्छा लिखा है ,लेकिन 
भोजपुरी ने जिस तरह विवेकी राय ऊपर उछाला वह तामुम्र उसका एहसान मानते रहे . ललित निबंध की चर्चा चलती है तो हिंदी जो दमदार नाम सामने आते हैं 
वे सब इसी माटी की उपज हैं , आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी , पंडित विद्यानिवास मिश्र ,डॉ शिव प्रसाद सिंह कुबेरनाथ राय , निश्चित रूप से इ बड़े नाम हैं 
विवेकी राय थोड़ा अलग दीखते हैं , इनमे माटी की खुशबु है , भाषा इ सरल रवानी है ,सीधे सपाट ढंग से कथ्य को कह जाते हैं , बगैर कोइ पांडित्य बघारे 
विवेकीराय की सबसे बड़ी ताकत वह पाठक है जो भूखा भी है और सुस्वादु भी . लेकिन यह पाठक गंवई और नगरी दोनों सभ्यताओं में विभक्त होने
के बावजूद विवेकी राय की और लपकता जरूर है . 
   विवेकी राय याद किये जांयगे जब साहित्य अपने आपको समेट कर , सिमट कर केन्द्रीयकरण के खूंटे  में बाँध लेगा तो कहा जायगा एक छुट्टा फ़कीर 
गाँव में खडा गान की भाषा में सबसे बोल बतिआय रहा है और पुनह विकेंद्री करण की लहर चलेगी . अभी कल की बात है साहित्य के मुहाने विकेन्द्रित 
थे , काशी , प्रयाग , लखनऊ  में ऐसे फलते फूलते दरख्तों से ताजा हवा निकलती थी और लोग सीखने को आतुर रहते थे . तरह तरह के साहित्य , 
उनकी अलग अलग तासीर , महक , लिए समाज की नब्ज पर उंगली रख देते थे , केन्द्रीयकरण ने सब बराबाद किया है . लेकिन यह दीप जलता मिलेगा . 
अलविदा मास्स्साह्ब !
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भाउकता मन को कितना संचालित करती है एक छोटा सा उदाहरण 
विवेकी राय को तीन लत थी . बीडी , खैनी और तम्बाकू . ३० जनवरी ४८ को महात्मा गांधी की ह्त्या हुयी . खबर गाजीपुर पहुंची . लोग बताते हैं 
वह दिन उनकी जिन्दगी का सबसे उदास दिन रहा . दिन भर कमरे में बैठे रोते रहे , अचानक अपनी तीनो लतों को खिड़की से बाहर फेंक दिए 
और फिर कभी पलट कर उधर नहीं देखे . 



Monday, January 16, 2017

अलविदा ओम
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चंचल
प्रसिद्द फिल्म निर्माता , रंगमंच निदेशक और ओम पूरी के साले भाई रंजित कपूर का एक छोटा सा सन्देश मिला कि ओम पूरी  नही रहे . पल भर के लिए एक शून्य पसर गया. अभी कुछ दिन पहले हम लोंगों ने फोन पर बात की थी .और टी हुआ था एक गंभीर फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की जाय जो खांटी राजनीति से जुडी हो और उसके अंदरुनी खांचे को उजागर करती हो .अभी हाल में भाई रंजीत कपूर की एक फिल्म ' जय हो डेमोक्रेसी ' आई है . ग्रुशा कपूर निहायत जहीन कलाकार है और उतनी ही बेहतर खुशमिजाज इंसान .ग्रुशा से हमने उत्तर प्रदेश में टैक्स माफी के लिए जिक्र किया की मुख्यमंत्री के सलाहकार हैं मधुकर जेटली उनसे मिलो . बात हो गयी है . इसका जिक्र इसलिए  लिए जरूरी है  लोग यह जान लें की फ़िल्मी दुनिया का यह दूसरा कपूर परिवार  है जहां सब के सब एक से बढ़ कर एक कलाकार हैं . ओम पुरी इसीपरिवार से जुड़े रहे हैं . सीमा कपूर रणजीत भाई की बहन है . रणजीत कपूर , अनिल कपूर जो अब फिल्मो में अन्नू कपूर के नाम से जाने जाते हैं सगे भाई हैं . बहरहाल आइये देखते हैं एक कलाकार की निजी जिन्दगी जो उसके फ़िल्मी चरित्र को भरपूर मदद करते हैं .
     दुनिया का सबसे बड़ा प्रयोग हो रहा है , गो की इस तरह की संगीन और संजीदा रचनाओं पर इसके पहले भी फिल्म बन चुकी है लेकिन यह अद्भुत प्रयोग था . कहानी - मुंशी प्रेमचंद / निदेशक - सत्यजित राय / कथा - सद्गति /कलाकार - सब एक दुसरे पर भारी . मोहन अगासे , ओम पुरी. स्मिता पाटिल . अछूत ओम पूरी अछूत है , यह बताने केलिए  किसी वाह्य आडम्बर की जरूरत नही पडी , उसके बैठने का अंदाज , चेहरे का भाव सब उसके अपने अन्दर से आ रहा था . ओमपूरी की निजी जिन्दगी अभाव , और तिरश्कार से गुजरी है . कोयला बेचा है , मामा के घर से बाहर निकाला गया चोरी और चम्चोरी का आरोप लगा कर .निजी अनुभवों के जखीरे पर खडा ओम फिल्मों में बेहतरीन मोड़ देता है . ७० के रंगीन ,सजे संवेरे चेहरे जहा राजेश खन्ना , अमिताभ बच्चन , जितेन्द्र का बोलबाला हो , उसके समानांतर रंगमंच से आये 'लौंडों ' ने नई लकीर खींच दी . नशीर , कुल भूषण खरबंदा , पंकज कपूर , राजेश विवेक , अन्नू कपूर , ओम पुरी . बहुत से नाम हैं . लेकिन जो गहराई ओम में रही वह शायद ही किसी में , एक साथ और एक मुश्त हो .हास्य की एक नई परिभाषा दी है ॐ ने . एक वास्तविक घटना का जिक्र करना चाहूँगा जहां रंगमंच और जिन्दगी सिम्त कर एक हो गयी है . करुणा है , अभाव है , राजशाही है . ठहाका है . दिल्ली के पूसा रोड पर दुसरे तल पर एक कमरा किराए पर लेकर बज्जू भाई (कलाकार , निदेशक  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक रहे , आज कल बंबई में हैं और फिल्मों से जुड़े हैं हमारे निहायत हिआत्मीय ) और ओमपुरी साथ साथ रहते थे . फाकामस्ती के दिन थे . एक दिन अल सुबह पता चला की दोनों में  किसी के भी पास  इतने पैसे नही हैं की वे मंडी हाउस ( बंगाली मार्केट )  तक पहुँच जायं और दोस्तों से उधार लेकर जिन्दगी को आगे बढायें . इतने में नीचे से कबाड़ी की आवाज आयी . ओम ने बालकनी से कबाड़ी वाले को आवाज दिया और वह ऊपर आ गया . खाली बोतलें . अखबार वगैरह मिला कर कुल बहत्तर रूपये हुए /कबाड़ी ने सौ रूपये निकाला और बोला छुट्टा तो नही है , आपके पास हो तो दे दीजिये . ॐ  ने जोर का ठहाका लगाया और बोले - उस्ताद ! वही तो दिक्कत इधर भी है . सौ सौ के ही नोट हैं . तुम ऐसा करो नेचे चले जाओ . चार अंडा , एक मक्खन , एक ब्रेड और एक पाकिट दूध लेलो , छुट्टा हो जायगा .कह कर ॐ बैठ गये दाढी बनाने .कबाड़ी वाले ने जाते जाते पूछ लिया -साब ! ये बोरा नीचे लेता जाऊं ? बज्जू भाई ने फराकदिली से कहा - बिलकुल ले जाओ भाई , और ज़रा जल्दी लौटना . आगे का किस्सा मत पूछिए . याद आता है तो अब भी हंसी आती है /
      ओम से हमारे रिश्ते उतने बेबाकी से नही रहे जैसा की और लोंगों के साथ . उसकी एक वजह थे जब हम दिल्ली के हुए तो ओम पुरी और राज बब्बर ने अपना कार्यक्षेत्र पंजाब बदल लिया था . लेकिन गाहे ब गाहे मुलाक़ात होती रहती थी . ओम का इस तरह अचानक जाना अखर गया .
सादर नमन दोस्त .
राहुल गांधी और अखिलेश ; सियासत की बिसात पर .
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चंचल 
  शतरंज से वाकिफ नही हैं , तो मियाँ ! सियासत में दखलंदाजी मत करिए . और अगर आप कत्तई सियासतदां नही हैं और शतरंज के खिलाड़ी हैं तो अपने झरोखे से बैठ कर  जंगलात में खेले जा रहे सियासी चाल पर यह तो बोल ही सकते हैं की कौन पैदल सही चला है , कौन पैदल  रानी के लिए अर्दभ में खडा होरहा है. अब जरा उत्तर प्रदेश का मौक़ा मुआइना करिए . पिछले दो दशक से भी ज्यादा हुआ यह प्रदेश दो अतिवादियों के बीच लत्ते की गेंद बना कभी इस पाले में ,कभी उस पाल्हे में लुढ़क रहा है . इनकी खामियों को अभी देखने का वक्त नही है , अभी तो महज यह भर जान लेना जरुरी है की इन दो सरकारों का चरित्र क्या रहा है ? राजनीति और विशेषकर जनतंत्र में दो ऐसे कारक तत्व होते हैं जो सबसे पहले तंत्र को ही समाप्त करते हैं . एक है बाहुबल और दुसरा धन बल . विडंबना यह की जो अपने आपको , वंचितों , दलितों , मजबूरों और मजलूमों के नेतृत्व का  दम भरते रहे और उनके कंधे पर बैठ कर धन उगाही करते रहे , उनके लिए समाज का यह वंचित हिस्सा महज वोट बन कर रह गया है . दुसरी तरफ बाहुबल सियासत में स्थापित होकर समाज को खोखला बनाता रहा . इनके यहाँ स्थापित सत्ता का केवल एक मतलब रहा लूट और तिजारत .उत्तर प्रदेश इन्ही डोके बीच पिस रहा था , ऐसे दो राष्ट्रीय पार्टियों ने उत्तर प्रदेश की तरफ मुह घुमाया . १४ के संसदीय चुनाव में भाजपा कोमिली जीत ने उसके सपने को फैलाने के लिए अच्छी खासी जमीन दी लेकिन मुद्दे कहाँ से लाये जाँय ? जनता के बीच जाने के लिए भाजपा के पास कोइ ठोस नारा तक नही है . सिवाय इसके की वह समाजवादी सरकार के खिलाफ 'गुंडा राज ' ख़त्म करने का वायदा करे . ( समाजवादी सरकार पर गुंडई का मुलम्मा चढ़ाना , सामान्य बात रही  है )  लेकिन इस बार भाजपा वह भी नही बोल पा रही हा क्यों की जातीय वोट के चक्कर में उसने अन्य पिछड़ों में से जिसे प्रदेश का अध्यक्ष बनाया है उस पर दर्जनों अपराधिक मामले दर्ज हैं . ऐसे में भाजपा केवल कहीं क ईंट कहीं क रोड़ा  जोड़ घटा कर कुनबा तैयार करने में लगी है . 
अब आती है कांग्रेस .मुख्यधारा की एक मात्र पार्टी . तकरीबन साथ साल तक हुकुमत करने के बाद कांग्रेस आहिस्ता आहिस्ता यथास्थितवाद की ओर झुक गयी है . अजगरी परम्परा में बैठी कांग्रेस खुद नही हिलती , जब उसका इंजन हिलता है तो यह वहीं से बैठे बैठे हुंकार मारती है . उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जायका लें तो पच्चीस साल में कांग्रेस ने सदन में या सडक पर ऐसा कुछ किया हो जो जनता से जुड़ कर देखा गया हो .इसके दो अध्यक्ष , एक सलमान खुर्शीद और दुसरे निर्मल खत्री ऐसे रहे जिनसे कुछ उम्मीद बनाती थी लेकिन  इनकी मजबूरियां भी कमाल की रही . केंद्र एक अध्यक्ष ही नही देता रहा , साथ में भांति भांति के तत्व भी लटका देता था , (अभी भी यह  जारी है ) अब अध्यक्ष सूबे के कांग्रेसी कोदेखे या जो गौने में पालकी के साथ आये हैं ? नतीजा यह हुआ की नये चेहरों की भारती ही नही हुयी और जो पुराने थे वे ठस , जस के तस  कभी इस कमिटी में कभी उस कमेटी में घूमते रहे . आज राज बब्बर जब कांग्रेस अह्यक्ष बन कर लखनऊ आये तो नौजवानों में एक नई उर्ज्वा का संचार हुआ क्यों की राज बब्बर के काम का तरीका परम्परागत कांग्रेसी तरीके से अलग रहा है . संघर्ष और मुद्दों पर टकरा कर नये नये चेहरों की खोज और उसकी शिक्षा जिससे राज आये हैं यहाँ भी धीरे धीरे भोथरी हो रही है . ऐसे में अगर राज बब्बर जोखिम लेकर अपने निर्णय पर अड़े तो निश्चित रूप से कांग्रेस फायदे में रहेगी .जहां तक राहुल गांधी या सोनिया गांधी के हस्तक्षेप की बात है ये दोनों ही किसी के काम में हस्तक्षेप नही करते , जब तक की कोइ बड़ा हादसा न हो जाय . अगर राज इस डगर पर चले तो संभव है आगामी दो साल में कांग्रेस ५२ की स्थिति में पहुँच जायगी . 
उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में अखिलेश और राहुल गांधी के गठबंधन की जाजा हवा के झोंके की जनता कोइंत्जार है . अरसे बाद यह चुनाव होने जा रहा है जो धनात्मक होगा ,  ऋणात्मक नही . बहुत दिनों बाद जनता जाति , धर्म , लिंग  अर्थ , बाहुबल , धन बल  आदि  सारी दीवारों को भसका कर , अपने उम्मीद को वोट करने का मन बना लिया है . यह चुनाव एक तरफ़ा भी जा सकता है . 


Friday, January 6, 2017

अनुपम अब नही लौटेंगे

अनुपम अब नही लौटेंगे
चंचल
     हममे रत्ती भर वो कुछ होता , जो मिल मिला कर अनुपम को गढ़ता है तो निश्चित  रूप से हम ऐलानिया कहते कि हम अनुपम के दोस्त रहे हैं . लेकिन अनुपम भाई की एक और बड़ी खूबी रही है उन्होंने ने अपने सामने वाले को कभीभी अपने पैमाने से कभी किसी को  नहीं मापा , बल्कि  उसे राग के अनुपात से अपने पास आने को सम्मोहित किया .गाँधी का यह सलीका बहुत सारे गांधीवादी भी नही समझ सके ,लेकिन अनुपम भाई इस सलीकोको इस  तरह अपना रखा था जैसे खादी को अपनाया था . चुनांचे उनके दोस्तों , प्रशंसकों , उनके  कार्य कलाप में रूचि रखने वालों यहाँ तक कि उनके पाठकों को एक सहज और सरल दोस्त मिलता रहा . अनगिनत तादात है .और सबसे बड़ी बात की वे जिस काल खंड पर खड़े थे उसके बर अक्स पुरानी , तार्किक और स्थायी समाधान देने के लिए , न कभी उत्तेजना व्यक्त किये न ही उत्तेजक भाषा या आचरण को स्वीकारा . खामोश ,सटीक और सार्थक विचार और कर्म देते रहे . आजीवन . गांधीवादी परिवार की परवरिश  का नतीजा रहा की जब देश का युवा वर्ग बदलाव की भूख लिए सडक पर लड़ रहा था , वर्धा में पैदा हुआ एक नौजवान पहाड़ पर चंडी प्रसाद भट्ट के साथ पेड़ से चिपक कर खडा हो गया . यह समय की बात है जब देश पर्यावरण के टूटते और भासकते बवंडर से वाकिफ ही नही रहा . यह ७० का कालखंड है . चिपको आन्दोलन की शुरुआत में जो गिने चुने नाम आते हैं उसमे सबसे कम उम्र के जिस नौजवान कोलोग आदर से गोहराते हैं , वह है अनुपम मिश्र .
 अनुपम मिश्र में कौन अनुपम बड़ा है , खोजना दिक्कत देता रहेगा . पत्रकार ,लेखक , सम्पादक , जल और जंगल का सजग पहरुआ , यहाँ तक की एक इंसान ? गांधी शान्ति प्रतिष्ठान के ठीक पीछे महावत खान रोड पर हम रहते थे , घर से निकल कर दरियागंज जाने के लिए हमे गांधी शान्ति प्रतिष्ठान की दीवार से होकर जाना पड़ता था . अनुपम भाई से अक्सर वहीं मुलाक़ात होती रहती थी . एक दिन बातचीत के दौरान अचानक अनुपम भाई ने कहा -  हम हरित क्रान्ति के नाम पर फिसल गये हैं . इसकी भरपाई होने में बहुत मेहनत और उससे ज्यादा वक्त लगेगा . वक्त के पहले कहा गया उनका आकलन अब तो सामान्य बात हो गयी है ,लेकिन उस समय हम समझने  से चूक गये . अनुपम भाई का पत्रकार और अध्यापकी मुद्रा बगैर लाग लपेट के सीधे सपाट भाषा में मिली . आज तक गाँठ बाँध कर रखा हूँ . पहली बार किसान की सहज और सटीक  परिभाषा सुन रहा था . किसान सीधा होता है , सहनशक्ति अपार है , भविष्य के बारे में धनात्मक सोच रखता है , निराश नही होता . जमीन और जल उसकी पूंजी है , हरित क्रान्ति ने अधिक अन्न उपजाओ के नारे और कृतिम उपायों से किसान को बर्बाद कर दिया . हुकुमत किसी की रही हो लेकिन वह गुलाम नही था . उसके पास जमीन थी , अपनी खाद थी , जो जानवरों से मिलती थी , उसके पास अपने संसाधन थे . खेत की सिंचाई के अपने संसाधन थे , आपस में सामूहिकता का जीवन दर्शन था सब बिखर गया . किसान को कर्जदार बनाया गया , खेती के उपकरण खरीदने के लिए , सिंचाई के लिए . हवा रोशनी और पानी पर सब का बराबर अधिकार था , आज सब बिक रहा है , किसान कर्जदार हो गया . बात समझ में आनेवाली थी . आ गयी . वक्त के पहले जमीन जंगल और जल की कीमत और कूबत आंकने वाले भाई अनुपम  एक आन्दोलन छोड़ कर गये हैं , आ अब लौट चलें . शुरुआत आज नही तो कल करनी ही होगी और उस दस्तावेज पर पहली दस्खत दिखेगी - अनुपम मिश्र की .
जल श्रोत के हमारे जितने भी पारंपरिक संसाधन थे , एक एक के विलुप्त हो रहे हैं इसका असर क्या हो रहा है सर्व विदित है . हम कब तक दैविक आपदा बोल कर मुह छुपाते रहेंगे . कभी तो सचेत होकर सगुण डगर पर चलना पडेगा . पोखरा , कुंवा , नदी नाला , हल बैल की जोताई , बगैर अंग्रेजी खाद का अन्न आज का बड़ा सवाल है . अनुपम भाई उन सवालों का हल दे चुके हैं , बस  उसे स्वीकारने की जरूरत है . अभी इसी संस्थान से एक अद्भुत किताब छपी है ,- जल थल मल . अद्भुत पुस्तक .
वक्त जितना खराब होगा , अनुपम भाई आपकी उतनी ही जरूरत बढ़ेगी .
सादर नमन , अनुपम भाई . 

अलविदा ओम

अलविदा ओम
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चंचल
प्रसिद्द फिल्म निर्माता , रंगमंच निदेशक और ओम पूरी के साले भाई रंजित कपूर का एक छोटा सा सन्देश मिला कि ओम पूरी  नही रहे . पल भर के लिए एक शून्य पसर गया. अभी कुछ दिन पहले हम लोंगों ने फोन पर बात की थी .और टी हुआ था एक गंभीर फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की जाय जो खांटी राजनीति से जुडी हो और उसके अंदरुनी खांचे को उजागर करती हो .अभी हाल में भाई रंजीत कपूर की एक फिल्म ' जय हो डेमोक्रेसी ' आई है . ग्रुशा कपूर निहायत जहीन कलाकार है और उतनी ही बेहतर खुशमिजाज इंसान .ग्रुशा से हमने उत्तर प्रदेश में टैक्स माफी के लिए जिक्र किया की मुख्यमंत्री के सलाहकार हैं मधुकर जेटली उनसे मिलो . बात हो गयी है . इसका जिक्र इसलिए  लिए जरूरी है  लोग यह जान लें की फ़िल्मी दुनिया का यह दूसरा कपूर परिवार  है जहां सब के सब एक से बढ़ कर एक कलाकार हैं . ओम पुरी इसीपरिवार से जुड़े रहे हैं . सीमा कपूर रणजीत भाई की बहन है . रणजीत कपूर , अनिल कपूर जो अब फिल्मो में अन्नू कपूर के नाम से जाने जाते हैं सगे भाई हैं . बहरहाल आइये देखते हैं एक कलाकार की निजी जिन्दगी जो उसके फ़िल्मी चरित्र को भरपूर मदद करते हैं .
     दुनिया का सबसे बड़ा प्रयोग हो रहा है , गो की इस तरह की संगीन और संजीदा रचनाओं पर इसके पहले भी फिल्म बन चुकी है लेकिन यह अद्भुत प्रयोग था . कहानी - मुंशी प्रेमचंद / निदेशक - सत्यजित राय / कथा - सद्गति /कलाकार - सब एक दुसरे पर भारी . मोहन अगासे , ओम पुरी. स्मिता पाटिल . अछूत ओम पूरी अछूत है , यह बताने केलिए  किसी वाह्य आडम्बर की जरूरत नही पडी , उसके बैठने का अंदाज , चेहरे का भाव सब उसके अपने अन्दर से आ रहा था . ओमपूरी की निजी जिन्दगी अभाव , और तिरश्कार से गुजरी है . कोयला बेचा है , मामा के घर से बाहर निकाला गया चोरी और चम्चोरी का आरोप लगा कर .निजी अनुभवों के जखीरे पर खडा ओम फिल्मों में बेहतरीन मोड़ देता है . ७० के रंगीन ,सजे संवेरे चेहरे जहा राजेश खन्ना , अमिताभ बच्चन , जितेन्द्र का बोलबाला हो , उसके समानांतर रंगमंच से आये 'लौंडों ' ने नई लकीर खींच दी . नशीर , कुल भूषण खरबंदा , पंकज कपूर , राजेश विवेक , अन्नू कपूर , ओम पुरी . बहुत से नाम हैं . लेकिन जो गहराई ओम में रही वह शायद ही किसी में , एक साथ और एक मुश्त हो .हास्य की एक नई परिभाषा दी है ॐ ने . एक वास्तविक घटना का जिक्र करना चाहूँगा जहां रंगमंच और जिन्दगी सिम्त कर एक हो गयी है . करुणा है , अभाव है , राजशाही है . ठहाका है . दिल्ली के पूसा रोड पर दुसरे तल पर एक कमरा किराए पर लेकर बज्जू भाई (कलाकार , निदेशक  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक रहे , आज कल बंबई में हैं और फिल्मों से जुड़े हैं हमारे निहायत हिआत्मीय ) और ओमपुरी साथ साथ रहते थे . फाकामस्ती के दिन थे . एक दिन अल सुबह पता चला की दोनों में  किसी के भी पास  इतने पैसे नही हैं की वे मंडी हाउस ( बंगाली मार्केट )  तक पहुँच जायं और दोस्तों से उधार लेकर जिन्दगी को आगे बढायें . इतने में नीचे से कबाड़ी की आवाज आयी . ओम ने बालकनी से कबाड़ी वाले को आवाज दिया और वह ऊपर आ गया . खाली बोतलें . अखबार वगैरह मिला कर कुल बहत्तर रूपये हुए /कबाड़ी ने सौ रूपये निकाला और बोला छुट्टा तो नही है , आपके पास हो तो दे दीजिये . ॐ  ने जोर का ठहाका लगाया और बोले - उस्ताद ! वही तो दिक्कत इधर भी है . सौ सौ के ही नोट हैं . तुम ऐसा करो नेचे चले जाओ . चार अंडा , एक मक्खन , एक ब्रेड और एक पाकिट दूध लेलो , छुट्टा हो जायगा .कह कर ॐ बैठ गये दाढी बनाने .कबाड़ी वाले ने जाते जाते पूछ लिया -साब ! ये बोरा नीचे लेता जाऊं ? बज्जू भाई ने फराकदिली से कहा - बिलकुल ले जाओ भाई , और ज़रा जल्दी लौटना . आगे का किस्सा मत पूछिए . याद आता है तो अब भी हंसी आती है /
      ओम से हमारे रिश्ते उतने बेबाकी से नही रहे जैसा की और लोंगों के साथ . उसकी एक वजह थे जब हम दिल्ली के हुए तो ओम पुरी और राज बब्बर ने अपना कार्यक्षेत्र पंजाब बदल लिया था . लेकिन गाहे ब गाहे मुलाक़ात होती रहती थी . ओम का इस तरह अचानक जाना अखर गया .
सादर नमन दोस्त .