Monday, August 14, 2017

chanchal: चिखुरी चिचियाने /चंचल----------------------------...

chanchal: चिखुरी चिचियाने /चंचल
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: चिखुरी चिचियाने /चंचल --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------...
चिखुरी चिचियाने /चंचल
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बीमार सियासत का चुहुलबाज मुल्क
   अड्डे केवल शहर में ही नही होते , कलकत्ते से चला यह अड्डेबाजी का चलन अब गाँव तक जा पहुंचा है और एक नशा की तरह पुरे समाज में तारी है . कल हमने बताया था की अड्डेबाजी को सरकार ने भरपूर  बढ़ावा दिया . सरकार ने मुलायम पग्दंद्दी को तोड़ कर गड्ढे वाली सडक दिया और माटी की दिया हटा कर बल्व लटकवा दिया ,गाँव सडक पर आ गया और घर घर में
टीवी आ गया / नेता जी मुस्कुराए - कमबख्त विकास देखो , मसायल मत उठाओ . भाड में गयी गरीबी , बेरोजगारी , गैर बराबरी .तुमे हंसने के लिए डिब्बा दे रहा हूँ , उलझो उन कहानियों में जो डिब्बा दिखाएगा . बिजली गायब रहे तो चौराहे पर जाओ देश के नाम सन्देश जारी करो , अमरीका रूस पर ब्यान दो कोइ न मिले तो पाकिस्तान तो है ही . तुम्हारे दिल को बहलाने के लिए पाकिस्तान गरीब की लुगाई की तरह है . लाल साहेब की बेंच पर बैठ कर तीन मिनट में छह बार पाकिस्तान की माँ बहन  करोगे . जब छोटका तुम्हारी माँ  बहन करते हुए दूकान की तरफ बढ़ेगी और भैस के भागने की खबर देगी तो चौराहे की बहादुरी भाग के छोटका के फुकती में घुस जाती है . हर रोज चौराहे पर यह होता है . चिखुरी ने चुटकी ली _ नवल ! पाकिस्तान को मारो गोली , कभी चीन को भी तो कुछ बोलो . पुरी दूकान में सन्नाटा पसर गया .करिअवा कुकुर जो भीड़ की आवाज में सोने का आदी हो चुका है , सन्नाटा पसरते ही कुनमुना कर मूड
उठाया . मौक़ा मुआयना किया और फिर सो गया . कयूम मिया ने टुकडा जोड़ा - चीन पर जब सरकार सनाटा खा जाती है तो नवल उपधिया किस दम पर बोले. अशोक अंडावाले बीडी सुलगा कर सामने आये - ये भाई ! देखते देखते राजनीति ही उल्ट गयी . क्ल्संस्द में बहस होती थी सरकार को जवाब देना होता था . अब न सवाल है , न जवाब .बस पैसा चाहिए . उमर दरजी जनम का मुरहा है बेबात कुबात ही बोलता है - का गलत है भाई , राजा राज कर रहा है प्रजा ऐश कर रही है कोइ समस्या है इस देश में ? ना है न .बस ऐश करो . मद्दु ने करवट बदला गौर से सब को निहारा और शुरू हो गये -
         
    ' हस्बे जेल अर्ज कर दूँ कि हम ऐसे मुल्क की नब्ज पर हाथ रखने जा रहे हैं जिसे पहली नजर में आप खारिज कर देंगे , क्यों की आप  उस  समाज के नुमाइंदे हैं जो गंदगी को देख कर
डगर बदल कर आगे बढ़ जाते हैं या उस पर गमकती रुमाल रख कर ढँक देंते हैं लेकिन गंदगी को साफ़ नही करते .मसलन आजका भारत देखिये हर तरफ झूठ फरेब का ऐसा जाल  फैला दिया गया है की हर इंसान तकरीबन उस झूठ  के सहारे हम हर सवाल का हल ढूंढने लगा है . ' आज मद्दु पत्रकार कुछ ज्यादा ही संजीदा दिखे और जो बात उन्होंने बोला उसके बारे में नवल उपधिया का कहना है की आप जो बोल रहे हैं एंटिना में नही फंस रहा है . मद्दु उखड़ गये - सुनो ! एक बात बताओ १४ में संसद का चुनाव हुआ किस मुद्दे पर ? भूल गये होगे , हम बता रहे हैं .  बड़ी चालाकी से , समाज के हर हिस्से के लिए अलग अलग सवाल दिए गये थे . एक - आम आदमी के लिए , महगाई .इसका हल - हर खाते में मुफ्त का पैसा सरकार दाल देगी  . पढ़े लिखे डपोर लोंगो के लिए भ्रष्ट्राचार . नौजवानों के लिए काला धन वापस होगा . नतीजा .संसद में वजीरे तिजारत जनाब अरुण जेटली जवाब देते हुए कहा वो तो चुनाव के बोला गया जूमला था . कमाल है देश का नेता जनता में जूमला बोल कर वोट माँगा है मुकर जाता है क्यों ? है किसी के पास जवाब ? क्यों नही उठता संसद में सवाल ? अब चिखुरी की बारी थी -
संसद की हालत देखो , कौन बैठा है आज संसद में ? सरकारी आंकडा है पिच्चासी फीसद संसद सदस्य  करोड़ पति है . साथ फीसद लोगों पर अपराधिक मामले हैं ,  बलात्कार . चोरी . चम्चोरी , लूट दंगा . कौन बैठा है देश की सबसे बड़ी पंचायत में . ?   जहां  कभी पंडित नेहरु बैठते थे , लाल बहादुर शास्त्री , डॉ  लोहिया , कृपलानी , ज्योतिर्मय बासु , सवाल उठते थे आम आदमी के . जनता संसद को अपना मानती थी .उसी संसद में गाजी पुर के विश्व नाथ गहमरी का गरीबी पर भाषण है पंडित नेहरु की आँख भर आयी थी . उसी संसद में डॉ लोहिया ने चुनौती दी थी पंडित नेहरु की सरकार को . संसद की पुस्तकालय में आज भी वह बहस मील का पत्थर बन कर . तीन आने बनाम तेरह आने . लेकिन दोषी संसद सदस्य नही है . गलती उनकी है जिन्होंने ऐसे लोंगों को चुन कर संसद पहुचाया .
लखन कहार का सवाल टेढा है -अब क्या करें ?
कुछ ख़ास नही , बस अपने चुने हुए प्रतिनिधि से पूछिये -संसद में . विधान सभा में आपने जो काम किया है उसे जनता को बताओ .
नवल मुस्कुराए . साइकिल उठाये . घंटी बजाए . पैदल चले . कयूम ने पूछा - का बात है बेटा - पैदल ? नवल मुस्कुराए - साइकिल क कुत्ता फेल .
नवल गाते हुए जा रहे हैं - मिर्जापुर कैल गुलजार हो कचौड़ी गली सुन कैल बलमा       

Monday, August 7, 2017

chanchal: चिखुरी चिचियाने / चंचल---------------------------...

chanchal: चिखुरी चिचियाने / चंचल
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चिखुरी चिचियाने / चंचल
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९ अगस्त महज एक तारीख नही है .
     
         अगरचे यही रहा तो कुछ दिन में चिखुरी ' काठे मार ' दिए जायंगे . पागल होने में अब कोइ कोर कसर नही है .  नवल उपधिया की पुरानी आदत है , कोइ भी बात बताने के लिए
कमबख्त  ढेढ़ हाथ की भूमिका लगाएगा . आँख बंद कर के खैनी मलेगा .तब तक लोग उब चुके होते हैं और उत्सुकता बढ़ चुकी होती है .कयूम मिया ने पूछ् पकड़ा - हुआ का , अभी कल तक तो भले चंगे थे अचानक पगला कैसे गये ? अभी आ रहे हैं  देखना . आज सुभ से ही हर एक से सवाल पूछ रहे हैं - नौ अगस्त के बारे में बताओ . अब भला  कोइ क्या बताये की नौ अगस्त
का है ? लखन कहार ने इशारा किया वो देखो चिखुरी काका भी आ गये . लोग चौंके . आज तो चिखुरी का पूरा हुलिया ही बदला हुआ है . खादी का कुर्ता .जवाहिर जैकेट , टोपी , खादी की
बी कायदे धुली हुयीधोती पैर में चट्टी और हाथ में तिरंगा लिए चले आ रहे हैं .पीछे पीछे जमा पूँजी चार लड़के कांग्रेस जिंदाबाद , महात्मा गान्ही अमर रहें . 'कुट्ट इंडिया जिन्नावाद . हर जोर जुर्म के टक्कर में ....... /  चौराहा सावधान . दुकानदार गाहक छोड़ कर सडक पर . जनता एक दुसरे की आँख में आँख दाल कर पूछ रही है , - माजरा क्या है ? लेकिन जब किसी को मालुम हो तब बताये न की माजरा क्या है . लाल साहेब ने उमर दरजी से पूछा - आज पन्द्रह अगस्त है का ? हमरे समझ से तो ना है .आहे से की कल सात रहा रछा बंधन वास्ते एक दिन बीच में आवा तदौड़ के पन्द्रह कैसे होय जाई . कीन उपधिया आजकल ज्यादा बोलने लगा है ,उसकी सरकार है वह नही बोलेगा तो कौन बोलेगा . किन  की दूकान बंद है दुसरी दूकान चालु है . हैण्ड पम्प चाहिए ? करताहूँ कुछ और इस कुछ से ही कीन कीदुकान चल रही है . लेखी होंगी प्रवक्ता दिल्ली की , यहाँ तो सरकार को उबार रहे हैं कीन उपधिया ही . चिखुरी से कीन की कत्तई नही जमती , पर का करे अक्खा समाज चिखुरी के साथ . आज कीन को मौक़ा मिल गया है - चिखुरी को देखो भाई ! आज य पन्द्रह अगस्त मनाय ले रहे हैं . कुछ और भी बोलते पर इतने में चिखुरी का जुलुस लाल्साहेब की चाय की दूकान तक आ पहुंचा . लड़के नारा लगाए जारहे हैं , कुछ हो हल्ला , कुछ भीड़ भड़क्का देख कर और भी लोग आ पहुंचे बच्चे तो कुछ ज्याडा ही .
नारा दुगुनी गति से उपर उठ गया . चिखुरी लाल साह्ब्की दूकान के अंदर चौकी पर जा बैठे , जहां हर रोज बैठते रहे हैं. बात उठाया मद्दु पत्रकार ने - आज से ही पंद्रह अगस्त मन्ने लगा काका ? चिखुरी ने तरेर कर देखा - पत्रकार हो न ? बड़ा गर्क हुआ केवल राजनीति से ही नही . तुम लोंगों की कम अकली ने बहुत जल्दी डुबोया है समाज को . नौ अगस्त भी नही जानते ? जब तुम्हारे जैसे पत्रकार इतने पर खड़े रहेंगे तो इनका क्या होगा जो सामने बैठे हैं लखन कहार , उमर दरजी , नवल उपधिया , लाल साहेब सिंह वगैरह .मद्दु ने अपनी असमर्थता जाहिर की - वाकई हम नही जानते दादा . हममे से कोइ जानता है भाई ? एक मस्ट आवाज आयी - कोइ नही  जानता , बताया जाय . नवल ने प्रस्ताव रखा - ऐसे नही , दादा के लिए चौकी बाहर निकाली जाय . झंडा है ही एक भाषण हो जाय . ससुरे चुनाव न आये तो भाषण भी न सुनायी पड़े . नवल ने नारा लोकाया , बच्चों ने बीच में ही लोक लिया . कीन उपधिया जानते हैं किचिखुरी पुरानेज्माने के सुराजी हैं कांग्रेस की तारीफ़ करेंगे .पर डर की वजह से चुप ही रहे .
           पूरा चौराहा भर गया . घास की तलाश में निकला महिलाओं का झुण्ड भी एक किनारे खडा हो गया . मंझारी से बगैर बोले नही रहा जाता , लम्मरदार से बोली - हे देवर ! हिया कुछ बटी का ? लम्मर दार ने गौर से मंझारी को देखा और बोले _ हुंडी बटी , चाहि का ? मंझारी के लिए हुंडी नई बात थी वह चौंकी _ हुंडी ? कैसा होला ई ? लम्मार्दार ने इशारे से बगैर कुछ बोले , बोल गये . महिलाओं की और से खिलखिलाहट हुयी , कई मनचले जो मौक्ये वारदात पर थे जोर से हंस दिए और सारी भीड़ इधर देखने लगी . लम्मार्दार ने हांका मारा - बोला जाय पब्लिक व्याकुल होय रही बाय , अब चिखुरी मंच में चढ़े .तालिया बजी . और भाषण शुरू
        ' हम कोइ नेता ना हैं , आम आदमी हैं , और उसी आदमी के बारे में बोल रहा हूँ . बुरा मत मनाइएगा हम मरे हुए समाज को दफनाने की जुगत में हैं . जो समाज अपने इतिहास से वाकिफ नही होता , उसका वर्तमान लम्पटों , आढतियों और टेनीमार व्यापारियों के हाथ में खेलता है और उस समाज का भविष्य गर्त में जाता है . आज हम उसी मुकाम्पर खड़े हैं
आज नौ अगस्त है हमारे इतिहास का एक सुनहरा पन्ना आज के ही दिन लिखा गया है , पर दुर्भाग्य देखिये इस मुल्क को विशेष कर नई पीढ़ी को यह तारीख भी नही मालुम है .
आज से ठीक पचहत्तर साल पहले सुराज की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस पार्टी का बम्बई में जलसा था . उस सम्मेलन में महात्मा गांधी ने बर्तानिया सरकार को चुनौती दी और नारा दिया -
 अंग्रेजो भारत छोडो , क्विटइंडिया . डू आर डाई / करो या मरो . यह है नौ अगस्त बयालीस का आन्दोलन . आधे घंटे के अंदर समूची कांग्रेस गिरफ्तार कर ली गयी . कुल डेढ़ लाख लोग एक घंटे के अंदर जेल भेज दिए गये .अब जनता ने आन्दोलन अपने हाथ में ले लिया इसका नेतृत्व चला गया समाजवादियो के हाथ डॉ लोहिया , अचुत पटवर्धन , जी जी  पारीख वगैरह .लेकिन सबसे ज्यादा बढ़ चढ कर महिलाओं ने आन्दोलन को चलाया आज जिसे आजाद मैदान बोलते हैं वहाँ देश की एक क्रांतिकारी लड़की ने कांग्रेस का झंडा फहरा कर दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य को चुनौती दी , उनका नाम है अरुणा आसफ अली . गुप्त रेडियो का संचालन किया है उषा मेहता ने . आजादी की उस लड़ाई में अंग्रेजों का साथ देनेवालों में जिन्ना की मुस्लिम लीग थी , राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ था और कम्यनिस्ट पार्टी थी . ये सब अंग्रेज के साथ थे . कांग्रेस अकेले लड रही थी , उस अंग्रेजी साम्राज्य से जिसके हुकुमत में सूरज नही डूबता था .
तालियाँ बज रही है , नम आँख में चिखुरी सुराजी बच्चों को निहार रहे हैं .
नवल गाते हुए रवाना हुए - झंडा उंचा रहे हमारा 
पर कथा / चंचल

सुनती हो  ! जी यस टी  सिजेरियन है
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   हुकूमत की अपनी भाषा होतीहै और जनता की अपनी . हुकूमत जनता की भाषा समझती है पर जनता हुकूमत की भाषा से दूर ही  रहती है . यह मैकाले की युक्ति है .
मैकाले के पहले भी , तंत्र कोइ भी रहा हो हुकूमत अपनी अलग की जुबान रखता है . जब धर्म सत्ता पर काबिज था और समाजका नियंत्रण वह करता था तब भी यही चलन था
बाइबिल इब्रानी भाषा में इसाईयत को विस्तार देतीहै /इस्लाम का कुरआन अरबी में है . सनातन धर्म संस्कृत में , इन तमाम  धर्मो को मानने वाले  लोग अपनी धार्मिक भाषा से
कोसों दूर है . धर्म के नाम पर लूट की जो व्यवस्था बनी उसमे अजनवी भाषा को एक हथियार के रूप में रखा गया. हमने जिनका जिक्र किया ये सब अपने काल में सत्ता रहे हैं
और आज जब सत्ता का स्वरूप बदला जनतंत्र आया तो भाषा भी बदल गयी लेकिन मूल भावना वही रही की सत्ता की भाषा से जन भाषा अलग रहे .सबसे मजेदार मौजूदा
सरकार की भाषा है .ये जब तक सत्ता में नही थे तब तक- हिंदी , हिन्दू और हिन्दुस्थान चीखते रहे . सत्ता में आते ही अंग्रेज हो गये , एकभी नारा इनका हिंदी में नही मिलगा .
मेक इंडिया , इंडिया टीम , ब्लैक मनी , डी मोंतेजायेसन . अब जी यस टी . चारो तरफ शोर हुआ जी यस टी . खबर पहिये पर तो चलती नही ,ये तो उडती है तो हवाकी भी हवा
 निकाल दे. ती है .  गाँव की अपनी सिफत होती है , उसका अपना नजरिया होता है , भाषा और मुहावरे तो ऐसे होते हैं की घोड़ा नस कटा गाजीपुर में औ पता चला गाजियाबाद में
संवाद सुनिए -
- देवर ! इ जेय्स्टी का है ?
- देख्बू का ?
- सुना है रात में बाढ़ बजे निकला ?
- हाँ , अटक गवा रहा .
- कोलई कहत रहे की सिजेरियन निकला .
 गाँव में पिछले बीस साल से यह शब्द घर घर में आ गया है जिसे सिजेरियन कहते हैं . अब न ओ माएं रही जो आराम से आम्खाते खाते बच्चा दे जाती रही ,चमाइन की हंसिया से
 नाल काट कर अँधेरे बंद कमरे में दाल दिया जाता रहा . अँधेरे से निकला बच्चा आहिस्ता आहिस्ता रौशनी से मिलता था तब तक आँख की रेटिना रौशनी सहने लायक होजाती थी
अब बच्चे अस्पताल में होते हैं , पैदा होते ही हैं ट्यूब  लाईट में  नतीजा ? तीन साल बाद आँख पर चस्मा . तो यह जी यस टी भी सिजेरियन है . पेट्रोल, डीजल , और कश्मीर को
छोड़ कर बाद बाकी हर जगह , हर सामान पर जी यस टी का भार बढ़ा मिलेगा . यह पहली सरकार आयी है जो अखंड भारत तो चीखती है लेकिन अपने ही एक सूबे कश्मीर को
भारत से बाहर कर दिया . पुरे देश में यह टैक्स लगेगा लेकिन कश्मीर में नही . डीजल पेट्रोल पर इस लिए नही लगेगा की अगर डीजल पेट्रोल पर जी यस टी लगा तो पेट्रोल और डीजल
४० प्रतिशत दाम नीचे गिर जायगा . क्यों की जी यस टी कुल २८ फीसद टैक्स लगाता है और देश को जो डीजल पेत्रोल्स्र्कार बेच रही है ४५ फीसद मुनाफे पर . इस जी यस टी से जो तीन बातें होने जा रही हैं य=उसे गौर से देखिये .
अह्गाई - बढ़ेगी
क्रयशक्ति - घटेगी
पूंजी - केन्द्रित होगी .
उपचार ?
कारखाने के माल का वहिष्कार .
और खलिहान के उत्पाद का चलन बढाओ.


Sunday, July 23, 2017

chanchal: चिखुरी चिचियाने / चंचल--------------------- जी य...

chanchal: चिखुरी चिचियाने / चंचल
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 जी य...
: चिखुरी चिचियाने / चंचल ---------------------  जी यस टी का भाव बताओ भाई ! ---------------------------------------------------------------...
चिखुरी चिचियाने / चंचल
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 जी यस टी का भाव बताओ भाई !
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   कल हमने जिक्र किया था की बिकास के नाम पर गाँव की मुलायम पगडंडियों को ककरीला,  किया गया फिर उस पर तारकोल ढँक कर काला किया गया .कहा गया की विकास
इसी पर चलता है . विकास की दूसरी क़िस्त आयी बिजली का खम्बा ले कर . गान ने यकीन किया की सरकार की बात है , घोंचू तेली की बात थोड़े ही है की दुबई की बनी साडी
 बेच कर ससुरा अपनी बर्दवान ठीक कर लेगा . जनता , जनता है फरेब में आ गयी किसी ने उससे पूछा तक नही की अबे घोंचू ! कब से दुबई में सादी बन्ने लगी ?
- भैये ! नाम का रक्खा है ,बक्सावाली सादी पहनेगी कि दुबई ? जैसे सुरत वैसी सर्जाह . बात सही है . तो सरकार काहे ऐसा घपला  करेगी . तो साहब विकास हो गया इका पक्का साबुत देखना हो तो सुबेके किसी गाँव में जाकर देख्लीजिये सडक के किनारे एक खोखा जरुर खडा मिलेगा . जहां दिन भर चाय मिलेगी , हॉट सांझ  राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू . सुबह , शाम पूरा गाँव खाली मिलेगा सडक का खोहा आबाद रहेगा . अरसे तक चिखुरी  इस चौराहे की तमीज के खिलाफ रहे लेकिन जब थक गये तो खुद चौराहे पर जाके बैठ गये . जैसे समाजवादी कांग्रेस से बाहर निकला ,क्रान्ति करने , क्रान्ति नही कर पाया तो लौट कर अपने घर कांग्रेस में जा बैठा . वही हाल चिखुरी का भी रहा .उमर दरजी , लखन कहार , नवल उपधिया कयूम डग्गा मास्टर
को अकेले छोड़ कर चिखुरी जाते कहाँ . सो लाल साहेब सिंह की दूकान पर अड्डेबाजी शुरू हो गयी .
         हिंदी पट्टी में राजनीति चबैना है / खीसे में रहती है जब जहां मौक़ा मिला शुरू . ये बात दीगर है की वह आपको नही सुनायी पड़ेगी क्यों की आप मोदी , जेटली , राहुल , यचूरी को
सुनने के आदी हैं और आपको यह आदत दो जगह से पडी है . एक अखबार से , दुसरा डिब्बे से . और इन दोनों की मजबूरी है ओहदे दारों की बातों को फैलाएं कमबख्त चाहे जहर
ही बोले  . चोर . चम्चोर . बलात्कारी , मवाली , बवाली कल तक टाट पांत से बाहर कर दिए जाते थे , हुक्का पानी बंद कर दिया जाता रहा आज उनका अपराध और उस अपराध का पैमाना
उनकी औकात बन रहा है .अब यह सवाल जेरे बहस होने लगा है . देश में केवल एक संसद नही  है . कांग्रेस की कृपा से यह देश और इसका निजाम संसद दर संसद से चलेगा . गाँव गाँव में संसद है . बैठकें होती हैं , बयान जारी होते हैं लोग सुनते हैं लेकिन कम लोग . लाल साहब की दूकान पर संसद बैठी है . कार्यवाही शुरू
_ ई  जेस्टी के है , भाई ?
- जेस्ती ? एक साथ तकरीबन सब चौंके , बस दो जन को छोड़ कर . एक मद्दु पत्रकार ( नाम है महंथ दुबे लेकिन जब से पत्रकार हुए हैं उनका नाम अखबार ने ही काट कर बांणा कर दिया चाभुती की तर्ज पर महान्थ्दुबे से मदु हुए , लयकारी के चलते मद्दु हो गये )और दुसरे रहे चिखुरी दुबे जो अमूमन चुप्र्हते हैं और जब मुह खोलते हैं तो बोलते नही चीखते हैं . इस चीख को नवल उपधिया कहते हैं चिखुरी चिचिआने .
- जेस्टी ...... कोलई दुबे बताय रहे थे यह तरह की गाय है जो जर्सी से भी ज्यादा दूध देगी , अब पुराने जमाने की तरह देश में दूध और घी की नदी बहेगी , यह बात कोलई दुबे किसी नामी उकील से सुन के आये हैं जो कचहरी में नीमतले बोल रहा था . औ ...... लखन कहार की बात उमर दरजी ने बीच में ही काट दिया - जान रहें कहें मगर अब पानी नही मिलेगा एवज में
दूध लो या घी ? नवल ने टोका - और दही कहाँ गयी ? कयूम मुस्कुराए - बरखुरदार नवल ! दही का मजा तो उसी दिन बिगड़ गया जिस दिन तोहार माई फुकती से दही क मटिया ही ढक
के उठ गयी . और का ठहाका उठा कई चीजें अस्त व्यस्त हो गईं .  गौरयों का झुण्ड जो धूल में नहा रहा था पंख झाड कर फुर्र से उड़ गया , करियवा कुरुर रात भर जगा रहा कुनमुनाया
निहारा और फिर सो गया . मद्दु पत्रकार जो अब तक दायें गोलार्ध पर टिके थे , पहलु बदल कर बाएं पर आ गये . चिखुरी मुस्कुराए - ; कमबख्त शहर होता तो अब तक आग  के हवाले हो गया होता लेकिन गाँव का ताना बाना देखिये कयूम मियाँ नवल के चचा लगेंगे गाँव के रिश्ते में . गालियों के खुले पन ने धर्म , जाती , लिंग वगैरह की जो दीवारे हैं वो भास्का देती हैं .
- मजाक नही , सच्ची   बताया जाय का है ई जेस्टी ?
अलग अलग मत मनान्त्र का रोर जब कानफोडू हो गया तब चिखुरी चीखे - अथी है  जेस्टी . जब से आवा है एक न एक काम बे वजह का लगा देता है . इधर नोट बंदी , उधर विदेश
रवाना . इधर जी यस टी , उधर विदेश रवाना . किसको मालुम है की क्या है जी यस टी ?सरकार खुद नही मालुम है का  कर लोगे ? नवल उठ गये . अक्सर यह होता है जब चिखुरी
चिचिआयेंगे , नवल पंचम में एक सुर उठाएंगे और साइकिल से आगे बढ़ जायेंगे -
  दिनवा गिनत मोर घिसल रे अंगुरिया ...........






Monday, May 22, 2017

पर कथा

रे हे मीम अलिफ नून।
असलम परवेज खान की एक दुकान हुआ करती थी दालमंडी में । दालमंडी  , को नहि  जानत है जग में । काशी की आबरू यही आकर टिकती है । ऊपर  कोठा नीचे कोठरी । कोठरी में दुकान । इन्ही दुकानों में एक दुकान सुंघनी साव की  भी रही जिसपर उनकी औलाद ने न केवल दुकान चलाया बल्कि हिंदी साहित्य को अमर कर गया । जयशंकर प्रसाद । कोठे की ताकती आंख पर मर मिटा था - जो घनीभूत पीड़ा थी , मस्तक में । कागज पर गिरी । कामायनी आ खड़ी हुई । इसी   गली में एक आंगन में  एक उस्ताद बैठा है  बिस्मिल्लाखां । रहमान खड़ा है इसी दाल मंडी में । अपने दोस्त असलम परवेज खान की दुकान पर । ढिबरी , लालटेन , पेट्रोमेक्स, चिमटा जो चाहिए ले लीजिए लेते समय गद्दी की ऊपर लटकी तख्ती को जरूर देखिए ' उधार प्रेम की कैंची है '
बुर्के से निकले गोरे हाथ के जाने के बाद असलम ने पलट कर रहमान से पूछा - जी ! क्या चाहिए आपको ?
- कैंची
- अयं ! तुम  ? अबे अब तक बाहर हो ? और ये लिबास ?
- अबे!मियां भूख लगी है ?
- अंदर आ जाओ । जो भी खाना हो इसे बता दो । और खा पी कर दफा ही जाओ ।
- भाड़ा
-  ए रख लो   दस दस के कई नोट रहे । दबा के खाया यही सीखा उर्दू की पहली इबारत अलिफ । असलम आज दमदार इंजीनियर है हमारा उस्ताद है । हम उस परिवार के सदस्य हैं । असलम पर अलग से लिखूंगा ।
              और दालमंडी को नीचे से ऊपर की ऒर देखा ।आदाब ! दालमंडी ! हम नही बोले , दस दस के नोट बोल रहे थे । पूरे इत्मिन्नान के  साथ चौक थाने के सदर गेट पर आकर खड़े हो गए । हिंदुस्तान की पुलिस कमाल की है । आप इससे डरेंगे डरायेगा , घुड़क दीजिये ,रास्ता दे देगी   अपराध  कर के थाने में जाकर बैठ जाइए ,आपको भगा देगी । 71 में हम इनकी लड़ाई लड़ चुके थे । तब बाबा  रामा नंद तिवारी जी जिंदा थे । (कमाल का इतिहास है तिवारी जी का , हम लोग इन्हें बाबा बोलते थे इनके परिवार में भाई शिवानंद तिवारी जी ही नही हैं हजारों लोग हैं ये किस्सा फिर कभै ) थाने के सामने खड़े होकर सिगरेट पिया रिक्सा रोका
चौकाघाट जेल चलोगे ?

Thursday, January 26, 2017

विवेकी राय / श्रद्धांजलि 
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मास्साब की चिट्ठी 
 ० चंचल 
उन्नीस बीस की लोकोक्ति भोजपुरी पट्टी में दौड़ने वाली कहावत है , विवेकी राय ने अपने लेखन में इस लोकोक्ति का जम कर प्रयोग किया है , उन्हें  का
 मालुम रहा की अपने अंतिम दिन वे खुद इस लोकोक्ति को वोढ लेंगे .१९ नवंबर १९२४ को पैदा हुए विवेकी राय २१ नवंबर २०१६ को विदा हो गये . ' एकाध 
दिन ' का हेर फेर कोइ मतलब होता है का ? पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक ' महकौवा ' जिला गाजीपुर (अरसे तक गाजी पुर गुलाबजल
  और केवडा जल का उत्पादन केन्द्र  रहा है , ) के एक ठेठ गाँव में पैदा हुए विवेकी राय की जिन्दगी 
बहत खुरदुरी रही . विवेकी राय के पैदा होने के डेढ़ महीना पहले इनके पिता की मृत्यु हो गयी थी . माँ ने अपने मायके में इन्हें पाला , बड़ा किया और समाज की 
बोलियों ने विवेकी राय को बचपन से ही जिम्मेदार बना दिया . मिडिल तक की पढाई करके विवेकी राय प्राइमरी के अध्यापक बन गये . यहाँ से विवेकी 
राय के पीठ चिपका ' बेचारा ' खुद को गड़ने लगा . इस एक फांस ने हौसला दिया . प्राइवेट परीक्षा देकर आगे बढ़ते गये . सामने माटी का दिया था , बगल में माँ 
का दुलार विवेकी पढ़ा रहे हैं विवेकी पढ़ रहे हैं ,और एक विवेकी राय उठ रहा है .  खुदमुख्तारी का यह जज्बा रंग लाया और विवेकी राय अपनी मोदार्रिसी भी बढाते गये .
 प्राइमरी से मिडिल , फिर इंटर कालेज , डिग्री कालेज और फिर स्नातकोत्तर महा विद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक . लेकिन यह सब बड़ी आसानी नही हुआ 
बहुत जद्दोजेहद से चलती है जिन्दगी .प्राइमरी पास करते करते एक तूफ़ान  से उलझ गयी .तूफ़ान था गांधी का , सुराज का जलसा और जुलुस का 
 गाजीपुर अलग ऐसे रहता . गान्ही बाबा घर घर में कहानी 
की तरह कहे जा रहे थे . विवेकी का बाल मन कुतूहल के साथ गांधी जी के साथ हो गया . ज्यों ज्यों विवेकी राय बड़े होते गये , गांधी का विस्तार भी
 बढ़ता गया .विवेकी राय गांधी में डूबते  गये . खादी का पहनावा , सादगी से भरा जीवन , गाँव से लगाव सब गांधी से मिला , विवेकी तो बस वाहक रहे ,
 विनम्र , सचेत और संकोची भी . भाषा की कोइ कशमकश उनके पास नही है , पैदा ही दो भाषा में हुए हैं , एक माँ से दुसरी माटी से . हिंदी और भोजपुरी 
दोनों भाषाओं को कांख में दबाये विवेकी राय बगैर किसी आडम्बर और अहंकार के संवाद करते रहे . एक दिन अचानक विवेकी राय 'इज्जतदार ' हो गये 
यह उस जमाने की बात है जब इज्जतदार की ओअरिभाषा कत्तई दूसरी थी . किसी भी तरह के छल प्रपंच से दूर , पर हित की भावना , सादगी का जीवन 
खादी का लिबास , आँख पर मोटा चश्मा , साइकिल भी तो थी ,विवेकी भाई इलाके में इज्जतदार हो गये . भोजपुरी भाषा में बहुतकम शब्द होंगे जिनकी 
कोइ सीमा तय हो . इसके  शब्द आजाद परिंदों की तरह उड़ान भरते हैं , इलाका उसमे से एक है . यह भूगोल नही है .यश और भाव की धारा है .
 कल तक गाँव बहुत सोच समझ कर इज्जतदार की पदवी देता था. यह पदवी पहला काम करती है उसके असल नाम को इज्जत में लपेट देती है और 
एक उपनाम दे देती है . अब विवेकी राय मास्टर साहब हो गये . पर गाँव , वो भी भोजपुरी ? बगैर लय ताल और संगीत के ? चुनांचे अब मास्साब चल पड़े 
मास्साब की तीन लत थी . खैनी , बीडी और तम्बाकू . चाहते तो महगा शौक पाल सकते थे ,लेकिन तब गाँव से टाट बाहर हो जाते . लेकिन इतना सब क्यों 
बता रहा हूँ ? हम उनके लिखे पर बहस चला सकते थे , उन्ही के बहाने हम खुद गंभीर बन सकते थे लेकिन फिर हमारे पाठक को विवेकी राय के लेखन 
का मर्म न मिल पाता . एक उदाहरण देखिये . मनबोध की डायरी , . उन दिनों देश आजाद हुआ था समस्याए सामने थी . गाँव भिउस्से अछूता नही था .
पूर्वी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा अखबार रहा ' आज ' . मनबोध की डायरी नियमित पढ़ी जाती थी . सच कहा जाय तो गाँव मनबोध के साथ ताल दे रहा था 
गाजीपुर में भी मनबोध सिद्दत के साथ खोज खोज के पढ़े जा रहे थे लेकिन खुद गाजीपुर को नही मालुम रहा की ये मनबोध मास्टर है कौन  ? एक वाकया 
जिसे खुद विवेकी राय बताते थे , गाजीपुर की एक सडक जिससे होकर विवेकी राय कालेज जाते थे , टूट चुकी थी बीच बीच में इतने बड़े गड्ढे हो चुके थे 
की उसमे भैंसे भी नहा लें . मनबोध मास्टर की डायरी के हिस्से में उस सडक का जिक्र करते हुए , विवेकी राय ने सडक को नया नाम दिया '  भैंसा लोटन '
सडक . जिस दिन आज अखबार में यह चिट्ठी छपी उसके दुसरे दिन से ही उसपर काम शुरू हो गया . विवेकी राय रुके और बोले इतनी जल्दी काम शुरू 
हो गया ? ठेकेदार ने बताया की साहेब ! कोइ मन बोध मास्टर हैं जिन्होंने मंत्री जी को चिट्ठी लिख दिया था , विवेकी राय कुछ बोले नही चुपचाप
 आगे निकल गये .
विवेकी राय ने भोजपुरी के अलावा हिंदी में भी बहुत कुछ लिखा है , उपन्यास ,कहानियां , कविता और निबन्ध . और आहूत ही अच्छा लिखा है ,लेकिन 
भोजपुरी ने जिस तरह विवेकी राय ऊपर उछाला वह तामुम्र उसका एहसान मानते रहे . ललित निबंध की चर्चा चलती है तो हिंदी जो दमदार नाम सामने आते हैं 
वे सब इसी माटी की उपज हैं , आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी , पंडित विद्यानिवास मिश्र ,डॉ शिव प्रसाद सिंह कुबेरनाथ राय , निश्चित रूप से इ बड़े नाम हैं 
विवेकी राय थोड़ा अलग दीखते हैं , इनमे माटी की खुशबु है , भाषा इ सरल रवानी है ,सीधे सपाट ढंग से कथ्य को कह जाते हैं , बगैर कोइ पांडित्य बघारे 
विवेकीराय की सबसे बड़ी ताकत वह पाठक है जो भूखा भी है और सुस्वादु भी . लेकिन यह पाठक गंवई और नगरी दोनों सभ्यताओं में विभक्त होने
के बावजूद विवेकी राय की और लपकता जरूर है . 
   विवेकी राय याद किये जांयगे जब साहित्य अपने आपको समेट कर , सिमट कर केन्द्रीयकरण के खूंटे  में बाँध लेगा तो कहा जायगा एक छुट्टा फ़कीर 
गाँव में खडा गान की भाषा में सबसे बोल बतिआय रहा है और पुनह विकेंद्री करण की लहर चलेगी . अभी कल की बात है साहित्य के मुहाने विकेन्द्रित 
थे , काशी , प्रयाग , लखनऊ  में ऐसे फलते फूलते दरख्तों से ताजा हवा निकलती थी और लोग सीखने को आतुर रहते थे . तरह तरह के साहित्य , 
उनकी अलग अलग तासीर , महक , लिए समाज की नब्ज पर उंगली रख देते थे , केन्द्रीयकरण ने सब बराबाद किया है . लेकिन यह दीप जलता मिलेगा . 
अलविदा मास्स्साह्ब !
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भाउकता मन को कितना संचालित करती है एक छोटा सा उदाहरण 
विवेकी राय को तीन लत थी . बीडी , खैनी और तम्बाकू . ३० जनवरी ४८ को महात्मा गांधी की ह्त्या हुयी . खबर गाजीपुर पहुंची . लोग बताते हैं 
वह दिन उनकी जिन्दगी का सबसे उदास दिन रहा . दिन भर कमरे में बैठे रोते रहे , अचानक अपनी तीनो लतों को खिड़की से बाहर फेंक दिए 
और फिर कभी पलट कर उधर नहीं देखे . 



Monday, January 16, 2017

अलविदा ओम
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चंचल
प्रसिद्द फिल्म निर्माता , रंगमंच निदेशक और ओम पूरी के साले भाई रंजित कपूर का एक छोटा सा सन्देश मिला कि ओम पूरी  नही रहे . पल भर के लिए एक शून्य पसर गया. अभी कुछ दिन पहले हम लोंगों ने फोन पर बात की थी .और टी हुआ था एक गंभीर फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की जाय जो खांटी राजनीति से जुडी हो और उसके अंदरुनी खांचे को उजागर करती हो .अभी हाल में भाई रंजीत कपूर की एक फिल्म ' जय हो डेमोक्रेसी ' आई है . ग्रुशा कपूर निहायत जहीन कलाकार है और उतनी ही बेहतर खुशमिजाज इंसान .ग्रुशा से हमने उत्तर प्रदेश में टैक्स माफी के लिए जिक्र किया की मुख्यमंत्री के सलाहकार हैं मधुकर जेटली उनसे मिलो . बात हो गयी है . इसका जिक्र इसलिए  लिए जरूरी है  लोग यह जान लें की फ़िल्मी दुनिया का यह दूसरा कपूर परिवार  है जहां सब के सब एक से बढ़ कर एक कलाकार हैं . ओम पुरी इसीपरिवार से जुड़े रहे हैं . सीमा कपूर रणजीत भाई की बहन है . रणजीत कपूर , अनिल कपूर जो अब फिल्मो में अन्नू कपूर के नाम से जाने जाते हैं सगे भाई हैं . बहरहाल आइये देखते हैं एक कलाकार की निजी जिन्दगी जो उसके फ़िल्मी चरित्र को भरपूर मदद करते हैं .
     दुनिया का सबसे बड़ा प्रयोग हो रहा है , गो की इस तरह की संगीन और संजीदा रचनाओं पर इसके पहले भी फिल्म बन चुकी है लेकिन यह अद्भुत प्रयोग था . कहानी - मुंशी प्रेमचंद / निदेशक - सत्यजित राय / कथा - सद्गति /कलाकार - सब एक दुसरे पर भारी . मोहन अगासे , ओम पुरी. स्मिता पाटिल . अछूत ओम पूरी अछूत है , यह बताने केलिए  किसी वाह्य आडम्बर की जरूरत नही पडी , उसके बैठने का अंदाज , चेहरे का भाव सब उसके अपने अन्दर से आ रहा था . ओमपूरी की निजी जिन्दगी अभाव , और तिरश्कार से गुजरी है . कोयला बेचा है , मामा के घर से बाहर निकाला गया चोरी और चम्चोरी का आरोप लगा कर .निजी अनुभवों के जखीरे पर खडा ओम फिल्मों में बेहतरीन मोड़ देता है . ७० के रंगीन ,सजे संवेरे चेहरे जहा राजेश खन्ना , अमिताभ बच्चन , जितेन्द्र का बोलबाला हो , उसके समानांतर रंगमंच से आये 'लौंडों ' ने नई लकीर खींच दी . नशीर , कुल भूषण खरबंदा , पंकज कपूर , राजेश विवेक , अन्नू कपूर , ओम पुरी . बहुत से नाम हैं . लेकिन जो गहराई ओम में रही वह शायद ही किसी में , एक साथ और एक मुश्त हो .हास्य की एक नई परिभाषा दी है ॐ ने . एक वास्तविक घटना का जिक्र करना चाहूँगा जहां रंगमंच और जिन्दगी सिम्त कर एक हो गयी है . करुणा है , अभाव है , राजशाही है . ठहाका है . दिल्ली के पूसा रोड पर दुसरे तल पर एक कमरा किराए पर लेकर बज्जू भाई (कलाकार , निदेशक  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक रहे , आज कल बंबई में हैं और फिल्मों से जुड़े हैं हमारे निहायत हिआत्मीय ) और ओमपुरी साथ साथ रहते थे . फाकामस्ती के दिन थे . एक दिन अल सुबह पता चला की दोनों में  किसी के भी पास  इतने पैसे नही हैं की वे मंडी हाउस ( बंगाली मार्केट )  तक पहुँच जायं और दोस्तों से उधार लेकर जिन्दगी को आगे बढायें . इतने में नीचे से कबाड़ी की आवाज आयी . ओम ने बालकनी से कबाड़ी वाले को आवाज दिया और वह ऊपर आ गया . खाली बोतलें . अखबार वगैरह मिला कर कुल बहत्तर रूपये हुए /कबाड़ी ने सौ रूपये निकाला और बोला छुट्टा तो नही है , आपके पास हो तो दे दीजिये . ॐ  ने जोर का ठहाका लगाया और बोले - उस्ताद ! वही तो दिक्कत इधर भी है . सौ सौ के ही नोट हैं . तुम ऐसा करो नेचे चले जाओ . चार अंडा , एक मक्खन , एक ब्रेड और एक पाकिट दूध लेलो , छुट्टा हो जायगा .कह कर ॐ बैठ गये दाढी बनाने .कबाड़ी वाले ने जाते जाते पूछ लिया -साब ! ये बोरा नीचे लेता जाऊं ? बज्जू भाई ने फराकदिली से कहा - बिलकुल ले जाओ भाई , और ज़रा जल्दी लौटना . आगे का किस्सा मत पूछिए . याद आता है तो अब भी हंसी आती है /
      ओम से हमारे रिश्ते उतने बेबाकी से नही रहे जैसा की और लोंगों के साथ . उसकी एक वजह थे जब हम दिल्ली के हुए तो ओम पुरी और राज बब्बर ने अपना कार्यक्षेत्र पंजाब बदल लिया था . लेकिन गाहे ब गाहे मुलाक़ात होती रहती थी . ओम का इस तरह अचानक जाना अखर गया .
सादर नमन दोस्त .
राहुल गांधी और अखिलेश ; सियासत की बिसात पर .
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चंचल 
  शतरंज से वाकिफ नही हैं , तो मियाँ ! सियासत में दखलंदाजी मत करिए . और अगर आप कत्तई सियासतदां नही हैं और शतरंज के खिलाड़ी हैं तो अपने झरोखे से बैठ कर  जंगलात में खेले जा रहे सियासी चाल पर यह तो बोल ही सकते हैं की कौन पैदल सही चला है , कौन पैदल  रानी के लिए अर्दभ में खडा होरहा है. अब जरा उत्तर प्रदेश का मौक़ा मुआइना करिए . पिछले दो दशक से भी ज्यादा हुआ यह प्रदेश दो अतिवादियों के बीच लत्ते की गेंद बना कभी इस पाले में ,कभी उस पाल्हे में लुढ़क रहा है . इनकी खामियों को अभी देखने का वक्त नही है , अभी तो महज यह भर जान लेना जरुरी है की इन दो सरकारों का चरित्र क्या रहा है ? राजनीति और विशेषकर जनतंत्र में दो ऐसे कारक तत्व होते हैं जो सबसे पहले तंत्र को ही समाप्त करते हैं . एक है बाहुबल और दुसरा धन बल . विडंबना यह की जो अपने आपको , वंचितों , दलितों , मजबूरों और मजलूमों के नेतृत्व का  दम भरते रहे और उनके कंधे पर बैठ कर धन उगाही करते रहे , उनके लिए समाज का यह वंचित हिस्सा महज वोट बन कर रह गया है . दुसरी तरफ बाहुबल सियासत में स्थापित होकर समाज को खोखला बनाता रहा . इनके यहाँ स्थापित सत्ता का केवल एक मतलब रहा लूट और तिजारत .उत्तर प्रदेश इन्ही डोके बीच पिस रहा था , ऐसे दो राष्ट्रीय पार्टियों ने उत्तर प्रदेश की तरफ मुह घुमाया . १४ के संसदीय चुनाव में भाजपा कोमिली जीत ने उसके सपने को फैलाने के लिए अच्छी खासी जमीन दी लेकिन मुद्दे कहाँ से लाये जाँय ? जनता के बीच जाने के लिए भाजपा के पास कोइ ठोस नारा तक नही है . सिवाय इसके की वह समाजवादी सरकार के खिलाफ 'गुंडा राज ' ख़त्म करने का वायदा करे . ( समाजवादी सरकार पर गुंडई का मुलम्मा चढ़ाना , सामान्य बात रही  है )  लेकिन इस बार भाजपा वह भी नही बोल पा रही हा क्यों की जातीय वोट के चक्कर में उसने अन्य पिछड़ों में से जिसे प्रदेश का अध्यक्ष बनाया है उस पर दर्जनों अपराधिक मामले दर्ज हैं . ऐसे में भाजपा केवल कहीं क ईंट कहीं क रोड़ा  जोड़ घटा कर कुनबा तैयार करने में लगी है . 
अब आती है कांग्रेस .मुख्यधारा की एक मात्र पार्टी . तकरीबन साथ साल तक हुकुमत करने के बाद कांग्रेस आहिस्ता आहिस्ता यथास्थितवाद की ओर झुक गयी है . अजगरी परम्परा में बैठी कांग्रेस खुद नही हिलती , जब उसका इंजन हिलता है तो यह वहीं से बैठे बैठे हुंकार मारती है . उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जायका लें तो पच्चीस साल में कांग्रेस ने सदन में या सडक पर ऐसा कुछ किया हो जो जनता से जुड़ कर देखा गया हो .इसके दो अध्यक्ष , एक सलमान खुर्शीद और दुसरे निर्मल खत्री ऐसे रहे जिनसे कुछ उम्मीद बनाती थी लेकिन  इनकी मजबूरियां भी कमाल की रही . केंद्र एक अध्यक्ष ही नही देता रहा , साथ में भांति भांति के तत्व भी लटका देता था , (अभी भी यह  जारी है ) अब अध्यक्ष सूबे के कांग्रेसी कोदेखे या जो गौने में पालकी के साथ आये हैं ? नतीजा यह हुआ की नये चेहरों की भारती ही नही हुयी और जो पुराने थे वे ठस , जस के तस  कभी इस कमिटी में कभी उस कमेटी में घूमते रहे . आज राज बब्बर जब कांग्रेस अह्यक्ष बन कर लखनऊ आये तो नौजवानों में एक नई उर्ज्वा का संचार हुआ क्यों की राज बब्बर के काम का तरीका परम्परागत कांग्रेसी तरीके से अलग रहा है . संघर्ष और मुद्दों पर टकरा कर नये नये चेहरों की खोज और उसकी शिक्षा जिससे राज आये हैं यहाँ भी धीरे धीरे भोथरी हो रही है . ऐसे में अगर राज बब्बर जोखिम लेकर अपने निर्णय पर अड़े तो निश्चित रूप से कांग्रेस फायदे में रहेगी .जहां तक राहुल गांधी या सोनिया गांधी के हस्तक्षेप की बात है ये दोनों ही किसी के काम में हस्तक्षेप नही करते , जब तक की कोइ बड़ा हादसा न हो जाय . अगर राज इस डगर पर चले तो संभव है आगामी दो साल में कांग्रेस ५२ की स्थिति में पहुँच जायगी . 
उत्तर प्रदेश के इस चुनाव में अखिलेश और राहुल गांधी के गठबंधन की जाजा हवा के झोंके की जनता कोइंत्जार है . अरसे बाद यह चुनाव होने जा रहा है जो धनात्मक होगा ,  ऋणात्मक नही . बहुत दिनों बाद जनता जाति , धर्म , लिंग  अर्थ , बाहुबल , धन बल  आदि  सारी दीवारों को भसका कर , अपने उम्मीद को वोट करने का मन बना लिया है . यह चुनाव एक तरफ़ा भी जा सकता है . 


Friday, January 6, 2017

अनुपम अब नही लौटेंगे

अनुपम अब नही लौटेंगे
चंचल
     हममे रत्ती भर वो कुछ होता , जो मिल मिला कर अनुपम को गढ़ता है तो निश्चित  रूप से हम ऐलानिया कहते कि हम अनुपम के दोस्त रहे हैं . लेकिन अनुपम भाई की एक और बड़ी खूबी रही है उन्होंने ने अपने सामने वाले को कभीभी अपने पैमाने से कभी किसी को  नहीं मापा , बल्कि  उसे राग के अनुपात से अपने पास आने को सम्मोहित किया .गाँधी का यह सलीका बहुत सारे गांधीवादी भी नही समझ सके ,लेकिन अनुपम भाई इस सलीकोको इस  तरह अपना रखा था जैसे खादी को अपनाया था . चुनांचे उनके दोस्तों , प्रशंसकों , उनके  कार्य कलाप में रूचि रखने वालों यहाँ तक कि उनके पाठकों को एक सहज और सरल दोस्त मिलता रहा . अनगिनत तादात है .और सबसे बड़ी बात की वे जिस काल खंड पर खड़े थे उसके बर अक्स पुरानी , तार्किक और स्थायी समाधान देने के लिए , न कभी उत्तेजना व्यक्त किये न ही उत्तेजक भाषा या आचरण को स्वीकारा . खामोश ,सटीक और सार्थक विचार और कर्म देते रहे . आजीवन . गांधीवादी परिवार की परवरिश  का नतीजा रहा की जब देश का युवा वर्ग बदलाव की भूख लिए सडक पर लड़ रहा था , वर्धा में पैदा हुआ एक नौजवान पहाड़ पर चंडी प्रसाद भट्ट के साथ पेड़ से चिपक कर खडा हो गया . यह समय की बात है जब देश पर्यावरण के टूटते और भासकते बवंडर से वाकिफ ही नही रहा . यह ७० का कालखंड है . चिपको आन्दोलन की शुरुआत में जो गिने चुने नाम आते हैं उसमे सबसे कम उम्र के जिस नौजवान कोलोग आदर से गोहराते हैं , वह है अनुपम मिश्र .
 अनुपम मिश्र में कौन अनुपम बड़ा है , खोजना दिक्कत देता रहेगा . पत्रकार ,लेखक , सम्पादक , जल और जंगल का सजग पहरुआ , यहाँ तक की एक इंसान ? गांधी शान्ति प्रतिष्ठान के ठीक पीछे महावत खान रोड पर हम रहते थे , घर से निकल कर दरियागंज जाने के लिए हमे गांधी शान्ति प्रतिष्ठान की दीवार से होकर जाना पड़ता था . अनुपम भाई से अक्सर वहीं मुलाक़ात होती रहती थी . एक दिन बातचीत के दौरान अचानक अनुपम भाई ने कहा -  हम हरित क्रान्ति के नाम पर फिसल गये हैं . इसकी भरपाई होने में बहुत मेहनत और उससे ज्यादा वक्त लगेगा . वक्त के पहले कहा गया उनका आकलन अब तो सामान्य बात हो गयी है ,लेकिन उस समय हम समझने  से चूक गये . अनुपम भाई का पत्रकार और अध्यापकी मुद्रा बगैर लाग लपेट के सीधे सपाट भाषा में मिली . आज तक गाँठ बाँध कर रखा हूँ . पहली बार किसान की सहज और सटीक  परिभाषा सुन रहा था . किसान सीधा होता है , सहनशक्ति अपार है , भविष्य के बारे में धनात्मक सोच रखता है , निराश नही होता . जमीन और जल उसकी पूंजी है , हरित क्रान्ति ने अधिक अन्न उपजाओ के नारे और कृतिम उपायों से किसान को बर्बाद कर दिया . हुकुमत किसी की रही हो लेकिन वह गुलाम नही था . उसके पास जमीन थी , अपनी खाद थी , जो जानवरों से मिलती थी , उसके पास अपने संसाधन थे . खेत की सिंचाई के अपने संसाधन थे , आपस में सामूहिकता का जीवन दर्शन था सब बिखर गया . किसान को कर्जदार बनाया गया , खेती के उपकरण खरीदने के लिए , सिंचाई के लिए . हवा रोशनी और पानी पर सब का बराबर अधिकार था , आज सब बिक रहा है , किसान कर्जदार हो गया . बात समझ में आनेवाली थी . आ गयी . वक्त के पहले जमीन जंगल और जल की कीमत और कूबत आंकने वाले भाई अनुपम  एक आन्दोलन छोड़ कर गये हैं , आ अब लौट चलें . शुरुआत आज नही तो कल करनी ही होगी और उस दस्तावेज पर पहली दस्खत दिखेगी - अनुपम मिश्र की .
जल श्रोत के हमारे जितने भी पारंपरिक संसाधन थे , एक एक के विलुप्त हो रहे हैं इसका असर क्या हो रहा है सर्व विदित है . हम कब तक दैविक आपदा बोल कर मुह छुपाते रहेंगे . कभी तो सचेत होकर सगुण डगर पर चलना पडेगा . पोखरा , कुंवा , नदी नाला , हल बैल की जोताई , बगैर अंग्रेजी खाद का अन्न आज का बड़ा सवाल है . अनुपम भाई उन सवालों का हल दे चुके हैं , बस  उसे स्वीकारने की जरूरत है . अभी इसी संस्थान से एक अद्भुत किताब छपी है ,- जल थल मल . अद्भुत पुस्तक .
वक्त जितना खराब होगा , अनुपम भाई आपकी उतनी ही जरूरत बढ़ेगी .
सादर नमन , अनुपम भाई . 

अलविदा ओम

अलविदा ओम
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चंचल
प्रसिद्द फिल्म निर्माता , रंगमंच निदेशक और ओम पूरी के साले भाई रंजित कपूर का एक छोटा सा सन्देश मिला कि ओम पूरी  नही रहे . पल भर के लिए एक शून्य पसर गया. अभी कुछ दिन पहले हम लोंगों ने फोन पर बात की थी .और टी हुआ था एक गंभीर फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की जाय जो खांटी राजनीति से जुडी हो और उसके अंदरुनी खांचे को उजागर करती हो .अभी हाल में भाई रंजीत कपूर की एक फिल्म ' जय हो डेमोक्रेसी ' आई है . ग्रुशा कपूर निहायत जहीन कलाकार है और उतनी ही बेहतर खुशमिजाज इंसान .ग्रुशा से हमने उत्तर प्रदेश में टैक्स माफी के लिए जिक्र किया की मुख्यमंत्री के सलाहकार हैं मधुकर जेटली उनसे मिलो . बात हो गयी है . इसका जिक्र इसलिए  लिए जरूरी है  लोग यह जान लें की फ़िल्मी दुनिया का यह दूसरा कपूर परिवार  है जहां सब के सब एक से बढ़ कर एक कलाकार हैं . ओम पुरी इसीपरिवार से जुड़े रहे हैं . सीमा कपूर रणजीत भाई की बहन है . रणजीत कपूर , अनिल कपूर जो अब फिल्मो में अन्नू कपूर के नाम से जाने जाते हैं सगे भाई हैं . बहरहाल आइये देखते हैं एक कलाकार की निजी जिन्दगी जो उसके फ़िल्मी चरित्र को भरपूर मदद करते हैं .
     दुनिया का सबसे बड़ा प्रयोग हो रहा है , गो की इस तरह की संगीन और संजीदा रचनाओं पर इसके पहले भी फिल्म बन चुकी है लेकिन यह अद्भुत प्रयोग था . कहानी - मुंशी प्रेमचंद / निदेशक - सत्यजित राय / कथा - सद्गति /कलाकार - सब एक दुसरे पर भारी . मोहन अगासे , ओम पुरी. स्मिता पाटिल . अछूत ओम पूरी अछूत है , यह बताने केलिए  किसी वाह्य आडम्बर की जरूरत नही पडी , उसके बैठने का अंदाज , चेहरे का भाव सब उसके अपने अन्दर से आ रहा था . ओमपूरी की निजी जिन्दगी अभाव , और तिरश्कार से गुजरी है . कोयला बेचा है , मामा के घर से बाहर निकाला गया चोरी और चम्चोरी का आरोप लगा कर .निजी अनुभवों के जखीरे पर खडा ओम फिल्मों में बेहतरीन मोड़ देता है . ७० के रंगीन ,सजे संवेरे चेहरे जहा राजेश खन्ना , अमिताभ बच्चन , जितेन्द्र का बोलबाला हो , उसके समानांतर रंगमंच से आये 'लौंडों ' ने नई लकीर खींच दी . नशीर , कुल भूषण खरबंदा , पंकज कपूर , राजेश विवेक , अन्नू कपूर , ओम पुरी . बहुत से नाम हैं . लेकिन जो गहराई ओम में रही वह शायद ही किसी में , एक साथ और एक मुश्त हो .हास्य की एक नई परिभाषा दी है ॐ ने . एक वास्तविक घटना का जिक्र करना चाहूँगा जहां रंगमंच और जिन्दगी सिम्त कर एक हो गयी है . करुणा है , अभाव है , राजशाही है . ठहाका है . दिल्ली के पूसा रोड पर दुसरे तल पर एक कमरा किराए पर लेकर बज्जू भाई (कलाकार , निदेशक  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक रहे , आज कल बंबई में हैं और फिल्मों से जुड़े हैं हमारे निहायत हिआत्मीय ) और ओमपुरी साथ साथ रहते थे . फाकामस्ती के दिन थे . एक दिन अल सुबह पता चला की दोनों में  किसी के भी पास  इतने पैसे नही हैं की वे मंडी हाउस ( बंगाली मार्केट )  तक पहुँच जायं और दोस्तों से उधार लेकर जिन्दगी को आगे बढायें . इतने में नीचे से कबाड़ी की आवाज आयी . ओम ने बालकनी से कबाड़ी वाले को आवाज दिया और वह ऊपर आ गया . खाली बोतलें . अखबार वगैरह मिला कर कुल बहत्तर रूपये हुए /कबाड़ी ने सौ रूपये निकाला और बोला छुट्टा तो नही है , आपके पास हो तो दे दीजिये . ॐ  ने जोर का ठहाका लगाया और बोले - उस्ताद ! वही तो दिक्कत इधर भी है . सौ सौ के ही नोट हैं . तुम ऐसा करो नेचे चले जाओ . चार अंडा , एक मक्खन , एक ब्रेड और एक पाकिट दूध लेलो , छुट्टा हो जायगा .कह कर ॐ बैठ गये दाढी बनाने .कबाड़ी वाले ने जाते जाते पूछ लिया -साब ! ये बोरा नीचे लेता जाऊं ? बज्जू भाई ने फराकदिली से कहा - बिलकुल ले जाओ भाई , और ज़रा जल्दी लौटना . आगे का किस्सा मत पूछिए . याद आता है तो अब भी हंसी आती है /
      ओम से हमारे रिश्ते उतने बेबाकी से नही रहे जैसा की और लोंगों के साथ . उसकी एक वजह थे जब हम दिल्ली के हुए तो ओम पुरी और राज बब्बर ने अपना कार्यक्षेत्र पंजाब बदल लिया था . लेकिन गाहे ब गाहे मुलाक़ात होती रहती थी . ओम का इस तरह अचानक जाना अखर गया .
सादर नमन दोस्त .