Sunday, December 16, 2012

क्रान्ति सड़क से उठती है 
.......   "जन संचार के जितने भी माध्यम हैं सबकी अपनी एक सीमा है , वह क्रान्ति की दिशा और उसके उफान को  मापती है , आगे लेजाती है और बाज दफे उसे दफना देती है . "- यह एक भ्रम है भारतीय जमीन पर अभी हाल की दो एक घटनाओं ने इसका सबूत दे दिया है . अन्ना और केजरीवाल इसके उदाहरण हैं . इस विषय पर आज भाई अम्बरीश ने एक सवाल उठाया है - क्या इन्टरनेट पर ( से ) क्रान्ति संभव है ?
     ऋग्वेद की एक ऋचा है - जानाति इच्छति अथ करोति ' इच्छा , ज्ञान और शक्ति ये तीन आवश्यक तत्व हैं जो उड़ान भरने के लिए जरूरी होते हैं . जिस कौम की इच्छाशक्ति ही मर जाती है वह अपने आप लुप्त हो जाती है . पिछले दिनों यह सवाल जोर शोर से चला कि नेट के जरिये क्रान्ति संभव है उदाहरण के लिए मध्येसिया के तमाम् तानाशाहों के खिलाफ लड़े गए आंदोलनों का जिक्र किया जा सकता है . लेकिन एक बात लोग  नजरअंदाज कर देते हैं कि वहाँ जनतंत्र नहीं था , जनसंचार के माध्यम सरकारी थे , नेट ने वहाँ काम कर दिया . लेकिन जनतंत्र में गुस्से का एक मुस्त दबाव नहीं बन पाता वह रोजही होता है  और रोज रोज निकलता रहता है .
        मीडिया में जिन तीन चीजों से परहेज करने की नसीहत डी गयी है उसमे से एक है '  प्रिडिक्टसन ' आज मीडिया इसी बीमारी के चलते अपने आपको मार रही है . अचानक उसने अपनेआपको खुदा समझ लिया और सन्निपात में चला गया . इस विषय पर भाई प्रमोद जोशी ने अच्छी टिप्पणी की है उसे देखा जाना चाहिए . इसे और भी सरल बनाया है भाई संदीप वर्मा ने ' चौथी टांग भी टूट गयी ' . इसका मतलब यह नहीं कि अब कोइ रास्ता नहीं बचा या हम अपाहिज हो गए है . यहाँ दो पन्नों का खुलासा करना चाहता हूँ एक आजादी की लड़ाई में जब प्रेस पर सत्ता का जबर दस्त दबाव था तब भी सुराजियो की आवाज गाँव गाँव तक पहुच जाती थी . दूसरा आपातकाल के दौरान .
     इससे अलहदा जो मूल सवाल है आप बदलाव के हामी हैं तो आप चाहते क्या हैं ? जो चाहते हैं उसकी जमीन ( लोंगो में  इच्छाशक्ति) तैयार  है क्या ? उसका पूरा ज्ञान है कि नहीं ? कथनी और करनी के बीच की कम से कम की दूरी पर नेतृत्व का खड़ा होना जरूरी होता है इसके बाद सड़क आती है . यहाँ प्रसंग्वस् एक उदाहरण देना चाहता हूँ . फेसबुक पर ' कई दलित चिन्तक ' हैं जो हर वक्त एक ही र्रोना रोते रहते हैं उन्हें ब्राहमणवाद नेमारा है . उंच नीच का खेल उन्होंने बनाया है . हमारा उनसे यह कहना है कि भाई यह तो हर कोइ जानता है हम भी इसके खिलाफ हैं लेकिन पहले अपना घर तो देख आओ . आज डालियों में भी उंच नीच है . छुआ छूत है . कर्मकांड से भरा पड़ा है . उसे तो दूर करो . इसके लिए हमने रचनात्मक संघर्ष का सुझाव दिया . बापू का हथियार . इस रचनात्मक संघर्ष पर भी सवाल उठे -यह क्या होता है ? इसे अगली कड़ी में -

Wednesday, December 12, 2012

शुभ यात्रा पंडित जी !

 पंडित रवि शंकर के निधन का समाचार हमें यात्रा में मिला . ' शिशिर जी ' से . उनकी कामयाबी , उनकी बुलंदी . और उनकी उम्र देखते हुए उनके निधन की खबर दुःख नहीं देती लेकिन एक कमी खटकती रहेगी . संगीत की दुनिया का एक बेताज बादशाह अलविदा कह रहा है लेकिन उसकी झंकार सदियों तक समूची कायनात में गूंजती रहेगी . इंसानी सभ्यता लित्नी बार करवट लेगी सितार का एक तार जरूर झंझनायेगा . काशी अदब का एक प्रकाशपुंज और गया . उनकी समूची शख्सियत का खाका खीचना बहुत आसान नहीं है . उनके पास भैरवी की रुनझुन बयार है तो भीम  पलासी और यमन की लयकारी . उनके तार और उँगलियों के रिश्ते को अभिव्यक्ति नहीं किया जा सकता उसे महसूस किया जा सकता है और सारी दुनिया ने उसे महसूस किया है . पंडित जी ! जब भी कोइ परिंदा किसी भी भाव में  चहकेगा आप याद आयेंगे .
      पंडित जी बनारसी  ठाट , ठसक और रंग के बेजोड इंसान रहें . उनके ठहाके , उनकी मुस्कान सब जगह संगीत बजता था .
   काशी संगीत की दुनिया है  एक से बढ़ कर एक . उसमे पंडित रविशंकर थोड़ा अलग रहें . काशी ने उनके  जीते जी वो प्यार , मनुहार और आदर नहीं दिया जितना उनके हिस्से में आता था . यह काशी की अपनी ठसक है . लेकिन आज उनके न रहने पर सबसे ज्यादा अगर कहीं बेचैनी होगी तो काशी में . पंडित जी को पुष्पांजलि अर्पित करता हूँ .

Tuesday, December 4, 2012

सुषमा स्वराज हमें अच्छी लगती हैं . मै क्या करूं ..
...... बहुत दिनों बाद , कल हमने संसद की कार्यवाही देखा . देखन जोगू . कार्यवाही का फिल्मांकन कर रहें कैमरा मैन का नाम नहीं देख पाया लेकिन उसने अच्छा काम किया . स्क्रीन पर बार बार तीन फ्रेम दे रहा था एक साथ . बीच में मीरा कुमार एक  तरफ सोनिया गांधी , दूसरी तरफ सुषमा स्वराज . सारी दुनिया के सामने हम यह कह सकते हैं कि देखो यह है भारत की संसद . महिलायें महज घर के इंतजामात तक ही महदूद नहीं है बल्की मुल्क के मुस्तकबिल का भी फैसला इनके हाथ में है .
         यह अवसर था , -  खुदरा व्यापार में  विदेशी निवेश का . भाजपा अड़ी थी कि धारा १८४ के तहत बहस के साथ मत विभाजन भी हो . संसद के अध्यक्ष श्री मती मीरा कुमार . नेता संसद सुशील कुमार शिंदे समेत सभी दल इस पर सहमत हो गए . लेकिन एनवक्त पर भाजपा मुकर गयी . भाजपा की ओर से यशवंत सिन्हा ने व्यवस्था का प्रश्न उठा कर समूची कार्यवाही को एक एक नया मोड़ दे दिया. इस मुद्दे पर तीस दिन का समय और दिया जाय . कांग्रेस बार बार चुनौती देती रही कि मत विभाजन की मांग आप की थी हम उस पर तैयार हैं . लेकिन भाजपा किसी भी तरह से तैयार नहीं दिखी . बहरहाल बहस् शुरू हुई .
      बहस की शुरुआत सुषमा स्वराज बहैसियत नेता प्रतिपक्ष ने की . बहस की शुरुआत अच्छी रही लेकिन अचानक सुषमा जी ने बहस को पीछे ढकेल दिया . जनसंघ के जमाने में चली गयी और आढतियों के समर्थनमे उतर आयी . किसान और आढतियों के बीच के ' मानवीय संबंधो ' की वकालत करने लगी . हमें बड़ी हैरानी हुई . आज भी भाजपा आढतियों के साथ खड़ी है ? मोटू ने कहा सुन रहें हो -   साहूकार किसी जरूरत मंद किसान को जब मदद करता है तो एवज में खाल तक खींच लेता है . हमने मोटू को समझाने की कोशिश की कि सुषमा जी इसी लिए तो अच्छी लगती हैं कि वे कभी कोइ भी बात राज नीति में गोपनीय नहीं रखती . यह भाजपा की नीति और नियति दोनों है . 

Sunday, November 4, 2012


जी हाँ ..मै कांग्रेस में  हूँ...
 मै तीन नामों के बहाने एक बात कहना चाहता हूँ . ये तीन है अर्चना राज , जिनका कहना है कि ' मै कांग्रेस से भावात्मक लगाव रखती रही हूँ लेकिन आज कांग्रेस जहां (?) है , मै भ्रमित हो रही हूँ . ' दूसरी है नीलाक्षी जी , जो अपनी पोस्ट पर अचानक ; गांधी पर हमलावर हो गयी है. तीसरे हैं - प्रभात चन्द्र जो स्थापित करना चाह रहें हैं कि जितना काम इस समाज के लिए डॉ अम्देकर ने किया उतना गांधी ने नहीं लेकिन मीडिया ने गांधी को राष्ट्र पिता बना दिया और अम्बेडकर के साथ बे मानी किया . येहां तीनो का अलग अलग मनोविज्ञान है . अर्चना राज को लग रहा है कि कांग्रेस फसती जा रही है , रोज रोज जो घोटाले खुल रहें हैं उससे अर्चना जी परेशान लग रही हैं . नीलाक्षी जी छेड़ने की गरज से अतीत में कूद कर गांधी को उठा रही हैं कि इनपर बहस चले . तीसरे सज्जन का सवाल मजेदार है किसने समाज के लिए ज्यादा काम किया ?
       अर्चना जी मै कांग्रेस के बहुत पुराने इतिहास को नहीं खोलना चाहता वह बहुत विस्तार ले लेगा . आप खौफजदा हैं '  आर्थिक भ्रष्टाचार ' के खुलते आयाम पर . सत्ता कोइ भी होगी भ्रष्टाचार उसका एक अंग होता है . जनतंत्र अकेला तंत्र   है जो इसपर रोक लगा सकता है . और यह जिम्मेवारी प्रतिपक्ष की बनती है . और मीडिया की . आज है क्या कि सत्ता से ज्यादा भ्रष्ट और बेईमान प्रतिपक्ष और मीडिया है . सत्ता तो फिर भी कम है . आजादी के बाद से इस सवाल पर कांग्रेस को देखाजाय तो नेहरू का कार्यकाल कत्तई भ्रष्टाचार से मुक्त रहा है . जहां कहीं भी कोइ मामला सामने आया है नेहरू ने बगैर देर किये तुरत कारवाही की . कृष्णमेनन रहें हों या पटेल . मंत्रिमडल से हटाये गए . प्रति पक्ष में डॉ लोहिया का प्रवेश हो चुका था . समाजवादी आंदोलन की सबसे बड़ी भूमिका रही है कि उसने कांग्रेस की नक्लेल पकडे रखा . इंदिरा गांधी के जमाने से फिसलन शुरू हुई लेकिन इसे संस्थागत होने से इंदिरागांधी बचाती रही इतना ही नहीं कांग्रेस को इस सवाल पर टूटना पड़ा . इंडीकेट और सिंडी केट . १९६९ नेकीराम कांग्रेस टर्निंग प्वाइंट है , कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया . नीलम संजीव रेड्डी , मोरारजी भाई . यस के पाटिल . चंद्रभानु गुप्त . अतुल्य्घोस , निजलिंग गप्पा . एक तरफ और पांच समाजवादियों के साथ इंदिरा गांधी एक तरफ . ७१ में इंदिरा गांधी दो तिहाई बहुमत से जीती . इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को समाजवाद से जोड़ दिया . दूसरी तरफ समाजवादी आंदोलन बिखर गया . साम्यवादियों ने अपने आपको इंदिरा के सामने घुटने टेक दिए . यहाँ तक आते आते भ्रष्टाचार को थोड़ी मोहलत मिली लेकिन वह कंट्रोल में रही . असल भ्रष्टाचार बेलगाम होता है ७७ के बाद जब संविद सरकारों का चलन शुरू हुआ . आज भी इसे देखा जा सकता है कि किस तरह वो लोग ज्यादा भ्रष्ट होते पाए जा रहें हैं जिनके समर्थन से सरकार चलती रहती है . इस लिहाज से कांग्रेस सबसे कम भ्रष्ट है .
  लेकिन मीडिया का दिमागी दिवालियापन देखिये वह न तो प्रतिपक्ष पर बोल रहा है न अपने करतूतों पर . शुक्र है कि इस मीडिया की पहुँच दूर तक नहीं है . बाकी दो पर कल ....

Thursday, September 20, 2012

बन्द का दर्शन 
बन्द ?
भारत बन्द सम्पूर्ण रूप से सफल रहा . ब कलम खुद - गडकरी, याचूरी . मुलायम सिंह यादव . शरद यादव ,वगैरह वगैरह ....रेल के इंजिन पर तमाम तरह के लाल , केसरिया . सतरंगी झंडों का फहरना .कैमरों के आगे नाचते गाते उत्साही नौजवानों का जत्था , अन्तः सूरज डूबने के पहले ही थक- थका कर बैठ गया . विरोध का एक और नपुंशक त्यौहार समाप्त हुआ . थकान ' मिटाते ' नेता अपने अपने सोफे पर निढाल पड़े  गलाफादू डिब्बे में अपनी तस्वीर तलाशने में मशगूल हैं .पूरालाल ( एक गाँव है ) के चौराहे पर आसरे की चाय की दूकान पर बैठा अस्सी साल का एक नौजवान सूरज  के डूबते चेहरे को निहार रहा है .उसकी आँखों में अभी भी चमक है . वह अपने आपसे एक सवाल कर रहा है - ' कांग्रेस भ्रष्ट है , कांग्रेस  ने महगाई  बढ़ाई,कांग्रेस किसान विरोधी है , कांग्रेस मजदूर विरोधी है , ... मै कहता हूँ कांग्रेस वह सब कुछ है जो कांग्रेस को नहीं होना चाहिए . लेकिन तुम क्या हो ? साथ साल हो गए है देश में बहु दलीय व्यवस्था को चलते हुए . इन साथ सालों में तुमने क्या किया ? कोइ एक काम गिना दो . क्यों बर्बाद कर रहें हो देश को , भटके हुए नौजवान को , और अपने आपको .मौक़ा तुम्हे भी मिला है , देश चलाने का . कोइ एक काम गिना दो ,  सत्ता में  में जाने के बाद क्या बदलाव आया ? सिवाय चेहरे बदलने के . कोइ गुणात्मक फर्क ?
      अभी एक चेहरा बोल रहा है , शरद यादव का , कभी जवान था उर्ज्वा थी , जज्बा था , थका हुआ लग रहा है . बुझे मन से बोल रहा है . उसका चोर मन उसकी खुर्दी से झाँकने  लगता है . वह कहरहा है बहु राष्ट्रीय घराने इस देश की अर्थ व्यवस्था को बर्बाद कर देन्गे . बोल्ट बोलते वह अपने सीने पर हाथ रख लेता है जैसे किसी का मुह दबा रहा हो .इस शरद यादव के पीछे एक और शरदयादव खड़ा है . उसके कंधे को हौले से ठोक कर पूछता है .. शरद ! तुम्हे याद है एक बार तुम ' फ़ूड प्रासेसिंग मंत्री ' रहें .पेप्सी कोला को भारत आने का न्योता तुमने अपने हाथ से दिया है . उस दस्तावेज पर तुम्हारे हस्ताक्षर हैं ? जानता हूँ , तुम्हारा हाथ कंपा था , तुम्हे उस शरद की याद आयी थी जो 'देसी' के लिए प्रतिबद्ध था . जार्ज ( फर्नांडीज ) ने जिस दिन कोकोकोला को बाहर का राश्ता दिखाया था तुम बगल में खड़े थे .आज क्या हो गया .? बोलो शरद .. बस एक अदद काठ की कुर्सी के लिए एक शरद यादव गिरवी रख उठा . ? उस अडवानी के बगल में बैठने के लिए जो सोमनाथ से रथ लेकर चलता है अयोध्या के लिए कूच करता है . चंगेज खान के कत्लेआम और इस यात्रा में तुम्हे फर्क नहीं दिखाई दिया . ? एक विवादित इबादत घर को गिराने के साथ पूरे देश में आग लगी पता नहीं कितने लोग मरे उससे भी ज्यादा ख्हतार्नाक खेल था हजारों हजार साल की हमारी वह तमीज जो एक बेहूदी हरकत से भरभरा कर बिखर गयी . उसके साथ सियासत करोगे केवल गणित के लिए . ?
        हम औरों की बात नहीं करते . साम्यवादी अपनी कोख में ही नकारात्मक सोच लेकर चला है . हमसे पूछोगे कि प्रतिपक्ष की क्या भूमिका बनती है ? विरोध किस तरह दर्ज किया जाता ? जेल भर देते . जंतर मंतर पर इकट्ठे होकर सरकार को ललकारते ,मार खाते . जनता तुम्हे प्यार से सुनती . तुम्हारा साथ देती . लेकिन पास नतो सगठन है न ही सिद्धांत है .. बन्द के बहाने तुमने सरकार को आराम करने का मौक़ा दिया . तुम्हारे बंद का हासिल जमा देखा जाय तो तुमने जनता को दुखी किया है . रेल रोक कर . बस रोक कर . बच्चे पानी के लिए रोते रहें हैं . मरीज राश्ते में दम तोड़ दिया है . .. चलो आज के अखबारों में अपना चेहरा खोजो .

Tuesday, September 11, 2012


इस कायनात में औरत से ज्यादा खूबसूरत और कुछ नहीं ........
एक दिन हम संगीत विभाग के बगल घने ऊबड़ -खाबड बेतरतीब उगे पेड़ों के बीच बैठे लैंडस्केप बना रहें थे . अचानक कहीं से घूमते हुए अप्लाइड के हेड पम्मी लाल आगये . बहुत प्यारे टीचर थे .शकुंतला सिंह जो हम लोंगो के साथ थी , उसके पीछे खड़े हो गए . उस समय वह कोइ फ़िल्मी गाना गा रही थी और पेन्सिल से स्केच कर रही थी . पम्मी ने पूछा क्या हो रहा है ? उसने पलट कर पीछे देखा और बोली - सर आगे लाइन भूल रही हूँ .. बता दीजिए न ... ! दोनों में उस गाने को लेकर बहस चल पडी . अंत में तय हुआ कि कल पूरी क्लास  '  आनंद ' देखेगी . और टिकट का भुगतान पम्मी लाल करेंगे . ( ऐसी घोषणाएँ कई बार हो चुकी हैं लेकिन बस यहीं तक ) अचानक पम्मी ने पूछा इसमें हिरोइन कौन है ? शकू ने बताया कोइ नहीं .. ! तो फिर कैंसिल . बगैर हिरोइन के मै कुछ नहीं देखता . हम सब चौकन्ने हो गए . अजीब स्थापना है ? किसी दूसरी लड़की ने पूछा था - सर मान्लिजिये आप यहाँ अकेले बैठ कर लैंडस्केप बना रहें हैं तो आप इसे भी नहीं देखेंगे .. ? पम्मी ने मुस्कुरा कर जवाब दिया - यहाँ तो बहुत सारी हीरोइने हैं ... ! इन पेडों में ? उन्होंने कहा हाँ , इन  पेडों में , टहनियों में , पत्तियों में . पर देखो तो सही . प्रकृति के हर हिस्से में स्त्री है . पुरुष है , चलो आज तुम लोग देखना शुरू करो . किसी एक को अपने सामने कर लो गौर से देखो उसके लिंग , उम्र . उसका मूड . सब कुछ तुम्हे पता चल जायगा . जब तक यह जानकारी नहीं होगी तुम उन्हें तमीज से नहीं पेट कर सकते .
     प्रकृति की इस नायाब धरोहर  'स्त्री ' पर आज नीलाक्षी जी ने एक असामान्य टिप्पणी की है कि पुरुष को उसकी देह की सुंदरता ही लुभाती है इसलिए वह उसका गुणगान करता है . यह आधा सच है नीलाक्षी जी ! नीलाक्षी जी ! सौंदर्य तब तक पूरा नहीं होता जब तक कि उसमे करुणा न हो . इस लिहाज से औरत हर हाल में प्रकृति की सबसे बड़ी और अकेली धरोहर है . इसलिए हर औरत खूबसूरत होती है , करुणा से भरी होती है . वह रचना है और रचनाकार भी . पोषक है और हरपाल रचना में लींन रहती है . किसी भी 'तत्व' को बरगी कृत करेंगी तो कुल आठ कारक मिलेंगे जो धनात्मक है वह स्त्री है जो ऋणात्मक है वा पुरुष है . उदाहरण के लिए एक रचना करती है , दूसरा विध्वंश .....
        हे देवियो ! हमें एक कोमल छाया दीजिए .  

Saturday, September 8, 2012

डॉ. कुरियन नहीं रहे.....
'अमूल ' और डॉ कुरियन एक दूसरे के पर्याय हैं . सारी दुनिया में . गुजरात और  दूध  उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र ? यह असंभव था . लेकिन एक शख्स ने यह कर दिखाया , उसका नाम है डॉ कुरियन . 'सफ़ेद क्रान्ति का आग्र्दूत . दूध की सहकारी व्यवस्था कैसी और कितनी कारगर होती है ? यह देखने के लिए सारी दुनिया से लोग आ रहें हैं . गुजरात के आनंद शहर में .गांधी दर्शन को केन्द्र में रखकर किया गया एक सफलतम प्रयोग .अगर कभी गुजरात के गाँव को देखने का मौक़ा मिले तो इस जुनूनको जरूर झांकिये गा जो डॉ कुरियन ने घर घर में दिए की तरह सजा गए हैं . गुरात पानी की किल्लत झेल्नेवाला सबसे बड़ा और भयावह सूबा है . कुवों के पानी का जलस्तर सबसे नीचे जा चुका है . लेकिन मेहनती गुजराती विशेष कर महिलाए 'सफेद्क्रान्ति की वाहक बनी मसाल जलाए रखा है . हर घर में भैस . हर गाँव में दूध का डिपो . गाड़ी आयेगी और दूध ले जायगी . इतना ही  नहीं अगर किसी के घर कोइ प्रयोजन है या शहर से कोइ सामान मग्वाना है तो पूर्व सूचना पर वही गाड़ी मुफ्त में पूरा सामान गाँव तक ले आयेगी . यह सब कुरियन की देंन है . विकेंद्रित अर्थव्यवस्था जो गांधी की मंशा थी वह यहाँ देखने को मिलती है .
       इसी अर्थव्यवस्था पर एक प्रसिद्ध फिल्म बनी थी . 'मंथन ' स्मिता पाटिल का प्रवेश था , गिरीश कर्नाड , अनंत नाग , कुलभूषण खरबंदा ,नशीरुद्दीन शाह . .. यादगार फिल्म . वह कुरियन नहीं रहे . नमन 

Sunday, September 2, 2012

इंदिरा गांधी की वैचारिक यात्रा ..
   आज पूजा शुक्ला जी का एक मंतव्य दयानंद पांडे जी के हवाले से फेसबुक पर देखने को मिला .जिसमे पांडे जी ने बताया है कि किस तरह इंदिरागांधी प्रधान मंत्री बनी ? एक नजर में यह एक किस्सा की तरह चलता है ,जिसमे सियासत के तमाम दाँव पेच की हल्की झलक मिलती है .लेकिन अंतर्कथा बहुत पीछे से शुरू हो चुकी होती है .पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रधान मंत्री बनने से पहले आजादी की लड़ाई के ही दौरान .देश में घट रही हर घटना से इंदिरा गांधी जुड़ी रही . उम्र भले ही कम रही लेकिन उनकी उपस्थित दर्ज होती रही है .आनंद भवन का ठिकाना , पंडित नेहरू का संसर्ग देश के तमाम नेताओं के बारे में एक दूसरे की क्या राय है ? इससे इंदिरा गांधी पूर्व परचित रही .इंदिरा गांधी को यह भी मालुम रहा कि कांग्रेस के अंदर की आपसी गुटबाजी में कौन किसके साथ है .? कांग्रेस के अंदर समाजवादी गुट का अद्भुदय जिसके नेता पंडित नेहरू स्वं रहें का टकराव ठस कांग्रेसी ग्रुप के लौह पुरुष सरदार पटेल से था .पंडित नेहरू की छवि भले ही बहुत बड़ी थी ,लेकिन संगठन पर पटेल का कब्जा था .गांधी जी कांग्रेस में घट रही घटनाओं को बड़ी बारीकी से देख रहें थे ,और उनका फैसला नेहरू के पक्ष में गया और पंडित नेहरू प्रधान मंत्री बन गए .यहाँ दो दो बड़ी घटनाओं की तरफ इशारा करना चाहूँगा जो आगे चल कर कांग्रेस यात्रा में कारक तत्व बनते हैं - एक - कांग्रेस से गांधी का अलगथलग पड़ जाना और दूसरा समाजवादियों के प्रति गांघी का झुकाव .इसका अंदाजा पंडित नेहरू और पटेल दोनों को हो चुका था .चूंकि  पंडित नेहरू स्वं समाजवादी थे और समाज्वादिओं से उनके ताल्लुकात अच्छे थे लेकिन उनकी तादात इतनी नहीं थी कि उनके सहारे नेहरू किसी पायदान तक पहुच पाते इसलिए उन्होंने चुप्पी साध ली .गांधी जी १९३४ में ही कांग्रेस से अलग हो चुके थे ( संवैधानिक रूप से लेकिन कांग्रेस के साथ जुड़े रहें ) लेकिन कांग्रेस की दिक्कत थी कि ब गैर कांग्रेस के वह कोइ निर्णय नहीं ले सकती थी .आजादी के तुरत पहले गांधी जी ने कांग्रेस को एक अजीब स्थिति में ला कर खड़ा कर दिया .जब उन्होंने सुझाव ( यह सुझाव और सलाह कांग्रेस के लिए आदेश होता था ) दिया कि ' कांग्रेस का अध्यक्ष पड़ किसी समाजवादी को दिया जाय , और बापू ने नाम भी सुझाया था आचार्य नरेंद्र देव का .यह कांग्रेस के लिए सुपाच्य नहीं था लिहाजा सबसे मुलायम समाजवादी आचार्य कृपलानी अध्यक्ष बने .ये सारी घटनाएं इंदिरा गांधी के सामने घट रही थी .( भरत विभाजन के अपराधी  पुस्तक में डॉ लोहिया ने एक घटा का जिक्र किया है जिसमे गांधी जी और लोहिया के ईच इंदिरा गांधी मौजूद रही ) दयानंद पांडे जी जब व्यक्तियों के हवाले से इंदिरा गांधी के प्रधान मंत्री बनने के दास्ताँ कहते हैं तो उसके पीछे जो वैचारिक यात्रा चली आर रही होती है उसकी तरफ  भी चलना चाहिए .
       इंदिरा गांधी का इतिहास पंडित नेहरू की   राजनीतिक ख्वाहिसों  की पूर्ति का सम्यक यात्रा है .जिसे पांडे जी ने इंडीकेट और सिंडी केट कह कर छोड़ दिया है .कांग्रेस का यह टर्निंग प्वाइंट है .इंदिरा गांधी  ने देखा है प्रधान मंत्री नेहरू तीन मूर्ती के लान में डॉ लोहिया के साथ बैठे हैं .भारत आजाद हो चुका है ,गांधी जी की ह्त्या की जा चुकी है , समाजवादी कांग्रेस से निकल चुके है .लौह पुरुष पटेल की मृत्यु हो चुकी है .नेहरू और लोहिया लान में बैठे है .इंदिरा गांधी जग रही है रात के दो बजे तक नेहरू लोहिया को मनाते रहें .लोहिया की तीन शर्ते हैं .दो पर पंडित नेहरू सहमत हैं एक पर असहमत बात टूट गयी लेकिन एक लोच के साथ ' चलिए हम इस पर फिर चर्चा करेंगे ' .नेहरू के समाजवाद के प्रति मोह का असर इंदिरा  गांधी   पर पड़ा . नेहरू संगठन के दबाव पर जो नहीं कर पाए उसे इंदिरा गांधी ने १९६९ ' नेकीराम कांग्रेस ' में कर के दिखा दिया .१९५४ में एक प्रखर समाजवादी जे. पी. की लिखी एक चिट्ठी जो उन्होंने पंडित नेहरू को लिखी थी और वह कांग्रेस के ठंढे बस्ते में पडी थी उसे इंदिरा गांधी ने सामने रख कर दिग्गजों से टक्कर लिया . कुल पांच समाजवादी इंदिरा के साथ रहें - चंद्रशेखर ,मोहन्धारिया ,कृष्णकांत ,अर्जुन अरोड़ा ,रामधन /इंदिरा गांधी कांग्रेस से निकाल  दी गयी .एक नयी कांग्रेस बनी  कांग्रेस इंडीकेट .इस इन्दी केट ने जे. पी. की चिट्ठी को जस का तस स्वीकार किया , कांग्रेस ने पहली दफा समाजवादी समाज के लिए अपनी प्रतिवद्धता का ऐलान किया . बैंको का राष्ट्रीयकरण , प्रिविपर्ष की सामप्ति  आदि चौदह कार्यक्रमों को लेकर इंदिरा गांधी मैदान में उतारी और सिंडी केट का सफाया हो गया .
     पांडे जी ने द्वारिका प्रसाद मिश्र और कामराज नादार का जिक्र किया है .लेकिन उन लोंगो को भी देखिये जिनका समाजवाद से शुरुआती लगाव रहा है . पंडित कमलापति त्रिपाठी ,हेमवती नंदन बहुगुणा , नारायण दत्त त्रिपाठी .बहुत नाम है हर सूबे में रहे ....
    पूजा जी आप बधाई की पात्र हैं , इतिहास् के अनछुए हिस्से को उजागर कर आप उसे सामने लाई. ऐसे मुद्दों पर शोध की जरूरत है . पांडे जी ! अगला पन्ना उठाइये .. बहुत कुछ सीखने को मिलता है आप लोंगो से ..

Thursday, August 30, 2012

समताघर पुस्तकालय पूरालाल
विकास भवन किताब से चिढता है .....................
कृपया दर्ज करें कि कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक पढाकू जिला जौनपुर में कई उखाड़ते पुस्ताकालयों में एक पुस्ताकालय ऐसा भी है जिसे चूहे पढ़ रहें है जो किताब उन्हें उनके मिजाज के अनुरूप नहीं लगती वे उसे इज्जत के साथ ऐसा कुतरते हैं कि एक एक अक्षर अलग करके रख देते हैं .इसके उपाय के लिए समताघर ने एक जनप्रतिनिधि  सांसद धनञ्जय सिंह से संपर्क साधा तो उन्होंने पुस्तकालय के लिए सांसद निधि से दो कमरों के लिए पांच लाख आवंटित कर दिया .फ़ाइल विकास भवन में आ गयी .यह वाकया दस माह पुराना है .तब से फ़ाइल चल रही है .जिस डीलिंग क्लर्क से यह फ़ाइल शुरू होती है वह एक सामाजिक प्राणी है ,उसने समाज के रश्म के मुताबिक़ एक शूत्र बताया -कुल डेढ़ दो हजार लगेगा सब हो जायगा .समताघर ने कहा ' न देंगे न लेंगे ' बस बात बिगड गयी .हर तीसरे दिन समता घर को कोइ न कोइ कादाज जमा करना पड़ता .जमा करते गए .अन्तः फ़ाइल फूल गयी .इस बीच पता चला कि पी डी साहेब का तबादला हो गया है  नए साहब आ रहें हैं .आगये नए साहब .वो सरकारी जाति के हैं ,सरकार के मुताबिक़ काम करते हैं ,कलेक्टर से बात हुई तो उन्होंने क्लर्क का नाम पूछा हमने कहा छोटा नौकर है मारा जायेगा .कलेक्टर ने कहा मै देखता हूँ .तब से वे देख रहें हैं और मै चूहों को देख रहा हूँ .
पी डी साहेब के सवाल सुनिए जिसे वे लिखित रूप से जानना चाहते थे -  पंजीकरण ?
समताघर ने कागज़ दिखाए ,प्लानिंग कमीशन में समताघर बाकायदा दर्ज है यह भी दिखया गया ,लेकिन चुकी जौनपुर सरकार  चिट् फंड के कागज़ देखने की आदी है उसे अखिल भारतीय  स्तर के कागज़ देखने में दिक्क्कत आती है  सो कहते सुनते मूत मैन हुए .दूसरा सवाल आया गति विधियां बताइये ?
एक एक करके सब लिखित रूप से दिया गया . गाँव में पुस्तक मेला लगा सारे अखबारों में चित्र समेत छापा लेकिन जिस तरह का चित्र उन्हें पसन् नहीं है ,वह नहीं था लिहाजा पुस्ताकालय की खबर ' फलाने लड़की के साथ फुर्र ' के नीचे दब गयी और हुक्मरां पुस्तकालय से महरूम रहें .आख़री सवाल टेढ़ा है - आपके जाति का मामला फस रहा है ?
पुस्तकालय में जाति कहाँ से जोडूं ... किसी के पास कोइ तरकीब हो तो बताए ..वसे एक बात बताऊँ - विकास भवन उस फ़ाइल को अपने ... ले जाय .पुस्तकालय तो बनेगा ही .. देखता हूँ इन चूहों को ........

Wednesday, August 29, 2012

तोरी बोलिया  सुने कोतवाल .... 
......फेस बुक मकड जाल में उलझ गया है .'दलित ' अम्बेडकर ,तरह तरह के देवी देवता , अनाप सनाप गरियाना , .... ( हम इसके विरोध में नहीं हैं दोस्त .. जिंदगी कातने में यह मकड जाल बेहतरीन तरी का है ) मै निकल आया गाँव ..... पूर्वी उत्तर प्रदेश चेरा पूंजी हो गया है .दो पहर तक गर्मी , दोपहर बाद उमस के बीच पुरवाई और फिर बारिश का झोंका..  रात में गुलाबी ठंढ .चारों तरफ हरियाली .मोर की पिहक .मेढक की बदमासी .रात भर टर्र टर्र उसके झींगुर की सारंगी ... कोइराने में झूला पड़ा है .धुप्प अन्धेरा है .कजरी झूले के साथ आरोह और अवरोह पर झूल रही है .मोटू उकसाता है .कजरी देखने चलोगे ? देखने कि सुनने ? .... बदतमीज ...लोकगीत केवल 'कर्ण ग्राही ' ही नहीं होता इसमें  ' चाछासु सुख ' की महक भी होती है ... गंदे ! तुम शहर में रहते रहते नर्कभोगी हो चुके हो .संगीत सुख से वंचित हो .यह जो लोक कला है संगीत है यह 'क्लासिकल मुजिक ' की मा है . डूब चुके शब्दों का जखीरा पड़ा है ... ' नह्कै' लाये गवनवा ... सुने हो ? निदिया ' बैरन ' भई ... तुम नकली परिमार्जित भाषा में कूदते रहो प्यारे लेकिन रस तो लोक में ही है .आज कविता में बुद्धि नाथ मिश्र जी हैं जो चुन चुन कर इन शब्दों को कविता में टाँक रहें हैं .... चलो माटी की महक में चलो .. लेकिन अंधेरी रात ... ? क्यों डरता है . आदमी से ज्यादा खतनाक कोइ जानवर नहीं होता .. इसके पदचाप से ही सब बगल हो जाते हैं ... हम चल पड़े मोटू ने मेरा हाथ पकड़ा हुआ है .मुलायम घास की झुरमुट ,गीली जमीन की फिसलन ,गंधराज की महक , मकई के खेत से गुजरते हुए दो जोड़ी इन पैरों ने महसूस किया कोइ दो  आवाजें सावधानी से खिल खिला रही हैं .मोटू ने मेरे मुह पर हाथ रख दिया .खींच कर आगे ले चला ....व्यतिक्रम मत पैदा करो .. ये दो दिल हैं ..
        काले  दैत्याकार नीम के पेड पर झूला ऊपर आसमान तक जा रहा है ..वापसी में नव यौवना मुग्धाओं की चीत्कार से भर जाता है . नीचे सेआवाज आती है  और .. और .. हमें खुसरो की  फुसफुसाहट सुनाई पड़ती है .. ' झूला किन्ने डाला रे .. अमरइयां .. झूले मोरा सैयां लू मै बलईयाँ.... ' मोस्ट इराटिक सांग '.. मोटू चिकोटी काटता है .. चुपचाप सुनो ... ज्ञान मत बघारो .. ' रिम झिम बरसे कारी बदरिया .. पीया घर नाही ... प्रकृति के लास्य को कालिदास ने जिया था ? या किसी दूसरे के अनुभव को बांटा था ? अबूझ पहेली है . लेकिन ऋतु संहार अमर कृति है .... 'दामिनी चमके '.. जियरा हुलसे ..../ हम लौट आये हैं .लेकिन कजरी अभी भी बदन को भिगो रही है .अमराई के झूले की तरफ बढ़ता हूँ .. बिस्तर से गिरते गिरते बचा , नीद खुल गयी .. मोटू के हाथ में काली काफी का प्याला है - बदतमीज ... बहुत बिगड गए हो .. चलो उठो .. पेंटिंग बनानी है .. 

Monday, August 27, 2012

पंडित जी ! प्रणाम ......
३ सितम्बर को पंडित जी का जन्म दिन है .मै नहीं जानता औरंगाबाद क्या कर रहा है ,लेकिन इतना दावे के साथ कह सकता हूँ कि आज भी बहुत सारे लोग हैं जिनके जेहन में पंडित जी ज़िंदा है और लोग उन्हें प्रणाम कर रहें हैं .( औरंगाबाद बनारस का एक सकसा हुआ मोहल्ला है जिसका जिक्र होते ही पंडित जी उठ खड़े होते हैं ,औरंगाबाद प्तातीक बनचुका है पंडित जी का ,उनकी अगली पीढ़ियों का -पंडित कमला पति त्रिपाठी , लोकपति त्रिपाठी ,राजेश पति त्रिपाठी ,और अब ललितेश त्रिपाठी .गरज यह कि इस घर में एक से एक विद्वान हैं जिनका जिक्र नहीं कर रहा हूँ .) ....हमने पंडित जी को पहली दफा जौनपुर में देखा .पंडित जी चंदौली से चुनाव हार गए थे .जौनपुर के उप चुनाव में वे जौनपुर आ गए थे .पंडित जी सर्किट हाउस में कांग्रेसियों से घिरे बैठे थे .पता नहीं कैसे अचानक मै चला गया उन्हें देखने .पंडित जी  लान में बैठे थे .उनके बैठने का अंदाज भी कमाल का रहा एक पाँव जमीन पर दूसरा घुटने पर .लोग आ रहें थे और उस पैर को छू कर प्रणाम कर रहें थे जो दूसरे पैर पर टिका पड़ा था .मै गया और हाथ जोड़ कर प्रणाम किया .और वही खड़ा हो गया .पंडित जी ने गौर से देखा .तब तक किसी ने मेरा परिचय मेरे दादा के हवाले से दिया .( आजादी की लड़ाई में हमारा परिवार क्रांतिकारी माना जाता रहा है ) पंडित जी मुस्कुराए .. तुम उनके नाती हो ...किसी ने आगे बताया -ये समाजवादी है .पंडित जी मुस्कुराए ... बोले कुछ नहीं .अब लगता है पंडित जी को समाजवाद से मोह था शायद आजीवन .( बाद के दिनों में धर्मयुग में  डॉ शिव प्रसाद सिंह के एक लेख में इसका जिक्र है कि कांग्रेस समाजवादी की एक बैठक में डॉ लोहिया ने पंडित जी के माथे पर लागे तिलक को लेकर पंडित जी को झिडकी दी थी ) पंडित जी से  वह पहली मुलाक़ात और फलाने के नाती आजीवन बना रहा .
     जौनपुर छोड़ कर जब बनारस पहुचा और विश्वविद्यालय की राजनीति में सक्रीय हुआ तो पंडित जी के पूरे परिवार से जुड गया ,गो कि हम समाजवादी रहें और पग-पग पर कांग्रेस के विरोध में रहे.चूंकी विश्वविद्यालय में छात्रों के बीच कांग्रेस न के बराबर रही और समाजवादियों की टक्कर संघी घराने से होती रही इसमें कांग्रेस गाहे ब गाहे समाजवादियों के साथ आ खड़ी होती .पंडित जी के नाती आबू (पूरा नाम राजेश पति त्रिपाठी है आज कांग्रेस के अगली कतार के नेता हैं हम लोग इन्हें आबू के नाम से संबोधित करते रहे.) से हमारी दोस्ती हो गयी जो अब तक चल रही है. ७३ छात्र संघ के चुनाव में भाई मोहन प्रकाश समाजवादी खेमे से चुनाव मैदान में थे .मुकाबला संघ से था .कांग्रेस और कम्युनिस्ट ने भी अपने अपने उम्मीदवार लड़ाए थे .एक दिन हमारे नेता देबूदा ( देवब्रत मजुमदार ) ने मुझे अकेले बुला कर कहा - पंडित आये हुए हैं तुम उनसे मिल आवो ,कुछ मदद कर दे तो अच्छा रहेगा .सांझ को बचते बचाते मै औरंगा बाद पहुचा .आबू को पहले से ही मालुम था सो उन्होंने अकेले में मिलवाने की व्यवथा कर रखी थी .पंडित जी से यह आत्मीय मुलाक़ात थी .संकोच्वास मै उनसे चंदे की बात नहीं कर सका .और सोच लिया कि देबूदा से झूठ बोल दूंगा कि उन्होंने कुछ भी नहीं दिया .उठकर चलने लगा तो पंडित जी ने रोका - जाने के पहले बहू जी से मिल लेना ( आबू की मा चंद्रा त्रिपाठी जी ) और जब बहूजी से मिला तो उन्होंने जीत की अग्रिम बधाई दी और हाथ में धीरे से एक लिफाफा पकड़ा दिया और बोली -और जरूरत पड़े तो हमें बता देना .
       एक और घटना का जिक्र करना चाहूँगा .७१ में कांग्रेस के सहयोग से उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह की सरकार थी .चौधरी चरण ने छात्र संघों को भंग कर दिया था .पूरे सूबे में छात्र उबाल पर थे .तमाम छात्र नेतावों पर अपराधिक मुक़दमे दर्ज हो चुके थे .लोग पकडे जा रहें थे .हम पर भी वारंट था और पुलिस बड़े मुस्तैदी से हमारी तलाश में थी .काफी सोच विचार के बाद तय हुआ कि अब क्या किया जाय . इसी बीच चौधरी चरण की सरकार गिर गयी और पंडित जी मुख्य मंत्री बन गए लेकिन पुलिस हमारीतालाश में लगी रही .और हमलोग पंडित जी के घर में डेरा डाले पड़े रहे. यह आबू की दोस्ती थी .एक दिन अचानक पंडित जी औरंगाबाद आ पहुचे .ठीक उसी समय हम लोंगो के लिए खाना लगाया जा रहा था .पंडित जी ने बहूजी पूछा कोइ आया है क्या ? बहूजी मुस्कुराई और बोलीं आबू के दोस्त लोग हैं .पंडित जी को अजीब लगा होगा कि आबू के दोस्त ..... न कोइ दुआ न बंदगी ...पंडित जी उठे और सीधे उसी कमरे के सामने आगये जहां हम लोग पसरे पड़े थे .हम लोंगो ने प्रणाम किया .पंडित जी मुस्कुराए ..अच्छा तो तुम लोग मेरे ही घर में ....अपने सचिव को कहा -डी यम और यस.पी को यहीं बुला लो .और पंडित जी वहीं दरवाजे पर कुर्सी लगा कर बैठ गए .थोड़ी देर में डी यम और यस पी सामने .पंडित जी ने पहला सवाल पूछा -उन  नेताओं की गिरफ्तारी क्यों नहीं हो रही ? एस पी ने कहा -दबिस डी जा रही है मिल नहीं रहें हैं .. पंडित जी मुस्कुराए कहाँ दे रहें हो दबिस .. मुख्यमंत्री के घर दबिस दिया ? ... हमने समझा अब गए काम से ..पंडित ने कहा तुम लोग नहीं पकड़ पाओगे .. ये सब यहीं है ...अब इन्हें पकडना भी नहीं ... कल लखनऊ पहुच कर इन पर लगे मुकदमे वापस ले लुऊंगा .. परेशान मत हो .. कम से कम मेरा खर्चा तो कुछ कम हो ... और हम मुस्कुराते हुए बाहर आगये ...
   कांग्रेस के अंदरूनी खांचे में समाजवाद बनाम जड़वाद / नेहरू बनाम पटेल / उत्तर परदेस में गुप्ता बनाम गौतम / की एक कड़ी चरण बनाम पंडित जी हमने आखन देखी का जिक्र किया .पंडित जी के पास तिलक भी था और समाजवाद भी .इन्ही पंडित जी का ऐलान था -बाबरी  मस्जिद पर एक भी फावड़ा गिरेगा तो वह मेरी पीठ पर गिरेगा . प्रणाम पंडित जी .

     

Sunday, August 26, 2012

वो इन्कलाब के दिन थे ...
उज्जवल जी के   'हल्फिया बयान ' जिस तरह मौक - ये -वारदात से दिए जा रहें है वह काफी दिलचस्प और और मौजूदा हालात को नापने में मददगार साबित हो रहें हैं .अब चूंकी हमारा भी जिक्र आ रहा है चुनांचे यह जरूरी लगने लगा कि हम उसे तस्दीक करते हुए आपको उसी मुकाम पर ले चलूँ जहां का यह अफ़साना है .काशीविश्व् विद्यालय ( हमलोग इसमें ' हिन्दू ' नहीं लगाते ) के दो प्रजातियों का जिक्र आया है . ' बलियाटिक ' और मकालू .पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार समेत तमाम हिन्दी भाषी ' लोग ' बलियाटिक और हाई फाई वाले लोग मकालू .य सच है कि मै दोनों में रहा .विश्व विद्यालय में हमारी फैकल्टी सबसे छोटी थी .कुल जमा पूंजी तीस लोग तुर्रा यह कि लडकियां किसी भी मायने में किसी से कम नहीं .उन्मुक्त माहौल .हमारे टीचर भी एक से बढ़ कर एक .' सर ! आज यहाँ क्लास करने का मन नहीं कर रहा है ....किसी एक लड़की ने बहुत ही महीन अंदाज में गुजारिश किया और पूरी क्लास कैंटीन  पर लग जाती थी .कैंटीन पर चाय पीनेवाले बढ़ जाया करते थे .हमारी पढाई ,उसका विषय बंधन मुक्त रहा है .यह गांधी की बुनियादी तालीम का अघोषित प्रयोग था '.हाथ का हुनर ' और मन की उड़ान बड़े एकाग्र चित्त से स्केच बुक पर उतारते थे .कोइ चाय पी रहा है , कोइ घास पर  लेटा है ,हम उसे बनाते थे पूरी मस्ती के साथ . यह था फाइन आर्ट का माहौल जिसका मै भी एक कारकून था इस लिए मै मकालू कहलाया .वो आदते आज तक जस की तस पडी हैं ,जिसके चलते बाज दफे " बे इज्जत भी होना पडता है .अभी हाल में एक संभ्रांत महिला को यार कहकर संबोधित कर दिया वो हत्थे से उखड गयी ,किसी झुके चेहरे को 'ठोढी पकड़ कर ऊपर उठा दूं और कहूँ कि अब आँख मिला कर बात करो तो कई ' छुई -मुइयों ' की तरह  विलुप्त हो जाती हैं .लेकिन शुक्रगुजार हूँ फेसबुक का कि कई चेहरे ऐसे भी मिले जो दमदारी के साथ हाथा पाई तक करने पर आमादा हो जाती है .कितना अच्छा लगता है यह बराबरी का रिश्ता .अभी जिसका जिक्र नीलाक्षी जी ने किया कि वो हमसे भीड़ गयी थी सही है हमें अच्छा लगा था .औरत और मर्द के इस रिश्ते को बनाने में बहुत  दिक्कते आयी लेकिन हम सफल रहे.एक वाकया सुनाता हूँ . अभी हँस के किसी अंक में प्रसिद्ध कथाकार डॉ काशी नाथ सिंह ने हमारे ऊपर दो पेज लिख डाले .उनका एक वाक्य मजेदार है -' चंचल पहले छात्र संघ अधक्ष हैं जो महज छात्रों के ही नहीं ,बल्की छात्रावों के  भी अधक्ष रहे'. इसका एक कारण भी था .डॉ लोहिया का प्रभाव .औरत की इज्ज्जत करना सीखो .उसकी खुल कर तारीफ़ करो .पीठ पीछे नहीं सामने .छात्र संघ का चुनाव चल रहा था ,कानूनन हमें महिला छात्रावासों में जाकर उनके बीच बोलना होता था .प्रवेश केवल उम्मीदवारों का ही होता था .मै जब ज्योतिकुंज पहुचा उस समय विद्यार्थी परिषद के महेंद्र नाथ सिंह बोल रहें थे .कद काठी से दुरुस्त बोल्ट बोलते उन्होंने एक जुमला बोला कि अगर आपने हमें जिताया तो हम आपको गुंडों से हिफाजत की जिम्मेदारी अपने कंधे पर लेते है . कल से कोइ लड़का किसी लड़की को नहीं छेड़ेगा .जोर दार ताली बजी .इसके बाद हमें बोलना था .हमने अपनी बात रखी .हमारी बात खत्म होते ही एक लड़की ने महेंद्र नाथ के हवाले से पूछा -आप हमारी हिफाजत कैसे करेंगे ? हमने कहा हम दो काम करेंगे ...एक आपके मोहब्बत की हिफाजत और दूसरा 'जेल के कायदे ' से मुक्ति .( महिला छात्रावासों में छात्राओं को एक निश्चित समय पर छात्रावासों में पहुचना पड़ता था , और किसी से मिलने के लिए अगर बाहर गेट तक जाना होता तो उन्हें रजिस्टर पर लिखना पड़ता कि वो किस्से मिलने जा रही हैं .. जाहिर सी बात है हर लड़की झूठ लिखती कि वह अपने लोकल गार्जियन से मिल रही है .) .. मेरी बात सन्नाटा छा गया .हमें लगा कि गए बच्चू काम से .. लेकिन अचानक एक ताली बजी .. दो बजी .. फिर पूरा हाल तालियों की गडगडाहट से गूंजता रहा . और कुछ इस तरह धक्का मुक्की में घिरा कि  हमें लगा लगा कि हम जो कुर्ता पहन के आये थे वापसी बगैर कुर्ते के होगी .....( जारी )
इस मुसलमान का घर कहाँ है 
एक बार किसी अखबार ने मरहूम डॉ राही मासूम राजा से  पूछा था कि आपको इस बात से  डर नहीं लगता कि कोइ आपको पाकिस्तानी कहदे ? राही साहेब ने बहुत माकूल जवाब डिया था -  देश के प्रति वफादारी का सबूत तो हिंदुओं को देना चाहिए जिन्हें हर हाल में यहीं रहना था , हमारे सामने तो  'आप्सन' था . हम यहाँ रहते या पाकिस्तान चले जाते ,लेकिन हमने यहाँ रहना कबूल किया .हमारे बाप दादा यहा रहें , उनकी काबरे यहाँ है हम क्यों किसी और मुल्क में  जांय ? यह दमदारी राही साहब में रही .इतना ही नहीं अपने हक और हुकूक के लिए कभी भी चुप नहीं रहे.आपात काल का विरोध जिस मुखर तरीके से राही साहब ने किया ( सीन  ७५ ) शायद ही किसी  और लेखक ने किया हो .लेकिन वो अपने मुल्क जिसमे तमीज और तहजीब भी शुमार है को बे इन्तहां प्यार भी किया  .हिन्दू मुस्लिम एका उनके लेखन की जान है - 'आधा गाँव ' टोपी शुक्ला ' 'ओस की बूँद ' हिम्मत जौनपुरी ' ' कटरा बी आरजू '  नीम का पेड़ ' इसके उदाहरण हैं . आखीर में डॉ साहब एक अमूल्य निधि ' महाभारत ' की पट कथा लिख कर छोड़ गए जिसे कई पीढियां याद करेंगी .हम इस तरह के और इस जज्बात के बहुतो को जानते हैं जो सही मायने में इस्लाम में यकीन रखते है और भारतीय हैं .आज जरूरत है इस्लाम में यकीन रखने वाली समूची कौम इस जज्बे के साथ उठ खड़ी हो ,अपने को मुकम्मिल तौर पर सवारे , शिक्षा ,रोजगार ,तिजारत .में अपना दखल दर्ज कराये .यहाँ दो टूक बात कहना चाहता हूँकि दुनिया में भारत के अलावा दूसरा कोइ मुल्क नहीं है जो अपने आमजन जिसमे मुसलमान भी शामिल है को इतनी तरजीह देता हो .वरना एक अकेले ' बटवारे के फैसले ने ' मुसलमान को समूचे भारतीय उप महाद्वीप के मुसलमानों को बे घर कर के छोड़ दिया है .आज पाकिस्तान में ' पाकिस्तान बनानेवाले असल लोग ' मोहाजिर बोले जाते हैं और उन्हें भारत का एजेंट माना जाता है .बँगला देश में अपने हक और हुकूक की बात करनेवालों को 'बिहारी ' कह कर अलग कर दिया जाता है , भारत में लंबे अरसे तक कट्टर हिंदुओं की संस्था ने इन्हें पाकिस्तानी करार दिया अब भी जादा  कदा उसे दुहरा दिया जाता है ,लेकिन वोट के गणित ने उन्हें भी सिम्बल के तौर पर ही सही लेकिन अपने संगठन में लेना पड़ा .सैकडो साल तक इस मुल्क में हुकूमत करनेवाली कौम एक दरी हुई कौम बन कर किसका नुकशान करेगी ? इसका जवाब बहुत सीधा है अपनी कौम का और अपने  मुल्क का .
        बाबरी मस्जिद का विद्ध्वंस ,एम् एफ हुसैन का दर-बदर ,बाबर की औलाद  जफ़र की तौहीन किसीभी हिंदू को शर्मिन्दा करता रहेगा .अभी भी वक्त है 'अखंड भारत ' का नारा लगानेवालो अखंड भारत तो देखो ...

Monday, August 20, 2012

साहेब बंदगी .......
कल त्रिलोचन जी का जन्मदिन था .
सब कुछ मिला त्रिलोचन जी को लेकिन बहुत देर से .मै बनारस छोड़ कर दिल्ली आचुका था ,' दिनमान में ट्रेनी था .एक दिन प्रयाग शुक्ल जी ने बताया कि कल त्रिलोचन जी से मिलने जाना है .हमने पूछा -बनारसवाले त्रिलोचन जी ? बोले हाँ वही .और बात खत्म हो गयी .इतने में सर्वेश्वर जी  ने हमें बताया कि तुम दफ्तर से घर जाते समय शीला जी से मिलते जाना  उनका फोन आया था .( उन दिनों शीला संधू राजकमल प्रकाशन की मालकिन थी  और मोहन गुप्त करता धरता ..) राज कमल पहुचा तो मोहन जी ने रोक लिया ,आओ चाय पीया जाय अभी शीला जी त्रिलोचन जी से बात कर रही हैं .... अचानक शीला जी ने मोहन जी को बुलवाया , मै बगैर कुछ बोले सीधे शीला जी के  कमरे में नमूदार हो गया .वहाँ एक साथ तीन 'घटना ' घटी .शीलाजी ने का यह कहना कि त्रिलोचन जी ये चंचल जी हैं बहुत बड़े....... और त्रिलोचन का उत्तर देना  ' को नहीं जानत है ...' और बदले में हमने कहा साहेब बंदगी ....पूरा कमरा सहज हो गया .दरिया गंज से मंडी हाउस तक का सफर पैदल ही कटा .रास्ते में कई तरह की चर्चा चली .उस दिन मंडी हाउस के श्री राम सेंटर में त्रिलोचन जी की कथा उन्मुक्त भाव से चली .अब मै बनारस चलता हूँ ....
     बनारस में  गो दुलिया चौराहा पर एक तांगा स्टैंड हुआ करता था .अभी भी है शायद .वहाँ बुधिराम की किताब की दूकान हुआ करती थी ,त्रिलोचन जी का अड्डा था यह तांगा स्टैंड .कहनेवाले तो यहाँ तक कहते थे कि अगर त्रिलोचन जी का पता खोजना हो तो तांगा स्टैंड चले जाओ .एक दिन एक बंगाली ' भ्रमरी ' ( बंगाल से जो यात्री काशी लाभ लेने आते थे उन्हें कुछ मनचले भ्रमरी ही कहते थे और यह नाम भी त्रिलोचन जी का दिया हुआ था ) एक दिन हम गोपाली के पान की दूकान पर खड़े थी कि एक भ्रामरी जत्था तांगे की तलाश में भौचकियाया इधर उधर आँखे दौड़ा रहा था कि अचानक  चकाचक बनारसी मुह में पान घुलाये उनके मदद में उतर गए ...' का तलाश रहें आप जन .....तांगा  ?... उधर खम्भे के पास चले जाइए पूरब की तरफ .. वहीं एक तांगा होगा .. हटा कट्टा भ्रमरी उधर बढे  तब तक चकाचक अपनी बात पर जारी रहें ,....खसखसी दाढ़ी ,खादी का फटा हुआ मोटा कुर्ता ,चौड़ा  माथा ,, लंबी बाहें  सरपट चाल ....किसी ने टोका आजकल गांधी पर बतियाते हैं त्रिलोचन जी ...
      त्रिलोचन जी की सांझ तांगा स्टैंड से अस्सी और अस्सी से गोदौलिया ,गोदौलिया से अस्सी तक  बीतती थी . लोगो की जिज्ञासा ,प्रश्न ,कुतूहल ,शंका सब का समाधान चलते फिरते होता था .श्रोता बदलते रहते थे और त्रिलोचन जी चलते रहते थे ....हमने त्रिलोचन जी के बहुत सारे स्केच बनाए है .आज त्रिलोचन जी नहीं हैं लेकिन हिन्दी का अरस्तू जिन्द्दा रहेगा ..

Sunday, August 12, 2012

लोहिया: एक कुजात गांधीवादी 
फेसबुक पर अचानक गांधी और लोहिया जेरे बहस हो गए .यह शुभ शुरुआत है .अब तक गांधी को 'गरियाने ' वालों में संघी और साम्यवादी थे अब एक तबका और आ मिला है वह है ' दलित उद्धारकों ' का.कल संदीप जी ने बाजारवाद की प्रतिस्पर्धा को आर्थिक गैरबराबरी औए विपन्नता का मूल कारण बताया जो सच भी है .लेकिन इससे निजात कैसे मिले ? बीसवीं सदी ने सबसे ज्यादा इस सवाल को अह्मियती दी .दो 'राजनीतिक दार्शनिक' सामने आये .एक मार्क्स और दूसरे गांधी .मार्क्स ने एकबारगी सब को चौका दिया जब उसने ' द्वंदात्मक भातिक्वाद ' की स्थापना की और 'थेसिस  , एंटीथेसिस और सेनथेसिस के आधार पर न केवल इंसानी सभ्यता के विकास को समझाया बल्की आर्थिक सोच को भी परि लक्षित किया .मार्क्स जब तक 'दर्शन ' पार रहता हहै निश्चित रूप से वह बड़ा हो जाता है लेकिन उसके साथ राजनीति के दो तत्व और ,जो निहायत ही जरूरी होते हैं ,वो गायब मिले . दर्शन का समाज में प्रयोग और और उस दर्शन के आधार पर समाज बनाने के लिए नेतृत्व .मार्क्स केवल दार्शनिक बन कर रह जाता है ,वह नतो सामाजिक बैज्ञानिक बन पाता है न ही लीडर .दूसरे छोर पर गांधी का प्रवेश होता है .गांधी जन सामान्य की भाषा में आर्थिक विषमता का निदान देता है -उत्पादक .उत्पादन और उपभोक्ता  का .मार्क्स के बर् अक्स गांधी उत्पादन को विकेंद्रित कर देता है और उसका वैज्ञानिक प्रयोग पहले खुद पर करता है .फिर समूचे समाज को इस डगर पर चलने को कहता है इस तरह गांधी राजनीति के तीनो हिस्से को एक साथ जीता है .गांधी का मानना है कि तुम उत्पादक हो और तुम्ही उपभोक्ता यहाँ लाभ जिसे मार्क्स 'अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत ' कह कर पूंजीवाद के खिलाफ 'मजदूरों एक हो ' का नारा देता है ,गांधी उत्पादन को उपभोक्ता और उत्पादक के बीच बगैर किसी लाभ और हानि के बितरित कर पूंजीवाद की मूल  जड़ को ही काट देता है .मजे की बात समाज के ताने बाने पर दोनों एक मत हैं .एक 'कम्यून' की बात करता है तो दूसरा 'गाँव स्वराज की ' कम्यून में और गाँव स्वराज में दो मूल भूत फर्क है .सत्ता और संपत्ति का विकेंन्द्रीकरण गाँव स्वराज की बुनियाद है तो साम्यवादी कम्यून में उत्पादन का लाभ सत्ता को और कम्यून पराधीन होगा केन्द्रीय व्यवस्था के .इसपर निहायत ही सटीक भाषा में डॉ लोहिया परिभाषित करते है -  'समाजवाद = साम्यवाद + युद्ध + ऋण आजादी . साम्यवाद में ' द्वन्दऔर  स्थाई भाव में रहेगा और आजादी लोप रहेगी .......जारी 

Saturday, August 11, 2012

सवनवा में ना जईबे ननदी 
 बादल...मेघ ..
भारतीय साहित्य का ओढ़ना -बिछौना है .नाम नहीं गिनाउंगा .लोक साहित्य .लोकगीत ,लोक कथा बादल और बदरी के बीच खींची पतली लकीर के मर्म को उजागर कर देती है .बादर 'घिरते ही ' पृथ्वी व्याकुल  हो जाती है .और पहली फुहार ? प्रफुल्लित धरती की सुगंध  जिसे नहीं सुहाया उसकी जिंदगी  अकारथ .सस्य श्यामला पृथ्वी धानी चूनर ओढ़ लेती है .ऋतु संहार में काली दास ने मुग्धाओं के ग्व्याकुल मन का जिक्र किया है .दामिनी की तड़क  प्रेमी युग्म को चिपटा देता है .नई नवेली दुल्हन आयी है .मायके में झूला पड़ा है ,भाई बुलाने आया है .वह अपने प्रेमी के साथ रहना चाहती है .अपनी ननद से कहती है -चाहे रिसिआयं चाहे कोहाय ,सवनवा में ना जईबे ननदी . गिरिजा देवी कजरी गा रही हैं ..मै अपने बरामदे में बैठा हूँ . पुराने घर के खपरैले मुडेर पर काली कजरारी बदरी चढी बैठी है ... गाँव की खुशबू से सराबोर ...मोटू अनार के दाने निकाल कर ,आँखों में बदरी फैलाए है .....

Thursday, August 9, 2012

मोहन से महात्मा तक 
अब तक गांधी साम्यवादियो और संघियो के निशाने पर थे ,अब एक नयी जाति और उभरी है जो अपने आपको दलित उद्धारक कहती है उसने भी गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और बे सर पैर के आरोप लगा रही है .एक छोटे से  अरसे तक हम भी गांधी को थोड़ा  ढीला ढाला नेता मानता रहा .लेकिन जेल यात्रा ने मेरे लिए जो सबसे बड़ा काम किया वह था गांधी को जानना .ज्यों ज्यो गांधी को पढ़ता गया ,गांधी कके प्रति जो दुराग्रह था दूर होता गया .और इसमें डॉ लोहिया के लेखन ने बहुत मदद किया .' भारत विभाजन के अपराधी ' ( डॉ लोहिया ) पढते समय यह महसूस हुआ कि एक शख्स जिसने सत्य और अहिंसा के सहारे न केवल आजादी की लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की बल्की सारी दुनिया को इस सत्य और अहिंसा से बने एक हथियार 'सिविल नाफरमानी '( न मारेंगे ,न  मानेगे ) को उनके हाथ में दे दिया जो दबे और कुचले लोग थे , मजबूर थे मजलूम थे ,उन्हें अपने हक के  लड़ने की ताकत दी .उस निहत्थे महात्मा को एक कट्टर और कायर संघी ने क्यों ह्त्या की ? वह शख्स जो बटवारे का कत्तई पक्षधर नहीं था उस पर इन संघियों ने बटवारे  का झूठा आरोप क्यों लगाया ? जब कि सच्चाई यह है कि बटवारे का समर्थन संघ और साम्यवादी दोनों कर रहें थे .जिन्ना का नारा था मुसलमानों  पाकिस्तान चलो ,संघ  का नारा था -मुसलमानों भारत छोड़ो .कम्युनिस्ट का बाकायदे प्रस्ताव था .पाकिस्तान बनाओ .मुस्लिम लीग का डाइरेक्ट एक्सन दंगा में तब्दील हो चुका था .लन्दन में बैठा चर्चिल बटवारे की स्क्रिप्ट लिख रहा था .गांधी और उनके साथ समाजवादी कांग्रेस को छोड़ कर कोइ और नहीं था जो बटवारे का विरोधी रहा हो .कांग्रेस नेतृत्व 'गृह युद्ध 'की स्थिति से विचलित थी . सरदार पटेल कुछ ज्यादा ही मुखर थे .गांधी अकेला है .डॉ लोहिया ने समूचे दस्तावेज को उघार कर लिखा कि जब गांधी को जो कि कांग्रेस कार्य कारिणी के आमंत्रित सदस्य हैं को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है .( १९३४ में गांधी ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है ,इस आशय के साथ कि जब भी कभी कांग्रेस चाहे वह उन्हें आमंत्रित कर सकती है ,..इस इस्तीफे के बाद गांधी चरखा और अछूतोद्धार का कार्य क्रम चला रहें थे ,इससे गांधी को समझा जा सकता है कि जब आजादी बिलकुल साम्ने खड़ी है गांधी की चिंता 'अछूत ' और दलित है .इस गांधी ने अछूत और दलित में उठ खड़े होने की इक्षा शक्ति पैदा की .वही लोग जब गांधी को गरियाते हैं तो उनकी दिमागी हालत पर तकलीफ होती है .) बटवारे के सवाल पर बैठी कांग्रेस कार्य कारिणी में  गांधी ने दो प्रस्ताव सुझाया -एक अंग्रेज चले जायं बटवारा हम कर लेंगे .दो -कांग्रेस दो राष्ट्र के सिद्धांत को नहीं मानती .इस सवाल के पहले पटेल ,नेहरू और लोहिया के बीच झड़प भी हुई कि बटवारे की पूर्व सूचना गांधी को क्यों नहीं दी गयी ?.
        हमने इस लिए जिक्र किया कि आज गांधी को जानने की ज्यादा जरूरत है .विशेष कर नयी पीढ़ी को .कुछ लोग गांधी को निहायत ही रूखा समझते हैं .( बहुत दिनों तक हम भी इसी राय के थे लेकिन ज्यो ज्यो गांधी के न्नाज्दीक जाता गया  पर्दा हटता गया .हमने जान बूझ कर गांधी और दुनिया के सबसे बड़े हास्य कलाकार  चार्ली चैप्लिन की तस्वीर चिपकाया )) यह उस समय की तस्वीर है जब १९२९ में गांधी के आह्वाहन पर विदेशी कपड़ों की होली जला कर गांधी गोलमेज कांफ्रेंस में भाग लेने लन्दन गए थे .मीडिया ने गांधी से जानना चाहा  था कि कांफ्रेंस के अलावा और क्या प्रोग्राम है ? गांधी ने कहा -एक - मानचेस्टर के मजदूरों के बीच रहूँगा और दूसरा चार्ली चैप्लिन से मिलूँगा .यह दोनों बाते राज नीति से जुड़ी हुई थी और चर्चिल का जवाब भी था .( चर्चिल ने गांधी को अधनंगा फ़कीर कहा था .और गांधी को मशखरा कहा था ) मानचेस्टर के मजदूरों के बनाए गए कपड़ों की होली जला कर उनके बीच जाना और अधनंगे जाना हिन्दुस्तान की हकीकत बयान करता है .दूसरा जवाब था -सुना है चार्ली चैप्लिन हमसे भी बड़ा मसखरा है ... इस बयान के बाद चार्ली चैप्लिन अपनी शूटिंग रोक कर गांधी के साथ आ मिला ...

Thursday, August 2, 2012

वो क़त्ल हो गया  बद्सूरतों की  महफ़िल में .......

कतील सिफाई की एक सतर है -वो क़त्ल हो गया  बद्सूरतों की महफ़िल में ,जो सारे शहर के आईने साफ़ किया करता था ./ 
जो अन्ना को अच्छी तरह नहीं जानते थे ,जो यह भी नहीं जानते थे कि अन्ना किसके इसके इशारे पर काम कर रहें हैं ,जिन्होंने अन्ना को मसीहा मान लिया था ,कल के अन्ना के इस फैसले से कि अन्ना अब एक पार्टी बनाएंगे जो चुनाव लड़ेगी तब 'मजबूत ' लोकपाल लायेगी .वे बहुत मायूस हुए हैं .जिस जनता ने बहुत लगन के साथ अन्ना का साथ दिया वह इस हद तक दुखी है कि गालिया तक निकाल रही है .आइये अब इस पूरे खेल की पड़ताल की जाय .
     अन्ना को गांधीवादी क्यों बताया गया ? 
बाँझ हो चुकी प्रतिपक्षी राजनीति बौने नेतृत्व से फिसलने लगी थी .७७ के बाद देश में न तो कोइ बड़ा सवाल उठा ,न ही कोइ आंदोलन हुआ .महगाई पर एक 'प्रायोजित और दिखावटी ' लड़ाई जरूर शुरू हुई लेकिन उसे बीच में ही मरना था सो मर गयी .इसी बीच संधी धराने ने अन्ना को प्रस्तुत किया . बड़े सलीके और गाजे-बाजे के साथ .चुकी मीडिया के पास विशेष कर इलेक्टोनिक मीडिया एक ऐसे दौर से गुजर रही थी जब उसके पास कोइ ऐसी खबर नही थी जिसे वह बेच सके और उत्तेजना पैदा कर सके .ऐसे में अन्ना आ गए .खादी का लिबास और टोपी को देखते ही इस मीडिया ने अपनी तरफ से अन्ना को गांधीवादी घोषित कर दिया .जब कि  इस मीडिया को इतना भी नहीं मालुम कि अन्ना का लिबास समूचे महाराष्ट्र का लिबास है .यह इस मीडिया की सबसे बड़ी भूल थी .अन्ना आंदोलन में संघी घराने ने पूरी ताकत लगा दी .लेकिन जब दिशा ,कार्यक्रम और विकल्प की बात आई तो आपसी मतभेद उभरने लगे और अन्ना टीम का एक एक सदस्य उघार होने लगा .इसी में रामदेव यादव भी बाबा बन कर कूद पड़े .आहिस्ता अहिस्ता जनता को यह पता चल गया कि यह कोइ आंदोलन नहीं है बल्कीभ्रष्टाचार  को सामने रखकर  राजनीति खेला जा रहा है .अपने चरम पर यह साबित हो ही गया जब अन्ना ने एक पार्टी बनाने की बात कही .इस पार्टी का अगला कदम होगा प्यात्यक्ष या परोक्ष रूप से संघी घराने से ताल मेल .
   इस खेल का पटाक्षेप हो गया लेकिन जिस सवाल पर जनता में एक कुतूहल मचा था - भ्रष्टाचार  उसका क्या होगा .? क्योकि सवाल तो जस का तस बना हुआ है इसके कम से कमतर करने के लिए कांग्रेस को ही पहल करनी पड़ेगी और उसे संकल्प लेना होगा .और इस लड़ाई को दोनों मुहानो पर एक साथ लड़ना होगा संसद और सड़क दोनों को सचेत करना होगा .

Friday, July 27, 2012

ईंट में दब गयी एक सभ्यता 
हमारे कई दोस्त गाँव लौट रहें हैं .इन्ही में एक है शीतल जी .इन्होने सुल्तानपुर के कादीपुर और सूरापुर के बीच एक ठेठ गाँव में जमीन ली है और वहाँ निर्माण कार्य में लगे हैं .अक्सर हमलोग वहाँ इकट्ठे हो जाया कतरे है .कल की सांझ ऐसी ही एक बैठकी में गुज़री और हम लोग गाँव के बारे चर्चा कर्रने लगे .हम सब इस बात से सहमत थे कि अब गाँव का चेहरा भी बदलने लगा है और बदसूरत हो रहा है .पत्रकार मित्र कुमार सौबीर ने एक मजेदार टुकड़ा जोड़ा -'शुरुआत ईंट से होती है '.यह सुलेख इसी ईंट पर है .
      अब तक माटी का कोइ भाव नहीं था ,प्रचलित मुहावरा है 'माटी के भाव '.लेकिन अचानक गाँव में भी माटी बिकने लगी और अच्छे दाम पर .आज शहर में ईंट का क्या भाव है हमें नहीं मालुम लेकिन गाँव में ईट की कीमत है पांच रूपये .ईंट का अर्थ शास्त्र और भी दिचास्प है .ईंट भट्ठे का मालिक किसान से ' माटी के भाव ' मिट्टी लेता है .वही मिट्टी जब जब उसके कारखाने( भट्ठे ) से ईंट के रूप में बाहर आती है तो उसकी कीमत सात गुनी बढ़ चुकी होती है .इसका भुगतान वही किसान ईंट खरीद कर करता है .इतना ही नहीं माटी से ईंट बनाने की प्रक्रिया में गाँव के ही लोग होते है .विशेषकर आदिवासी जो गुलामो की तरह खरीदे जाते हैं .
        इस ईंट ने  एक समूची सभ्यता को ही दबा कर मार डाला .गाँव में अब माटी के घर नहीं बनते ,ईंटों के मकान बनते हैं .उस 'घर' और इस 'मकान' के बीच फ़ैली खाई में एक सभ्य्ता लुप्त हो गयी .माटी के घर गाँव के ही लोग बनाते थे .उनकी जिंदगी ,रोजी रोटी इसी निर्माण कला से चलती थी .और दलित होने केबावजूद समाज में इनकी इज्जत थी .( दलित और बावजूद हमने जानबूझ कर जोड़ा है ,.. उनके लिए जो नए नए दलित प्रेमी पैदा हुए हैं वो दलितों पर चिंतित तो हैं लेकिन कारणों पर बात नहीं करते ) इस घर निर्माण में जो दूसरी जाति अपनी भूमिका निभाती थी वह थे लुहार ,लकड़ी का काम होता था .उनके कारी गरी की कीमत थी .माटी के घर में खिड़की दरवाजे से पहले ,घोरी,धन्,बदेर.फरका .उतरन ये  गढे जाते थे .( आज ये शब्द ही चलन में नहीं हैं ,घर और मकान केबीच हमारी शब्द संपदा चूक रही है यह सबसे बड़ा घाटा है ) इसके बाद नाम्बर्र आता था कुम्हार का वह  छत के लिए 'खपडा' तैयार करता था .उसे 'नरइ और थपुआ ' कहते है .माटी को चाक पर चढ़ा कर नरइ  गढना एक कला थी .अब न तो इस  खपडे की जरूरत रह गयी है न उस कला की .लिहाजा एक जाति अपने पुश्तैनी पेशे से हट कर रोजगार की तलाश में दर ब दर हो रही है
       गाँव का अपना विनमय का अर्थशास्त्र टूट कर भसक गया और गाँव ईंट के पक्के मकान में 'पकस् ' रहा है . .
     
      

Wednesday, July 4, 2012

राजा नहीं फ़कीर है .......
वी.पी. सिंह से हमारी मुलाक़ात उसी तरह की थी ,जैसे एक समाजवादी की किसी कांग्रेसी से होती है .हम इनके नजदीक तो कत्तई नहीं थे बल्की इलाहाबाद की राज नीति में हम इनके विरोधी माने जाते थे क्यों कि हम जनेश्वर मिश्रा के साथ थे .एक दिन अचानक पता चला कि कांग्रेस का एक पुर्जा छटक रहा है जिससे फिर किसी नए समीकरण के बनने की संभावना है .और वह पुर्जा थे वी.पी. सिंह .भारतीय राजनीति की विडम्बना देखिये कांग्रेस का छटका पुर्जा प्रतिपक्ष की झोली में गिरता है .और प्रतिपक्ष उसे 'रंग रोगन' लगा कर कंधे पर daal कर घूमना शुरू कर देता है . वी.पी. अन्यों से थोड़े भिन्न थे .एक सरकार में जिम्मेदार ओहदे से बावस्ता रहें ,दो साफ़ सुथरी छवि थी ,राजा थे ,कानिया ऐसे कि कभी किसी भी सवाल दो टूक नहीं बोले .उनकी सबसे बड़ी खूबी रही मुद्दा उठा कर किनारे बैठ जाते थे और लोग उस मुद्दे पर अलग अलग अपनी राय ,किस्से ,कहानिया गढते थे और राजा मुस्कुराते थे ,न हाँ न ना.बोफोर्स के साठ भी यही हुआ .भारतीय राज नीति में बोफोर्स और वी.पी .एक दूसरे से चिपका हुआ बवंडर बन कर आया और अपने ही अंतर्विरोध पर सिमट गया .इस विषय पर सबसे कारगर टिप्पणी जार्ज ने की थी ,व्यक्तिगत बात चीत में .उन्होंने कहा -हर सौदे में दलाली होती है सबको पता है ,यह बिजनेस ट्रेंड है .लेकिन पहली बार यह हो रहा है कि एक सरकारी मंत्री अपने ही सरकार के ऊपर आरोप लगा रहा है यह मामला जितना खुला हुआ है उतना ही दबा भी .; जो दबा हिस्सा था उसे गौर से सुने .सारा इलाहाबाद जानता है कि राजिव गांधी और अमिताभ बच्चन के निजी रिश्ते ने वी.पी. को विचलित कर दिया था .इतना ही नहीं अमिताभ के चलते वीपी की बेइज्जती भी हुई और उसने आग में घी का काम किया .हुआ यह कि मेजा में वीपी और बच्चन का सामूहिक कार्यक्रम था .बच्चन नहीं पहुच पाए वहाँ वीपीको जनता ने न केवल बोलने नहीं दिया बल्की धक्का भी दिया .बोफोर्स की नीव तो उसी दिन पड़ गयी थी और राजा ने तय कर लिया था अमिताभ के बहाने  राजीव  गान्ही को चुनौती देना .यह है राजा के व्यक्तित्व का अहम् हिस्सा . राजा निहायत भाउक,संवेदनशील ,तुनक मिजाजी ,और जिद्दी स्वभाव से भरपूर था .इसके कई उदाहरण है -जे पी. के भूदान कार्यक्रम में जमीन देना और फिर परिवार से यह बयान दिलवाना कि मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी ..भाई की शिकार खेलते समय हुई ह्त्या के बाद  पुलिस द्वारा अंधा धुंध अपराधियों  की ह्त्या ..वगैरह वगैरह ..इस वीपी से हमारी मुलाक़ात संतोष भारती के  साथ हुई .उनके परिवार का जो माहौल था उसने बरबस हमें खींचकर चौका तक पहुचा दिया .उनकी पत्नी सीता जी सही मायने मा रही .हम लोंगो का ख़याल उसी तरह करती थी जैसे एक मा अपने बच्चे का .उनमे राज बब्बर ,मै .संतोष भारती  .योगेश मिश्रा ...घर के सदस्य की तरह रहें .
               बोफोर्स का''कागद' जेब में डाले वीपी इलाहाबाद के उप चुनाव में आ गए .इस एलान के साथ कि अमिताभ के खिलाफ चुनाव लडूंगा .वीपी के साथ पूरा प्रतिपक्ष इलाहाबाद में घेरादाले पड़ा था .अमिताभ जब मैदान में नहीं आया और उसकी जगह हरे कृष्ण शास्त्री आ गए राजा ने ऐलान कर दिया कि  वह अब चुनाव नहीं लड़ेंगे .यह अजीब वाकया था .राजा नाम वापसी की तैयारी करते दिखे .दोपहर का वक्त था 'ऐश महल' ( इलाहाहाबाद में राजा के पुश्तैनी मकान का नाम जो उस चुनाव का केन्द्रीय कार्यालय था ) तमाम लोग राजा को मना रहें हैं इनमे विद्या चरण शुक्ल .राम धन ,जोशी ,......केवल एक शख्स ऐसा था जो खिड़की से बाहर झांक रहा था और मुस्कुरा रहा था वह थे जनेश्वर मिश्रा .(मुझसे बोले यह सब नाटक है )अंत में राजा राजी हो गए और चुनाव चल निकला .
          एक वाकया और सुन लीजिए बोफोर्स मसले पर देश में जनमन बनाने में राज( बब्बर) की अहम् भूमिका थी .इस पर फिर कभी ..उस राज को वीपी नहीं चाहते  थे कि वह चुनाव प्रचार में आये .राजा न बुलाने का जो कारण बताते थे वह और भी खफ्ती लगता था -लोग कहेंगे चुनाव जीतने के लिए हमने 'ऐक्टर'का सहारा लिया .'संतोष भारती ,संजय सिंह ,सीता जी ...सब परेशान तरीका खोजा गया ,मुझे कहा गया कि तुम बात करो ..मैंने राजा को दो टूक फैसला सुना दिया -मै राज को अपने मंचपर बुला रहा हूँ ,आपसे आपके संगठन से कोइ मतलब नहीं होगा .'राजा चुप रहें 'बहार हाल राज आये और जम कर प्रचार किये .
       एक और - देश के तमाम नेता इस कुम्भ में बगैर बुलाये हाजिर थे ,एक जार्ज को छोड़ कर .और जार्ज आने के लिए तैयार नहीं थे .चूंकि हमारे और जार्ज के रिश्ते सबको मालुम थे इसलिए यह भी जिम्मेदारी हमें दी गयी कि किसी भी तरह से जार्ज को बुलाना है .बहरहाल मैंने जार्ज से बात की और जार्ज आये .मैंने जार्ज से राज बब्बर वाली बात बता दी ,जार्ज गुस्से में आग बबूला ..बोले वीपी राज को महज ऐक्टर ही समझता है क्या ...उसकी तुलना अमिताभ से करता है ? ..ऐक्टर बाद में बना है समाजवादी आंदोलन का लड़का है ,लाठी खाया है जेल गया है .....वगैरह वगैरह और उस दिन फूल बाग की सभा में जार्ज केवल राज बब्बर पर बोलते रहें पीपल के पेड़ के नीचे जहां हम सब बैठे थे ..जार्ज को सुनते रहें और राज को रोता देखते रहें .
      संदीप भाई अगली पोस्ट में आपको बताउंगा प्रधानमंत्री वीपी सिंह का राज काज ,मंडल कमीशन की असलियत और सरकार का गिरना ......

Wednesday, June 27, 2012

यस.पी. : खबर बनाओ ....
यस पी पत्रकार नहीं थे ,पत्रकारिता के कारखाना थे और ऐसा कारखाना जिसके उपयोगी उत्पादन से अधिक कचड़ा निकला .उन कचडों का कमाल कि आज वो खबरों से बेखबर हैं और बाकी से बाखबर .यह उस शख्स का कमाल और जमाल दोनों रहा .इस अखबार बाज से मेरी पहली मुलाक़ात १९७७ में हुई . हमने पहले भी कही कहा है कि ७७ भारतीय समाज का टर्निंग प्वाइंट है राजनीति .पत्रकारिता ,कला साहित्य हर मैदान में उठा पटक जारी है, इमरजेंसी हटा ली गयी है  ,चुनाव की घोषणा हो चुकी है . बनारस से हमारे नेता ,बनारस विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष देव ब्रत मजुमदार चुवाव मैदान में हैं और हम सब उनके साथ हैं .दोसाल की जेल काट कर हम बाहर आये हैं अपने आपको तोप से कम नहीं समझ रहें हैं .जनता पार्टी बन चुकी है लेकिन जनता पार्टी ने मजुमदार को टिकट देना मुनासिब नहीं समझा .चुनाव में मेरे बनाए चित्र ( जेल में बनाए गए ) जगह जगह सड़कों पर लग रहें थे .चर्चा दो जगहों की ज्यादा हुई .एक  मुजफ्फरपुर जहां से जार्ज (जेल में रहते हुए ) चुनाव लड़ रहें थे और दूसरा बनारस .यस .पी से  मेरी मुलाक़ात बनारस में हुई .'यस पी ..'ताप से ताए हुए' थे ( कवि त्रिलोचन जी से उनको उधार ले रहा हूँ ) इमरजेंसी की ज्यादती ,पत्रकारिता की लचर चाल ,समाज में गूँज रहा गुस्सा .यस .पी . को एक मोड़ तक पहुचा दिया .'रविवार' गुस्से का तेवर लेकर मैदान में उतरा .यह पहला प्रयोग था कि आपके पास अगर खबर है तो आओ ,हमें भाषा और व्याकरण नहीं चाहिए इसके लिए हमारे पास अलग का मोहकमा है .रविवार में अशोक सेकसरिया का जो योगदान है वह अविष्मर्णीय है .पत्रकारिता के बंधे -बंधाए खांचे को तोड़ कर 'रविवार ' ने एक नया मुकाम बनाया और बड़ों बड़ों को पीछे ढकेल कर स्वं स्थापित हो गया .
        ७७ में मै बनारस विश्वविद्यालय छात्र संघ का अधक्ष बन गया .संघी घराना  ने इस हार को संजीदगी के साथ लिया और उसकी पूरी कोशिश रहती थी कि किस तरह समाजवादियों को घेरा जाय .यह. पी .के लिए यह अच्छा मौक़ा था .'रविवार ' का एक अंक ही हमारे ऊपर आगया .छद्म नाम से स्टोरी छपी .अच्छी बिक्री हुई .हमारे ऊपर कई आरोप लगे .'असामाजिक तत्वों का ठेकेदार ' लड्कीबाज ,वगैरह वगैरह .( बहुत दिनों तक रविवार का भूत लड़कियों के ऊपर चढ़ा रहा .बाद में उसकी सफाई भी यस पी ने ही दिया .उनमे कई तो अच्छी खासी  पत्रकार ,जहीन और बोल्ड भी रही नाम बता दूँ -दरियाफ्त कर लीजियेगा .आप इन्हें जानते भी होंगे ..अलका सक्सेना और अर्चना झा ....जब इन्हें सच्चाई मालुम हुई तो जम कर ठहाके लगे .यस पी ने कहा हमें तो समाचार बेचना था ..मैंने कहा था 'कसाई !'
      एक दिन यस पी. दिल्ली आगये .दिल्ली में उनका घर 'लफंगों' का अड्डा बनगया .चंचल .रामकृपाल .नकवी ,अजय सिंह .नरेंद्र सिंह .पंकज सिंह ..बहुत नाम हैं भाई .यह उस जमाने की बात है जब दिल्ली की सांझ महफ़िल में कटती थी .मेहमान नवाजी के लिए उदायांशार्मा .संतोष भारतीय ,गौतम नौलखा .मल्लिक साहब आदि व्यवस्थित ढंग से इंतजाम करते रहें ...(आप जिसके बारे में सुनना चाहते हैं वह उन दिनों बैरा की जिम्मेवारी निभाता था ) दिल्ली की हर सांझ यस पी के साथ कटी है ,उनकी शादी के बाद तबदीली आयी ...बहुत से किस्से हैं ..अजित अंजुम ने याद दिला कर गडबड किया है .अम्बरीश जी संदीप् भाई अब कोइ सवाल नहीं .. सांझ होने को है ...काफी हाउस जेरे बहस रहें ..बस 

Saturday, June 23, 2012


दोनों हँस रहें हैं ;उदास केवल मै हूँ

आज  २३ जून है  राज (बब्बर ) का जन्म दिन .हम फिर भी उदास है .आज मेरे बच्चों ने बताया कि काका भाई (राजेश खन्ना की तबियत ज्यादा ही बिगड गयी ,उन्हें अस्पताल ले जाया गया है .अभी कल मैंने डिम्पल जी से बात किया उन्होंने कहा घबराने की कोइ बात नहीं सब ठीक है .लेकिन जब दुबारा अस्पताल जाने की बात हुई तो मै थोड़ा विचलित हुआ .मैंने राज को फोन किया जन्मदिन की बधाई देने के लिए ,राज ने सबसे पहले काका का जिक्र किया ,कहा कि हालत बहुत खराब है बात कर लो .मैंने बात किया जो खबर हमें मिली वह दुखी करनेवाली थी मैंने नरेश जी को कहा कि आप हमें बताते रहिएगा .
मै नास्तेलिगिया में चला गया .एक दिन का वाकया है राज ने हमसे कहा कि यार कल संसद में में हमें बोलना है थोड़ी देर के लिए आ जाओ
कुछ बात कर लिया जाय .हमने कहा ठीक है और मै
रात में आता हूँ ,और रात की शुरुआत अभी शुरू ही हुई थी कि राज का सचिव भागा भागा कमरे में दाखिल हुआ ,जब कि उसे हिदायत दे दी गयी थी कि किसी का भी फोन हो देना मत .राज ने गुस्से से उसकी तरफ देखा .उसने कहा ..साहब काका का फोन है गाली दे रहें हैं .इतना सुनना था  कि हम दोनों का उतर गया .राज ने कहा तुम्ही बात करो ...मैंने फोन पकड़ा .. उधर से आवाज आई ' लीजिए साहिब इससे बात करिये और उन्होंने फोन का चोंगा मेरी नवासी यानी मेरी बेटी की बेटी अनुष्का के मुह के पास लगा दिया .उन दिनों वह बहुत छोटी थी रो रही थी .मै समझ गया कि मामला गंभीर है .मैंने राज से कहा प्यारे मुझे पहुचाओ .उस समय तक राज का ड्राइबर जा चुका था ,राज ने कहा मै तुम्हे उनके घर तक पहुचा दूंगा लेकिन मै अंदर नहीं जाऊंगा .और हम लोधी रोड उनके मकान पर आ गए . काका भाई के घर पर भाग दौड़ देख कर मै हैरान रह गया .मेरी बेटी , उसके जेठ अवधेश जी ,उनके कालेज के दो अध्यापक काका के बैठक में ,और मेरी बेटी की बेटी अनुष्का काका भाई के गोद में ..काका भाए ने एक भी शब्द नहीं बोला बस इतना कि 'साहिब हमें तो बता देते आज आप हमारे साथ नहीं रहेंगे '  मै काका भाई को जानता था ..सफाई देना मतलब फसना ..'सारी' कह कर मै गिलास बनाने लगा .'गिलास ' काका भाई की सबसे बड़ी कमजोरी रही है और आज मै उन लोंगो में नहीं हूँ जो यह कहें कि इस गिलास ने काका भाई को कमजोर किया है .(इसका माकूल जवाब मोटू ने दिया -..'लोग इनको चेहों को परदे पर देखते हैं ,इन्हें हीरो बनाते हैं ,लेकिन यह भी आम आदमी हैं कम लोग जानते हैं ,इसके निर्वहन के लिए इन्हें कितनी कीमत चुकानी पडती है तुम क्या जानो '...) काका भाई गिलास के साथ ज्यादा सही होते थे आज मै दावे के साथ कह सकता हूँ .बहार हाल मेहमान लोग खाना खाए ,हम विदा हुए तब हमें मालुम हुआ कि मेरी बेटी को मेरे घर से लेने काका भाई खुद गए थे क्यों कि उसी रात डिम्पल जी दिल्ली आरही थी और काका का ड्राइवर डिम्पल जी को लेने एयर पोर्ट  गया हुआ था .
      मजेदार घटना मेरे आवास के सामने हुई .मेरे आवास के सामने बरात घर था .उस दिन किसी की शादी थी और बरात वह्व्वं पर पहुची थी जब बगैर किसी कार्य क्रम के मेरी बेटी हमारे आवास पर पहुची थी ,वहाँ ताला देख कर उसने काका को फोन किया था .काका जब  उन सब को उठाने वहाँ पहुंचे तो भीड़ ने उन्हें घेर लिया किसी तरह बच बचा कर हमारे बच्चों ko लेकर घर पहुचे थे ...मै इस लिए याद कर रहा ..अगर वे चाहते तो फोन नहीं उठा सकते थे ..मै वहाँ नहीं हूँ यह बोल सकते थे ..लेकिन ... यह है काका भाई ,,सच बताऊँ मै राज को जानता हूँ आज उसका जन्म दिन है आज वह वह उस तरह से खिला खिला नहीं है जसे पिछले साल था .....


Thursday, June 21, 2012

काका भाई ; जिंदगी कैसी है  पहेली   ........
.......और एक दिन मै काका भाई का कीमती दोस्त हो गया .पांच साल मुतवातिर उनके साथ रहा .सोने के अलावा कोइ वक्त ऐसा न गुजरा होगा जब हम दो पल के लिए भी अलग हुए हों .सुबह का नाश्ता ,दोपहर का खाना ,रात की रात भर चलनेवाली पार्टी ....सब साथ साथ ...रात के तीन बजे हम दस्तरखान पर बैठते थे चार बजे के करीब काका भाई किचेन ठीक करते थे फिर एक पान साहिब ! और जब हम ८१ लोधी रोड से बाहर निकलते थे तो लोधी गार्डन घूमने वालों का हुजूम दिखाई पड़ता था .काका भाई लोधी गार्डन में रहते थे और मै लोधी कालोनी में ,हमदोनो के बीच एक सड़क थी और खुशबूदार पेड़ों की छाँह .एक दिन मजेदार वाकया हुआ हम रात की पार्टी से ठीक ठाक होकर लौटे थे और दरवाजे का ताला खोल रहें थे ,तब तक हमारे पड़ोसी शर्माजी अपने बेटे को जगा कर सुनाराहे थे .. अंकल को देखो मार्निंग वाक् कर के आगये और तुम अभी तक सो रहें हो .....उस दिन मै देर से सो पाया .हमें रेणु ( महान कथाकार ,समाजवाद के पक्के सिपाही ,मैला आँचल और परतीपरिकथा जैसे उपन्यास के लेखक ....) ने अपने संस्मरण में लिखा है कि जिस दिन ज्यादा पी लेता था सुबह जल्दी उठ जाता था लोग कहते थे .देखो आज कल पीना छोड़ दिया है ,जिस रात देर तक लिखता था और सुबह देर से उठता था ,तो लोग कहते थे ,देखो पी के सो रहा है | मैंने काका को फोन कर के रेणु जी की यह बात बताई ,हम दोनों काफी देर तक हस्ते रहे |
काका भाई से मेरी पहली मुलाकात बहुत दिलचस्प वाकया है , दिल्ली में हमारे एक मित्र है नरेश जुनेजा जो कत्तई अराजनीतिक आदमी है लेकिन राजनीति में सबसे जादा दखलंदाजी उनकी रहती है , किसी भी दल का आदमी हो जुनेजा साहब उसके अपने आदमी होते है , हर हप्ते हंगामेदार पार्टी करना उनका शगल है | एक दिन हमें सन्देश मिला कि आज कि शाम कि पार्टी में आप को आना है , और मै पहुच गया पार्टी बड़ी लम्बी थी उनके ड्राइंग रूम में बीसियों बिदेसी राजनायीक मौजूद थे , मै भी उसी में हाजिर हुआ | अचानक मुझे नरेश भाई के चमचे  से एक संदेस मिला कि आप नरेश जी के बेडरूम में चले जाये वहा कुछ लोग आप का इंतज़ार कर रहें है ,मै उस चमचे के साथ नरेश जुनेजा के बेडरूम में चला गया, वहाँ बम्बई के फिल्म इंड्रस्ट्री के कई दिस्तीबुटर, डॉक्टर , और अन्य लोग  अपनी अपनी गिलासो के साथ बा दस्तूर चलू थे , उसी भीड़ में हमारा एक मित्र संतोसानंद भी मौजूद था , ये संतोसनंद वाही है जो मनोज कुमार कि फिल्मो के गीत लिखता रहा है , वो अकेला पड़ा हुआ था क्यों कि वहा संघियो कि भीड़ जादा थी  .हमें देखते ही उसका चेहरा खिल गया ,और उसने एलन कर दिया कि लो अब मेरा वकील आ गया है अब बात करो ,मैंने पूछा कि क्या हुआ भाई आज आप को मेरी ज़रूरत पड़ रही है तो बोले कि यार मै अकेला हूँ यहाँ चड्ढी वालो कि तादाद जादा है मैंने कुछ अति उत्साह में कहा कि भाई हमें लेबिल में आने दीजिए अभी मै निपटता हूँ .मैंने निगाह दौडाया तो उस भीड़ में हमें हमारे दोस्त गिप्पी (नाम है सिद्धार्थ दुवेदी पुत्र हजारी प्रसाद ) दिखाई पड़े मैंने गिप्पी को इशारा किया कि हो जाये और हम दोनों दो ''पटियाला '' के बाद उस भीड़ से मुखातिब हुए और मैंने कहा कि हम इतनी देर से आप सब को सुन रहें थे , हम कोई राजनीति कि बात नहीं करेंगे हम केवल एक बात कहना चाहेगे कि दुनिया कि सबसे बड़े पोस्टर डिजाईनर का नाम मोहन दस करमचंद गाँधी है . भीड़ में सन्नाटा छा गया गाँधी और पोस्टर डिजाईनर ये चौकाने वाली बात थी ही उसमे से एक जो सबसे जादा चहकने वाला चड्ढीधरी था उसने पूछा कि यह नयी बात कहा से आगई तब तक मै रौ में आचुका था ,और मैंने उसे बताना सुरु किया कि आज़ादी कि लड़ाई में गाँधी ने जिस चलती फिरती पोस्टर का इजाद किया उसका नाम है चरखा उस ज़माने में जो चरखा चलता था वो मान लिया जाता था कि वो सुराजी है , और उस चरखे  पर कोई भी प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता क्यों कि यह उत्पादन का स्रोत है ,उस भीड़ में सन्नाटा छा गया ,अचानक बिच में एक आवाज़ उठी - साहिब एक बार इसे फिर दोहरा दीजिए मै देर से आया हूँ ,मेरा नाम राजेश खन्ना है |
राजेश खन्ना से यह पहली मुलाकात थी और अभी तक आखरी नहीं हो पाई है ,आज मेरे वाल पर जब राहुल सिंह ने यह खबर दी कि  राजेश खन्ना कि तबियत ठीक नहीं है तो हमें ये अजीब सी बेचैनी हुयी और मैंने बगैर ये जाने हुए कि राजेश खन्ना हप्तो से बिस्तर पर पड़े हुए है ,न  खा पा  रहें है ,न बोल रहें है , चुप चाप लेते हुए है तो हमने फोन पर बात करने की नाकामयाब कोशिस की जब उनसे बात नहीं हुयी तो मैंने आज यानि २१ को सुबह १० बजे डिम्पल जी से बात किया हाला की डिम्पल जी हमें ढाढस बढाती रही कि नहीं सब ठीक हो जाये गा कंट्रोल में है लेकिन  मै अभी भी बेचैन हूँ , थोड़ी देर बाद राजेश खन्ना कि आवाज़  एक ठहाके के साथ आयेगी, कि हा साहिब हम सब रंग मंच की एक कठपुतलियां है जिसकी डोर उपरवाले की हाथ में है |
मैंने  राहुल को कहा है कि ,काका पर बहुत कुछ है जो मेरे पास है वो मै कल दूगा अपने वाल पर ,क्यों कि मैंने अपनी जिंदगी में इससे जादा खुद्दार इंसान नहीं देखा राहुल कल का इंतज़ार करना |

Tuesday, June 19, 2012

इमरजेंसी का पटाक्षेप हो
इमरजेंसी लगी ,हटी ,कांग्रेस यहांतक कि इंदिरा गांधी ने इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफी माँगी और जो इंदिरा गांधी इमरजेंसी की सबसे बड़ी  खलनायिका थी दो साल के ही अन्त् राल पर हिरोइन बन कर उभरी .
पिछले आलेख में हमने जिन मुद्दों को उठाया था  उस पर बहस न होकर बिपेंद्र भाई ने उसे एक नया मोड़ दिया है हम उसी पर आते हैं .बिपेंद्र जी कहते हैं कि 'आंदोलन का एक मकसद था कांग्रस के एकाधिकार की समाप्ति ' कांग्रेस से निकले तमाम समाजवादियों की यह चिंता शुरुआत से थी .इसलिए डॉ लोहिया बार बार उस एकाधिकार पर हमला करते रहें और सफल भी रहें .६७ में गैर कांग्रेसवाद एक प्रयोग था मकसद ऋणात्मक था  'कांगेस हटे ' .विकल्प क्या और कैसा बने इस पर विसंगतियाँ थी .भारतीय राजनीति में पहली बार साम्यवादी और संघी घराना एक साथ आया और कई सुबो में सरकारें बनी .लेकिन सरकार में कोइ गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ बल्की कुछ मायने ये संविद सरकारे निहायत ही घटिया दर्जे की साबित हुई .सबसे हास्यस्पद स्थिति में समाजवादी रहें .'मालिक' से लड़ते रहें और मालिक के 'चिलमची 'की पालकी ढोते रहें .डॉ लोहिया दुखी हुए थे .जग जाहिर है .वही ज.पी. के साथ हुआ .
      १९५४ में कांग्रेस को क्रांतिकारी बनाने के लिए ज.पी. ने चिट्ठी लिखा था ,तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अधक्ष  पंडित नेहरु को .नेहरु 'सिंडिकेट' से तब भी घिरे थे उन्होंने जोखिम उठाना ठीक नहीं समझा चुनांचे जे.पी. का प्रस्ताव ठंढे बस्ते में चला गया .१९६९ में वही प्रस्ताव कांग्रेस ने  अस्वीकार किया लेकिन इंदिरा गांधी उस पर अड़ी रह गयी .कुल पांच समाजवादी थे इंदिरा गांधी के साथ -चंद्रशेखर ,मोहन धरिया ,कृष्ण कान्त ,रामधन ,अर्जुन अरोरा .कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया .कांग्रेस दो फांक में  बंट गयी .इन्दिकते और सिंडिकेट .१९७४,७५ तक आते आते जे.पी . को अपने ही खिलाफ होना पड़ा .कांग्रेस में जो समाजवादी विचारधारा के धुर विरोधी थे ,दकियानूसी थे भारत की बागडोर उन्ही के हाथ में सौपना पड़ा .मोरार जी भाई ,nईलम संजीव रेड्डी ,.. आदि आदि .और समाजवादियों ने एक बार फिर 'चिलाम्चियों' की पालकी उठाने में अपने को गौर्वानित महसूस किया .
      बिप्पेंद्र जी !७७ भारतीय राजनीति का टर्निंग प्वाइंट है .इस पर गौर कीजियेगा .. प्रतिपक्ष जो अब तक पुरुषार्थ की राज नीति कर रहा था वन अनुदान की राजनीति पर उतरने को मजबूर हो गया .राजनीति में गणित का प्रवेश हुआ उसका खामियाजा आज तक जनता भुगत रही है .बिपेंद्र जी हम आपके भावात्मक लगाव से वाकिफ हैं .हम भी आंदोलन के साथ रहें हैं दो साल की जेल  काटी है .सबकुछ बहुत नजदीक से देखा है .कांग्रेस को भ्रष्ट होने में पचास साल लगे हैं और प्रतिपक्ष पांच दिन भी नहीं चल सका बगैर भ्रष्टाचार के .
       एक छोटा सा सवाल पूछ कर हट जाना चाहूँगा -७७ के बाद आमजन के सवाल पर कोइ आंदोलन हुआ ? क्या हम ७७ के बाद बगैर किसी सवाल के बेहतर जिंदगी जी रहें हैं ? इसका जिम्मेदार कौन है ? संदीप जी ! मै अपनी तरफ से इस् विषय पर विराम दे रहा हूँ ...
 

Monday, June 18, 2012

फिर से वही बवाल .......
'सो रहा था चैन से ,ओढ़े कफ़न मजार में .फिर आगये सताने ,किसने पता बता दिया ........ शहर छोड़ा ,भाग आया गाँव .न रेडियो न टेलीविजन .बस एक अखबार 'द हिन्दू ' और मेरा लैप टॉप .अच्छी हवा .दमदार गर्मी .सुबह  नाश्ते में 'माठा' दोपहर में अरहर की दाल के साथ देशी घी चूल्हे पर सेंकी रोटी .लोंगो को छेड़ना और खुद 'कुछ ' सुनना .बस एक ही शगल ...अचानक अभी परितोष जी ( परितोष चक्रवर्ती .. संपादक लोकायत ,कहानीकार ,आलोचक ) के नए उपन्यास ' प्रिंट लाइन ' के प्रकाशित होने की सूचना मिली .यह उपन्यास ज्ञानोदय से प्रकाशित होरहा है (ज्ञान मंडल ) हमें बताया गया कि इस उपन्यास  के सारे पात्र सचमुच वाले हैं और उन्हें नाम ब नाम ,जो जैसा है जस का तस दिया गया है .चुकी परितोष दादा से हमारे भी ताल्लुकात रहें हैं साथ साथ काम भी किया है इसलिए  मै अपने बारे में सोचने लगा .अगर सचमुच जस का तस दिया गया होगा तो मै .... मै तो उघार हो जाउंगा .. लबे सड़क .सब जानते हैं मै लिखने में बहुत काहिल रहा हूँ और दादा जब भी मुझसे 'कुछ' लिखवाना चाहते तो हम दोनों कुछ देर के लिए किसी विषयान्तर पर चले जाते .. थोड़ी देर बाद दादा मुस्कुराते और कहते आज मेरे पास बहुत अच्छी 'चीज' आयी है .मैंने उसे तुम्हारे लिए रखा हुआ है .फला आदमी फला जगह से आ रहा था ,वहाँसे लाया  है . जब कि मै जानता था दादा झूठ बोल रहा है ,इसे दादा ने खुद खरीदा है ....' उस किताब में यह भी तो नहीं है ? दादा रायपुर से दिल्ली आये तो उन्हें दिल्ली की सच्चाई नहीं मालुम थी .एक दिन हमने ककहा कि दादा यह बहुत खोखली जगह है ,यहाँ बस हवा पानी है .ये जो लिख्खाड बड़े बड़े बोर्ड लगाए बैठे हैं इनका खेल दूसरा है .एक दूसरे की पीठ ठोंकना इनका काम है .पुरष्कार ,सम्मान, गोष्ठी ,सब बैठे बैठे तय होती है .दिल्ली के बाहर इनका डंका गूंजता है .हमने उन्हें एक वाकया सुनाया .एक बार भारती जी (धर्मवीर भारती -संपादक धर्मयुग ) का सन्देश मिला कि मै दिल्ली  की साहित्यिक गतिविधियों पर एक रपट लिखूं .और मैंने लिख दिया .उस पर हमारे कई दोस्त नाराज हो गए .हमने एक घटना का जिक्र कर दियाथा .एक साहब जो 'सारिका' में मुलाजमत करते थे और लेखक भी माने जाते रहें .उनकी एक कहानी का ऐलान हुआ कि अगले अंक में आप इन्हें पढ़ें .कहानी कम्पोज हुई पेज बना लेकिन एन वक्त पर किसी कारण कहानी नहीं जा पाई .लेकिन डाक से बहुत सारे पत्र उस कहानी की तारीफ़ में आ गए ...'दादा ने कहा क्या वाकई ऐसा होता है ? हमने कहा अक्सर ऐसा होता है ..दादा ने उसको आजमाया भी मै नहीं जानता उन्होंने इनका जिक्र किया कि नहीं ..लेकिन दिल्ली के बड़े नामो से दादा मायूस हुए थे यह मै जानता हूँ ..

Sunday, June 17, 2012

जार्ज की शख्सीयत
चर्चा इमरजेंसी पर चल रही थी .संदीप जी एक बुनियादी सवाल उठाया ...इमरजेंसी की असल तस्वीर क्या है .? यह सच है कि जब हम इमरजेंसी की बात करते हैं तो किसी गफलत बस या जान बूझ कर २६ जून १९७५ के पहले की घटनाओं को भी उसमे शामिल कर  लेते हैं .जब वे सब इमरजेंसी के कारक तत्व हैं .जे.पी. जनशक्ति के प्रतीक बन कर उभरे और श्री मती गांधी राज शक्ति की .राज शक्ति ने आंदोलन को रोकने या समाप्त करने के लिए इमरजेंसी लगाया .उस इमरजेंसी से कैसे लड़ा जाय ? यही सवाल है जिस पर अबतक चर्चा नही हो पाई है .क्यों कि जब इस बुनियादी सवाल पर बात होगी तो कई 'राज' खुलेंगे .और अनुत्तरित सवाल  इतिहास के कई पन्नों को उघार कर देंगे .मसलन ..
          ०- इस आन्दोलन की असल भूख क्या थी ? इंदिरा गांधी या कांग्रेस को सत्ता से हटाना या कोइ नई व्यवस्था देना ?
           ०- यह आंदोलन व्यक्तिगत रूप से इंदिरा गांधी ब हैसियत व्यक्ति के खिलाफ था या कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ था ?
            ०-इस आन्दोलन में साम्यवादियों  का रुख और उसके पीछे  का इरादा क्याथा ? क्या भारत में साम्यवाद को फैलने देने में कांग्रेस हुकूमत सहूलियत देती है ? बाकी दल इनके लिए चुनौती बनते हैं ? या जहां संघ रहेगा वहाँ साम्यवादी नहीं जायंगे ?
          ०- जे.पी. आंदोलन की सोच सीमित थी जिसमे यह भी नहीं सोचा गया था कि सत्ता  की तरफ से इमरजेंसी जैसी चीज भी लगाई जा सकती है ? और अगर यहाँ तक सोचा जा चुका था तो अगली रणनीति क्या थी ?
          ०- साकार सारे नेताओं को गिरफ्तार भी कर सकती है तो आगे की कमान किसके हाथ में रहेगी ..और उसका कार्यक्रम क्या होगा ?
          ये अनुत्तरित सवाल हैं .इन सारे सवालों का एक जवाब है -जार्ज  और जार्ज चुनौती बन कर श्री मती गांधी के सामने खड़ा होता है .इस लिए इंदिरागांधी अपनी पूरी ताकत के साथ जार्ज को खत्म करने पर आमादा होती हैं .इंदिरा गांधी की यह खूबी रही है और कमजोरी भी कि वह किसी को भी अपने सामने तन कर खड़ा हुआ देखना नहीं चाहती थी .इसलिए जार्ज और जार्ज के परिवार के साथ वह सब कुछ हुआ जो नहीं होना चाहिए था .उसके तफसील में नहीं जाउंगा .महज उन सवालों पर बात करूँगा जिसकी आड़ में आज इमरजेंसी भुनाने वाले तमाम नेता अपना चेहरा छिपा लेते है .
        य्हान्दोलन उद्द्येश्य हीन था .अगर कोइ 'सम्पूर्ण क्रान्ति 'की बात करता है तो वह पाखंडी है ,क्योंकि संपूर्णक्रांति अभी तक परिभाषित नहीं हो पाई है .अगर उसकी तुलना डॉ लोहिया के 'सप्त क्रान्ति' से की जाय तो और भी बेमानी होगी .
        यह आंदोलन समाजवादियों की जमीन पर खड़ा हो रहा था जिसके साथ संघी घराना "बर् मरे ,या कन्या ..दक्षिणा से मतलब' वाले तर्ज पर बरात की मानसिकता में गाते बजाते चल रहें थे .(ऐसे लोग जब पकडे जाते हैं तो ....'साहेब  गलती हो गयी .. ज्यादा हो गयी थी ..अब भविष्य में ऐसा नहीं होगा .. हमका माफी देयिदो साहेब !..इमरजेंसी में लिखा इनका माफी नामा इनके माथे पर लगा एक कलंक और है )
         अगर कोइ दल यह कहकर भागना चाहे कि उसके सारे नेता जेल में थे आंदोलन कैसे चलता तो इसका भी जवाब जार्ज ही देते हैं .डैनामाइट कांड से दुनिया के जितने भी .जनतंत्र के पैरोकार थे सब जार्ज के साथ उतर आये .और जार्ज की जीत हुई .लेकिन जार्ज के मन में जो कड़वाहट एक बार भरी वो आज तक नहीं निकली .बिपेंद्र जी ( इसमें हमलोग भी शामिल रहें हैं ) ने आपत्ति दर्ज किया है जार्ज का 'संघी' घराने से जुडना .बहुत कम लोंगो को मालुम है कि इस मुद्दे पर जार्ज को अपने लोंगो से कितना सुनना पड़ा है .यह सब कभी मीडिया में नहीं गया .हर बार जार्ज का एक ही जवाब रहता -बोलो किसके साथ जायं ..अकेले चलने की हिम्मत नहीं है ..समाजवादी आंदोलन बिखर चुका है ,एक दूसरे प्रति हम इतने पूर्वाग्रही बंचुके हैं कि इन्हें जोड़ा नहीं जा सकता ..तुम्ही बताओ क्या करूं ..?
      विषयान्तर कर रहा हूँ - जार्ज फिसलकर गिर गए थे दिमाग के अंदरूनी हिस्से में चोट लगी थी .बंबई में आपरेशन हुआ था ,मै गया मिलने हमारे साथ जार्ज के पुराने साथी रंजित भानु भी थे .हमें बाहर रोक दिया गया कहा गया कि थोड़ा रुक जाइए अंदर कुछ जरूरी बात हो रही है .हम बाहर बैठ गए ,थोड़ी देर बाद अंदर से लालकृष्ण अडवानी और जया जेटली बाहर निकली .हमने रंजित को कहा ' यह ..ले डूबेगी ..जार्ज को ' और वही हुआ .
      जार्ज के साथ बहुत सारी यादें हैं अगली पोस्ट में ....

Saturday, June 16, 2012

२६ जून,  प्रतिपक्ष नपुंशक है की कहानी कहता है ---------
अभी अभी जापान से स्वस्ति जी ने एक सवाल पूछा है -इमरजेंसी के बारे में .ब्राजील की वीरा रईस की उत्सुकता है 'इमरजेंसी '? इलाहाबाद पुलिस और अदालत ने मिल कर सीमा आजाद और उनके पति विश्वविजय को किताब रखने और पढ़ने के जुर्म(?) में आजीवन कारावास के सजा पर २६ जून से किसी आंदोलन की शुरुआत करने की बात हो रही है ,यह सूचना हमें नीलाक्षी जी से मिली .गो कि इस विषय पर अम्बरीश जी ,वीरेंद्र यादव जी ,संदीप वर्मा जी ,प्रमोद जोशी जी ,....तमाम लोग जो संवेदन शील हैं इस फैसले पर दुखी हैं .अर्चना झा गुस्से में हैं .. जुगनू शारदेय ने तो इस अदालत को रंडीखाना तक कह डाला.( आप मेसे बहुत से लोग जुगनू शारदेय को भूल चुके होंगे ,जुग्नूजी पत्रकार ,साहित्यकार .फिल्म निदेशक और खुल्लम खुल्ला लड़ाई लड़ने वाले जांबाज हैं .जिन्हें सच कहने में कोइ परहेज नहीं रहा है ) मै व्यक्तिगत तौर पर नीलाक्षीजी से अनुरोध कर रहा हूँ कि आप मेहरबानी करके किसी आंदोलन की शुरुआत २६ जून से मत करियेगा .क्यों ? वह मै बताना चाहता हूँ .एक दिन संदीप वर्मा ने हमें छेड़ा (यह उनकी आदत है और हमें उनकी यह आदत पसंद है ) २६ जून जिस दिन इमरजेंसी लगी कुछ लोग उस दिन को त्यौहार की तरह मनाते हैं ..संदीप जी ने चिकोटी काटा -त्यौहार मनायेगे क्या ? हमने कहा नहीं ,लेकिन असलियत बतायेंगें ..यह 'सुलेख' उन तमाम दोस्तों के नाम है जो जैल के बाहर थे और जैल की जलालत झेल रहें थे ,जो अंदर थे वो आजाद होकर गए थे ,आजादी से रह रहें थे और आजाद  की तरह जैल से बाहर आये .लेकिन इसकी सच्चाई तो जाने ..
      पिछले आलेख में हमने बताया कि ७३ में अहमदाबाद से बच्चों का एक आन्दोलन शुरू हुआ समोसा के बढे दाम की वजह से .इसमें कई और बाते जुड़ती गयी .नाकारा प्रतिपक्ष ,सिंडिकेट ताकतें ,समाजवाद से त्रस्त पूजीवादी घराने (६९ नेकीरामनगर कांग्रेस का फैसला जिसने तमाम पूजीपतियों की चूलें हिला दी थी ) सब एक साथ हो गए .जे. पी. पर दबाव पड़ा और वो भी इस आंदोलन में कूद पड़े .यहाँ एक विषयान्तर कर रहा हूँ - जे पी. ४७ के हीरो हैं ,हजारीबाघ जैल लांघ कर भागे हुए बहादुर सेनानी हैं ,गांधी के चहेते हैं लेकिन साथ के दसक तक आते आते भुलाए जा चुके हैं .डॉ लोहिया प्रतिपक्ष की राजनीती में एकमात्र चमकते सितारे हैं लेकिन असमय ही मृत्यु सैया पर हैं .दिन में प्रभावती (जी पी. की पत्नी ) रात में जे.पी. लोहिया की देखभाल कर रहें हैं एक दिन डॉ लोहिया ने  जे. पी. से कहा -तुम इतिहास में ज़िंदा रहना चाहते हो तो एक बार जेल जरूर चले जाना ..... / १२ जून ७५ को जगमोहन सिन्हा का फैसला आया इंदिरा गांधी के खिलाफ  और इमरजेंसी लग गयी .
         नीलाक्षी जी ! अब देखिये आज जो लोग इमरजेंसी को भुनाना चाहते हैं उनकी शक्ले कितनी घिनौनी है .इमरजेंसी २६ जून को लगी ,२६ जून के बाद इमरजेंसी के खिलाफ कोइ लड़ाई हुई ? नहीं .. इमरजेंसी के खिलाफ अगर कोइ लड़ा तो व्यक्तिगत तौर पर जार्ज हैं 'दाइनामाईट कांड ' जिसमे एक पत्रकार  के. विक्रम राव  भी शामिल रहें हैं जिनका जिक्र आज अम्बरीश भाई ने किया ...
         नीलाक्षी जी आपातकाल प्रतिपक्ष के लिए नपुंशक राजनीति का दिन है .साम्यवादियों ने तो पहले ही हथियार डाल दिए थे ,संघियों ने घुटने टेक कर माफी नामा भेजा ..लड़ाई तो कांग्रेस से निकले समाजवादी कांग्रेस ने ही लड़ा ..
      आख़िरी बात कह दूँ ... कांग्रेस का विकल्प कांग्रेस है ....प्रमोद जोशी जी आगे आप बता दें ..

Monday, June 11, 2012

समोसा से सरकार तक भाग २
कालेज कैंटीन के समोसा का बढ़ा दाम गुजरात को घेर लिया .और देखते देखते देश के अन्य हिस्सों में भी आंदोलन जोर पकड़ने लगा .उत्तर प्रदेश सबसे बाद में मैदान में उतरा .जे. पी .पर दबाव पड़ा कि वे इसका नेतृत्व अपने हाथ में ले लें .लेकिन जे.पी. हिचक रहें थे .यह उस वक्त की बात है जब जे.पी. राजनीति से ओझल हो चुके थे .अपनी पीढ़ी में जे.पी. भले ही अपने रुत्वे पर कायम थे लेकिन अगली पीढ़ी उनसे अनजान थी और जे.पी. इससे वाकिफ थे .जे.पी के सामने दूसरी दिक्कत थी प्रतिपक्ष की बिखरी हुई ,एकदूसरे टकराती हुई राजनीति ( ६५ में बना डॉ लोहिया का गैर कांग्रेस वाद ७२ तक आते आते बिखर चुका था ) इन सबको एक पगहे से बाँधना आसान नहीं था .लेकिन सरकार के खिलाफ जनता का गुस्सा अपने शिखर पर था जेपी इससे वाकिफ थे .तो जब संघी घराने ने कांग्रेस के खिलाफ (जो कि उसका स्थाई भाव है ) छात्र आंदोलन में उतरने और जेपी को अपना नेता मानने की घोषणा कर दी तो जेपी को थोड़ी सहूलियत मिली क्यों कि संघी घराना शुरू से ही जे पी के खिलाफ रहा है ,और उनपर कई बार हमला तक कर चुका था .समाजवादियों पर जे.पी. को भरोसा तो था लेकिन एक जिच भी थी .. जब एन वक्त पर जे पी. पार्टी छोड़ कर सर्वोदई बन गए थे ..लेकिन जब जार्ज ने जे.पी. से खुल कर बात की और आंदोलन में उतरने को कहा तो कुछ शर्तों के साथ तैयार हो गए .और आंदोलन व्यवस्थित ढंग से शुरू हुआ .आंदोलन अहमदाबाद से उठकर पटना के कदम कुवां आगया .'न मारेंगे न मानेगे ' हमला चाहे जैसे होगा ,हाथ हमारा नहीं उठेगा ' और आंदोलन चल पड़ा .अब उन नामो को सुनिए जिन्हें इस आंदोलन ने बुलंदी दी उसमे लालू.पासवान .शिवानंद तिवारी ,नीतीश ,लालमुनी चौबे ,आदि आदि ...( मुआफी चाहता हूँ नाम बहुत है लेकिन मै उन नामो का जिक्र कर रहा हूँ जो उठने के पहले ही भसक गए ) बहरहाल आंदोलन बे काबू होने की तरफ बढ़ने लगा .इसी बीच एक घटना और हो गयी .इंदिरा गांधी के खिलाफ राज नारायण की चुनाव याचिका न्यायालय में थी और उसका फैसला आगया .इंदिरागांधी दोषी पायी गयी ,उनका चुनाव निरस्त हो गया ६ साल के लिए चुनाव लड़ने की मनाही हो गयी .और वह आज के ही दिन यानी १२ जून को हुआ था .उस दिन वी पी सिंह इलाहाबाद में ही थे और अपने आवास 'ऐश महल;'में सो रहें थे ...
इमरजेंसी  ?
कभी अहमदाबाद जाना हो तो वहाँ दो दो लोंगो के बारे में दरियाफ्त करियेगा .मनीषी जानी और उमाकांत माकन .जिस आंदोलन को आज जे.पी. आंदोलन कहा जाता है उसकी नीव में ये दो चेहरे है .मनीषी गुमनामी में चले गए हैं और हमारा दोस्त उमाकांत माकन कांग्रेस में है .१९७३ का वाकया है साइंस कालेज के मेस में अचानक समोसे का दाम बढ़ गया .बच्चों ने विरोध किया .विरोध बढ़ता गया और मामला सरकार तक चला गया .उस समय गुजरात में चिमन भाई की सरकार थी छात्र आंदोलन से निपटने के लिए सरकार ने हिंसा का सहारा लिया जिसके चलते पूरे देश विशेषकर उत्तर भारत बौखला गया .उन दिनों मै विश्वविद्यालय में समाजवादी युवजन सभा का संयोजक था . छात्रसंघ के पूर्व  अध्यक्ष देवब्रत मजुमदार ने हमसे कहा कि तुम्हे अहमदाबाद जाना है ,जार्ज(फर्नांडिस) वहा पर मिलेंगे .मै गया और भाषण देते समय पकड़ लिया गया .तुरंत छूटा भी पर कैसे वह मजेदार वाकया है ,विषयान्तर हो रहा है लेकिन तब की राजनीति समझने के लिए जरूरी है ...पुलिस हमें लेकर थाने पहुची ही थी कि इतने में कहीं से राज नारायण जी को पता चल गया कि हमें पुलिस ने पकड़ लिया है .एक अम्बेसडर कार से नेता जी आये और आते ही पुलिस से पूछा .- कौन है जी ..बनारस से येहां आ गया .. बुलाओ तो ...नेता जी इतना ताबक् तोड़ बोल रहें थे कि पुलिस वाला कुछ समझ ही नहीं पाया और उसने हमें नेता जी के सामने कर दिया फिर क्या था नेता जी  गुस्से में लगे चीखने (यह उनका स्थाई भाव था जिसके चलते हमारी तरह के कई लोग पुलिस से बचे हैं )..चुतिया हो .. यहाँ आने की क्या जरूरत थी .. क्रांतिकारी बनते हो ...ये तो समझो ये बेचारा (इशारा पुलिस की तरफ था ) शरीफ है ..नालायक चलो बैठो गाड़ी में .. अभी बताता हूँ ..और उनका 'बताना'इतनी जल्दी संपन्न हो गया कि पुलिस वाला जब तक समझा होगा हम उसकी जद से काफी दूर आचुके थे .
       यह वही आंदोलन है समोसेवाला जिसने इतिहास रच दिया .कल बताएँगे इस आंदोलन में जे.पी. कैसे कूदे ?
एक कार्टून और फंसा  सियासत में
अभी अम्बेडकर ,संविधान बनने की गति ,और जनता की उत्कंठा को ले कर बने शंकर पिल्लई के कार्टून का विवाद थमा भी नहीं की 'अंग्रेजी हटाओ 'के विरोध में दक्षिण भारत की प्रतिक्रया पर आर . के . लक्ष्मण .का बनाया हुआ कार्टून विवाद में आगया .अभी तक करुणा निधि और वाइको का विरोध आचुका है .उनका कहना है की इस कार्टून से यह सन्देश जाता है की दक्षिण भारत के लड़के अंगरेजी नहीं जानते .१० जून और ११ जून के हिन्दू में इस पर लंबी चर्चा चली है .इस समूचे प्रकरण में जो मुद्दे उभर रहें है  उन गांठों को खोलना जरूरी है .
      अगर आपको याद हो तो आजादी की लड़ाई में एक भी ऐसा मुद्दा नहीं था जिस पर कांग्रेस ने अपनी राय न स्पष्ट कर दी हो . इसमें एक मुद्दा था राष्ट्र भाषा का .कांग्रेस ने 'हिन्दी' को राष्ट्रभाषा के रूप में इसे स्वीकार कर लिया .गांधी हिन्दी के सबसे बड़े पैरोकार थे .दक्षिण को और कई गैर हिन्दी इलाको को यह समझाया गया की हिन्दी हम पर थोपी जा रही है .चुनांचे इसका विरोध हुआ .१९३९ में तमिल नाडू इसके विरोध में उतरा लेकिन आजादी के जूनून में यह विरोध ज्यादा मुखर नहीं हो पाया .आजादी के बाद डॉ लोहिया ने जब भारतीय भाषा को बहस के केन्द्र में रख कर अंगरेजी हटाने की बात कही तो दक्षिण ने उसका गलत अर्थ निकाला कि हम पर हिन्दी थोपने की बात हो रही है .डॉ लोहिया के भाषा नीति पर समूचा देश आंदोलित हुआ .और सच कहा जाय तो आजादी के बाद यह पहला सवाल था जिस पर समूचा मुल्क कसमसाया .और नौजवानों की एक नई खेप राजनीति में सक्रीय हुई .उत्तर भारत में 'अंग्रेजी हटाओ 'एक बड़ा मुद्दा बना .उत्तर भारत के सारे शिक्षण संस्थान इसके घेरे में आ गए .बनारस विश्वविद्यालय इसका केन्द्र बना .देवब्रत मजुमदार ने जिस हिम्मत और दिलेरी के साथ इस आंदोलन की अगुआई की वह आज तक एक नजीर बनी हुई है .इलाहाबाद से श्याम पांडे ,नरेंद्र गुरू ,नरेंद्र देव पांडे ..बहुत सारे नाम है ...समाजवादी आंदोलन में जनेश्वर मिश्रा और आनान्देश्वर सिंह के बाद यह नई पीढ़ी आरही  थी .गोरखपुर से कल्पनाथ राय ,मेरठ से सत्यपाल मलिक बनारस से मार्कंडेय सिंह ,आनाद कुमार ,राम बचन पांडे ..
     उधर गैर हिन्दी इलाको में इस आंदोलन को गलत ढंग से पेश किया गया .उन लोंगो को यह स,म्झाया गया कि उत्तर भारत के लोग आप पर हिन्दी थोप रहें हैं .इसी विषय को लेकर आर. के. लक्षमण ने कार्टून बनाया .वही कार्टून फिर विवाद में आ गया है .हमारे मित्र वाइको जो कि एक दमदार और निर्भीक नेता हैं इस मुद्दे को लेकर मैदान में कूद चुके हैं .लगता है यह दौर ही कार्टून के विरोध का दौर है .

Tuesday, June 5, 2012

राजनीति में 'इच्छाशक्ति' और ' जोखिम '....मर चुकी है .
बिहार की ताजा घटना क्रम में एक बहस जारी है -बिहार की बीमारी और उसका इलाज .'काफी हाउस ' में पंकज श्रीवास्तव और संदीप् वर्मा ने जो सवाल उठाये हैं उसी पर विस्तार चाहता हूँ .
      बिहार को 'जातीय' कटघरे में खड़ा किया जा रहा है ,हमने असहमति जताई .......भट्टाचार्या ने इसका जिक्र किया है , सतही तौर पर देखा जाय तो सच भी लगता है लेकिन यह सच नहीं है .यह उसी तरह की बात हुई जैसे किसी के पैर में काँटा चुभा हो और उसे लंगड़ा मान लिया जाय .बिहार की 'तबियत' उसकी तमीज ,तहजीब बड़े 'दिल' की रही है .देश का कोइ भी भाग उसके मुकाबले में नहीं खड़ा हो सकता .अगर बिहार जाति  के कटघरे में कैद रहता तो एक मंग्लोरियन क्रिश्चियन जार्ज फर्नांडिस लगातार बिहार से न जीतते .एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण मधु लिमये बार बार बांका से न चुने जाते ,एक सिंधी जे. बी. कृपलानी .को बिहार संसद तक नहीं पहुचाता .( ख़याल रखियेगा हमने जिनका और जिन क्षेत्रों का जिक्र किया है यह कास्मोपालिटन शहरी इलाका नहीं है धुर गंवई इलाका हैं ) जबलपुर के हमारे दोस्त शरद यादअव आज तक उसी बिहार से जीत रहें हैं .बिहार पुरुषार्थ को अपनाने वाला सघन प्रदेश है .उसने जाति तोड़नेवाले दो बेहतरीन मुख्यमंत्री दिए हैं -कर्पूरी ठाकुर और चचा अब्दुल गफूर .लेकिन आज सियासत ही ऐसे बौने और नपुंशक नेतृत्व (?) की रखैल हो गयी है की उसमे किसी नयी पौध की सोच ही बेमानी लगती है .
   पंकज जी और संदीप भाई ने नेतृत्व में 'इच्छा' शक्ति और जोखिम का जिक्र किया है .यहाँ इंदिरा गांधी का जिक्र हुआ .की किस तरह इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीय करण किया प्रिविपर्ष को समाप्त किया ....हमें लगा की यह सही वक्त है और सही समय भी की हम इस 'जोखिम 'के इतिहास को भी खंगाल लें .आजादी के बाद कांगेस के अंदर जमे बैठे समाजवादी कांग्रेसी खेमा इन्ही मुद्दों को लेकर मुखर था ,नेहरु इस खेमे के साथ थे लेकिन पटेल  जिनका संगठन पर सबसे ज्यदा पकड़ थी ,के सामने नेहरु मुखर नहीं होते थे .बापू समाजवादियों के पक्षधर हो चुके थे .( गांधी के ही सुझाव 'कांग्रेस का अध्यक्ष किसी समाजवादी को बनाओ ' पर आचार्य कृपलानी अध्यक्ष बने थे ,गो की बापू का कहना था आचार्य नरेंद्र देव को बनाया जाय ) अचानक गांधी की ह्त्या हो गयी .और समाज्वादीबे बाप के हो गए . नेहरु की कोशिश रही की समाजवादी वापस आजाय .१९५२ के चुनाव ने समाजवादियो को और भी निराश किया .१९५४ में जे .पी.ने नेहरु को एक चौदह सूत्रीय प्रोग्राम भेजा .. जिसमे जमीन का बटवारा ,बैंकों का राष्ट्रीयकरण ,प्र्विपर्स की समाप्ति आदि आदि शामिल रहा .इन कार्य क्रमों से सहमत होने के बावजूद नेहरु उसे कार्य समिति यक नहीं ले जा सके ,जिसे १९६९ नेकीराम कांग्रेस में इंदिरा गांधी ने उठाया और पार्टी टूट गयी .( सच यह है की इंदिरा गांघी को पार्टी से बाहर कर दिया गया एक तरफ कामराज ,निजलिंगप्पा .नीलम संजीव रेड्डी .चंद्रभानु गुप्त .यस के पाटिल मोरार जी भाई एक तरफ और पान्म्च समाजवादियों-चंद्रशेखर,मोहन धरिया ,कृष्णकांत ,अर्जुन अरोड़ा ,और रामधन के साथ इंदिरा गांधी .लेकिन अपने प्रस्ताव पर इंदिरा गांघी डटी रही और महज चुनाव ही नहीं जीती राजनीति का बिसात ही पलट गया ..आज बिहार को एक दमदार नेतृत्व की जरूरत है लेकिन आज बिहार क्या समूचा देश ही 'दुम दारों 'की जेब में है .. फिर भी हम निराश नहीं हैं ..

Monday, June 4, 2012

बच्चों की किताबों का मेला
'किताबों में बिल्ली ने बच्चे दिए हैं 'सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता है जो उन्होंने बच्चों के लिए लिखी है .हमने जब बच्चों के किताबों का मेला लगाने की रूप रेखा शुरू बनानी शुरू की तो महिला मित्रों से संपर्क साधा . फेस बुक पर पहली रूप रेखा दिया तो सबसे पहले ब्राजील की वीरा रईस  और संदीप वर्मा ने उत्साहित किया . चंडी भारती ने हिस्सेदारी करने की इच्छा जाहिर की हिन्दी के प्रसिद्ध कथाकार डॉ. काशी नाथ ने इसमें भाग लेने की अनुमति दी . डॉ. मंजुला चौधरी ,काशी विद्यापीठ के प्रो. सुरेन्द्र प्रताप ,डॉ. अवधेश सिंह ,असलम परवेज खान , प्रसिद्ध चित्रकार मोहम्मद इलियाश ने बच्चो के साथखेलने की सहमति दी .हमने हिन्दी के प्रसिद्ध प्रकाशक अशोक माहेश्वरी (राज कमल ,राधा कृष्ण.और लोक भारती प्रकाशन ) से बात की उन्होंने बच्चों की किताबों का पूरा jakheeraa ही भेज दिया .
          देखते हैं क्या होता है ? संदीप वर्मा ने सुझाया है की बच्चों को किताब आदान प्रदान की सुविधा मिले जिससे वो एक ही किताब तक महदूद न रहें ,एक किताब पढ़ कर उसे बदल कर दूसरी ले जाय .
     बच्चे कहानी लिखते हैं
     बच्चे चित्र बनाते हैं
     बच्चे खेलते हैं
     बच्चों की दुनिया देखी जाय .

Sunday, June 3, 2012

बच्चों की किताबों का मेला
'किताबों में बिल्ली ने बच्चे दिए हैं '
'देखी तेरी दिल्ली' बोला और दिल्ली को अलविदा कह दिया .और आगया गाँव .पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक गाँव .देश के अन्य गांवों से थोड़ा अलहदा इसकी तस्वीर है .गरीबी है .ग़ुरबत है . लेकिन गैर बराबरी कम है .यहाँ बेचैनी नहीं है ,न तड़प है .लोग जी रहें हैं तो जिए ही जा रहें हैं .सरकार भरपूर कोशिश कर रही है 'विकास'(?) का विस्तार हो ,योजनाये आरही हैं ,जनता मुह बाए देख रही है .रकम आ रही है ,मिल बाँट कर खा रहें हैं .सरकार कहती है जनता अपना हिसाब देखे उसपर नक्लेल लगाए जनता कसमसाती जरूर है लेकिन 'ऊपर भी तो येही हो रहा है ' कह कर संतोष कर ले रही है .एक दिन मन में आया कुछ किया जाय ....चाचे तो चोर और मुह्मोट हो ही चुके हैं भतीजों को देखा जाय .हमने एक सवाल उठाया -बच्चों के लिए क्या किया जाय ? कई महिला मित्रों से राय ली .(पुरुषों से बाद में .. कारण भी बाद में बताउंगा ) दीदी (सुमीता चक्रवर्ती ,जानी मानी चित्रकार .मूर्तिशिल्पी .और सबसे बड़ी बात संवेदन शील है .बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और शान्ति निकेतन से प्रशिक्षित हैं ,बच्चों से जुड़ी रही हैं , विश्वविद्यालय (B.H.U.) की अध्यापकी छोड़ कर अपने घर पर ही रह कर बच्चों को चित्रकारी सिखाती हैं )ने सुझाया बच्चों की किताबों का मेला लगाओ ....बात में दम था .और उस पर मै काम करने लगा .लेकिन जबर दस्त निराशा हाथ लगी .यहाँ गाँव में लोंगो की इच्छा शक्ति ही मर चुकी है .हमसे कई तरह के सवाल पूछे गए -
       -इससे क्या होगा ?
       -कोइ आएगा भी ?
       -किताबें कहाँ से आयेगी ?
     - कौन खरीदेगा ?
      -कोर्स की किताब पढ़ने से बच्चों को फुर्शत ही नहीं .....किताब खरीदेंगे ?
     -खर्चा कौन देगा ? वगैरह वगैरह और सबसे मजेदार टिप्पणी तो आड़ से मिली ' ये मुह और मसूर की दाल ?' बाप मरा अधिअरिया बेटा पावर हाउस ?' कोइ सरकारी योजना मारा होगा .. कुछ नकुछ तो दिखानाही होगा ..' चूतियापा है .. खाली दिमाग सैतान का घर ..' भसक जाने  के लिए इतना काफी था .लेकिन मैंने सोचा और राय लूं ...हमारी एक दोस्त लन्दन में रहती है साधना ..दस्तकारों के साठ काम कर चुकी है उससे बात की ,उसने हौसला दिया ..तुम घबराओ नहीं .. हजारों हजार साल से गाँव उपेक्षित पड़ा है .. यह दिक्कत तो आयेगी ही लेकिन काम शुरू तो करो .और मैंने काम शुरू कर दिया ....अभी बताता हूँ बात कहाँ तक पहुँची ..?