Friday, July 27, 2012

ईंट में दब गयी एक सभ्यता 
हमारे कई दोस्त गाँव लौट रहें हैं .इन्ही में एक है शीतल जी .इन्होने सुल्तानपुर के कादीपुर और सूरापुर के बीच एक ठेठ गाँव में जमीन ली है और वहाँ निर्माण कार्य में लगे हैं .अक्सर हमलोग वहाँ इकट्ठे हो जाया कतरे है .कल की सांझ ऐसी ही एक बैठकी में गुज़री और हम लोग गाँव के बारे चर्चा कर्रने लगे .हम सब इस बात से सहमत थे कि अब गाँव का चेहरा भी बदलने लगा है और बदसूरत हो रहा है .पत्रकार मित्र कुमार सौबीर ने एक मजेदार टुकड़ा जोड़ा -'शुरुआत ईंट से होती है '.यह सुलेख इसी ईंट पर है .
      अब तक माटी का कोइ भाव नहीं था ,प्रचलित मुहावरा है 'माटी के भाव '.लेकिन अचानक गाँव में भी माटी बिकने लगी और अच्छे दाम पर .आज शहर में ईंट का क्या भाव है हमें नहीं मालुम लेकिन गाँव में ईट की कीमत है पांच रूपये .ईंट का अर्थ शास्त्र और भी दिचास्प है .ईंट भट्ठे का मालिक किसान से ' माटी के भाव ' मिट्टी लेता है .वही मिट्टी जब जब उसके कारखाने( भट्ठे ) से ईंट के रूप में बाहर आती है तो उसकी कीमत सात गुनी बढ़ चुकी होती है .इसका भुगतान वही किसान ईंट खरीद कर करता है .इतना ही नहीं माटी से ईंट बनाने की प्रक्रिया में गाँव के ही लोग होते है .विशेषकर आदिवासी जो गुलामो की तरह खरीदे जाते हैं .
        इस ईंट ने  एक समूची सभ्यता को ही दबा कर मार डाला .गाँव में अब माटी के घर नहीं बनते ,ईंटों के मकान बनते हैं .उस 'घर' और इस 'मकान' के बीच फ़ैली खाई में एक सभ्य्ता लुप्त हो गयी .माटी के घर गाँव के ही लोग बनाते थे .उनकी जिंदगी ,रोजी रोटी इसी निर्माण कला से चलती थी .और दलित होने केबावजूद समाज में इनकी इज्जत थी .( दलित और बावजूद हमने जानबूझ कर जोड़ा है ,.. उनके लिए जो नए नए दलित प्रेमी पैदा हुए हैं वो दलितों पर चिंतित तो हैं लेकिन कारणों पर बात नहीं करते ) इस घर निर्माण में जो दूसरी जाति अपनी भूमिका निभाती थी वह थे लुहार ,लकड़ी का काम होता था .उनके कारी गरी की कीमत थी .माटी के घर में खिड़की दरवाजे से पहले ,घोरी,धन्,बदेर.फरका .उतरन ये  गढे जाते थे .( आज ये शब्द ही चलन में नहीं हैं ,घर और मकान केबीच हमारी शब्द संपदा चूक रही है यह सबसे बड़ा घाटा है ) इसके बाद नाम्बर्र आता था कुम्हार का वह  छत के लिए 'खपडा' तैयार करता था .उसे 'नरइ और थपुआ ' कहते है .माटी को चाक पर चढ़ा कर नरइ  गढना एक कला थी .अब न तो इस  खपडे की जरूरत रह गयी है न उस कला की .लिहाजा एक जाति अपने पुश्तैनी पेशे से हट कर रोजगार की तलाश में दर ब दर हो रही है
       गाँव का अपना विनमय का अर्थशास्त्र टूट कर भसक गया और गाँव ईंट के पक्के मकान में 'पकस् ' रहा है . .
     
      

Wednesday, July 4, 2012

राजा नहीं फ़कीर है .......
वी.पी. सिंह से हमारी मुलाक़ात उसी तरह की थी ,जैसे एक समाजवादी की किसी कांग्रेसी से होती है .हम इनके नजदीक तो कत्तई नहीं थे बल्की इलाहाबाद की राज नीति में हम इनके विरोधी माने जाते थे क्यों कि हम जनेश्वर मिश्रा के साथ थे .एक दिन अचानक पता चला कि कांग्रेस का एक पुर्जा छटक रहा है जिससे फिर किसी नए समीकरण के बनने की संभावना है .और वह पुर्जा थे वी.पी. सिंह .भारतीय राजनीति की विडम्बना देखिये कांग्रेस का छटका पुर्जा प्रतिपक्ष की झोली में गिरता है .और प्रतिपक्ष उसे 'रंग रोगन' लगा कर कंधे पर daal कर घूमना शुरू कर देता है . वी.पी. अन्यों से थोड़े भिन्न थे .एक सरकार में जिम्मेदार ओहदे से बावस्ता रहें ,दो साफ़ सुथरी छवि थी ,राजा थे ,कानिया ऐसे कि कभी किसी भी सवाल दो टूक नहीं बोले .उनकी सबसे बड़ी खूबी रही मुद्दा उठा कर किनारे बैठ जाते थे और लोग उस मुद्दे पर अलग अलग अपनी राय ,किस्से ,कहानिया गढते थे और राजा मुस्कुराते थे ,न हाँ न ना.बोफोर्स के साठ भी यही हुआ .भारतीय राज नीति में बोफोर्स और वी.पी .एक दूसरे से चिपका हुआ बवंडर बन कर आया और अपने ही अंतर्विरोध पर सिमट गया .इस विषय पर सबसे कारगर टिप्पणी जार्ज ने की थी ,व्यक्तिगत बात चीत में .उन्होंने कहा -हर सौदे में दलाली होती है सबको पता है ,यह बिजनेस ट्रेंड है .लेकिन पहली बार यह हो रहा है कि एक सरकारी मंत्री अपने ही सरकार के ऊपर आरोप लगा रहा है यह मामला जितना खुला हुआ है उतना ही दबा भी .; जो दबा हिस्सा था उसे गौर से सुने .सारा इलाहाबाद जानता है कि राजिव गांधी और अमिताभ बच्चन के निजी रिश्ते ने वी.पी. को विचलित कर दिया था .इतना ही नहीं अमिताभ के चलते वीपी की बेइज्जती भी हुई और उसने आग में घी का काम किया .हुआ यह कि मेजा में वीपी और बच्चन का सामूहिक कार्यक्रम था .बच्चन नहीं पहुच पाए वहाँ वीपीको जनता ने न केवल बोलने नहीं दिया बल्की धक्का भी दिया .बोफोर्स की नीव तो उसी दिन पड़ गयी थी और राजा ने तय कर लिया था अमिताभ के बहाने  राजीव  गान्ही को चुनौती देना .यह है राजा के व्यक्तित्व का अहम् हिस्सा . राजा निहायत भाउक,संवेदनशील ,तुनक मिजाजी ,और जिद्दी स्वभाव से भरपूर था .इसके कई उदाहरण है -जे पी. के भूदान कार्यक्रम में जमीन देना और फिर परिवार से यह बयान दिलवाना कि मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी ..भाई की शिकार खेलते समय हुई ह्त्या के बाद  पुलिस द्वारा अंधा धुंध अपराधियों  की ह्त्या ..वगैरह वगैरह ..इस वीपी से हमारी मुलाक़ात संतोष भारती के  साथ हुई .उनके परिवार का जो माहौल था उसने बरबस हमें खींचकर चौका तक पहुचा दिया .उनकी पत्नी सीता जी सही मायने मा रही .हम लोंगो का ख़याल उसी तरह करती थी जैसे एक मा अपने बच्चे का .उनमे राज बब्बर ,मै .संतोष भारती  .योगेश मिश्रा ...घर के सदस्य की तरह रहें .
               बोफोर्स का''कागद' जेब में डाले वीपी इलाहाबाद के उप चुनाव में आ गए .इस एलान के साथ कि अमिताभ के खिलाफ चुनाव लडूंगा .वीपी के साथ पूरा प्रतिपक्ष इलाहाबाद में घेरादाले पड़ा था .अमिताभ जब मैदान में नहीं आया और उसकी जगह हरे कृष्ण शास्त्री आ गए राजा ने ऐलान कर दिया कि  वह अब चुनाव नहीं लड़ेंगे .यह अजीब वाकया था .राजा नाम वापसी की तैयारी करते दिखे .दोपहर का वक्त था 'ऐश महल' ( इलाहाहाबाद में राजा के पुश्तैनी मकान का नाम जो उस चुनाव का केन्द्रीय कार्यालय था ) तमाम लोग राजा को मना रहें हैं इनमे विद्या चरण शुक्ल .राम धन ,जोशी ,......केवल एक शख्स ऐसा था जो खिड़की से बाहर झांक रहा था और मुस्कुरा रहा था वह थे जनेश्वर मिश्रा .(मुझसे बोले यह सब नाटक है )अंत में राजा राजी हो गए और चुनाव चल निकला .
          एक वाकया और सुन लीजिए बोफोर्स मसले पर देश में जनमन बनाने में राज( बब्बर) की अहम् भूमिका थी .इस पर फिर कभी ..उस राज को वीपी नहीं चाहते  थे कि वह चुनाव प्रचार में आये .राजा न बुलाने का जो कारण बताते थे वह और भी खफ्ती लगता था -लोग कहेंगे चुनाव जीतने के लिए हमने 'ऐक्टर'का सहारा लिया .'संतोष भारती ,संजय सिंह ,सीता जी ...सब परेशान तरीका खोजा गया ,मुझे कहा गया कि तुम बात करो ..मैंने राजा को दो टूक फैसला सुना दिया -मै राज को अपने मंचपर बुला रहा हूँ ,आपसे आपके संगठन से कोइ मतलब नहीं होगा .'राजा चुप रहें 'बहार हाल राज आये और जम कर प्रचार किये .
       एक और - देश के तमाम नेता इस कुम्भ में बगैर बुलाये हाजिर थे ,एक जार्ज को छोड़ कर .और जार्ज आने के लिए तैयार नहीं थे .चूंकि हमारे और जार्ज के रिश्ते सबको मालुम थे इसलिए यह भी जिम्मेदारी हमें दी गयी कि किसी भी तरह से जार्ज को बुलाना है .बहरहाल मैंने जार्ज से बात की और जार्ज आये .मैंने जार्ज से राज बब्बर वाली बात बता दी ,जार्ज गुस्से में आग बबूला ..बोले वीपी राज को महज ऐक्टर ही समझता है क्या ...उसकी तुलना अमिताभ से करता है ? ..ऐक्टर बाद में बना है समाजवादी आंदोलन का लड़का है ,लाठी खाया है जेल गया है .....वगैरह वगैरह और उस दिन फूल बाग की सभा में जार्ज केवल राज बब्बर पर बोलते रहें पीपल के पेड़ के नीचे जहां हम सब बैठे थे ..जार्ज को सुनते रहें और राज को रोता देखते रहें .
      संदीप भाई अगली पोस्ट में आपको बताउंगा प्रधानमंत्री वीपी सिंह का राज काज ,मंडल कमीशन की असलियत और सरकार का गिरना ......