Wednesday, June 27, 2012

यस.पी. : खबर बनाओ ....
यस पी पत्रकार नहीं थे ,पत्रकारिता के कारखाना थे और ऐसा कारखाना जिसके उपयोगी उत्पादन से अधिक कचड़ा निकला .उन कचडों का कमाल कि आज वो खबरों से बेखबर हैं और बाकी से बाखबर .यह उस शख्स का कमाल और जमाल दोनों रहा .इस अखबार बाज से मेरी पहली मुलाक़ात १९७७ में हुई . हमने पहले भी कही कहा है कि ७७ भारतीय समाज का टर्निंग प्वाइंट है राजनीति .पत्रकारिता ,कला साहित्य हर मैदान में उठा पटक जारी है, इमरजेंसी हटा ली गयी है  ,चुनाव की घोषणा हो चुकी है . बनारस से हमारे नेता ,बनारस विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष देव ब्रत मजुमदार चुवाव मैदान में हैं और हम सब उनके साथ हैं .दोसाल की जेल काट कर हम बाहर आये हैं अपने आपको तोप से कम नहीं समझ रहें हैं .जनता पार्टी बन चुकी है लेकिन जनता पार्टी ने मजुमदार को टिकट देना मुनासिब नहीं समझा .चुनाव में मेरे बनाए चित्र ( जेल में बनाए गए ) जगह जगह सड़कों पर लग रहें थे .चर्चा दो जगहों की ज्यादा हुई .एक  मुजफ्फरपुर जहां से जार्ज (जेल में रहते हुए ) चुनाव लड़ रहें थे और दूसरा बनारस .यस .पी से  मेरी मुलाक़ात बनारस में हुई .'यस पी ..'ताप से ताए हुए' थे ( कवि त्रिलोचन जी से उनको उधार ले रहा हूँ ) इमरजेंसी की ज्यादती ,पत्रकारिता की लचर चाल ,समाज में गूँज रहा गुस्सा .यस .पी . को एक मोड़ तक पहुचा दिया .'रविवार' गुस्से का तेवर लेकर मैदान में उतरा .यह पहला प्रयोग था कि आपके पास अगर खबर है तो आओ ,हमें भाषा और व्याकरण नहीं चाहिए इसके लिए हमारे पास अलग का मोहकमा है .रविवार में अशोक सेकसरिया का जो योगदान है वह अविष्मर्णीय है .पत्रकारिता के बंधे -बंधाए खांचे को तोड़ कर 'रविवार ' ने एक नया मुकाम बनाया और बड़ों बड़ों को पीछे ढकेल कर स्वं स्थापित हो गया .
        ७७ में मै बनारस विश्वविद्यालय छात्र संघ का अधक्ष बन गया .संघी घराना  ने इस हार को संजीदगी के साथ लिया और उसकी पूरी कोशिश रहती थी कि किस तरह समाजवादियों को घेरा जाय .यह. पी .के लिए यह अच्छा मौक़ा था .'रविवार ' का एक अंक ही हमारे ऊपर आगया .छद्म नाम से स्टोरी छपी .अच्छी बिक्री हुई .हमारे ऊपर कई आरोप लगे .'असामाजिक तत्वों का ठेकेदार ' लड्कीबाज ,वगैरह वगैरह .( बहुत दिनों तक रविवार का भूत लड़कियों के ऊपर चढ़ा रहा .बाद में उसकी सफाई भी यस पी ने ही दिया .उनमे कई तो अच्छी खासी  पत्रकार ,जहीन और बोल्ड भी रही नाम बता दूँ -दरियाफ्त कर लीजियेगा .आप इन्हें जानते भी होंगे ..अलका सक्सेना और अर्चना झा ....जब इन्हें सच्चाई मालुम हुई तो जम कर ठहाके लगे .यस पी ने कहा हमें तो समाचार बेचना था ..मैंने कहा था 'कसाई !'
      एक दिन यस पी. दिल्ली आगये .दिल्ली में उनका घर 'लफंगों' का अड्डा बनगया .चंचल .रामकृपाल .नकवी ,अजय सिंह .नरेंद्र सिंह .पंकज सिंह ..बहुत नाम हैं भाई .यह उस जमाने की बात है जब दिल्ली की सांझ महफ़िल में कटती थी .मेहमान नवाजी के लिए उदायांशार्मा .संतोष भारतीय ,गौतम नौलखा .मल्लिक साहब आदि व्यवस्थित ढंग से इंतजाम करते रहें ...(आप जिसके बारे में सुनना चाहते हैं वह उन दिनों बैरा की जिम्मेवारी निभाता था ) दिल्ली की हर सांझ यस पी के साथ कटी है ,उनकी शादी के बाद तबदीली आयी ...बहुत से किस्से हैं ..अजित अंजुम ने याद दिला कर गडबड किया है .अम्बरीश जी संदीप् भाई अब कोइ सवाल नहीं .. सांझ होने को है ...काफी हाउस जेरे बहस रहें ..बस 

Saturday, June 23, 2012


दोनों हँस रहें हैं ;उदास केवल मै हूँ

आज  २३ जून है  राज (बब्बर ) का जन्म दिन .हम फिर भी उदास है .आज मेरे बच्चों ने बताया कि काका भाई (राजेश खन्ना की तबियत ज्यादा ही बिगड गयी ,उन्हें अस्पताल ले जाया गया है .अभी कल मैंने डिम्पल जी से बात किया उन्होंने कहा घबराने की कोइ बात नहीं सब ठीक है .लेकिन जब दुबारा अस्पताल जाने की बात हुई तो मै थोड़ा विचलित हुआ .मैंने राज को फोन किया जन्मदिन की बधाई देने के लिए ,राज ने सबसे पहले काका का जिक्र किया ,कहा कि हालत बहुत खराब है बात कर लो .मैंने बात किया जो खबर हमें मिली वह दुखी करनेवाली थी मैंने नरेश जी को कहा कि आप हमें बताते रहिएगा .
मै नास्तेलिगिया में चला गया .एक दिन का वाकया है राज ने हमसे कहा कि यार कल संसद में में हमें बोलना है थोड़ी देर के लिए आ जाओ
कुछ बात कर लिया जाय .हमने कहा ठीक है और मै
रात में आता हूँ ,और रात की शुरुआत अभी शुरू ही हुई थी कि राज का सचिव भागा भागा कमरे में दाखिल हुआ ,जब कि उसे हिदायत दे दी गयी थी कि किसी का भी फोन हो देना मत .राज ने गुस्से से उसकी तरफ देखा .उसने कहा ..साहब काका का फोन है गाली दे रहें हैं .इतना सुनना था  कि हम दोनों का उतर गया .राज ने कहा तुम्ही बात करो ...मैंने फोन पकड़ा .. उधर से आवाज आई ' लीजिए साहिब इससे बात करिये और उन्होंने फोन का चोंगा मेरी नवासी यानी मेरी बेटी की बेटी अनुष्का के मुह के पास लगा दिया .उन दिनों वह बहुत छोटी थी रो रही थी .मै समझ गया कि मामला गंभीर है .मैंने राज से कहा प्यारे मुझे पहुचाओ .उस समय तक राज का ड्राइबर जा चुका था ,राज ने कहा मै तुम्हे उनके घर तक पहुचा दूंगा लेकिन मै अंदर नहीं जाऊंगा .और हम लोधी रोड उनके मकान पर आ गए . काका भाई के घर पर भाग दौड़ देख कर मै हैरान रह गया .मेरी बेटी , उसके जेठ अवधेश जी ,उनके कालेज के दो अध्यापक काका के बैठक में ,और मेरी बेटी की बेटी अनुष्का काका भाई के गोद में ..काका भाए ने एक भी शब्द नहीं बोला बस इतना कि 'साहिब हमें तो बता देते आज आप हमारे साथ नहीं रहेंगे '  मै काका भाई को जानता था ..सफाई देना मतलब फसना ..'सारी' कह कर मै गिलास बनाने लगा .'गिलास ' काका भाई की सबसे बड़ी कमजोरी रही है और आज मै उन लोंगो में नहीं हूँ जो यह कहें कि इस गिलास ने काका भाई को कमजोर किया है .(इसका माकूल जवाब मोटू ने दिया -..'लोग इनको चेहों को परदे पर देखते हैं ,इन्हें हीरो बनाते हैं ,लेकिन यह भी आम आदमी हैं कम लोग जानते हैं ,इसके निर्वहन के लिए इन्हें कितनी कीमत चुकानी पडती है तुम क्या जानो '...) काका भाई गिलास के साथ ज्यादा सही होते थे आज मै दावे के साथ कह सकता हूँ .बहार हाल मेहमान लोग खाना खाए ,हम विदा हुए तब हमें मालुम हुआ कि मेरी बेटी को मेरे घर से लेने काका भाई खुद गए थे क्यों कि उसी रात डिम्पल जी दिल्ली आरही थी और काका का ड्राइवर डिम्पल जी को लेने एयर पोर्ट  गया हुआ था .
      मजेदार घटना मेरे आवास के सामने हुई .मेरे आवास के सामने बरात घर था .उस दिन किसी की शादी थी और बरात वह्व्वं पर पहुची थी जब बगैर किसी कार्य क्रम के मेरी बेटी हमारे आवास पर पहुची थी ,वहाँ ताला देख कर उसने काका को फोन किया था .काका जब  उन सब को उठाने वहाँ पहुंचे तो भीड़ ने उन्हें घेर लिया किसी तरह बच बचा कर हमारे बच्चों ko लेकर घर पहुचे थे ...मै इस लिए याद कर रहा ..अगर वे चाहते तो फोन नहीं उठा सकते थे ..मै वहाँ नहीं हूँ यह बोल सकते थे ..लेकिन ... यह है काका भाई ,,सच बताऊँ मै राज को जानता हूँ आज उसका जन्म दिन है आज वह वह उस तरह से खिला खिला नहीं है जसे पिछले साल था .....


Thursday, June 21, 2012

काका भाई ; जिंदगी कैसी है  पहेली   ........
.......और एक दिन मै काका भाई का कीमती दोस्त हो गया .पांच साल मुतवातिर उनके साथ रहा .सोने के अलावा कोइ वक्त ऐसा न गुजरा होगा जब हम दो पल के लिए भी अलग हुए हों .सुबह का नाश्ता ,दोपहर का खाना ,रात की रात भर चलनेवाली पार्टी ....सब साथ साथ ...रात के तीन बजे हम दस्तरखान पर बैठते थे चार बजे के करीब काका भाई किचेन ठीक करते थे फिर एक पान साहिब ! और जब हम ८१ लोधी रोड से बाहर निकलते थे तो लोधी गार्डन घूमने वालों का हुजूम दिखाई पड़ता था .काका भाई लोधी गार्डन में रहते थे और मै लोधी कालोनी में ,हमदोनो के बीच एक सड़क थी और खुशबूदार पेड़ों की छाँह .एक दिन मजेदार वाकया हुआ हम रात की पार्टी से ठीक ठाक होकर लौटे थे और दरवाजे का ताला खोल रहें थे ,तब तक हमारे पड़ोसी शर्माजी अपने बेटे को जगा कर सुनाराहे थे .. अंकल को देखो मार्निंग वाक् कर के आगये और तुम अभी तक सो रहें हो .....उस दिन मै देर से सो पाया .हमें रेणु ( महान कथाकार ,समाजवाद के पक्के सिपाही ,मैला आँचल और परतीपरिकथा जैसे उपन्यास के लेखक ....) ने अपने संस्मरण में लिखा है कि जिस दिन ज्यादा पी लेता था सुबह जल्दी उठ जाता था लोग कहते थे .देखो आज कल पीना छोड़ दिया है ,जिस रात देर तक लिखता था और सुबह देर से उठता था ,तो लोग कहते थे ,देखो पी के सो रहा है | मैंने काका को फोन कर के रेणु जी की यह बात बताई ,हम दोनों काफी देर तक हस्ते रहे |
काका भाई से मेरी पहली मुलाकात बहुत दिलचस्प वाकया है , दिल्ली में हमारे एक मित्र है नरेश जुनेजा जो कत्तई अराजनीतिक आदमी है लेकिन राजनीति में सबसे जादा दखलंदाजी उनकी रहती है , किसी भी दल का आदमी हो जुनेजा साहब उसके अपने आदमी होते है , हर हप्ते हंगामेदार पार्टी करना उनका शगल है | एक दिन हमें सन्देश मिला कि आज कि शाम कि पार्टी में आप को आना है , और मै पहुच गया पार्टी बड़ी लम्बी थी उनके ड्राइंग रूम में बीसियों बिदेसी राजनायीक मौजूद थे , मै भी उसी में हाजिर हुआ | अचानक मुझे नरेश भाई के चमचे  से एक संदेस मिला कि आप नरेश जी के बेडरूम में चले जाये वहा कुछ लोग आप का इंतज़ार कर रहें है ,मै उस चमचे के साथ नरेश जुनेजा के बेडरूम में चला गया, वहाँ बम्बई के फिल्म इंड्रस्ट्री के कई दिस्तीबुटर, डॉक्टर , और अन्य लोग  अपनी अपनी गिलासो के साथ बा दस्तूर चलू थे , उसी भीड़ में हमारा एक मित्र संतोसानंद भी मौजूद था , ये संतोसनंद वाही है जो मनोज कुमार कि फिल्मो के गीत लिखता रहा है , वो अकेला पड़ा हुआ था क्यों कि वहा संघियो कि भीड़ जादा थी  .हमें देखते ही उसका चेहरा खिल गया ,और उसने एलन कर दिया कि लो अब मेरा वकील आ गया है अब बात करो ,मैंने पूछा कि क्या हुआ भाई आज आप को मेरी ज़रूरत पड़ रही है तो बोले कि यार मै अकेला हूँ यहाँ चड्ढी वालो कि तादाद जादा है मैंने कुछ अति उत्साह में कहा कि भाई हमें लेबिल में आने दीजिए अभी मै निपटता हूँ .मैंने निगाह दौडाया तो उस भीड़ में हमें हमारे दोस्त गिप्पी (नाम है सिद्धार्थ दुवेदी पुत्र हजारी प्रसाद ) दिखाई पड़े मैंने गिप्पी को इशारा किया कि हो जाये और हम दोनों दो ''पटियाला '' के बाद उस भीड़ से मुखातिब हुए और मैंने कहा कि हम इतनी देर से आप सब को सुन रहें थे , हम कोई राजनीति कि बात नहीं करेंगे हम केवल एक बात कहना चाहेगे कि दुनिया कि सबसे बड़े पोस्टर डिजाईनर का नाम मोहन दस करमचंद गाँधी है . भीड़ में सन्नाटा छा गया गाँधी और पोस्टर डिजाईनर ये चौकाने वाली बात थी ही उसमे से एक जो सबसे जादा चहकने वाला चड्ढीधरी था उसने पूछा कि यह नयी बात कहा से आगई तब तक मै रौ में आचुका था ,और मैंने उसे बताना सुरु किया कि आज़ादी कि लड़ाई में गाँधी ने जिस चलती फिरती पोस्टर का इजाद किया उसका नाम है चरखा उस ज़माने में जो चरखा चलता था वो मान लिया जाता था कि वो सुराजी है , और उस चरखे  पर कोई भी प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता क्यों कि यह उत्पादन का स्रोत है ,उस भीड़ में सन्नाटा छा गया ,अचानक बिच में एक आवाज़ उठी - साहिब एक बार इसे फिर दोहरा दीजिए मै देर से आया हूँ ,मेरा नाम राजेश खन्ना है |
राजेश खन्ना से यह पहली मुलाकात थी और अभी तक आखरी नहीं हो पाई है ,आज मेरे वाल पर जब राहुल सिंह ने यह खबर दी कि  राजेश खन्ना कि तबियत ठीक नहीं है तो हमें ये अजीब सी बेचैनी हुयी और मैंने बगैर ये जाने हुए कि राजेश खन्ना हप्तो से बिस्तर पर पड़े हुए है ,न  खा पा  रहें है ,न बोल रहें है , चुप चाप लेते हुए है तो हमने फोन पर बात करने की नाकामयाब कोशिस की जब उनसे बात नहीं हुयी तो मैंने आज यानि २१ को सुबह १० बजे डिम्पल जी से बात किया हाला की डिम्पल जी हमें ढाढस बढाती रही कि नहीं सब ठीक हो जाये गा कंट्रोल में है लेकिन  मै अभी भी बेचैन हूँ , थोड़ी देर बाद राजेश खन्ना कि आवाज़  एक ठहाके के साथ आयेगी, कि हा साहिब हम सब रंग मंच की एक कठपुतलियां है जिसकी डोर उपरवाले की हाथ में है |
मैंने  राहुल को कहा है कि ,काका पर बहुत कुछ है जो मेरे पास है वो मै कल दूगा अपने वाल पर ,क्यों कि मैंने अपनी जिंदगी में इससे जादा खुद्दार इंसान नहीं देखा राहुल कल का इंतज़ार करना |

Tuesday, June 19, 2012

इमरजेंसी का पटाक्षेप हो
इमरजेंसी लगी ,हटी ,कांग्रेस यहांतक कि इंदिरा गांधी ने इसके लिए सार्वजनिक रूप से माफी माँगी और जो इंदिरा गांधी इमरजेंसी की सबसे बड़ी  खलनायिका थी दो साल के ही अन्त् राल पर हिरोइन बन कर उभरी .
पिछले आलेख में हमने जिन मुद्दों को उठाया था  उस पर बहस न होकर बिपेंद्र भाई ने उसे एक नया मोड़ दिया है हम उसी पर आते हैं .बिपेंद्र जी कहते हैं कि 'आंदोलन का एक मकसद था कांग्रस के एकाधिकार की समाप्ति ' कांग्रेस से निकले तमाम समाजवादियों की यह चिंता शुरुआत से थी .इसलिए डॉ लोहिया बार बार उस एकाधिकार पर हमला करते रहें और सफल भी रहें .६७ में गैर कांग्रेसवाद एक प्रयोग था मकसद ऋणात्मक था  'कांगेस हटे ' .विकल्प क्या और कैसा बने इस पर विसंगतियाँ थी .भारतीय राजनीति में पहली बार साम्यवादी और संघी घराना एक साथ आया और कई सुबो में सरकारें बनी .लेकिन सरकार में कोइ गुणात्मक परिवर्तन नहीं हुआ बल्की कुछ मायने ये संविद सरकारे निहायत ही घटिया दर्जे की साबित हुई .सबसे हास्यस्पद स्थिति में समाजवादी रहें .'मालिक' से लड़ते रहें और मालिक के 'चिलमची 'की पालकी ढोते रहें .डॉ लोहिया दुखी हुए थे .जग जाहिर है .वही ज.पी. के साथ हुआ .
      १९५४ में कांग्रेस को क्रांतिकारी बनाने के लिए ज.पी. ने चिट्ठी लिखा था ,तत्कालीन प्रधानमंत्री और कांग्रेस अधक्ष  पंडित नेहरु को .नेहरु 'सिंडिकेट' से तब भी घिरे थे उन्होंने जोखिम उठाना ठीक नहीं समझा चुनांचे जे.पी. का प्रस्ताव ठंढे बस्ते में चला गया .१९६९ में वही प्रस्ताव कांग्रेस ने  अस्वीकार किया लेकिन इंदिरा गांधी उस पर अड़ी रह गयी .कुल पांच समाजवादी थे इंदिरा गांधी के साथ -चंद्रशेखर ,मोहन धरिया ,कृष्ण कान्त ,रामधन ,अर्जुन अरोरा .कांग्रेस ने इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया .कांग्रेस दो फांक में  बंट गयी .इन्दिकते और सिंडिकेट .१९७४,७५ तक आते आते जे.पी . को अपने ही खिलाफ होना पड़ा .कांग्रेस में जो समाजवादी विचारधारा के धुर विरोधी थे ,दकियानूसी थे भारत की बागडोर उन्ही के हाथ में सौपना पड़ा .मोरार जी भाई ,nईलम संजीव रेड्डी ,.. आदि आदि .और समाजवादियों ने एक बार फिर 'चिलाम्चियों' की पालकी उठाने में अपने को गौर्वानित महसूस किया .
      बिप्पेंद्र जी !७७ भारतीय राजनीति का टर्निंग प्वाइंट है .इस पर गौर कीजियेगा .. प्रतिपक्ष जो अब तक पुरुषार्थ की राज नीति कर रहा था वन अनुदान की राजनीति पर उतरने को मजबूर हो गया .राजनीति में गणित का प्रवेश हुआ उसका खामियाजा आज तक जनता भुगत रही है .बिपेंद्र जी हम आपके भावात्मक लगाव से वाकिफ हैं .हम भी आंदोलन के साथ रहें हैं दो साल की जेल  काटी है .सबकुछ बहुत नजदीक से देखा है .कांग्रेस को भ्रष्ट होने में पचास साल लगे हैं और प्रतिपक्ष पांच दिन भी नहीं चल सका बगैर भ्रष्टाचार के .
       एक छोटा सा सवाल पूछ कर हट जाना चाहूँगा -७७ के बाद आमजन के सवाल पर कोइ आंदोलन हुआ ? क्या हम ७७ के बाद बगैर किसी सवाल के बेहतर जिंदगी जी रहें हैं ? इसका जिम्मेदार कौन है ? संदीप जी ! मै अपनी तरफ से इस् विषय पर विराम दे रहा हूँ ...
 

Monday, June 18, 2012

फिर से वही बवाल .......
'सो रहा था चैन से ,ओढ़े कफ़न मजार में .फिर आगये सताने ,किसने पता बता दिया ........ शहर छोड़ा ,भाग आया गाँव .न रेडियो न टेलीविजन .बस एक अखबार 'द हिन्दू ' और मेरा लैप टॉप .अच्छी हवा .दमदार गर्मी .सुबह  नाश्ते में 'माठा' दोपहर में अरहर की दाल के साथ देशी घी चूल्हे पर सेंकी रोटी .लोंगो को छेड़ना और खुद 'कुछ ' सुनना .बस एक ही शगल ...अचानक अभी परितोष जी ( परितोष चक्रवर्ती .. संपादक लोकायत ,कहानीकार ,आलोचक ) के नए उपन्यास ' प्रिंट लाइन ' के प्रकाशित होने की सूचना मिली .यह उपन्यास ज्ञानोदय से प्रकाशित होरहा है (ज्ञान मंडल ) हमें बताया गया कि इस उपन्यास  के सारे पात्र सचमुच वाले हैं और उन्हें नाम ब नाम ,जो जैसा है जस का तस दिया गया है .चुकी परितोष दादा से हमारे भी ताल्लुकात रहें हैं साथ साथ काम भी किया है इसलिए  मै अपने बारे में सोचने लगा .अगर सचमुच जस का तस दिया गया होगा तो मै .... मै तो उघार हो जाउंगा .. लबे सड़क .सब जानते हैं मै लिखने में बहुत काहिल रहा हूँ और दादा जब भी मुझसे 'कुछ' लिखवाना चाहते तो हम दोनों कुछ देर के लिए किसी विषयान्तर पर चले जाते .. थोड़ी देर बाद दादा मुस्कुराते और कहते आज मेरे पास बहुत अच्छी 'चीज' आयी है .मैंने उसे तुम्हारे लिए रखा हुआ है .फला आदमी फला जगह से आ रहा था ,वहाँसे लाया  है . जब कि मै जानता था दादा झूठ बोल रहा है ,इसे दादा ने खुद खरीदा है ....' उस किताब में यह भी तो नहीं है ? दादा रायपुर से दिल्ली आये तो उन्हें दिल्ली की सच्चाई नहीं मालुम थी .एक दिन हमने ककहा कि दादा यह बहुत खोखली जगह है ,यहाँ बस हवा पानी है .ये जो लिख्खाड बड़े बड़े बोर्ड लगाए बैठे हैं इनका खेल दूसरा है .एक दूसरे की पीठ ठोंकना इनका काम है .पुरष्कार ,सम्मान, गोष्ठी ,सब बैठे बैठे तय होती है .दिल्ली के बाहर इनका डंका गूंजता है .हमने उन्हें एक वाकया सुनाया .एक बार भारती जी (धर्मवीर भारती -संपादक धर्मयुग ) का सन्देश मिला कि मै दिल्ली  की साहित्यिक गतिविधियों पर एक रपट लिखूं .और मैंने लिख दिया .उस पर हमारे कई दोस्त नाराज हो गए .हमने एक घटना का जिक्र कर दियाथा .एक साहब जो 'सारिका' में मुलाजमत करते थे और लेखक भी माने जाते रहें .उनकी एक कहानी का ऐलान हुआ कि अगले अंक में आप इन्हें पढ़ें .कहानी कम्पोज हुई पेज बना लेकिन एन वक्त पर किसी कारण कहानी नहीं जा पाई .लेकिन डाक से बहुत सारे पत्र उस कहानी की तारीफ़ में आ गए ...'दादा ने कहा क्या वाकई ऐसा होता है ? हमने कहा अक्सर ऐसा होता है ..दादा ने उसको आजमाया भी मै नहीं जानता उन्होंने इनका जिक्र किया कि नहीं ..लेकिन दिल्ली के बड़े नामो से दादा मायूस हुए थे यह मै जानता हूँ ..

Sunday, June 17, 2012

जार्ज की शख्सीयत
चर्चा इमरजेंसी पर चल रही थी .संदीप जी एक बुनियादी सवाल उठाया ...इमरजेंसी की असल तस्वीर क्या है .? यह सच है कि जब हम इमरजेंसी की बात करते हैं तो किसी गफलत बस या जान बूझ कर २६ जून १९७५ के पहले की घटनाओं को भी उसमे शामिल कर  लेते हैं .जब वे सब इमरजेंसी के कारक तत्व हैं .जे.पी. जनशक्ति के प्रतीक बन कर उभरे और श्री मती गांधी राज शक्ति की .राज शक्ति ने आंदोलन को रोकने या समाप्त करने के लिए इमरजेंसी लगाया .उस इमरजेंसी से कैसे लड़ा जाय ? यही सवाल है जिस पर अबतक चर्चा नही हो पाई है .क्यों कि जब इस बुनियादी सवाल पर बात होगी तो कई 'राज' खुलेंगे .और अनुत्तरित सवाल  इतिहास के कई पन्नों को उघार कर देंगे .मसलन ..
          ०- इस आन्दोलन की असल भूख क्या थी ? इंदिरा गांधी या कांग्रेस को सत्ता से हटाना या कोइ नई व्यवस्था देना ?
           ०- यह आंदोलन व्यक्तिगत रूप से इंदिरा गांधी ब हैसियत व्यक्ति के खिलाफ था या कांग्रेस की नीतियों के खिलाफ था ?
            ०-इस आन्दोलन में साम्यवादियों  का रुख और उसके पीछे  का इरादा क्याथा ? क्या भारत में साम्यवाद को फैलने देने में कांग्रेस हुकूमत सहूलियत देती है ? बाकी दल इनके लिए चुनौती बनते हैं ? या जहां संघ रहेगा वहाँ साम्यवादी नहीं जायंगे ?
          ०- जे.पी. आंदोलन की सोच सीमित थी जिसमे यह भी नहीं सोचा गया था कि सत्ता  की तरफ से इमरजेंसी जैसी चीज भी लगाई जा सकती है ? और अगर यहाँ तक सोचा जा चुका था तो अगली रणनीति क्या थी ?
          ०- साकार सारे नेताओं को गिरफ्तार भी कर सकती है तो आगे की कमान किसके हाथ में रहेगी ..और उसका कार्यक्रम क्या होगा ?
          ये अनुत्तरित सवाल हैं .इन सारे सवालों का एक जवाब है -जार्ज  और जार्ज चुनौती बन कर श्री मती गांधी के सामने खड़ा होता है .इस लिए इंदिरागांधी अपनी पूरी ताकत के साथ जार्ज को खत्म करने पर आमादा होती हैं .इंदिरा गांधी की यह खूबी रही है और कमजोरी भी कि वह किसी को भी अपने सामने तन कर खड़ा हुआ देखना नहीं चाहती थी .इसलिए जार्ज और जार्ज के परिवार के साथ वह सब कुछ हुआ जो नहीं होना चाहिए था .उसके तफसील में नहीं जाउंगा .महज उन सवालों पर बात करूँगा जिसकी आड़ में आज इमरजेंसी भुनाने वाले तमाम नेता अपना चेहरा छिपा लेते है .
        य्हान्दोलन उद्द्येश्य हीन था .अगर कोइ 'सम्पूर्ण क्रान्ति 'की बात करता है तो वह पाखंडी है ,क्योंकि संपूर्णक्रांति अभी तक परिभाषित नहीं हो पाई है .अगर उसकी तुलना डॉ लोहिया के 'सप्त क्रान्ति' से की जाय तो और भी बेमानी होगी .
        यह आंदोलन समाजवादियों की जमीन पर खड़ा हो रहा था जिसके साथ संघी घराना "बर् मरे ,या कन्या ..दक्षिणा से मतलब' वाले तर्ज पर बरात की मानसिकता में गाते बजाते चल रहें थे .(ऐसे लोग जब पकडे जाते हैं तो ....'साहेब  गलती हो गयी .. ज्यादा हो गयी थी ..अब भविष्य में ऐसा नहीं होगा .. हमका माफी देयिदो साहेब !..इमरजेंसी में लिखा इनका माफी नामा इनके माथे पर लगा एक कलंक और है )
         अगर कोइ दल यह कहकर भागना चाहे कि उसके सारे नेता जेल में थे आंदोलन कैसे चलता तो इसका भी जवाब जार्ज ही देते हैं .डैनामाइट कांड से दुनिया के जितने भी .जनतंत्र के पैरोकार थे सब जार्ज के साथ उतर आये .और जार्ज की जीत हुई .लेकिन जार्ज के मन में जो कड़वाहट एक बार भरी वो आज तक नहीं निकली .बिपेंद्र जी ( इसमें हमलोग भी शामिल रहें हैं ) ने आपत्ति दर्ज किया है जार्ज का 'संघी' घराने से जुडना .बहुत कम लोंगो को मालुम है कि इस मुद्दे पर जार्ज को अपने लोंगो से कितना सुनना पड़ा है .यह सब कभी मीडिया में नहीं गया .हर बार जार्ज का एक ही जवाब रहता -बोलो किसके साथ जायं ..अकेले चलने की हिम्मत नहीं है ..समाजवादी आंदोलन बिखर चुका है ,एक दूसरे प्रति हम इतने पूर्वाग्रही बंचुके हैं कि इन्हें जोड़ा नहीं जा सकता ..तुम्ही बताओ क्या करूं ..?
      विषयान्तर कर रहा हूँ - जार्ज फिसलकर गिर गए थे दिमाग के अंदरूनी हिस्से में चोट लगी थी .बंबई में आपरेशन हुआ था ,मै गया मिलने हमारे साथ जार्ज के पुराने साथी रंजित भानु भी थे .हमें बाहर रोक दिया गया कहा गया कि थोड़ा रुक जाइए अंदर कुछ जरूरी बात हो रही है .हम बाहर बैठ गए ,थोड़ी देर बाद अंदर से लालकृष्ण अडवानी और जया जेटली बाहर निकली .हमने रंजित को कहा ' यह ..ले डूबेगी ..जार्ज को ' और वही हुआ .
      जार्ज के साथ बहुत सारी यादें हैं अगली पोस्ट में ....

Saturday, June 16, 2012

२६ जून,  प्रतिपक्ष नपुंशक है की कहानी कहता है ---------
अभी अभी जापान से स्वस्ति जी ने एक सवाल पूछा है -इमरजेंसी के बारे में .ब्राजील की वीरा रईस की उत्सुकता है 'इमरजेंसी '? इलाहाबाद पुलिस और अदालत ने मिल कर सीमा आजाद और उनके पति विश्वविजय को किताब रखने और पढ़ने के जुर्म(?) में आजीवन कारावास के सजा पर २६ जून से किसी आंदोलन की शुरुआत करने की बात हो रही है ,यह सूचना हमें नीलाक्षी जी से मिली .गो कि इस विषय पर अम्बरीश जी ,वीरेंद्र यादव जी ,संदीप वर्मा जी ,प्रमोद जोशी जी ,....तमाम लोग जो संवेदन शील हैं इस फैसले पर दुखी हैं .अर्चना झा गुस्से में हैं .. जुगनू शारदेय ने तो इस अदालत को रंडीखाना तक कह डाला.( आप मेसे बहुत से लोग जुगनू शारदेय को भूल चुके होंगे ,जुग्नूजी पत्रकार ,साहित्यकार .फिल्म निदेशक और खुल्लम खुल्ला लड़ाई लड़ने वाले जांबाज हैं .जिन्हें सच कहने में कोइ परहेज नहीं रहा है ) मै व्यक्तिगत तौर पर नीलाक्षीजी से अनुरोध कर रहा हूँ कि आप मेहरबानी करके किसी आंदोलन की शुरुआत २६ जून से मत करियेगा .क्यों ? वह मै बताना चाहता हूँ .एक दिन संदीप वर्मा ने हमें छेड़ा (यह उनकी आदत है और हमें उनकी यह आदत पसंद है ) २६ जून जिस दिन इमरजेंसी लगी कुछ लोग उस दिन को त्यौहार की तरह मनाते हैं ..संदीप जी ने चिकोटी काटा -त्यौहार मनायेगे क्या ? हमने कहा नहीं ,लेकिन असलियत बतायेंगें ..यह 'सुलेख' उन तमाम दोस्तों के नाम है जो जैल के बाहर थे और जैल की जलालत झेल रहें थे ,जो अंदर थे वो आजाद होकर गए थे ,आजादी से रह रहें थे और आजाद  की तरह जैल से बाहर आये .लेकिन इसकी सच्चाई तो जाने ..
      पिछले आलेख में हमने बताया कि ७३ में अहमदाबाद से बच्चों का एक आन्दोलन शुरू हुआ समोसा के बढे दाम की वजह से .इसमें कई और बाते जुड़ती गयी .नाकारा प्रतिपक्ष ,सिंडिकेट ताकतें ,समाजवाद से त्रस्त पूजीवादी घराने (६९ नेकीरामनगर कांग्रेस का फैसला जिसने तमाम पूजीपतियों की चूलें हिला दी थी ) सब एक साथ हो गए .जे. पी. पर दबाव पड़ा और वो भी इस आंदोलन में कूद पड़े .यहाँ एक विषयान्तर कर रहा हूँ - जे पी. ४७ के हीरो हैं ,हजारीबाघ जैल लांघ कर भागे हुए बहादुर सेनानी हैं ,गांधी के चहेते हैं लेकिन साथ के दसक तक आते आते भुलाए जा चुके हैं .डॉ लोहिया प्रतिपक्ष की राजनीती में एकमात्र चमकते सितारे हैं लेकिन असमय ही मृत्यु सैया पर हैं .दिन में प्रभावती (जी पी. की पत्नी ) रात में जे.पी. लोहिया की देखभाल कर रहें हैं एक दिन डॉ लोहिया ने  जे. पी. से कहा -तुम इतिहास में ज़िंदा रहना चाहते हो तो एक बार जेल जरूर चले जाना ..... / १२ जून ७५ को जगमोहन सिन्हा का फैसला आया इंदिरा गांधी के खिलाफ  और इमरजेंसी लग गयी .
         नीलाक्षी जी ! अब देखिये आज जो लोग इमरजेंसी को भुनाना चाहते हैं उनकी शक्ले कितनी घिनौनी है .इमरजेंसी २६ जून को लगी ,२६ जून के बाद इमरजेंसी के खिलाफ कोइ लड़ाई हुई ? नहीं .. इमरजेंसी के खिलाफ अगर कोइ लड़ा तो व्यक्तिगत तौर पर जार्ज हैं 'दाइनामाईट कांड ' जिसमे एक पत्रकार  के. विक्रम राव  भी शामिल रहें हैं जिनका जिक्र आज अम्बरीश भाई ने किया ...
         नीलाक्षी जी आपातकाल प्रतिपक्ष के लिए नपुंशक राजनीति का दिन है .साम्यवादियों ने तो पहले ही हथियार डाल दिए थे ,संघियों ने घुटने टेक कर माफी नामा भेजा ..लड़ाई तो कांग्रेस से निकले समाजवादी कांग्रेस ने ही लड़ा ..
      आख़िरी बात कह दूँ ... कांग्रेस का विकल्प कांग्रेस है ....प्रमोद जोशी जी आगे आप बता दें ..

Monday, June 11, 2012

समोसा से सरकार तक भाग २
कालेज कैंटीन के समोसा का बढ़ा दाम गुजरात को घेर लिया .और देखते देखते देश के अन्य हिस्सों में भी आंदोलन जोर पकड़ने लगा .उत्तर प्रदेश सबसे बाद में मैदान में उतरा .जे. पी .पर दबाव पड़ा कि वे इसका नेतृत्व अपने हाथ में ले लें .लेकिन जे.पी. हिचक रहें थे .यह उस वक्त की बात है जब जे.पी. राजनीति से ओझल हो चुके थे .अपनी पीढ़ी में जे.पी. भले ही अपने रुत्वे पर कायम थे लेकिन अगली पीढ़ी उनसे अनजान थी और जे.पी. इससे वाकिफ थे .जे.पी के सामने दूसरी दिक्कत थी प्रतिपक्ष की बिखरी हुई ,एकदूसरे टकराती हुई राजनीति ( ६५ में बना डॉ लोहिया का गैर कांग्रेस वाद ७२ तक आते आते बिखर चुका था ) इन सबको एक पगहे से बाँधना आसान नहीं था .लेकिन सरकार के खिलाफ जनता का गुस्सा अपने शिखर पर था जेपी इससे वाकिफ थे .तो जब संघी घराने ने कांग्रेस के खिलाफ (जो कि उसका स्थाई भाव है ) छात्र आंदोलन में उतरने और जेपी को अपना नेता मानने की घोषणा कर दी तो जेपी को थोड़ी सहूलियत मिली क्यों कि संघी घराना शुरू से ही जे पी के खिलाफ रहा है ,और उनपर कई बार हमला तक कर चुका था .समाजवादियों पर जे.पी. को भरोसा तो था लेकिन एक जिच भी थी .. जब एन वक्त पर जे पी. पार्टी छोड़ कर सर्वोदई बन गए थे ..लेकिन जब जार्ज ने जे.पी. से खुल कर बात की और आंदोलन में उतरने को कहा तो कुछ शर्तों के साथ तैयार हो गए .और आंदोलन व्यवस्थित ढंग से शुरू हुआ .आंदोलन अहमदाबाद से उठकर पटना के कदम कुवां आगया .'न मारेंगे न मानेगे ' हमला चाहे जैसे होगा ,हाथ हमारा नहीं उठेगा ' और आंदोलन चल पड़ा .अब उन नामो को सुनिए जिन्हें इस आंदोलन ने बुलंदी दी उसमे लालू.पासवान .शिवानंद तिवारी ,नीतीश ,लालमुनी चौबे ,आदि आदि ...( मुआफी चाहता हूँ नाम बहुत है लेकिन मै उन नामो का जिक्र कर रहा हूँ जो उठने के पहले ही भसक गए ) बहरहाल आंदोलन बे काबू होने की तरफ बढ़ने लगा .इसी बीच एक घटना और हो गयी .इंदिरा गांधी के खिलाफ राज नारायण की चुनाव याचिका न्यायालय में थी और उसका फैसला आगया .इंदिरागांधी दोषी पायी गयी ,उनका चुनाव निरस्त हो गया ६ साल के लिए चुनाव लड़ने की मनाही हो गयी .और वह आज के ही दिन यानी १२ जून को हुआ था .उस दिन वी पी सिंह इलाहाबाद में ही थे और अपने आवास 'ऐश महल;'में सो रहें थे ...
इमरजेंसी  ?
कभी अहमदाबाद जाना हो तो वहाँ दो दो लोंगो के बारे में दरियाफ्त करियेगा .मनीषी जानी और उमाकांत माकन .जिस आंदोलन को आज जे.पी. आंदोलन कहा जाता है उसकी नीव में ये दो चेहरे है .मनीषी गुमनामी में चले गए हैं और हमारा दोस्त उमाकांत माकन कांग्रेस में है .१९७३ का वाकया है साइंस कालेज के मेस में अचानक समोसे का दाम बढ़ गया .बच्चों ने विरोध किया .विरोध बढ़ता गया और मामला सरकार तक चला गया .उस समय गुजरात में चिमन भाई की सरकार थी छात्र आंदोलन से निपटने के लिए सरकार ने हिंसा का सहारा लिया जिसके चलते पूरे देश विशेषकर उत्तर भारत बौखला गया .उन दिनों मै विश्वविद्यालय में समाजवादी युवजन सभा का संयोजक था . छात्रसंघ के पूर्व  अध्यक्ष देवब्रत मजुमदार ने हमसे कहा कि तुम्हे अहमदाबाद जाना है ,जार्ज(फर्नांडिस) वहा पर मिलेंगे .मै गया और भाषण देते समय पकड़ लिया गया .तुरंत छूटा भी पर कैसे वह मजेदार वाकया है ,विषयान्तर हो रहा है लेकिन तब की राजनीति समझने के लिए जरूरी है ...पुलिस हमें लेकर थाने पहुची ही थी कि इतने में कहीं से राज नारायण जी को पता चल गया कि हमें पुलिस ने पकड़ लिया है .एक अम्बेसडर कार से नेता जी आये और आते ही पुलिस से पूछा .- कौन है जी ..बनारस से येहां आ गया .. बुलाओ तो ...नेता जी इतना ताबक् तोड़ बोल रहें थे कि पुलिस वाला कुछ समझ ही नहीं पाया और उसने हमें नेता जी के सामने कर दिया फिर क्या था नेता जी  गुस्से में लगे चीखने (यह उनका स्थाई भाव था जिसके चलते हमारी तरह के कई लोग पुलिस से बचे हैं )..चुतिया हो .. यहाँ आने की क्या जरूरत थी .. क्रांतिकारी बनते हो ...ये तो समझो ये बेचारा (इशारा पुलिस की तरफ था ) शरीफ है ..नालायक चलो बैठो गाड़ी में .. अभी बताता हूँ ..और उनका 'बताना'इतनी जल्दी संपन्न हो गया कि पुलिस वाला जब तक समझा होगा हम उसकी जद से काफी दूर आचुके थे .
       यह वही आंदोलन है समोसेवाला जिसने इतिहास रच दिया .कल बताएँगे इस आंदोलन में जे.पी. कैसे कूदे ?
एक कार्टून और फंसा  सियासत में
अभी अम्बेडकर ,संविधान बनने की गति ,और जनता की उत्कंठा को ले कर बने शंकर पिल्लई के कार्टून का विवाद थमा भी नहीं की 'अंग्रेजी हटाओ 'के विरोध में दक्षिण भारत की प्रतिक्रया पर आर . के . लक्ष्मण .का बनाया हुआ कार्टून विवाद में आगया .अभी तक करुणा निधि और वाइको का विरोध आचुका है .उनका कहना है की इस कार्टून से यह सन्देश जाता है की दक्षिण भारत के लड़के अंगरेजी नहीं जानते .१० जून और ११ जून के हिन्दू में इस पर लंबी चर्चा चली है .इस समूचे प्रकरण में जो मुद्दे उभर रहें है  उन गांठों को खोलना जरूरी है .
      अगर आपको याद हो तो आजादी की लड़ाई में एक भी ऐसा मुद्दा नहीं था जिस पर कांग्रेस ने अपनी राय न स्पष्ट कर दी हो . इसमें एक मुद्दा था राष्ट्र भाषा का .कांग्रेस ने 'हिन्दी' को राष्ट्रभाषा के रूप में इसे स्वीकार कर लिया .गांधी हिन्दी के सबसे बड़े पैरोकार थे .दक्षिण को और कई गैर हिन्दी इलाको को यह समझाया गया की हिन्दी हम पर थोपी जा रही है .चुनांचे इसका विरोध हुआ .१९३९ में तमिल नाडू इसके विरोध में उतरा लेकिन आजादी के जूनून में यह विरोध ज्यादा मुखर नहीं हो पाया .आजादी के बाद डॉ लोहिया ने जब भारतीय भाषा को बहस के केन्द्र में रख कर अंगरेजी हटाने की बात कही तो दक्षिण ने उसका गलत अर्थ निकाला कि हम पर हिन्दी थोपने की बात हो रही है .डॉ लोहिया के भाषा नीति पर समूचा देश आंदोलित हुआ .और सच कहा जाय तो आजादी के बाद यह पहला सवाल था जिस पर समूचा मुल्क कसमसाया .और नौजवानों की एक नई खेप राजनीति में सक्रीय हुई .उत्तर भारत में 'अंग्रेजी हटाओ 'एक बड़ा मुद्दा बना .उत्तर भारत के सारे शिक्षण संस्थान इसके घेरे में आ गए .बनारस विश्वविद्यालय इसका केन्द्र बना .देवब्रत मजुमदार ने जिस हिम्मत और दिलेरी के साथ इस आंदोलन की अगुआई की वह आज तक एक नजीर बनी हुई है .इलाहाबाद से श्याम पांडे ,नरेंद्र गुरू ,नरेंद्र देव पांडे ..बहुत सारे नाम है ...समाजवादी आंदोलन में जनेश्वर मिश्रा और आनान्देश्वर सिंह के बाद यह नई पीढ़ी आरही  थी .गोरखपुर से कल्पनाथ राय ,मेरठ से सत्यपाल मलिक बनारस से मार्कंडेय सिंह ,आनाद कुमार ,राम बचन पांडे ..
     उधर गैर हिन्दी इलाको में इस आंदोलन को गलत ढंग से पेश किया गया .उन लोंगो को यह स,म्झाया गया कि उत्तर भारत के लोग आप पर हिन्दी थोप रहें हैं .इसी विषय को लेकर आर. के. लक्षमण ने कार्टून बनाया .वही कार्टून फिर विवाद में आ गया है .हमारे मित्र वाइको जो कि एक दमदार और निर्भीक नेता हैं इस मुद्दे को लेकर मैदान में कूद चुके हैं .लगता है यह दौर ही कार्टून के विरोध का दौर है .

Tuesday, June 5, 2012

राजनीति में 'इच्छाशक्ति' और ' जोखिम '....मर चुकी है .
बिहार की ताजा घटना क्रम में एक बहस जारी है -बिहार की बीमारी और उसका इलाज .'काफी हाउस ' में पंकज श्रीवास्तव और संदीप् वर्मा ने जो सवाल उठाये हैं उसी पर विस्तार चाहता हूँ .
      बिहार को 'जातीय' कटघरे में खड़ा किया जा रहा है ,हमने असहमति जताई .......भट्टाचार्या ने इसका जिक्र किया है , सतही तौर पर देखा जाय तो सच भी लगता है लेकिन यह सच नहीं है .यह उसी तरह की बात हुई जैसे किसी के पैर में काँटा चुभा हो और उसे लंगड़ा मान लिया जाय .बिहार की 'तबियत' उसकी तमीज ,तहजीब बड़े 'दिल' की रही है .देश का कोइ भी भाग उसके मुकाबले में नहीं खड़ा हो सकता .अगर बिहार जाति  के कटघरे में कैद रहता तो एक मंग्लोरियन क्रिश्चियन जार्ज फर्नांडिस लगातार बिहार से न जीतते .एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण मधु लिमये बार बार बांका से न चुने जाते ,एक सिंधी जे. बी. कृपलानी .को बिहार संसद तक नहीं पहुचाता .( ख़याल रखियेगा हमने जिनका और जिन क्षेत्रों का जिक्र किया है यह कास्मोपालिटन शहरी इलाका नहीं है धुर गंवई इलाका हैं ) जबलपुर के हमारे दोस्त शरद यादअव आज तक उसी बिहार से जीत रहें हैं .बिहार पुरुषार्थ को अपनाने वाला सघन प्रदेश है .उसने जाति तोड़नेवाले दो बेहतरीन मुख्यमंत्री दिए हैं -कर्पूरी ठाकुर और चचा अब्दुल गफूर .लेकिन आज सियासत ही ऐसे बौने और नपुंशक नेतृत्व (?) की रखैल हो गयी है की उसमे किसी नयी पौध की सोच ही बेमानी लगती है .
   पंकज जी और संदीप भाई ने नेतृत्व में 'इच्छा' शक्ति और जोखिम का जिक्र किया है .यहाँ इंदिरा गांधी का जिक्र हुआ .की किस तरह इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीय करण किया प्रिविपर्ष को समाप्त किया ....हमें लगा की यह सही वक्त है और सही समय भी की हम इस 'जोखिम 'के इतिहास को भी खंगाल लें .आजादी के बाद कांगेस के अंदर जमे बैठे समाजवादी कांग्रेसी खेमा इन्ही मुद्दों को लेकर मुखर था ,नेहरु इस खेमे के साथ थे लेकिन पटेल  जिनका संगठन पर सबसे ज्यदा पकड़ थी ,के सामने नेहरु मुखर नहीं होते थे .बापू समाजवादियों के पक्षधर हो चुके थे .( गांधी के ही सुझाव 'कांग्रेस का अध्यक्ष किसी समाजवादी को बनाओ ' पर आचार्य कृपलानी अध्यक्ष बने थे ,गो की बापू का कहना था आचार्य नरेंद्र देव को बनाया जाय ) अचानक गांधी की ह्त्या हो गयी .और समाज्वादीबे बाप के हो गए . नेहरु की कोशिश रही की समाजवादी वापस आजाय .१९५२ के चुनाव ने समाजवादियो को और भी निराश किया .१९५४ में जे .पी.ने नेहरु को एक चौदह सूत्रीय प्रोग्राम भेजा .. जिसमे जमीन का बटवारा ,बैंकों का राष्ट्रीयकरण ,प्र्विपर्स की समाप्ति आदि आदि शामिल रहा .इन कार्य क्रमों से सहमत होने के बावजूद नेहरु उसे कार्य समिति यक नहीं ले जा सके ,जिसे १९६९ नेकीराम कांग्रेस में इंदिरा गांधी ने उठाया और पार्टी टूट गयी .( सच यह है की इंदिरा गांघी को पार्टी से बाहर कर दिया गया एक तरफ कामराज ,निजलिंगप्पा .नीलम संजीव रेड्डी .चंद्रभानु गुप्त .यस के पाटिल मोरार जी भाई एक तरफ और पान्म्च समाजवादियों-चंद्रशेखर,मोहन धरिया ,कृष्णकांत ,अर्जुन अरोड़ा ,और रामधन के साथ इंदिरा गांधी .लेकिन अपने प्रस्ताव पर इंदिरा गांघी डटी रही और महज चुनाव ही नहीं जीती राजनीति का बिसात ही पलट गया ..आज बिहार को एक दमदार नेतृत्व की जरूरत है लेकिन आज बिहार क्या समूचा देश ही 'दुम दारों 'की जेब में है .. फिर भी हम निराश नहीं हैं ..

Monday, June 4, 2012

बच्चों की किताबों का मेला
'किताबों में बिल्ली ने बच्चे दिए हैं 'सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता है जो उन्होंने बच्चों के लिए लिखी है .हमने जब बच्चों के किताबों का मेला लगाने की रूप रेखा शुरू बनानी शुरू की तो महिला मित्रों से संपर्क साधा . फेस बुक पर पहली रूप रेखा दिया तो सबसे पहले ब्राजील की वीरा रईस  और संदीप वर्मा ने उत्साहित किया . चंडी भारती ने हिस्सेदारी करने की इच्छा जाहिर की हिन्दी के प्रसिद्ध कथाकार डॉ. काशी नाथ ने इसमें भाग लेने की अनुमति दी . डॉ. मंजुला चौधरी ,काशी विद्यापीठ के प्रो. सुरेन्द्र प्रताप ,डॉ. अवधेश सिंह ,असलम परवेज खान , प्रसिद्ध चित्रकार मोहम्मद इलियाश ने बच्चो के साथखेलने की सहमति दी .हमने हिन्दी के प्रसिद्ध प्रकाशक अशोक माहेश्वरी (राज कमल ,राधा कृष्ण.और लोक भारती प्रकाशन ) से बात की उन्होंने बच्चों की किताबों का पूरा jakheeraa ही भेज दिया .
          देखते हैं क्या होता है ? संदीप वर्मा ने सुझाया है की बच्चों को किताब आदान प्रदान की सुविधा मिले जिससे वो एक ही किताब तक महदूद न रहें ,एक किताब पढ़ कर उसे बदल कर दूसरी ले जाय .
     बच्चे कहानी लिखते हैं
     बच्चे चित्र बनाते हैं
     बच्चे खेलते हैं
     बच्चों की दुनिया देखी जाय .

Sunday, June 3, 2012

बच्चों की किताबों का मेला
'किताबों में बिल्ली ने बच्चे दिए हैं '
'देखी तेरी दिल्ली' बोला और दिल्ली को अलविदा कह दिया .और आगया गाँव .पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक गाँव .देश के अन्य गांवों से थोड़ा अलहदा इसकी तस्वीर है .गरीबी है .ग़ुरबत है . लेकिन गैर बराबरी कम है .यहाँ बेचैनी नहीं है ,न तड़प है .लोग जी रहें हैं तो जिए ही जा रहें हैं .सरकार भरपूर कोशिश कर रही है 'विकास'(?) का विस्तार हो ,योजनाये आरही हैं ,जनता मुह बाए देख रही है .रकम आ रही है ,मिल बाँट कर खा रहें हैं .सरकार कहती है जनता अपना हिसाब देखे उसपर नक्लेल लगाए जनता कसमसाती जरूर है लेकिन 'ऊपर भी तो येही हो रहा है ' कह कर संतोष कर ले रही है .एक दिन मन में आया कुछ किया जाय ....चाचे तो चोर और मुह्मोट हो ही चुके हैं भतीजों को देखा जाय .हमने एक सवाल उठाया -बच्चों के लिए क्या किया जाय ? कई महिला मित्रों से राय ली .(पुरुषों से बाद में .. कारण भी बाद में बताउंगा ) दीदी (सुमीता चक्रवर्ती ,जानी मानी चित्रकार .मूर्तिशिल्पी .और सबसे बड़ी बात संवेदन शील है .बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और शान्ति निकेतन से प्रशिक्षित हैं ,बच्चों से जुड़ी रही हैं , विश्वविद्यालय (B.H.U.) की अध्यापकी छोड़ कर अपने घर पर ही रह कर बच्चों को चित्रकारी सिखाती हैं )ने सुझाया बच्चों की किताबों का मेला लगाओ ....बात में दम था .और उस पर मै काम करने लगा .लेकिन जबर दस्त निराशा हाथ लगी .यहाँ गाँव में लोंगो की इच्छा शक्ति ही मर चुकी है .हमसे कई तरह के सवाल पूछे गए -
       -इससे क्या होगा ?
       -कोइ आएगा भी ?
       -किताबें कहाँ से आयेगी ?
     - कौन खरीदेगा ?
      -कोर्स की किताब पढ़ने से बच्चों को फुर्शत ही नहीं .....किताब खरीदेंगे ?
     -खर्चा कौन देगा ? वगैरह वगैरह और सबसे मजेदार टिप्पणी तो आड़ से मिली ' ये मुह और मसूर की दाल ?' बाप मरा अधिअरिया बेटा पावर हाउस ?' कोइ सरकारी योजना मारा होगा .. कुछ नकुछ तो दिखानाही होगा ..' चूतियापा है .. खाली दिमाग सैतान का घर ..' भसक जाने  के लिए इतना काफी था .लेकिन मैंने सोचा और राय लूं ...हमारी एक दोस्त लन्दन में रहती है साधना ..दस्तकारों के साठ काम कर चुकी है उससे बात की ,उसने हौसला दिया ..तुम घबराओ नहीं .. हजारों हजार साल से गाँव उपेक्षित पड़ा है .. यह दिक्कत तो आयेगी ही लेकिन काम शुरू तो करो .और मैंने काम शुरू कर दिया ....अभी बताता हूँ बात कहाँ तक पहुँची ..?

Saturday, June 2, 2012

अलेक्स मेनन  एक  कलेटटर है
छत्तीसगढ़ सरकार ने नक्सल प्रभावित 'सुकमा' को नया जिला बनाया है .अलेक्स पौल मेनन इसके जिलाधिकारी बन कर गए .एक दिन जब अलेक्स एक गाँव में बैठ कर गाँव की समस्या सुन रहें थे ,उसी समय माओवादियों ने उनका अपहरण कर लिया .तेरह दिन तक वह जिलाधिकारी माओवादियों के कब्जे में रहा .अभी छूते हैं .यह देश की बड़ी खबर थी .लेकिन मीडिया के लिए इसमें 'बिकने की गुंजाइश ' कम दिखी इसी लिए समूची खबर हासिये से बाहर चली गयी ( द हिन्दू 'और 'प्रभात खबर ' छोड़ कर ) यह पोस्ट मै अपने दोस्त अजित अंजुम .ज्ञानेश पांडे और अरविन्द सिंह के नाम कर रहा हूँ .इस आशय के साथ की "खबर' कभी नहीं मरती .'बयान' मरता है ,घटना मरती है ,..... अलेक्स मेनन 'खबर है '
      अलेक्स जिले का सबसे बड़ा अधिकारी है ,वह तमाम ताम झाम छोड़ कर अकेले गाँव में क्यों गया ,जब किउसे मालुम है की यह माओवादियों का घर ही नहीं गढ़ है यहाँ अलेक्स की मनसा साफ़ है -संवाद बनाओ ' और बगैर संवाद के किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता .इस कलेत्तर ने 'सरकारी हिंसा' छोड़ कर ,व्यक्तिगत पुरुषार्थ को चुना और अकेला निकल पड़ा .तेरह दिन बाद जब अलेक्स बाहर आता है तो उसकी पहली प्रतिक्रया होती है -उनकी कुछ समस्याएं है ,उसे सुलझाना हमारी प्राथमिकता है .अलेक्स के इस बयान को रमण सरकार ने भले ही गंभीरता से न लिया हो लेकिन केन्द्र सरकार ने अलेक्स को ऊपर उठाकर सीधे संवाद कायम करने की सोची .इसके लिए केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जयराम  रमेश जिन्हें उनके जाननेवाले लोग जानते हैं की रमेश एक आदर्शवादी और बेबाक  व्यक्ति हैं खुद इस पहल में शामिल हुए और सुकमा पहुच गए .मजे की बात देखिये आजादी के साठ साल में जिन मुद्दों पर चर्चा तक नहीं हुई थी वह हाथो हाथ निपटा लिया गया .
     अलेक्स ने जयराम रमेश से कहा की अगर हम कुछ काम करलें तो माओवाद के बढते प्रभाव को रोक सकते है .जय राम रमेश खुल कर सामने आये .आश्वासन नहीं दिया बल्की वहीं बैठे बैठे नतीजा भी देते गए .इसके लिए अलेक्स ने पूरे जिले से तमाम चुने हुए गाँव प्रतिनिधियों को पहले से ही बुला रखा था .उनकी  मौजूदगी में सारे फैसले हुए .अलेक्स ने पहली मांग रखी-सुकमा से कोंताब्लाक तक ८० किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण जिसपर अमूमन १६० करोड़ कालागत आएगा और कोंट  इस हाइवे के चलते पदेश और देश के अन्य भाग से जुड जायगा .रमेश ने ओनी निजी पहल पर केन्द्रीय सड़क मंत्री पी. सी. जोशी से बात की (वहीं से और सबके सामने ) सड़क बनने का एलान होगया .और विकेन्द्री व्यवस्था से ,इसका ठेका किसी एक ठेकेदार को न देकर छोटे छोटे टुकड़ों में कर के लोकल लोंगो को शामिल करने की बात तय हो गयी .इसके अलावाजी और जरूरी जरूरियात के मुद्डून पर काम करने का एलान हुआ उसमे पीने का पानी का इंतजाम ,ग्राम पंचायतो कानिर्माण ,सवाद के लिए टावेर का शुरू करना शामिल रहा .इतना ही नहीं रमेश ने सुकमा के युवकों और चुने हुए प्रतिनिधियों को सरकारी खर्च पर केरला और सिक्किम के पंचायती राज को देखने समझने के लिए आमंत्रित किया . इस तरह एक कलेत्तर अलेक्स ने एक बुनियाद रखी .
मै 'काफी हाउस' गयाथा
अम्बरीश भाई की चिंता 'अखबार नवीसों ' के दलीय प्रतिबद्धता को लेकर थी तो पूजा जी बिहार में उठ रहें जातीय उन्माद को लेकर है .नीलाक्षी जी 'इधर' उधर' हैं .वहाँ दलित और मार्क्स दोनों अपने अपने ढंग से रंगे जा रहें है .मुखिया की ह्त्या पर मैंने अम्बरीश भी की खबर पर  टिप्पणी -यह दो 'अति' यों का पूर्वानुमानित परिणति है ,एक 'हिंसा' को अपनाता है और वही 'हिंसा' का शिकार भी  होता है .कहते हुए बाहर आ रहा था की पूजा जी की एक गंभीर आवाज सुनाई दी -क्या बिहार जातीय और वर्ग  संघर्ष का शिकार हुआ है ? बिहार सरकार इससे निपटेगी कैसे ?
   पूजाजी ! हम आपको थोड़ा पीछे ले चलते हैं .मार्क्स किसी भी संघर्ष के नींव में 'पूजी' को मुख्य कारण मानता है .और यह सच भी है .भारतीय उपमहाद्वीप में अंग्रेजों की लूट संस्कृति ने पूंजी की शक्ल ही बदल दी .मशीन उनकी ,मशीन उनके पास उनके अपने देश में ,कच्चा माल यहा का .भारतीय उपमहाद्वीप की पूंजी से अंग्रेज संस्कृति फलती फूलती रही .और जब वे यहा से चले गए तो इस द्वीप के पास जो इसकी पूंजी बची वह न तो मशीन थी न ही सिक्का .इसके पास कुछ बचा रह गया था तो बस 'भूमि' थी .अब सवाल था इसके बटवारे का .१९५२ में संविधान लागू होता है .संविधान 'संपत्ति का  अधिकार ' दे चुकी है ,अन्य अधिकारों की तरह .जब जमींदारी उन्मूलन के तहत सरकार ने जमीन  बटवारे की चर्चा चलाई तो इसका जबरदस्त विरोध हुआ .कांग्रेस बटवारे के पक्ष में है और दक्षिण पंथी संघी घराना जमींदारी प्रथा चालू रखने के पक्ष में है साम्यवादी जमीन को पूंजी मानने के लिए तैयार नहीं .जमींदारों ने उच्चतम न्यायालय की शरण ली उनका आधार था संविधान में प्रदत्त 'संपत्ति का अधकार ' ...कांग्रेस सरकार ने पहला संविधान संसोधन किया और जमींदारी उन्मूलन क़ानून बना .जमीन की सीमा तय की गयी .'सीलिंग ' लागू हुई .जमीन बटवारे का सबसे वीभत्स रूप अगर किसी राज्य में देखने को मिलेगा तो वह बिहार है . आज भी ऐसे ऐसे किसान है जिनके पास जमीन ही जमीन है बाकी आबादी ही मजूर है .तो पूजा जी जब तक जमीन का फैसला नहीं होगा हिंसा का क्रम टूटेगा नहीं .