Monday, February 8, 2016

चिखुरी / चंचल
चलो झूठ बोला जाय ,'अमी तोमा के भालोबासी
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...'राजनीति का होती है , इस सवाल को जड़ी कोइ हल करदे तो हम उसे पाइथागोरस से भी बड़ा बिद्वान मान लेंगे . नवल उपाधिया जब भी ऐसा सवाल पूछते हैं तो पूछ कर त्रिभंगी मुद्रा में हो जाते हैं ,गर्दन बायीं तरफ झुक जाती है , कमर दाहिनी तरफ और दोनों पैर एक दुआसरे के साथ कैंची मार लेते है .आँख सिकुड़ जाती है मुह ऊपर से नीचे की तरफ चिपक जाता है और भरपूर ढंग से कान तक बढ़ जाता है थिल वैसे लगता है जैसे सावन में सूखा पड़े से जमीन में दरार . सवाल सदन में है ,उस पर लोग सोचें , इधर नवल व्यस्त है खैनी मलने में . मद्दू पत्रकार को नवल की यह ' हरकत ' कत्तई नहीं पसंद है .नवल का इस तरह तीन टेढ़े का टेढ़ होना नहीं , न ही उसका मुह बनाना , मुह उसका है कमबख्त जैसा चाहे बनाए हमसे का लेना , लेकिन उसका इस तरह से खैनी बनाना ? उफ़ ! देखिये न कितना वीभत्स लगता है , पूरा लुच्चा लगता है बायीं मुठ्ठी में गदोरी पर खैनी और चूना रख कर मुत्थ्थी बंद करके उसमे अंगूठे के बगल वाली बड़ी उंगली दाल कर ऐसे रगड़ता है कि ... ' आपकी खैनी बन गयी हो तो उसे उंगली समेत मुह में डाल लीजिए और बैठ जाइए ' नवल जानते हैं ,मद्दू जब आप जोड़ कर किसी से बात करते हैं तो उसका मतलब क्या होता है . नवल ने फिस्स से हंस दिया .कयूम मियाँ डीएम साढ़े बैठे थे , जुम्बिश हुयी - बरखुरदार ! आपका सवाल है तो बहुत माकूल . पर पेचिंदा भी है .उमर दरजी ने बीच में ही रोका - ई पेठा गोरस है , कि पेठा गोरख है ? कीन उपधिया को मौक़ा मिल गया - जाहिल के जाहिल ही रहोगे , आठवीं ने नहीं पढ़ा था त्रिभुज के तीनो कोणों का योग दो समकोण के बराबर होता है . ? इसे कहते हैं पैथ्गोरस का सिद्धांत . लेकिन तुम्हे इससे का लेना देना , कैंची चलाओ और सुथने की मियानी बनाओ . उमर की आँख गोल हो गयी - अहिये अब हाफ पैंट ठीक कराये , उमर अभी कुछ और बोलते तब तक लखन कहार ने पूछ लिया - राजनीति पर बात शुरू हुयी थी ,,,, भिखई मास्टर ने अखबार रख दिया - यह एक कुटीर उद्योग है , जो घर घर में चलता है इसे झूठ , प्रपंच , लफ्फाजी , लालच से चलाया जाता है , जिससे एक काठ की कुर्सी निकलती है पर उसको आम भाषा में ओहदा बोला समझा जाता है , इस कुर्सी में एक छेद होता है , कुर्सी को जितना बेहुर्मत करोगे छेद से उतना ही पैसा गिरेगा . पहले इसे भर्ष्टाचार माना जाता रहा लेकिन अब यह रसूख है और रवायत है .चिखुरी बड़े गौर से भिखई मास्टर को सुनते रहे . भिखई मास्टर समझ गए कि अब चुप हो जाना चाहिए , और चुप हो गए .
            भिख्यी मास्टर ने जो कुछ भी कहा उसे सबने अपने अपने खांचे के हिसाब से नापना शुरू कर दिया . लखन कहार ने गाँव के परधान को सामने रख कर मन ही मन छीलने लगे . मनरेगा . सरकार की कितनी बड़ी सोच . गंवई मजदूर , बेरोजगार मजूर , सब को उनके अपने गाँव में रोजगार मिले . शहर की तरफ हो रहे पलायन को रोका जाय . बैंक में खाता कहने एक दिन में दस करोड़ लोग इस योजना से जुड़े . लेकिन हो क्या रहा है , परधान जी के रोजनामचे में ऐसे ऐसे लोग दर्ज हुए जिन्होंने कभी फावड़ा को छुआ तक नहीं है. वो बैठे दूकान चला रहे हैं , सब्जी बर्च रहे हैं , तहसील में राजनीति करने जाते हैं . किसी काम के नहीं है सब कार्ड धारक हो गए. उनके नाम पर रोजगार गारंटी के नामपर सरकार भुगतान कर रही है खाते से पैसा निकल रहा है , सौ रूपये कार्ड धारक को सोलह सौ परधान के खीसे में . खुश दोनों है - घर बैठे एक दस्तखत से अगर आपको सौ , दो सौ मिल जाय तो हर्ज का है ? लम्मरदार के घर से मुख्य सड़क तक तीन तीनबार सड़क बनती है . लाखों का बजट .खानेवाले भी तो कम नहीं , परधान है , सचिव है इंजीनियर है जो सड़क पास कर्त्या है . फिर कागद तो ब्लोक अधिकारी ही आगे बढ़ाएगा न , सब का हिस्सा बंधा हुआ है कितना साफ़ सुथरा बँटवारा होता है किसी को कोइ टेंशन नहीं .राहीव गांधी ने सही कहा था केन्द्र दस रुपया भजेगा तो गाँव तक पहुँचते पहुँचते आठ आना हो जाता है . सब जगह यही हाल है . लूट हमारी राष्ट्रीय मान्यता में दर्ज हो गयी है . गाँव प्रधान से शुरू होता है ऊपर ऊँची कुर्सी तक बढ़ता चला जाता है . और बड़ी बेहयाई के साथ . तर्क सुन लीजिए - ऊपर भी तो यही हो रहा है ' भइये ये सब राजनीति में है .
      चाय की भट्ठी सुलग चुकी है इसलिए लाल साहेब भी अब खाली हैं बोलने के लिए - एक बात बताया जाय , क्या बगैर ओहदे के राजनीति नहीं हो सकती , ? यस सवाल और भी टेढ़ा होकर सामने आया . चुनांचे सदन में सन्नाटा छा गया , चिखुरी मुस्कुराए . - होती थी , कारगर तरीके से होती थी अब उसका रिवाज खत्म हो गया . वह पुरुषार्थ की राजनीति थी आज जो राजनीति चल रही है यह अनुदान की राजनीति है , बगैर ओहदे की राजनीति करनेवाले आज भी चमक रहे हैं . इतिहास में वही मिलेंगे . मोहन दास करमचंद गांधी . जे पी . लोहिया , आचार्य नरेंद्र देव और भी बहुत से नाम हैं . इनकी हर बात पर जनता भरोसा रखती थी .क्यों कि इनकी बात जन हिट की होती थी . इसमें नेता का अपना कोइ स्वार्थ नहीं रहता था . और आज देखो हर कदम पर झूठ , फरेब , ओट के लिए कुछ भी कह सकते हैं ,और बाद में उसी गति मुकर भी जाते हैं बड़ी बेशर्मी के साथ और कहेंगे यह तो ' जुमला ' था . देखना इसी बंगाल में आएगा मदारी . लाव लस्कर के साथ . बा बुलंद आवाज में बोलेगा - की रे की खबोर . आमी तोमार बंधू , तुमी आमार मीत , आमी तोमार के भालोबासी . बउ डी कोहनी से झुम्पा को झाक्झोरेगी - देखून ! की बालो मानुष . लेकिन अब नहीं चलेगा . चोलबे ना . नवल को याद आया गेहूं के खेत में पानी खोल कर आये हैं . भागे . गाते गाते - जदी केऊ डाक सुने ना तोर , एकलएकला चलो ..

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