Friday, September 6, 2013

अन्न भोग  
अन्न महज पेट भरने की सामग्री भर नहीं है . पेट को अन्न की जरूरत भी नहीं  होती और न ही अन्न को पेट पसंद करता है . भूख दिमाग में लगती है . बेचारा पेट अपनी बनावट और बुनावट के लिए दिमाग की बेगारी करता है . बाज दफे तो पेट दिमाग के बर् खिलाफ जाकर हड़ताल तक कर बैठता है . जो भी हो लेकिन अन्न की जरूरत तो होती ही है . 
    प्रकृति में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो अन्न को खाता ही नहीं उससे खेलता भी है . अपने रूचि के अनुरूप अन्न को बदलता है . इस अन्न बदलाव पर आज फेसबुक पर अंजना चौहान सिंह का एक आलेख है 'जंक फ़ूड ' के खिलाफ . हमने देखा कि इतना खूबसूरत और ज्ञानवर्धक आलेख बहुत  हल्के से चला जा रहा है . इसलिए हम अंजना जी के साथ उनके किचेन तक जाने की इजाजत  चाहता हूँ . हमारे पास कई टिप्स हैं . 
         'अन्न की पूजा करो ' यह प्राण है .
वेद की ऋचा है जिसका भाष्य उपनिषद करता है . कई वामपंथी जो संस्कृत से , वेद उपनिषद से चिढते हैं उनसे कहता हूँ मित्र 'अन्न ' पर की गयी वेद ,उपनिषद की मान्यता से आप इनकार भले ही करें लेकिन खाने के लिए अन्न ही खोजेंगे हथौड़ा और रिंच नहीं हजम कर पायंगे . दक्षिण पंथी इनसे भी दो कदम आगे है . वह इस ज्ञान को 'तुन' के लाल कपड़े में लपेट कर फूल चढ़ा देगा और झुक कर आगे बढ़ जायगा . संस्कृत ज्ञान का भण्डार है पर ये पोंगापंथी अपनी हरकतों से बाज नहीं आयेंगे . 
   एक दिन भाई धर्मेन्द्र राय ने किसी की युक्ति को फेस बुक पर जस का तस दर्ज किया - आप अपनी जिंदगी में कभी किसी पुलिस अधिकारी से मिल लिए या किसी डाक्टर से मिल लिए तो उसे आजीवन याद करते रहते हैं लेकिन जिससे हर दिन तीनबार मिलते हैं उसे कत्तई नहीं याद करते .वह है अन्न और अन्नदाता . ' 
    इस अन्न के साथ आदमी के बच्चे ने बड़ा मजाक किया है . उसका रूप बिगाड़ कर . उसे सुधारने की जरूरत है जिससे आदमी का बच्चा तो सुधरा रहे . 
        अन्न ग्रहण पर फिर संस्कृत पर आ रहा हूँ . संस्कृत ज्ञान कहता है - भोजन को पहले देखो . एक सौंदर्यबोध पैदा होगा थाली में सजे अन्न से . उसकी महक लो , दूसरी इंद्री जागृत होगी . उसे छुओ . स्पर्श करो . फिर उसका स्वाद लो आहिस्ता आहिस्ता इस अन्न का मूल तत्व आपकी जननेंद्रिय को विकसित करेगी . यह है अन्न महिमा . 
   आखीर में किसका अन्न खाते हो . यह बहुत जरूरी है . इसका सबसे खूब सूरत उदाहरण महा भारत में मिलता है . भीष्म पितामह घायल होकर गिर गए हैं . सूर्य के उत्तरायण होने पर ही प्रंका त्याग करेंगे . सो सांझ को जब कौरव पांडव युद्ध विराम करते हैं तो अपने मुखिया से नीति सीखने भीष्म के पास इकट्ठा होते हैं और भीष्म नीति की शिक्षा देते हैं . एक दिन जब भीष्म बोल रहे थे तो द्रौपदी ने ठहाका लगाया . अर्जुन को गुस्सा आगया , वे द्रौपदी की तरफ दौड़े . कृष्ण बीच में आ गए और बोले कि पहले उससे पूछो तो सही कि वह हंसी क्यों . द्रौपदी ने भीष्म से कहा -आज आप नीति की शिक्षा दे रहे हैं उस समय आपकी नीति कहाँ थी जब चीर हरण हो रहा था ? छल से युधिष्ठिर को ठगा जा रहा था ,,,,, भीष्म ने बहुत खूबसूरत जवाब दिया था - बेटी ! मै अन्न दोष से पीड़ित था . यह अन्न दोष आज के समाज की सबसे बड़ी बीमारी है . भ्रष्टाचार , राजनीति , मीडिया सब के सब अन्न दोष से पीड़ित हैं .

1 comment:

  1. चंचल जी ने मेरे इस प्रश्न का अब तक जवाब नहीं दिया कि नौजवानी में समाजवाद और गैर-कांग्रेसवाद का झंडा बुलंद करने वाले अंतत: कांग्रेस का ही हिस्सा बनने को मजबूर क्यों हो जाते हैं ? भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वाले सत्ता मिलने पर खुद भ्रष्टाचार में गले तक क्यों डूब जाते हैं ? अंग्रेज़ी का विरोध करने वाले अपने बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूल में क्यों भेजते हैं ? इन प्रश्नों का चलताऊ जवाब नहीं, राजनैतिक-समाजशास्त्रीय विश्लेषण की मांग करते हैं। मैंने कई लोगों से पूछा, लेकिन उनके गोलमोल जवाब से संतुष्ट नहीं हो सका। आंदोलन और विचारधारा से मोहभंग होने पर निष्क्रिय हो जाना एक बात है, लेकिन उसी धारा का हिस्सा बन जाना जिसके विरोध की वैकल्पिक राजनीति आप करते रहे हों - ये मेरी समझ से परे है। कृपया विद्वतजन मार्गदर्शन करें। चंचल जी से भी जवाब की अपेक्षा है। - राजेंद्र मिश्र

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