Friday, October 16, 2015

बतकही / चंचल
गांधी ,नेहरु , जे पी . लोहिया को  पढ़ कर का करेंगे
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          ई राजेन्द्र चौधरी कौन है ?
- सच्ची बोलें ? तोर बाप है . चोर , बनडोल , डकैत , चमचोर ,बलात्कारी औ लुटेरों क इतिहास तुम्हरी जबान पर है , औ पूछि रहा है राजेन्द्र चौधरी कौन है ? तुम्हारी गलती नहीं है , पिछले कुछ सालों से बयार ही ऐसी चली है कि जो जितना बड़ा अपराधी ,उतना ही बड़ा उसका लावाजिमा और उतनी ही बड़ी पूजा . कल तक रहा कि अगर कोइ अपराध में पकड़ा गया तो क़ानून बाद में सजा देता रहा , समाज पहले ही टाट बाहर कर देता रहा औ हुक्का पानी सब बंद . राजिंदर के सवाल पर लम्मरदार का इस तरह भडकना लोगों को अजीब लगा , क्यों कि लम्मरदार जल्दी उबलते नहीं . लेकिन लगता है कहीं और से बौखलाए हुए आये हैं . लाल साहेब ने सम्भाला - बैठिये लम्मरदार ! आज अदरख की चाय बना रहा हूँ . का बात है आज सुबहे उखड गए ? लम्मरदार ने लाठी बगल दीवार पर टिकाया और तख़्त पे जम कर बैठ गए .लंबी सांस ली और बोलना शुरू किये . पूरे गाँव में का अगल बगल हर जगह चर्चा है कि एक ठेठ गाँव में लोगों को पढ़ने के लिए , उठने बैठने के लिए , और अपने पुरखों के बारे में जानने के लिए ' दस्तावेज ' बनाया जारहा है ....... बात पूरी हो इसके पहले ही उमर दरजी ने टोका - काका ! आज वाकई बहकी बहकी बात कर रहो  हो कुछो , कुछो ना समझ में आय रहा बा , एंटीना से ऊपर निकल जा रहा है ? लम्मरदार मुस्कुराए .बताता हूँ .परधान क लडिका पढ़ लिख के गाँव आवा . कुछ दिन तो यूँ ही गाँव गाँव घूमता रहा . पता नहीं का सनक सवार हुयी कि बोला - अब गाँव में एक पुस्तकालय की जरूरत है , एक बाजार की जरूरत है जहां गाँव में बनने वाले पुश्तैनी रोजगार को फिर से स्थापित किया जा सके ,इस समय समूचे देश को इन दो चीजों की बहुत जरूरत है वरना आगे आने वाली पीढ़ी तो और भी निकम्मी  निकलेगी . अपनी कुल पूंजी लगा कर उसने पुत्कालय तो खोल दिया , अब उसे और आगे बढ़ाना था . जहां एक जगह वे सारे दस्तावेज मुहैया हो सकें जिन्हें हमारी पीढ़ी नहीं जानती . गांधी , नेहरु , डॉ लोहिया , जे पी . आज की पीढ़ी के लिए यह जरूरी है कि इन पुरखों के बारे में गंभीरता से जाने . उस हिस्से का नाम रखा गया है दस्तावेज . इसी के बगल में एक कतार से छोटी छोटी दुकाने बनाने का इरादा है जहां लोहार , कुम्हार , धरिकार , रंगरेज . धुनिया वगैरह अपने पुश्तैनी पेशे के साथ इज्जत के साथ ,अपना काम करे और उसे देश दुनिया देखे . इस आयोजन के लिए राजेन्द्र चौधुरी ने अपने निधि से मदद किये . और इसकी चर्चा चारों ओर है . क्यों कि अब तक जो होता रहा कि सांसद और विधायक अपने निधी से जो भी मदद करते रहे , पहले उसका कमीशन ले लेते रहे . यहाँ एक भी पैसे का लेन देन नहीं हुआ है . इसकी वजह जान लो चौधरी राजेन्द्र निहायत ईमानदार नेता है और खुत्थड समाजवादी . औ ई बकलोल पूछ रहा है कि कौन हैं राजेन्द्र चौधरी ? अजीब हालत में समाज पहुँच चुका है . न नेक काम की चर्चा , न नेक नाम की जानकारी . इस लिए गुस्सा आ गया . कल का किस्सा सुने ? बनारस हवाई अड्डे पर कुछ देर के लिए मुलायम सिंह यादव रुके . बिहार से वापस आ रहे थे . गणेशी परम्परा के समाजवादी वहाँ पहुँच गए . मुलायम सिंह से कहा गया कि बनारस में डॉ लोहिया की एक प्रतिमा लगवा दीजिए .मुलायम सिंह ने बहुत माकूल जवाब दिया . - डॉ लोहिया पर सेमीनार भी किये हो कभी ? जे पी और आचार्य नरेंद्र देव को पढ़े हो ? समाजवादियों में आपस में ही तू तू मै मै शुरू हो गयी और मुलायम जी बगैर विश्राम किये अपनी यात्रा पर चले गए . लेकिन एक सवाल तो छोड़ ही गए - मूर्ती पूजा और विचार में किसको पकडना है ? और किसके विचार ?
   - तो इस दस्तावेज में कौन कौन से लोग आयेंगे ? कीन उपाधिया ने कुटिल हंसी के साथ पूछा क्यों कि जब से यह पुस्ताकलय शुरू हुआ है कुछ नौजवान गांधी लोहिया आचार्य , पंडित नेहरु के बारे में जानने लगे हैं और संघियों के झूठ का जवाब भी देने लगे हैं ,कीन उपाधिया को यह खटकता है क्यों कि ये पुराने संघी हैं और अब तक जो कुछ भी झूठ फुर बोलते थे पब्लिक मुह बाए सुनती थी . उनके प्रचार को धक्का लगा है . लम्मरदार ने कीन को देख कर हँसे -  बकलोल ! एक साल से भी ज्यादा हुए केन्द्र में तुम्हारी सरकार है . चुनाव हुए और हो रहे हैं . कहीं एक भी जगह अपने किसी नेता का नाम सुना कि उनके नाम पर वोट माग रहे हों ? हेडगवार , गोलवरकर , अटल या अडवानी किसी का नाम आया ? कभी गांधी , कभी पटेल , अब डॉ लोहिया , जे पी .. ? बोल ! सच है न . और जब गांधी लोहिया जे पी के विचार से मुठभेड़ होगी तब क्या करोगे ? अब भी वक्त है तू ' दस्तावेज में बैठना शुरू कर . वहाँ तुम्हारी भी किताबें मिलेंगी जिसमे तुमने नफरत के पाथ पढाएं हैं , उन्हें पढ़ कर तुम्हे शर्म आयेगी . पूछों न अपने नेता से कि बंच आफ थाट कहाँ है / बच्चू कोइ न कोइ समाजवादी ज़िंदा रहेगा और वह ठोस धरातल बनाएगा ही . परम्परा मिटनेवाली नहीं है . राजेन्द्र चौधरी उसकी एक मजबूत कड़ी हैं . उनके पास न मकान है , न बख्तर बंद गाड़ियों का काफिला , न बन्दूक है न संदूक लेकिन आज वह उत्तर प्रदेश का एक मजबूत शख्स है जिसके पास उसकी सबसे बड़ी तिजारत है इमानदारी और वैचारिक प्रतिबद्धता . चल वक्त हो तो दस्तावेज चलो .

Tuesday, September 15, 2015

चिखुरी / चंचल
बिहार खुदे एक जाति है भइये g
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                    '.....जब से इ मुआ आवा है, सब उलटा पुल्टा हो रहा बा .और त और अबकी बार मुह झौंसा बदरा भी दगा दे रहा हउ . भला बताओ सावन भादों में धूल उड़े औ दिन मे दुआरे दुआरे सियार फेकरै . ... बटुली में करछुल डाल कर जन्तुला ने उसे दो तीन बार खड खड़ाया और लगी महगाई को गरिआने .- दाल रोटी पे जिंदगी कटत रही , न उधो क लेना न माधो क देना कोइ बात की फिकर ना रहत रही . इहौ छिनार जा के आसमान पे बैठी है , भला बताओ कभी सोचा रहा कि डेढ़ सौ रुपिया में सेर भर दाल बिकी ? जारे जमाना ! तोर नास होय . पियाज देखो ... हरामी बिसुनाथ बनिया न गाँव देखत बा , न समाज ! सौदा -सुल्फी लेय गयी रही परबतिया क अंगुली छू के फंसावत रहा कि चल कोठरी में तुमका  सेर भर पियाज देब ... महगाई पर जन्तुला चालु रहती लेकिन चूल्हे ने रोक दिया . वह फूंक मार कर आग जलाने के लिए झुकी ही थी कि झबरा ने मौके का फायदा उठाया और थाली से एक रोटी खींच लिया .जन्तुला ने भांप लिया कि झबरे ने रोटी उठा लिया है . जन्तुला ने  अधजली लकड़ी का चैइला उठाया और झबरे पे दे मारा . रोटी वहीं जमीन पे गिर गयी और झबरा पों पों करते भागा .जन्तूला महगाई भूल गयी और लगी कुकुरों को कोसने - मुआ इ दुनो जब से आये हैं जीना हराम कर दिये हैं .. पूरे गाँव क नीद हराम किये बा ....एकरी दाढ़ी में ....उधर से खैय्नी मलते आ रहे नवल उपाधिया ने जन्तूला को सलाम करके खड़े हो गए . गाँव के रिश्ते में जन्तूला नवल उपाध्याय की बुआ लगती हैं ,इस रिश्ते दोनों में खुल कर मजाक होता है . शुरुआत नवल के दुअर्थी सवालों से होता है और जब जन्तुला सवालों से घिर जाती हैं तो सीधे सीधे नवल की माँ बहन अंग प्रति अंग की बनावट से लेकर वह सब कुछ शुरू कर देती हैं जो भारतीय समाज में गोपनीय कर्म मान लिया गया है . गरज यह कि जब जन्तूला शुरू होती हैं तो उसे नवल नहीं सुनते , वो कब के मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गए होते हैं उसे सुनते है उमर दरजी ,रामलाल तेली .कनुयी भक्तिन चुन्नी लाल की बकरी नीम की फुनगी . आज फिर वही मौक़ा आ गया . नवल रुके - किसे गरिया रही हो बुआ ? जन्तुला ने फुकती को ठीक किया - इहै दुनो कुकुर एक करिअवा औ एक इ झबरा . इ दुनौ  हलाकान मचाये हैं . आग न देखें न पीछ .. जो भी दिखेगा , मार के  झपट्टा चलि देहें .... नवल और भी सुनते लेकिन आज उन्हें जल्दी है चौराहे पर सब उनका इन्तजार कर रहे होंगे - तो आज कौन रहा बुआ ? झबरा कि करिअवा ? औ कहाँ मारिस ह झपट्टा , आगे कि ...बस इतना काफी था जन्तुला नवल की माँ पर चढ़ बैठी . लगी बखान करने , लेकिन नवल तो जा चुके थे . नवल मुस्कुराते हुए बढे जा रहे थे कि अचानक उनकी टकराहट बहिर दुबे से हो गयी जो हबीब की दूकान पर खड़े चड्ढी सिलवा  रहे थे . बहिर दुबे सुनते कम हैं लेकिन देखने में कोइ कोताही नहीं करते . आधी बात वे सामनेवाले के हाव भाव से जान लेते हैं ,जो नहीं जान्पाते उसे पूछ लेते हैं . - नवल ! का हुआ उधर जन्तुला काहे उखाड़ी हाउ ? झबरा जन्तुला क रोटी लेके भाग्गयल . बहिर दुबे चौंके - कहाँ भोजपुर कहाँ भागलपुर ? इसकी ससुराल तो भोजपुर रही ,एक बार लड़ के आयी तब से यहीं है इसे का मालुम भागल पुर की बात ? नवल धीरे से बुदबुदाए - अब इ बहिर राम के के समुझावे . भाग गयल के भागलपुर समझ लिए हैं .
       नवल जब चौराहे पर पहुचे तो सदन शुरू हो चुका था .चाय की केटली भट्ठी पर , और भट्ठी काले धुएं से घिरी पडी है लाल साहेब बेना हौंक रहे हैं . नवल का स्वागत लखन कहार ने किया - आओ हो नवल भाय कौनो खबर ? काहे नहीं बा , हम कहत रहे झबरा रोटी लेके भाग गयल औ बहिर दुबे लगे भागल पुर पे प्रबचन देने ,किसी तरह से निकल पाए . नवल यह जानते थे कि वे भागलपुर से निकले नहीं हैं ,अब भागलपुर जा रहे हैं . और हुआ वही भागलपुर जेरे बहस हो गया . कीन उपाधिया ब कलम खुद 'पदैसी संघी हूँ ' भागल पुर सुनते ही उछले - भीड़ देखा ? इसे कहते हैं रैली . आया समझ में . उमर ने चिढाया - पटना देखा , इसे कहते हैं रेला . सुनते ही जोर जोर का ठहाका लगा . मद्दू पत्रकार ने संजीदगी से बोलना शुरू किया . इस बार बिहार की लड़ाई आर पार की है . साम्प्रदायिकता और समाजवादियों के बीच . फैसला बिहार को करना है . ... कें ने सवाल उठाया - और कांग्रेस भी तो है . दूसरी बात नीतिश और लालू तो जातिवादी पार्टी चलाते हैं ? चिखुरी जो अब तक चुप थे कीन को घुडकी दी - कुछ जानते भी हो कि बकवास ही करोगे ?कांग्रेस सबदा कौन समाजवादी है . उसकी रसीद देखो सबसे पहले उसमे यही लिखा है समाजवादी समाज के प्रति प्रतिबद्धता .जे पी . डॉ लोहिया . आचार्य कृपलानी , आचार्य नरेंद्र देव बगैर इनके कांग्रेस का इतिहास ही नहीं पूरा होगा . और सुन कीन अपना यह भ्रामक प्रचार बंद कर कि बिजार में जातिबादी राजनीति होती है . यहाँ अगर जातिबादी राजनीति होती तो इसी बिहार से कृपलानी , जार्ज , मधुलिमये यहीं से जीतते रहे हैं यह प्रचार वही करते हैं जो खुद सिकुड़े हुए मन के हैं . दिल्लीमे पूर्वोत्तर राज्यों के बच्चे पर हमला करेंगे . बंबई में बिहारी मारे जांएगे , उन्ही के साथ मिल कर राजनीति करने वाले बिहार पर आरोप लगाएंगे ? बिहार किसी भ्रम में नहीं है . देश का जनतंत्र ज़िंदा रहे यह उसकी कामना है . देखा नहीं उस दिन पटना का रेला ? छल कपट बंद करो समझे कीन .? कीन समझें या न समझे लेकिन नवल समझ गए और गाते हुए निकले मोसो छल किये जाय .... सैयां बेईमान ...

Wednesday, September 9, 2015

बतकही / चंचल
अपन त मंसूबे में ही कंगाल हैं .
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 होत भिनसार    लम्मरदार के दरवाजे पर ,बाप बेटे में बतकही चालू हो गयी और बढते बढते कबाहट तक पहुँच गयी .चूंकी लखन कहार का सदर मोहारा उत्तर तरफ है और उत्तर लम्मरदार क दुआर बिलकुल सामने है इस वजह से लम्मरदार के दरवाजे पर जो कुछ भी होता है उसमे लखन कहार बतौर प्रेक्षक शामिल हो जाते हैं . हूँ हाँ करते कराते सारी खबर लखन को मुफ्त में मिल जाती है . अब उनकी दिक्कत हैं कि उन्हें दो चीज नहीं पचती एक बात और दूसरी बतासा .गरज यह कि ये दोनों ही लखन के प्रिय पदार्थ हैं . होत भिनसार जब सो के उठते हैं तो दो ठो बतासा खायेंगे और लोटा भर पानी पीकर ,लोटा भर पानी लेकर  'मैदान ' चल देते हैं . और गाँव गिराँव की कोइ खबर हो उसे लखन अपने ढंग से पचाते हैं और अपने ढंग से निकालते हैं . आज लम्मरदार के घर की खबर लेकर लखन चौराहे पहुंचे हैं .चौराहे पर बनी लाल साहेब की चाय की दूकान गाँव  की संसद है .कोइ कहीं से भी ,किसी भी जुबान में , कुछ भी बोलने की आजादी रखता है . यहाँ कोइ निष्कासन नहीं है . उमर दरजी ने लखन कहार को उकसाया - आज किस बात पे लम्मरदार उखड़े रहे ? यही तो चाह रहे थे लखन . चालू हो गए .- लम्मरदार को किसी से लोहे की कमानी मिल गयी है . लम्मरदार ने अपने बेटे बोग्गा को कहा कि यह कमानी ले लो और लोहराने ले जाकर एक  कुदाल और दो खुरपी बनवा लो . बम्मई कमा के लौटा बोग्गा बहस पे उतर गया . - दस किलो की कमानी ... कंधा कट जायगा . .. फिर गाँव में इतना हल्बा हथियार कहाँ से मिलेगा कि दो इंच मोटा लोहा कट जाएगा ? बनी बनायी कुदाल ले लो हम पैसा दे देंगे . इसी बात पे कबाहत हो रही है . लम्मरदार का कहना है कि सवाल पैसे का नहीं है पीढ़ी दर पीढ़ी से चली आ रही रवायत का है . और उससे बड़ा सवाल है जब गाँव के लोहार से किसी किसान का वास्ता ही नहीं रह जायगा तो कृपाल लोहार इस उम्र में कहाँ  जांयगे ?  लखन अभी अपनी रौ में थे कि एक एक करके लोग आना शुरू हो गए . यथोचित अपने अपनी जगह पर बैठ गए और सदन की कार्यवाही राम कृपाल लोहार और उनके उद्यम पर चल पडी . मद्दू पत्रकार ने लम्बी सांस ली . और बोलना शुरू कर दिये . - बहुत बड़ा सवाल है पता नहीं यह मुल्क स्साला कैसे इतने दिन तक ज़िंदा रहता जा रहा है जिस मुल्क के निजाम में उत्पादन करनेवाली जातियों की उपेक्षा हो , अन्हे अछूत तक मान लिया जाय वह देश वह कौम वह उनका अर्थशास्त्र जाहिर है गर्त में जायगा . और पहुच गया है . बाबू साहेब , पंडित जी , सबसे नाकारा बिरादरी लेकिन ये सबसे ऊपर हैं . पंडित जी जूते की दूकान खोलेंगे रीबाक ,उड्लैंड बेचेंगे लेकिन सीताराम मोची का छुआ पानी नहीं पियेंगे . इसी क्रम में लोहार , सुनार , धोबी , कुम्हार , नाई , मुसहर , धरिकार वगैरह आते हैं . लेकिन सब फेल , क्यों कि सरकार की नजर इधर नहीं है . क्यों  कि सरकार आँख नौकरशाही है और आधी  नौकरशाही रतौंधी में है और बाद बाकी दिन अंधरा के मरीज हैं . यहाँ जो जन प्रतिनिधी हैं उन्हें चाहिए कि नौकरशाही के सामने सीधी सदी बात सामने रख कर कहें कि यह करना है , उदाहरण के लिए इससमय एक जुमला बाहर फेंका गया है - स्मार्ट सिटी .सरकार जानती है कि क्या होती है इस्मार्ट सिटी ? नहीं मालुम . नौकरशाही को भी नहीं मालू,म .लेकिन वह कलाम में लग जायगा . दूसरी बात देखो - इस्मार्ट सिटी किसके लिए ? धनपशुओं के लिए , भ्रष्ट नेता के लिए , लुटेरे नौकर के लिए . उस स्मार्ट सिटी में गरीबों का प्रवेस वर्जित रहेगा . वहाँ ठेले नहीं चलेंगे , रिक्से नहीं चलेगे , सब कुछ बना बनाया . बैगन से लेकर बच्चा तक .
-बच्चा ? यह भी स्मार्ट सिटी में बिकेगा . ? लाल साहेब की आँख गोल हो गयी . मद्दू पत्रकार ने ज्ञान आगे बढ़ा दिया - इसे टेस्ट ट्यूब बेबी बोलते हैं . हिंदी में लोटे में गर्भाधान से गुजरे बच्चे की आमद होने लगी है . तुम जिस रूप , रंग , दिमाग ,चाल चलन , चरित्र वाले बच्चे को पसंद करो दूकान पर भी जाने की जरूरत नहीं है सब आन लाइन . लखन कहार ने लंबी सांस खीची - ज्जा रे ज़माना . उस शहर में कुकुर भी होंगे ? सवाल टेढ़ा लगा . मद्दू ने यह कह कर सवाल को बगल कर दिया कि पूछ के बताते हैं . तब तो हम हिंदी पट्टी वाले बहुत पीछे हो जांयगे ? उमर दरजी का सवाल चाय के साथ आ गया . सुराजी कयूम मियाँ से यह सब बर्दास नहीं हुआ तो वे सामने आ गए - इस्मार्ट सिटी के नाजायज नालायक औलादों ! हम देश की आजादी की लड़ाई लड़ते समय यह कहे रहे कि अब मुल्क के साथ गाँव आजाद होगा . यह गांधी का सपना था , कांग्रेस का सपना था . नेहरु, डॉ लोहिया , आचार्य नरेंद्र देव और जे पी का सपना था लेकिन कमबख्त नौकरशाही ने सब बराबाद कर दिया . अभी भी वक्त है उत्तर प्रदेश सरकार इस स्मार्ट सिटी का जवाब दे कि हम सूबे में स्वावलंबी गाँव बनाएंगे . आओ देखो इसे मुल्क कहते हैं . इस गाँव की परिकल्पना नौकरशाही नहीं करेगी . राजनीति तय करके नौकरशाही को कहेगी अब इसेचला कर दिखाओ . हर ब्लाक में एक माडल बनाओ गाँव में जितनी भी पुश्तैनी पेशे से जुड़ी जातिया हैं सब को मुफ्त का आवास , उनके पेशे से जुड़े औजार और सुविधांए . गाँव की जरूरी जरूरियात की चीजे उनके घर में पैदा हों . वही उत्पादक हो और वही विक्रेता और वही खरीद दार . गाँव की मजबूती वहाँ है . देश नहीं दुनिया आयेगी उसे देखने . करना कुछ नहीं है बस पर्यटन , खादी . लघु उद्योग , और सड़क मंत्री बैठ कर सब फैसला कर लें . एक सूबा है राजस्थान उसकी आमदनी बस दो पर टिकी है पर्यटन पर और गाँव पर . याता यात को मुख्य सड़क से थोड़ा कम करके उसे गाँव से शुरू कर दो . यह जवाब होगा इस्मार्ट सिटी का .. नाम लखन देयिया ,मुह कुकुरी का ? अकल से गायब इस्मार्ट सिटी बना रहे हैं ? नवल उपाधिया आँख बंद करके घोखते रहे फिर बुदबुदाए - अह्ने यहाँ विकास की परिभाषा ही गलत चलाई गयी है , कहो मद्दू ? बिलकुल सही .. इस पर कल . 

Thursday, August 27, 2015

आज भाई ब्रज खंडेलवाल फंसा दिया . अपनी पोस्ट में ब्रज भाई लिखते हैं कि भारतीय समाज की आदर्श  स्त्री सीता नहीं द्रौपदी है . यह कथन है डॉ लोहिया का . इस कथन पर घोचुओं , कम अक्ल पोंगापंथियों की त्योरी चढ़ जायगी और लगेंगे पोंगा काटने .मजे की बात इस कथन को विस्तार देने की जिम्मेवारी ब्रज भाई ने हमारी तरफ बढ़ा दिया .फेस बुक के मित्रों और वैचारिक विरोधियों को यह भी मालुम है कि हमारा नाम देखते ही गिरोही लगता है उछल कूद करने . फिर भी जोखिम तो लेना ही पड़ेगा , अब तो आदी हो चुका हूँ .चलिए शुरुआत करते हैं भारतीय जन मन से . उसके मनोविज्ञान से . हर समाज दो खाने में बंटा है . हीन भावना , कुंठित सोच , और परावलम्बी चेतना में जीनेवाला समाज एक तरफ है ,जो जालिमाना हरकत को सहन कर जालिम को जुल्म करने का मौक़ा देता चलता है .दूसरा हिस्सा है जो जुल्म के खिलाफ आवाज उठाता है , जालिमाने सोच को चुनौटी देता है और अपने हक और हुकूक के खातिर जंग का ऐलान करता है . सीता के प्रचलित जीवनी को देखा जाय तो उस पर जम कर अन्याय हुए हैं मिथक कथा के अनुसार सीता की मृत्यु तो और भी भयानक सवाल छोड़ जाती है जब एक धोबी सीता पर इल्जाम लगाता है . और सीता को अग्नि परिक्षा देने को विवस किया जाता है . इसके बरक्स द्रौपदी आती है . ध्रितराष्ट्र सुतों ने द्रौपदी के पिता को अपमानित किया , द्रौपदी उसका बदला लेने  और कौरव को समूल नष्ट करने की प्रतिज्ञा करती है . समूचे महा भारत को सलीके से पढ़ा जाय जो इस कथा की नायिका द्रौपदी है और नायक कृष्ण है .दोनों में सखा सखी का सम्बन्ध है . द्रौपदी कृष्ण से प्यार करती है . जब वह कृष्ण को शादी के लिए कहती है तो कृष्ण ने द्रौपदी को समझाया है - अगर तुम हमसे शादी करोगी तो तुम अपने पिता के अपमान का बदला नहीं ले पाओगी तुम पांडू पुत्र से शादी रचाओ . हस्तिनापुर राज्य के उत्तराधिकार का प्रश्न सामने आ रहा है . कौरव और पान्दुपुत्र आमने सामने होंगें . द्रौपदी खुल कर अपने प्यार का इजहार करती है . द्रौपदी का आदर्श रूप युद्ध के दौरान दिखाई देखा देता है जिसपर डॉ लोहिया ने विस्तार से लिखा है . कौरव और पाण्डु पुत्रों के पूज्य भीष्म पितामह मृत्युशैया पर हैं . दिन भर युद्ध लड़ने के बाद सांझ को दोनों भीष्म पितामह के सामने आते हैं और भीष्म उन्हें नीति की शिक्षा देते हैं . एक सांझ भीष्म नीति पर बोल रहे थे . कि अचानक द्रौपदी हंस पडी . ठहाका लगा कर हंसी थी . पूरा कुल सदमे में . अर्जुन गुस्से में द्रौपदी की तरफ दौड़े . हस्तिनापुर का कुल गौरव मौत को वरण कर रहा है और तुम हंस रही हो ? कृष्ण बीच में आ गए . अर्जुन को रोका . बोले - अर्जुन पहले यह तो जान लो कि द्रौपदी क्यों हंसी ? फिर द्रौपदी ने भीष्म से सवाल पूछा है . पितामह ! आप और आपकी नीति कहाँ थी जब हस्तिनापुर राज्य के असल राजा पांडू पुत्र को उनके राज्याधिकार से वंचित किया गया . पाण्डु पुत्रों को लाक्षा गृह में जलाने की योजना बनी . ? भरी सभा में आपकी उपस्थिति में चीर हरण किया गया ? ..... बहुत सारे सवाल उठाये हैं द्रौपदी ने . भारतीय समाज में एक औरत अपने हक और हुकूक की बात करती है . तन कर खड़ी होती है . भीष्म ने जो उत्तर दिया है वह आज भी सम सामयिक है . याद रखिये सवाल द्रौपदी का है . भारत की आदर्श नारी का है , जिसका उत्तर भीष्म दे रहे है - बेटी हम 'अन्न दोष 'से ग्रषित रहे .अब आपे सब तय करोकिस तरह की नारी चाहिए इस्पुरुष प्रधान समाज को .?
चिखुरी / चंचल
दाना न पानी , खरहरा दूनौ जून ?
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.... ' पानी बरसे दरभंगा में , छाता खुले दुबई में ? इ सब कसा होय रहा है , न हम्मे मालुम है न उसको जो हररोज नया फरमान जारी किये जाय  रहा बा .किसमे दम है कि कह  दे कि राजा ढांक लो , नीचे नंगे हो . आपन घर फूंक के , दूसरे क दालान बनाय  रहा है ? पंडा बिहार में , मंदिर बनी दुबई में ? कहो फलाने जे सुनी ऊ का कही ? नवल उपधिया बौखलाए हैं . एक साथ , एक सांस में कई सवाल दाग दिये . यह देश की संसद थोड़े ही है कि एक साथ कई सवाल पूछना वर्जित है और अगर पूछ दिये तो संसद से बाहर . उनका निजाम कहता है कि कुछ लोग अधिक को हलाकान नहीं कर सकते . लेकिन यह तो गाँव की संसद है . जित्ता चाहो सवाल उठाओ तरतीब हो कि न हो , कुछ भी बोलो कितना भी भदेस बोलो कोइ रोक नहीं . कीन उपाधिया समझ गए कि नवल जो भी कह रहा है वह कीन के खिलाफ या फिर कीन की पार्टी के खिलाफ ही बोलेगा यह उसकी हिस्ट्री है . उसे पता नहीं क्यों ' दिया ' से नफ़रत है . चुनांचे कीन ने नवल को रोका - इ पंडा बिहार में ही होते हैं काशी मथुरा में नहीं ? नवल कुछ सोच समझ के बोला करो . नवल ने आँख गोल करके कीन को देखा , मुह खोले नहीं लेकिन उसे भरपूर ढंग से कान की तरफ ले गए जितना ले जा सकते थे . नवल के इस हरकत से कीन को दिक्कत होती है ,उन्हें लगता है कि यह उन्हें चिढ़ाने के लिए किया जा रहा है ,क्यों कि कीन के मुह का आकार प्रकार कुछ इसी तरह का है .बीच में कयूम मियाँ आ गए - अकल के गरीबो ! रुख ताल देख कर बोला करो , जैसे देश का नेता बोलता है . बोले जा रहा है . नवल ने फिर टोंका - कहाँ बोले जा रहा है , संसद में तो कुछ नहीं बोला . कयूम मुस्कुराए - बरखुरदार यह भी नहीं जानते बोलने कि एक तरकीब होती है और यह तरकीब देश काल और परिस्थिति पर निर्भर करती है . अब मेढक औए झींगुर को देखो बज्र गर्मी में कभी इन्हें बोलते सुने हो या सर्दी के समय मोर की आवाज को सुनते हो ? नहीं न ? तो ऐसा ही समझ लो . जो बात दिल्ली में बोली जाती है वही बिहार में नहीं . संसद में केवल बोला ही नहीं जाता सुनना भी पड़ता है ,और हमारे नेता को सुनने की आदत नहीं है बस .दूसरी बात याद रखो कब कहाँ क्या बोलना है उसे समझा करो . पिछले चुनाव में इसी बिहार में तुम्हारे नेता ने नया इतिहास नए तरह से बोला . जनता जनार्दन ने ताली पीटा . जनता भदेस बात पर ताली पीटी या खुश होकर कि चलो अब अब तक्षशिला जो बटवारे में पाकिस्तान में ही फंसा रह गया था , अब नालंदा तो आ गया . जनता को कौन भांप पाया ? केवल 'बक्सा ' ने उसे दिखाया और बताया कि जनता हर बात पर ताली पीट कर स्वागत करती रही . देश ने डिब्बे की बात तो मान ली लेकिन भीड़ में हरखू झा की आवाज दबी ही रह गयी जब उन्हों ने कहा हुजूर तक्षशिला बिहार में नहीं है पाकिस्तान में है . हरखू जी की आवाज को डिब्बे ने नहीं सुना . क्यों कि हरखू के पास न तो दो करोड़ का मंच था , नही आठ करोड़ की लागत से प्रायोजित जलसा के लिए रकम थी . आया समझ में . नयी बात सुन लो बिहार में ठीक चुनाव के एन मौके पर्कहा जा रहा है कि बिहार को कई लाख करोड़ का पैकेट दिया जायगा . अब गणित देखो लिखा है ४०,००० करोड़ +१.२५ करोड़ = १६५००० करोड़ . यह नया गणित है . अब लगाते रहो कि कितने शिफर आते हैं इतनी रकम में ? उत्तर देगा वजीरे खारिजा जेटली कि सरकार ने थोड़े ही कहा कि इतनी रकम बिहार को जायगी वह तो चुनाव की बात थी . दूसरा रफूगर बोलेगा यह तो जुमला था . इसे कहते हैं आज की राजनीति . और यही राजनीति जनता को पसंद है तो हम का करें ? चिखुरी जो जो अब तक इस बात को चुपचाप सुनते रहे बीच में आ गए - सुनो जनता पर आरोप मत लगाओ . वह झांसे में आ गयी लेकिन कितनी बार आयेगी . अब वह वह अपने हक और हुकूक को सामने रख कर नेता को तौलेगी . वह भी बौखलाई हुयी है . सब को देख चुकी , हर फरेब से रु ब रु हो चुकी है . दो परस्पर बिरोधी बातें मत करो . एक तरफ तो सरकार कहती है , हमे खाली खजाना मिला है और दूसरी तरफ खैरात बंट रही है . तो जो लाखों करोड़ बाँट रहे हो अपनी जेब से देबांत रहे हो ? सही बात तो बोलना ही पड़ेगा . यह संसद नहीं है बिहार है और बिहार ठोंक बजा कर चलेगा . नया जुमला फेंक रहे हो दुबई में मंदिर बनेगा . अपने यहाँ मस्जिद गिरा कर उनके आँगन में मंदिर बनाओगे ? तुम्हारी अंतर्राष्ट्रीय समझ कितनी है यह यह सारी दुनिया देख ही नहीं है , हमे तनहा भी करती जा रही है आज अमरीका , रूस , जापान फ्रांस कोइ तो होगा जो हमारे साथ होगा . आज एक भी मुल्क अपने साथ नहीं है . दस लाख का परिधान पहन कर ओबामा ओबामा करते रह गए यह भी भूल गए कि एक ऐसा भी महात्मा था जो एक धोती पहन कर बर्तानिया निजाम को बदलवा दिया और अपने ही भारतीय लिबास में पूरे अंग्रेज कौम का पसंदीदा मेहमान बन गया . .एक बात गौर से सुन लो इस मुल्क को अगर कोइ बना सकता है तो वह गांधी ही है दूसरा नहीं . उमर दरजी ने पूछा -लेकिन बिहार में कांग्रेस ....? चिखुरी मुस्कुराए - कम्युनिस्ट और संघ को छोड़ कर बाद बाकी जितने भी हिंदी पट्टी में हैं सब गांधी की ही औलादे हैं . इस बार बिहार में गांधी ही लड़ेगा . रूप कुछ भी हो . चम्पारण फिर इतिहास लिखने जा रहा है . लड़ाई हिटलर और गांधी के बीच है . हिटलर की झूठ , उसकी चमक दमक , रथ और विमान सब द्वस्त होगा जब बिहार उठ खड़ा होगा . नवल आज बगैर किसी गाने को उठाये किसी विचार में मग्न होकर चलते बने .
बतकही / चंचल
... कुछो कहो हम  रहेंगे उत्तर प्रदेश ही .
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  '... ऊपरवाला झूठ न बुलवाए, बात खरी कहता हूँ , किसी को हजम हो या दौड़ा के पोंगा काट ले लेकिन जे बात सही है कि उत्तर प्रदेश में एक साफ़ सुथरा मुख्यमंत्री है अखिलेश यादव . ... कयूम मियाँ अभी शुरू ही हुए थे कि अखिलेश का नाम सुनते ही पुराने संघी जूते सिंह हत्थे से उखड गए . ( भला कोइ लायक बाप या दयावती दादी अपने बच्चे का नाम जूते रखेगी ? कत्तई नहीं असल नाम  है -तेज बहादूर सिंह , पहला घपला उनकी अपनी दादी ने किया कि नाम को काट कर छोटा कर दिया तेज बहादुर से तेजू हो गए . यह तेजू जब शाखा जाने लगे और बाप की दी हुयी फुल पैंट को काट कर हाफ किये तो गाँव के हमजोलियों ने नाम को ही उलट दिया और वह चल गया .जूते सिंह . )क्या ख़ाक ईमानदार है ? एक जाति के लोग मंत्री से लेकर सिपाही तक बैठा दिये गए हैं ... लाल साहेब ने जूते सिंह को घुडकी दी - ओम प्रकाश सिंह , राजा भईया, गोप .. सब अहीर हैं ? सूबे में जब खुल्लम खुला जाति की राजनीति शुरू हुयी और कांशी राम ने हरिजनों को इकट्ठा कर के एक नेता  मायावती दे दिया  तो बाकी जातियों में भी अपने नेता की तलाश शुरू हो गयी . मुलायम सिंह समाजवादी थे और रहेंगे वे जातिवादी नहीं हैं लेकिन उनकी बिरादरी ने खुल कर उनकी मदद करनी शुरू कर दी तो इसमें मुलायम सिंह का का दोख ? इतने हल्के में मत भागा करो . आज  मुलायम का इतिहास देखोगे तो खोपड़ी झन्ना जायगी . वहाँ जनेश्वर मिश्रा हैं , हनुमान सिंह है , ब्रजभूषण तिवारी हैं आजम खां हैं शिव कुमार बेरिया हैं .मामला संजीदा होत देख कयूम मियाँ ने लाल साहेब को अपनी बुजुर्गी से रोका - बरखुरदार ! ये जो तेज बहादुर सिंह वगैरह हैं ,ये अफवाह में जीते हैं . नफरत फैलाते हैं शुक्र है मियाँ कि हम सब गाँव में हैं वरना अगर हम शहर में होते और तेज बहादुर को जूते बोल देते तोदंगा हो जाता लेकिन यहाँ सब चलता है क्यों बेटा तेज बहादुर ? तेज बहादुर जब अपना नाम सही ढंग से सुनते हैं तो उनका सीना छप्पन इंच का हो जाता है गरज यह कि पूरा गाँव उन्हें जूते ही बोलता है यहाँ तक कि उमर दरजी भी . बेचारे खिसिया के रह जाते हैं लेकिन कुछ बोलते नहीं .कारण बस एक है - जन्म क मुरहा है , गुरभाई है .दर्जा आठ तक साथ में पढ़ा है . का करें ? तेज बहादुर ने कयूम मियाँ को उकसाया - हाँ चचा आप सरकार केव बारे में बता रहे थे . देखो बरखुरदार ! जब हम किसी सरकार को नापते हैं हैं तो सबसे पहले यह देख लो कि नापनेवाला कौन है ? आज के जमाने अगर तुम चाहो कि सूबे या मुल्क की गद्दियों पर पंडित नेहरु , डॉ संपूर्णानंद , लाल बहादुर शास्त्री , पंडित कमलापति त्रिपाठी , कर्पूरी ठाकुर जैसे तपे तपाये लोग दिखाई पड़ेंगे तो भ्रम में हो . लाल बहादुर शास्त्री देश के गृहमंत्री थे , मुला खुद उनके पास घर नहीं था . राज नारायण जब संसद में नहीं थे और रेल यात्रा करते थे तो टी टी  से ही चन्दा मांग कर टिकट बनवाते थे . जनेश्वर मिश्रा बार बार मंत्री बने लेकिन उनका दरवाजा सब के लिए खुला रहता था . जार्ज के घर पर गेट ही नहीं था उन्होंने खुद उसे निकलवा दिया था . कहाँ मिलेंगे ऐसे लोग . लेकिन अभी भी उनके लोग हैं . अभी इसी सरकार में देख कर लौटा हूँ . जा कर देख आओ . राजेन्द्र चौधरी , राम गोविन्द चौधरी . ओम प्रकाशसिंह . इनकी सादगी और इमानदारी पर कभी उंगली नहीं उठी . एवज में और सूबों को देख आओ . कितनी बेशर्मी से सरकार चला रहे हैं ये चाल चरित्र और चेहरे की दुहाई देते हैं. शवराज को देखो .घपला घोटाला कैसे होता है उससे सीखो . कई लाख सौ करोड़ का घपला ही नहीं हुआ डाक्टरी और इन्जीय्न्रिंग पेशे तक को बधिया कर दिया है . गुनाह छिपाने के लिए पच्चासों लोगों का क़त्ल हुआ है . गवाह मुह न खोल पाए उसे क़त्ल कर दो यह नयी चाल है . अनाप सनाप बोलनेवालों को संसद में बिठा दिया गया . कोइ साधू है कोइ सधुआइन हैं लेकिन भाषा ? कसाई भी शर्मा जाय . ये भाई ! सब जगह घपला है बोलते बोलते कयूम मियाँ हाफाने लगे . नवल बीच में आ गए . -
  -... लेकिन अब तो संसद ही जाम है . ?
महंथ दुबे कश्मसाए और उठ कर बैठ गए . -एक तरफ भ्रष्टाचार का खुला आरोप लगा पड़ा है . एक साहेब चार देवियाँ घेरे में हैं . सरकार के पास कोइ जवाब नहीं है कांग्रस को सडन से बाहर कर दियाजाता ही कहते हो साकार नहीचालने दे रहे कांग्रेस के लोग ? इनसे कोइ पूछे कि क्या कांग्रेस वहा साफ़ सफाई के लिए गयी है ? उस्काकाम है सवाल पूछना . और वह सवाल देश का सवाल है क्यों नहीं पूछेगी कांग्रेस ? दुबे जी को बीच में रुकना पड़ा क्यों कि लंगूर की शक्ल में सज धज कर तेज बहादुर सिंह का मझिला लडिका बोल बम् की यात्रा पर निकलने के लिए बाप से खर्च मांगने आकर खड़ा हो गया -ये बाऊ ! एक हजार ..
- का करबे एक हजार बे ?
- दोस्तन के बीयर पार्टी माने अही .
-तेज बहादुर सिंह का चेहरा देखने काबिल था .भीड़ में ठहाका था . नवल उपाधिया चकाचक बनारसी की कविता सुनाते हुए आगे बढ़ गए -दिन में बोले राम राम / औ रात में सौ सौ ग्राम 

Friday, August 7, 2015

चिखुरी / चंचल
यह राजनीति है भाई , जमूरों का जमावडा नहीं .
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       -... ये भाई ! ये बिहार कहाँ है ? लखन कहार का सवाल चौराहे की संसद को सन्नाटे में ला दिया . नवल उपाधिया की आँखे गोल हो गयी , - पटना सुने हो ,? उसे ही बिहार कहते हैं . बुडबकों की तरह बात करते हो .बिहार नहीं बूझते . ? लखन मुस्कुराए - तो चुनाव पटना में हो रहा है बाद बाकी आरा मुगेर भागल पुर , मोतिहारी और औराही हिंगना वगैरह में नहीं ? नवल गच्चा खा गए . गो कि नवल  और लखन कहार कलम एक से लेकर कलम आठ तक एकय साथ पढ़े रहे ,बस इतना फरक आवा है कि लखन बगैर नागा हर रोज अखबार बांचता है और नवल साइकिल उठाये गाँव गिराँव की खबर वहाँ से उठाते हैं और चौराहे पर ला कर कुरय देते हैं . जनता जनार्दन दिन भर उसे धान की तरह कूटती पछोरती  रहती है. आज नवल के समझ में आवा कि अखबार कितने काम की चीज है . तो एक बात बताओ लखन भाई ! जब बिहार जानते रहे तो फिर काहे पूछे ? लखन ने गौर से नवल को देखा फिर कीन उपधिया को झकझोरा - अखबार बताता है ,हम नहीं कहते , पिछले कुछ दिनों से देश का इतिहास और भूगोल दोनों बदला जा रहा है . कहो कीन कुछ गलत कहा का ? पिछली दफा कीन के नेता ने बिहार में तक्षशिला में ला दिया था . लोग बताते हैं कि वो अभीतक तक्षशिला वहीं है . बोरिंग कैनाल रोड की खुदाई हो तो तक्ष शिला साछात मिलेगी . मद्दू पत्रकार से नहीं रहा गया - इन्हें इतिहास और भूगोल दोनों ही बाहुत सालता है . होता क्या है कि ऐसे में जब भी इन्हें उछल कूद करनी पड़ती है तो उधार की तरफ भागते हैं . इन्होने एक नयी परम्परा डाली . प्रायोजित कार्यक्रम . नहीं समझोगे . इसे ऐसे समझो . तुम्हे चुनाव लड़ना है तो सभा जुलूस निकालोगे . कार्यकर्ताओं को पहले लगना पड़ता था , भीड़ जुटाने के लिए , पोस्टर पर्चा बाटने के लिए अब ऐसा कुछ नहीं है अब देश और विदेश में नयी नयी कंपनियां खुल गयी हैं जो एक मुस्त पैसा लेकर सारा काम कर देती हैं . लॉस स्पीकर , रोशनी . अखबार , डिब्बा यहाँ तक की भीड़ भी . ' भीड़ का चरित्र ' कैसा होना चाहिए . कितनी बुर्के वाली औरतें होनी चाहिए . कितने तहमत , कितनी टोपियां वगैरह सब का इंतजाम एक कम्पनी करती है यहाँ तक कि क्या बोलना है . और किस जगह ताली बजाना है . सब प्रायोजित रहता है .इसे कहते हैं गुजरात माडल . सुना है यही माडल अब कई और लोग भी ला रहे हैं बिहार में . ......
 - इससे का होगा ? कयूम ने सवाल पूछा .
- इससे यह होगा कि एक बार फिर जनता झांसे में फंसेगी ...कहते हुए मद्दू ने चिखुरी की ओर निहारा और फिर अपनी बात से मुकर गए - लेकिन बिहार में यह नहीं चल पायेगा . यह बिहार भइये . इसने बहुत कुछ देखा है बहुत कुछ दिखाया भी है . अब चिखुरी की बारी थी - झूठ फरेब , छल प्रपंच एक ही बार चलता है . अब तो पूरा देश ही समझ गया है . जिन बातों को जोर देखर जनता को उकसाया और उसे मोह में फंसाया उसी से पलटी मार रहा है .कोइ कहता है जुमला था , कोइ सफाई देता है हमने तो चुनाव में बोला था ,सरकार में आने के बाद तो नहीं बोला . ? बोलो क्या कर लोगे ? अब देखो संख्या की ताकत और सत्य की ताकत . किसान की जमीन लेने के सवाल पर सरकार को झुकना पड़ा है . यह उसकी ताकत थी कांग्रेस ने झुकाया . संसद से बाहर निकाल कर सरकार ने लोकतंत्र के पेट में चाकू भोंका है . इसका जवाब तो जनता मागेगी न ?
  - हाँ ये तो हम भूले ही गए थे कि कांग्रेस ने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया रहा कि उसे संसद से बाहर निकाल दिया गया ? और तो और ऐसे भी सांसदों को भी बाहर निकाला गया जो सडन में मौजूद भी नहीं थे ? इस बातको भाजपा नेता भी कह रहे हैं . ?चिखुरी संजीदा हो गए - इस सरकार से सवाल मत पूछो . मध्य प्रदेश में व्यापम घपला हुआ कई लाख करोड़ का . कई पीढ़ियों की जिंदगी का . उसे छिपाने के लिए अब तक पचास लोग कम से कम मारे जा चुके हैं . यह सवाल मत पूछो . भारत का वित्त मंत्रालय एक अपराधी को पकड़ने लिए वारंट जारी करता है ,उसीसर्कार का विदेश मंत्रालय उसे बचाता है यह सवाल मत पूछो .राजस्थान की सरकार उस भगोड़े से लंबी रकम लेकर अपने निजी उद्योग में लगाती है यह भि मत पूछो . छातिसगढ़ की सरकार गरीबों का चावल खा जाती है यह मत पूछो . यही तो पूछा था कांग्रेस ने . उनको निकाल कर बाहर कर दिया . अब जब बिहार यह सवाल पूछेगा तो कौन किसको निकालेगा यह देखना है ? जे बात है . लाल साहेब ने अब समझा . लेकिन लखन ने क्यों पूछा बिहार कहाँ है ? कहकर लाल साहेब मद्दू पत्रकार की तरफ मुखातिब हुए . मद्दू ने बताया - सुनो यह सवाल उठाने का एक नायाब तरीका है जो बहुत चोख होता है .एक किस्सा सुनो समझ में आ जायगा .


   कभी कभी भरी भीड़ में स्वर्गीय राज नारायण जी उठा दिये करते थे . उस परम्परा पर कल्पनाथ राय चले , लालू यादव अक्सर चल देते हैं . ये सवाल तीखे और बेचैन करनेवाले होते हैं . एक उदाहरण सुन लीजिए . ७७ में देश की सरकार पलट गयी थी . कांग्रेस सत्ता से बाहर हुयी थी . कई हस्तियाँ कांग्रेस से बाहर होकर जनता पार्टी में शामिल हुयी थी . उनमे से एक थे इंद्र कुमार गुजराल . जो जमाने तक कांग्रेस के साथ रहे और इंदिरा गांधी के निहायत ही विस्वसनीय रहे . रूस में भारत के राजदूत रहे . जंतर मंतर में जनता पार्टी की बैठक चल रही थी . राज नारायण जी थोड़ा देर से पहुचे , उस वक्त गुजराल साब कुछ बोल रहे थे . नेता जी अंदर घुसते ही व्यवस्था का सवाल उठा दिये . चंद्रशेखर जी अध्युक्ष रहे . नेता जी सीधे अध्यक्ष जी से मुखातिब हुए - ' अध्यक्ष जी ! ये कौन साहब  बोल रहे हैं ? पूरे हाल में सन्नाटा . गुजराल  साहब बैठ गए . अध्यक्ष जी समझ गए कि इस सवाल का अंदरूनी हिस्सा क्या है . मधु जी (स्वर्गीय मधु लिमये ) जी उठे और बोले - कोइ नहीं बोल रहा है अब आप बोलिए .समझे ? नवल ने कहा- जी!  बहुत समझे  .