Sunday, September 8, 2013

दंगा तो होगा ही .........
.......अन्ना दिल्ली में था . ( हम थे भी लिख सकते थे , लेकिन जानबूझ कर 'था' लिख रहा हूँ . क्यों कि उसने संघ के उकसावे पर बहुत बड़ा पाप किया है . सड़क की उर्ज्वा को कम से कम तीस साल के लिए गोबर कर दिया है . जनता का यकीन 'सड़क ' से उठ गया है .जम्हूरी निजाम में संसद की ताकत सड़क से ही मापी जाती है .उसने सड़क को तोड़ा है जनता के अरमान को तोड़ा है ) आंदोलन गति के साथ आगे बढ़ रहा था .हम घुमते घामते हिन्दुस्तान टाइम्स के सामने पहुँच गए . सोचा अपने दोस्त शशि शेखर से मिल लूं . ( संपादक हिन्दुस्तान हिन्दी ) दफ्तर में गुसा तो लगा कि साउथ ब्लाक में जाना हो रहा है . सुरक्षा चाक चौबंद . मुलाहिजा हुआ . ऊपर गया फिर रोका गया . हम बैठे बैठे सोचते रहे भाई पहले तो ऐसे नहीं होता था ( गलती हमारी थी , बहुत दिनों बाद हम इस दफ्तर में जा रहे थे और उस जमाने में जाया करता था जब दहशतगर्दों का खौफ नहीं था . आज इन दफ्तरों की मजबूरी है ) मनोहर श्याम जोशी मृणाल पांडे .शीला झुनझुनवाल से मिलने ( झूठ बोल रहा हूँ ,कुछ लिखने और बनाने के लिए बे धड़क दफ्तर में घुसते थे और कहना नहीं पड़ता था काम तुरत मिल जाता था . जानते सब थे कि इस चिलचिलाती धूप में . हड्डी तोड़ ठंढ में , मूसलाधार बारिश में कोइ किसी से केवल 'मिलने ' नहीं आया है . एक वाकया मजेदार है तब साप्ताहिक हिन्दुस्तान चपटा था उसके संपादक थे मनोहर श्याम जोशी . कठिन गर्मी के दिन थे पसीने से तरबतर दफ्तर पहुंचा . बाहर ही केजरीवाल साहेब मिल गए मुस्कुराए बोले आज तुम लोगो की कोइ विशेष बैठक है ,अंदर तुम्हारा दोस्त रमेश दीक्षित भी है . मै कुछ जवाब दिए ही जोशी जी के कमरे में घुस गया . जोशी जी मुस्कुराए - बोलो कैसे चले ? हमने कहा बस ऐसे ही मिलने आ गया . जोशी जी गंभीर हो गए .घंटी बजा कर चपरासी को बुलाया और उससे बोले केजरीवाल साहेब को बुलाओ . केजरीवाल साहेब आ गए . जोशी जी ने कहा -हमें सौ रूपये उधार दे दीजिए . अगर आपके पास न हो तो किसी से मांग कर लाइए जरूरी है . केजरीवाल साहेब थोड़ी देर बाद लौटे और सौ रूपये जोशी के हाथ में रख दिए . जोशी जी ने नोटों को देखा .. मुस्कुराए और बोले - कई लोगो से मांगना पड़ा आपको ? केजरीवाल कुछ जवाब देते इसके पहले ही जोशी जी ने सारे नोट टेबुल पर फैला दिए .ये तीन नोट उसके हैं जो बस से सफर करता है ,ये चार नोट कैंटीन के हैं , और ये आपके अपने हैं . सही ? केजरीवाल हक्का बक्का जोर का ठहाका लगा . फिर जोशी जी ने खुलासा किया . जो नोट लम्बाई में दोहरी गयी है यह बस कंडक्टर ही करता है . बाकी तीन पर बेसन लगा है ताजा वह इस समय ब्रेड पकौड़ा बना है बाकी आपके हैं इनमे आपके बनारसी तम्बाकू की महक है ... बहुत बहुत धन्यवाद केजरीवाल साहेब अब आप भी यहीं बैठिये और काफी पीजिए . अचानक जोशी जी ने उन नोटों को मेरी तरफ बढ़ा दिया और बोले - इन नोटों को चला कर दिखाना तो और नोटों को मेरी तरफ बढ़ा दिए . हमारी आँखे गोल हो गयी . देखो तुम समाज्बादी हो ,पत्रकार हो , कार्टूनिस्ट हो और सबसे बड़ी बात 'फ्रीलांसर हो .ये जो फ्रीलांसर समाज्बादी होता है वह किसी से मिलने यूँ ही नहीं जाता ... फिर केजरीवाल की तरफ मुड़े -एक काम करिये अगले अंक में जिन कहानियों और कविताओं को जाना है उसे चंचल को दे दीजिए समय पर मिल जाय यह आपकी जिम्मेवारी है .)
    विषयान्तर हो गया . मुआफी नहीं मांगूगा . भाई शशी शेखर के दफ्तर में बैठे बैठे यह याद आ गया था . बहरहाल जब शेखर जी को पता चला तो उन्होंने तुरत बुलाया . हम लोग काफी देर बतियाते रहे उसमे हम दोनों एक जगह सहमत रहे कि अन्ना सड़क को धोखा दे रहा है . सड़क की राजनीति मरती है है तो फिजूल की सियासत घेरा बनाती है . मुजफ्फर नगर इसका ताजा उदाहरण है . 
एक पाव धूप ......
......उन दिनों काशी विश्वविद्यालय का दिल बड़ा हुआ करता था . गधे  को गढ़ कर घोड़ा बनाना और उसे दौड़ में उतार देने का चलन था . आज उसके बरक्स है . अब तो उन्हें ही प्रवेश मिलता है जो पीठ पर जींस और आँखों पर ठप्पा बंधे आते है और जो कुछ भी रहता है बेचारे उसे भी उतार कर बाहर चले जाते हैं . इन्तेरेंस ? प्रवेश हुआ नहीं कि परीक्षा पहले दे दो . यह कौन सा चलन है ? जब लड़का पहले से ही तैयार है तो मोटी रकम पर ऐश करनेवाले प्राध्यापक किस लिए हैं ? लेकिन तब ऐसा कुछ नहीं था . और उसी दौर में मै भी पहुचा था . उन दिनों प्रवेश के लिए दो रूपये का एक फ़ार्म मिलता था . पीआरओ आफिस से . और यह आफिस कुलपति निवास और रुइया छात्रावास के सामने हुआ करता था . हमने फ़ार्म तो ले लिया . मुतमईन होने की खुशी में वापसी का डगर भूल गया . आना चाहिए था 'सिंह द्वार ' की तरफ मै मुड गया 'हवाई अड्डे की तरफ ' मई की कड़क धूप पैदल का सफर . चलता रहा . इक्का दुक्का लोग दिखे लेकिन किसी से डगर पूछने की हिम्मत नहीं हुई और मै कई मील आगे निकल गया . विश्वनाथ मंदिर के पीछे एक पेड़ के नीचे एक आदमी मिला . जो हमारे गाँव के लोंगो से मेल खाता दिखा . घुटने तक की धोती और बंडी पहने बैठा सुस्ता रहा था . हम उसके पास जा कर रुके और पूछा -अभी लंका कितनी दूर है ? वह समझ गया . तुम गलत आ गए हो , लंका तो उसी तरफ है जिधर से आ रहे हो . ... बैठो सुस्ता लो . गर्मी बहुत है . अभी एक बस आयेगी विश्वविद्यालय की है उस पर बैठ जाना लंका छोड़ देगी पैसा नहीं लगेगा . ... पानी पियोगे ? वह उठा और बगीचे में चला गया वहाँसे एक लोटे में पानी और थोड़ा सा गुड़ लेकर आया . विश्वविद्यालय का यह पहला सबक था जिसे मैंने उस 'आदमी ' से सीखा . उसने हमें बस में बिठा दिया और मै लंका आ गया . 
     तींन साल बाद जब मै छात्र संघ का अध्यक्ष बना तो वह 'आदमी 'हमें याद आया . उसकी तलाश में मै कईबार उस जगह को देखा , दरियाफ्त किया लेकिन कुछ पता नहीं चला . एक दिन मैंने देबू दा ( स्वर्गीय देव ब्रत मजूमदार ) से पूछा कि उसका पता कैसे किया जा सकता है . चूंकी देबू दा चार्टों के ही नेता नहीं थे कर्मचारियों के भी नेता थे . दादा ने सुझाव दिया तुम सुरेन्द्र त्रिपाठी से मिलो वह खोज देंगे आजकल कर्मचारियों के अध्यक्ष वही हैं . सुरेन्द्र त्रिपाठी थे तो कम्युनिस्ट पर दोस्त बहुत अच्छे थे . उन्होंने कहा क्यों खोज रहे हो . हमने कहा उसने हमें कुछ 'उधार ' दिए हैं उसे लौटाना है . सुरेन्द्र जी ठहाका लगा कर हँसे , भाई यहाँ जितने भी लोग हैं सब के सब का कर्जदार तो मालवी जी रहे आज तक इनका कर्ज उतार रहे हैं . चाहे वी सी श्री माली हों या आपका दोस्त मलिक , इन सब ने मालवी जी को कर्ज दिया है ..... एक काम करो कल सेन्ट्रल आफिस आ जाना , ग्यारह बजे मालियों की मीटिंग है उसमे से पहचान लेना . एन वक्त पर मै गया और उस 'आदमी ' को पहचान लिया . शिव धनी राम . दूसरे दिन शिव धनी का तबादला केन्द्रीय दफ्तर से छात्रसंघ हो गया . 
   बात उन दिनों की है जब छात्रसंघ के कर्मचारियों की तूती बोलती थी .आज से शिव धनी छात्र संघ के माली थे . आहिस्ता आहिस्ता शिव धनी घुल मिल गए . पांडे जी जो कि चपरासी थे वहीं छात्रसंघ में रहते भी थे अब दो जन हो गए . बाकी स्टाफ ड्यूटी के बाद घर चला जाता था लेकिन शिव धनी और पांडे जी वहीं खाना बनाते और दिन भर की खबर ... एक दो के बाद .. आप से तुम पर उतर जाते .. मजूमदार......मार्कंडे के साथ काम किया हूँ ..वो ठीक नहीं है , पीठ पीछे तुम्हारी बुराई करता है . वगैरह वगैरह . और रात का खाना 'साझा होता ' . एक दिन हमने शिव धनी से पूछा तुम्हे याद है किसी लड़के को गुड़ खिला कर पानी पिलाया था और उसे बस में बिठाया था . हाथ में पानी का ग्लास लिए शिव धनी ने बहुत अन्मयास्क ढंग से कहा -साहेब बहुतों को खिलाया पिलाया है कहाँ तक याद करें . सच कहता हूँ अगर वह मलिक का बच्चा वहाँ न मौजूद रहता तो मै शिव धनी का पैर पकड़ कर रो लेता और हल्का हो जाता . लेकिन ऐसा नहीं कर सका . दूसरे दिन कैम्पस में नई चर्चा चल निकलती --'हव स्साला ज्यादा ले लिया था ' . उसी तरह जैसे हमसे चुनाव के समय पूछा गया था 'गेस्ट हाउस कांड ' का जवाब दो . 
  शिव धनी ने एक बार भी नहीं बोला -नेकी कर दरिया में डाल .यह तो अध्यापक लोग पढ़ाते हैं . शिव धनी तो उसमे जीते हैं .
                                                -जारी   

Friday, September 6, 2013

अन्न भोग  
अन्न महज पेट भरने की सामग्री भर नहीं है . पेट को अन्न की जरूरत भी नहीं  होती और न ही अन्न को पेट पसंद करता है . भूख दिमाग में लगती है . बेचारा पेट अपनी बनावट और बुनावट के लिए दिमाग की बेगारी करता है . बाज दफे तो पेट दिमाग के बर् खिलाफ जाकर हड़ताल तक कर बैठता है . जो भी हो लेकिन अन्न की जरूरत तो होती ही है . 
    प्रकृति में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो अन्न को खाता ही नहीं उससे खेलता भी है . अपने रूचि के अनुरूप अन्न को बदलता है . इस अन्न बदलाव पर आज फेसबुक पर अंजना चौहान सिंह का एक आलेख है 'जंक फ़ूड ' के खिलाफ . हमने देखा कि इतना खूबसूरत और ज्ञानवर्धक आलेख बहुत  हल्के से चला जा रहा है . इसलिए हम अंजना जी के साथ उनके किचेन तक जाने की इजाजत  चाहता हूँ . हमारे पास कई टिप्स हैं . 
         'अन्न की पूजा करो ' यह प्राण है .
वेद की ऋचा है जिसका भाष्य उपनिषद करता है . कई वामपंथी जो संस्कृत से , वेद उपनिषद से चिढते हैं उनसे कहता हूँ मित्र 'अन्न ' पर की गयी वेद ,उपनिषद की मान्यता से आप इनकार भले ही करें लेकिन खाने के लिए अन्न ही खोजेंगे हथौड़ा और रिंच नहीं हजम कर पायंगे . दक्षिण पंथी इनसे भी दो कदम आगे है . वह इस ज्ञान को 'तुन' के लाल कपड़े में लपेट कर फूल चढ़ा देगा और झुक कर आगे बढ़ जायगा . संस्कृत ज्ञान का भण्डार है पर ये पोंगापंथी अपनी हरकतों से बाज नहीं आयेंगे . 
   एक दिन भाई धर्मेन्द्र राय ने किसी की युक्ति को फेस बुक पर जस का तस दर्ज किया - आप अपनी जिंदगी में कभी किसी पुलिस अधिकारी से मिल लिए या किसी डाक्टर से मिल लिए तो उसे आजीवन याद करते रहते हैं लेकिन जिससे हर दिन तीनबार मिलते हैं उसे कत्तई नहीं याद करते .वह है अन्न और अन्नदाता . ' 
    इस अन्न के साथ आदमी के बच्चे ने बड़ा मजाक किया है . उसका रूप बिगाड़ कर . उसे सुधारने की जरूरत है जिससे आदमी का बच्चा तो सुधरा रहे . 
        अन्न ग्रहण पर फिर संस्कृत पर आ रहा हूँ . संस्कृत ज्ञान कहता है - भोजन को पहले देखो . एक सौंदर्यबोध पैदा होगा थाली में सजे अन्न से . उसकी महक लो , दूसरी इंद्री जागृत होगी . उसे छुओ . स्पर्श करो . फिर उसका स्वाद लो आहिस्ता आहिस्ता इस अन्न का मूल तत्व आपकी जननेंद्रिय को विकसित करेगी . यह है अन्न महिमा . 
   आखीर में किसका अन्न खाते हो . यह बहुत जरूरी है . इसका सबसे खूब सूरत उदाहरण महा भारत में मिलता है . भीष्म पितामह घायल होकर गिर गए हैं . सूर्य के उत्तरायण होने पर ही प्रंका त्याग करेंगे . सो सांझ को जब कौरव पांडव युद्ध विराम करते हैं तो अपने मुखिया से नीति सीखने भीष्म के पास इकट्ठा होते हैं और भीष्म नीति की शिक्षा देते हैं . एक दिन जब भीष्म बोल रहे थे तो द्रौपदी ने ठहाका लगाया . अर्जुन को गुस्सा आगया , वे द्रौपदी की तरफ दौड़े . कृष्ण बीच में आ गए और बोले कि पहले उससे पूछो तो सही कि वह हंसी क्यों . द्रौपदी ने भीष्म से कहा -आज आप नीति की शिक्षा दे रहे हैं उस समय आपकी नीति कहाँ थी जब चीर हरण हो रहा था ? छल से युधिष्ठिर को ठगा जा रहा था ,,,,, भीष्म ने बहुत खूबसूरत जवाब दिया था - बेटी ! मै अन्न दोष से पीड़ित था . यह अन्न दोष आज के समाज की सबसे बड़ी बीमारी है . भ्रष्टाचार , राजनीति , मीडिया सब के सब अन्न दोष से पीड़ित हैं .
सिंहावलोकन

हम और मै .
.... उन दिनों ....
काशी विश्वविद्यालय बनारस के दाहिने सिस्से को काट-छांट कर बसाया गया है . यह एक बेहतर शिक्षण संस्थान भर नहीं है ,अपने आपमें एक मुकम्मिल 'एल्बम है .इसे पलटते जाइए और डूबते उतराते रहिये . अनोखी जगह  है . इस संस्थान में दाखिला लेना , अपने आपमें एक 'घटना ' होती है . और घटना बनने की ललक हर नौजवान में होती है . हम भी नौजवान रहे ( आज भी हूँ ) सो हमने भी यहा दाखिले का सपना देखा और चल पड़े सपना को पूरा करने .
गाँव के एक कालेज से इंटर की मार्कशीट , मोमजामे में दो पराठे , एक ढेला गुड़ . चालीस रूपये नकदी . पैंट और कमीज . बस इतना ही सब था . पर दाखिला नहीं मिला . दोस्तों ने खूब चिढाया ' बाप मरे अंधियारे बेटा पावर हाउस ' बहर लौट आया . यह कहते हुए कि चलो जब यहाँ महादेवी वर्मा जी दाखिला नहीं ले पायी तो मेरी क्या औकात . दिल मजबूत किया और काशी का मध्य क्षेत्र पकड़ा . काशी विद्यापीठ . 'शास्त्रियों ' का धर्मस्थल . बापू की डाली हुई नीव पर अपने तमाम अभावों के बीच टन कर खड़ा यह विश्वविद्यालय आजादी की लड़ाई का केन्द्र रहा है . दाखिला ले लिया . यहाँ लगे हाथ जिक्र कर दूं कि हम भाग्यशाली रहे ,हमारे कुलपति थे - राजाराम शास्त्री . दाखिले के तुरत बाद जेल जाना पड़ गया . हुआ यूँ कि उन दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे चौधरी चरण सिंह . उन्हें समाजवादियों से चिढ़ थी . और प्रदेश के तमाम विश्वविद्यालयों , विद्यालयों के छात्र संघों पर समाजवादी युवजन सभा का कब्जा रहा . यह मुख्यमंत्री को रास नहीं आता था . सो उन्होंने छात्र संघों को बंद करने का फरमान निकाल दिया . 'आ बैल मुझे मार ' आंदोलन शुरू हो गया . उसी झटके में हम भी नेता हो गए . चौधरी चरण के मंच पर चढ़ कर उनसे माइक छीन लिया . बस इतना ही अपराध था . और जेल चला गया . इसकी चर्चा रही . डेढ़ महीने बाद जब लौटा तब तक अखबारों ने हमें उड़ने की जगह दे दी थी .उस समय काशी विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष थे भाई मार्कंडे सिंह . उन्होंने हमें विश्वविद्यालय में दाखिला दिलवा दिया . और मै फाइन आर्ट्स का छात्र बन गया .
         फाइन आर्ट्स उन दिनों विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए 'दर्शनीय स्थल ' था . क्यों कि यह अकेला विभाग था जहां लड़के लडकियां उन्मुक्त भाव से रहते थे . साथ साथ . यहीं पर हमने पहली बार 'लड़की ' से बात करना सीखा . उनके साथ चाय पीना सीखा . यह हमारे  तमीज का पहला कायदा था .
                                                                                                              जारी -

Thursday, March 21, 2013

आओ लौट कर संजू ....
...... प्रिय संजू .
प्यार . 
हम मिले नहीं . क्यों कि इस बीच तुम सियासत के एक दलाल अमर सिंह के चक्कर में फंस चुके थे . लेकिन हमारी सोच , हमारी नियति और हमारा जुडाव   तुम्हारे साथ वैसा ही है जैसा पहले था यानी सुनील साहेब के रहते हुए . आज यह खत तुम्हे इस लिए लिख रहा हूँ कि तुम्हे अपने किये का प्रायश्चित तो करना ही है . लेकिन बच्चे ! याद रखना जेल बहुत अच्छी बशर्ते उसे सही ढंग से जियो . इसके लिए तुम्हे यह करना होगा कि सबसे पहले यह मान कर चलना कि तुम जेल में नहीं हो . तुमने अपनी मर्जी से एक जगह का चुनाव किया है कि हमें कुछ दिन यहां गुजारना है . बस . और  समझा दूँ ? मेरे बच्चे ( यह संबोधन इस लिए है कि सुनील दत्त साहेब हमारे अच्छे दोस्तों में रहे हैं , कभी राज (बब्बर ) से पूछ लेना . ) थोरो को जब जेल में डाला गया तो उसने माना ही नहीं कि वह जेल में है . जेल एक मनोविज्ञान है उसे नकार दो बस . हस्ते खेलते वक्त गुजर जायगा . मनो विज्ञान समझा कि नहीं ? हम बताते हैं - एक दिन तुमने फैसला किया कि हम अपने कमरे में ही बन्द रहेंगे लेकिन उसकी चाभी हमारे पास ही होगी . तुम्हे यह एहसास रहेगा कि जब मर्जी होगी हम बाहर निकल लेंगे . तुम्हे कोइ दिक्कत नहीं होगी . लेकिन अगर कोइ तुम्हे एक कमरे में बन्द करके उसकी चाभी अपने पास रख ले तो तुम दो घंटे में ही घुटन महसूस करोगे . संजू यह ,मान कर  चलना कि चाभी तुम्हारे पास है और तुम तीन साल बाद यहाँ से निकलो गे . बस . 
      अब यह तीन साल गुजारोगे कैसे ? उसे सुन लो . अपने माहौल से दोस्ती रखना . जेल का हर अधिकारी तुम्हारे परिवार का सदस्य है . उससे सलीके से पेश आना . वहाँ जितने छोटे बनोगे उतना ही बड़ा बनाता है जेल माहौल . सब को मोहब्बत करना . खूब पढाई करना . हम तुम्हे गांधी , लोहिया , नेहरू , आचार्य नरेंद्र देव की किताबे भेजेंगे . उन्हें गंभीरता से पढ़ना . खूब खेलना . थक जाना . रात बहुत अच्छी गुजरेगी . सुबह हस्ते हुए उठना . ' आपको क्या चाहिए ' पूछना . बहुत कुछ सीख कर मेरा बच्चा वापस आएगा . तप  कर . संजू ! जब तक तुम लौटोगे तुम एक बहुत बड़े कलाकार हो कर लौटोगे . तुइ दूसरा नहीं होगा बच्चे म्हारे लिए एक स्क्रिप्ट तैयार रहेगी . मै लिख रहा हूँ . 
           जेल जाते समय कलम , लिखने का कागद जर्रोर्र रखना मेरे बच्चे . आखीर में बोल दूँ - आज तुमने इतिहास रच दिया है मेरे बच्चे एक ऐक्टर ऐसा है जिसके पास जिंदगी के सारे अनुभव हैं यहा तक कि जेल के भी और वह है संजू . संजू तुम्हे जो कुछ भी चाहिए हम मुहैया कराएगे . 
      सन्जो०ओ लौट कर आओ . तुम अकेले होगे . कोइ दूसरा नहीं होगा बच्चे .
चंचल 

Saturday, March 9, 2013

महा शिव रात्रि : अग्नि और सोम के मिलन की रात है .........................
                        
भारतीय मिथक और मिथक चरित्रों से जुड़ी कहानियों  के बारे दो अतिरंजित धारणाएं हैं . एक पश्चिम की कथित वैज्ञानिक (?) अवधारणा जो इन मिथकों को गप्प कहकर खारिज कर देते हैं . दूसरे अपने यहाँ के पोंगापंथी हैं जो इन चरित्रों और इनसे जुड़ी कथाओं को सिन्दूर लगा कर अछत और नौवेद्य चढ़ा कर तहखाने में  सहेज कर रख देते हैं . ये दोनों सोच घातक है . हमारे ये मिथक हमारे अतीत के समाज , धर्म , राजनीति और्सबसे बड़ी बात जीवनशैली को समझने में मदद करते हैं . देश काल और परिस्थिति को समझने में पर्त दर पर्त खुलते चलते हैं . इतना ही नहीं ये कथा कई दरवाजो के सांकल बजा कर बताते हैं कि हम कहाँ थे . उदाहरण के लिए महा शिव रात्रि को ही उठाइये . 
       आज की रात जिसे हमारे मनीषी पुरखों ने ' महाशिवरात्रि ' कहा उस कथा पर जाने के पहले एक निवेदन करना चाहता हूँ - आज फाल्गुन , बदी( शुक्ल पक्ष ) की तेरस है . कल चतुर्दसी है . इस चतुर्दसी को ही महाशिवरात्रि कहते हैं . आज की रात और कल के रात की भोर को देखियेगा . सुबह के साढ़े चार बजे से पांच बज कर या सुबह होने तक . पूरब की ओर निहारियेगा . अद्भुत्नाजारा होता है . सूरज और चाँद साथ साथ निकलते हैं या थोड़ा आगे पीछे . सुरमई चादर से दो चहरे निकलते हैं . एक सूर्य का और दूसरा चंद्रमा का . आज की भोर दोनों का ताप समान होगा . अग्नि और सोम मिलते हैं लंबे अंतराल के बाद . दोनों का चेहरा सिंदूरी आभा से दमकता दिखाई पड़ेगा . अब कथा देखिये . यह रात शिव और पार्वती के समभोग की रात है . उत्सव , उमंग , उत्साह और उत्कंठा की रात है .  सालों साल योग साधना से उठा योगी भोग की कामना लिए आया है , दूसरी तरफ लंबी आराधना में लीन रही पार्वती को उनका मनचाहा प्रेमी मिला है . तप  से, ताप से ताए दो तपी भोग के लिए तत्पर हैं . दोनों का ताप बराबर है . ( सुबह को निहार कर आस्वस्थ  हो लीजिए ) यह है शिव और पार्वती के समभोग की रात . धुप अन्धेरा . हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा .समूची प्रकृति रुकी पडी है . कहीं कोइ स्पंदन नहीं . सब कुछ ठहर गया लगता है . रति क्रीडा में दोनों लीन हो गए हैं . उस अँधेरे में प्रेम और प्यास की एक ज्योति  जलती है श्रृजन की . योग और भोग की महान कथा महाशिवरात्रि हजारों हजार साल से चली आ रही है और चलती जायगी . मानवीय संवेदना , स्वभाव और मनोविज्ञान की ऐसी कथा शायद ही कहीं मिले . उत्सवधर्मी समाज समभोग की रात को पूजता है , श्रृजन के श्रोत को सामूहिक रूप से स्वीकारता ही नहीं उसके मर्म से जुड जाता है . अब इसकी अंतर कथा भी देखते जाइए . 
   दक्ष की दो बेटियाँ हैं . सती और रति .सती का ब्याह शिव के साथ होता है और रति का कामदेव के साथ . दक्ष अपने द्वारा आहूत यग्य में शिव को नहीं बुलाते इसमें कामदेव का भी सहयोग रहता है . सती जबरन पहुह्ती है और सती हो जाती हैं . शिव के दूत पहुच कर यग्य को नष्ट कर देते है लेकिन  कामदेव और अग्नि ,जिसमे सती जल कर प्रान त्यागी इन दोनों के प्रति शिव में रोष व्याप्त हो गया . और दोनों को उन्होंने भष्म किया . एक को योग साधना से विरत करने के आरोप में दूसरे को समभोग में खलल डालने के लिए . कथा कथा के अंदर बहते प्रवाह को उसे बिम्ब और प्रतीक के खाचे में रख कर टटोलिए बहुत कुछ मिलेगा . यह मधुमास है . कामदेव की रचना है . जब शंकर जैसा तपी कामदेव से नहीं बच पाया तो इन पोंगा पंथियों पर क्यों उलझा जाय . 
     चलिए विद्यापति . कालिदास मलिक मोहम्मद जायसी को बांचा जाय . इसमें कोइ किसी से कम नहीं है . कालिदास ऋतु संहार , कुमार संभवं और मेघ दूत में बहुत कुछ कह जाते हैं , विद्यापति की विरहनी मैथिल भाषा से निकलती है दुनिया की हर भाषा में अंगीकार हो जाती है . और पद्मावत ? .... क्या बात है बिम्ब , प्रतीक . अवधी का प्रान है जायसी . पद्मावत में .... जाने दीजिए इसे संघी भी पढेंगे हमें मालुम है फिर भी कहे देता हूँ - 'श्रीफल युग्म  ( बेल ) पर द्राक्ष ( अंगूर ) जैसा सुसोभित होता है , कुच बर्णन है . और ..... बस चलिए मदनोत्सव मनाये . शिव को लगा रहने दीजिए . आज महा शिव रात्रि है . 

Wednesday, February 13, 2013

वह योग और भोग का तपी है 
कह दूं कि शंकर योगी है तो वाम पंथ कहेगा पोंगापंथ बघार रहा है .शंकर भोगी है कहूँ तो पोंगापंथियों  की आत्मा (?) आहत होगी . ये तंत्र और मंत्र वाले दोनों मिल कर भारतीय सभ्यता की जड़ उखाड रहे हैं . उनका कहना है कि भारत के पास उसका अपना इतिहास नहीं है . इसके जो भी चरित्र हैं सब मिथक हैं . कहानियों में पिरोये गए ये चरित्र कालखंड का निर्धारण नहीं करते . बात वाजिब है लेकिन इन मिथकीय चरित्रों को लेकर गढी गयी कहानियां क्या कहती हैं ? इन कहानियों को गढ़नेवाले समाज की सभ्यता किस ऊँचाई पर रही होगी ,उसे इसी से नापा जा सकता है कि हजारों हजार साल से ये कहानिया , इनके पात्र आज भी ज़िंदा हैं . ऋतुराज के आगमन पर एक चरित्र उठा रहा हूँ इसे देखें . ( यह आलेख ब्राजील की वीरा रेइस के इस सवाल के जवाब में लिखा कि ' इस्प्रिंग '  के बारे में भारतीय मिथक क्या कहता है )
       शंकर एक चरित्र है . वह देवता है . औघडी है . दानी है . योगी है . भोगी है .वह पूज्य है . उसके लिंग की पूजा होती है . दुनिया की किसी भी सभ्यता में लिंग पूजन नहीं है . पश्चिम में तो कत्तई नहीं . मध्येसिया में कई बार इसका जिक्र होता है लेकिन बहुत बाद में . लिंग शंकर का प्रतीक है और प्रतिनिधि भी . केवल एक चरित्र की कथा हमारी सभ्यता का का खुलासा कर देती है कि हम किस ऊँचाई पर थे . प्रकृति के साथ हमारे क्या रिश्ते थे . कल बसंत पंचमी है . सूर्य के नजदीक जाकर पृथ्वी इस कोण पर झुकती है की मौसम में खुनकी आजाती है . शिशिर उतर रहा है ग्रीष्म उभर रहा है पर दोनों एक दूसरे को काटते नहीं ,एक दूसरे से लिपट जाते है . दोनों एक दूसरे को इस तरह से लपेटते हैं कि दोनों का वजूद एक दूसरे में लींन  हो जाता है , इसे नाम दिया गया बसंत ऋतु . मदन महीना . समूची प्रकृति में  मद समाहित हो जाता है . एक कथा शुरू होती है . ---
     कैलास की एक गुफा में एक योगी ध्यान में चला गया है . ' ध्यान ' में जाना  चरम आनंद है.और जब आनद चरम पर होता है तो वह अनंग होता है ,अस्तित्वहीन . वहाँ शरीर नहीं रह जाता . इस आनद को केवल दो जानते हैं , योगी और भोगी . शिव दोनों है . आज वह योग में है .  सती  अपने पिता के घर जाकर अपने पति के तिरस्कार का फल देती हैं खुद को जला कर . प्यार का अदभुत उदाहरण देती हैं , शिव सती  के शरीर को लिए भटकते है . शरीर गल गल कर गिरता है . आज उसे पीठ बोलते हैं . और जब सती नहीं रही तो वह योग में चला गया . देवताओं को दिक्कत हुई . शिव को उठाया कैसे जाय ? पंचाइत् में फैसला हुआ , शैलपुत्री पार्वती सती हैं अपने पति को चाहती हैं और शिव योग में हैं ' योग भंग ' का विधान तय हुआ . प्रकृति को बसंत मय करने का . ' कामदेव ' को कहा गया कि वे जाकर योगी शिव के ध्यान को भंग करें . कामदेव चले और समूची प्रकृति ' काम ' की उत्प्रेरक बन गयी . ठूठे पेड़ों में भी कोपलें फूटने लगी . बयार में खुनकी आ गयी . कामदेव ने शिव को  छुआ . ध्यान भंग हुआ पार्वती सामने खड़ी मिली . प्रथम आलिंगन .. योग का अनूठा प्रयोग है . पर छणिक अगर कोइ इस मिलन को साध ले और दूर तक चले तो यह मोक्ष भी देता है . यह प्यार है . भारतीय सभ्यता ने इसे पराकाष्टा तक पहुचाया है . सम्भोग को पूज्य बनाया . शिव उसके प्रकीक बनते हैं . अचानक उस योगी को याद आता है कि वह तो साधना में था यह भंग कैसे हुआ ? तोडी देरमे तीसरे नेत्र ने दिखाया कि काम देव आये हैं . औघडी उठा और कामदेव को भष्म कर दिया . हाहा कार मच गया . कामदेव की पत्नी रति विलाप करते हुए शिव के पास आयी . रति के विलाप ने शिव कोपिघ्ला दिया . शिव ने कहा कामदेव को बरदान देता हूँ वह ज़िंदा रहेगा पर शरीर में नहीं वह अनंग होगा . हर एक में होगा , हर जगह होगा , तब से कामदेव अनंग हो गए हर एक में व्याप्त होगये . कोइ इससे अछूता नहीं है . कल वही कामदेव आ रहे हैं उन्कास्वागत करिये .
   इस बसंत को देखना हो तो गाँव चलिए . आम के बगीचे के अमराई देखिये . ... धमार गा रहेहैं नवल उपधिया - चंचल ,चपल, नवल नटनागर .. अंगिया मुल्तानी क मार .. फिरे गलियन में विरह भरी अलबेली ...........