Friday, January 16, 2015

हम कहाँ जा रहे हैं 
चंचल 
                 हिंदी पट्टी का एक शब्द और क्रिया रही है हांका .यह जंगल ,जीवन और जानवर से जुड़ा एक सामूहिक उपक्रम रहा है . जंगली जानवर का शिकार , उससे बचाव और उसे पाने के लिए लोंगों का एक दल जोर जोर से चीखते हुए ,हाथ में जो भी रहे उसे पीटते हुए एक साथ दौड़ते थे ,जिससे सारे जानवर डर कर भागते थे . और शिकारी उसका शिकार करता था . वन संपदा और जानवर सुरक्षा के नाम पर इस क्रिया को रोक दिया गया . सरकार ने इसे प्रतिवंधित कर दिया है . नयी सरकार ने इस हांका को अब सियासत में उतार कर समाज पर प्रयोग कर रही है . इसका रूप , आकार , भाषा और करतब को नए ढंग से प्रयोग कर रही है और सफल भी हो रही है . इसे सटीक भाषा दी जाय तो यह कहने में ज्यादा सुविधा होगी कि हम हांका के दौर से गुजर रहे हैं . इसका पहला और सफल प्रयोग संसद के चुनाव में देखा गया . एक हांका उठा . ठीक हाँका की तरह . क्या , क्यों , कौन , किधर जैसे तमाम वाजिब सवाल दर किनार हो गए और लोग दौड़ पड़े . जनतंत्र के मूल ढाँचे पर यह पहला और कारगर हमला था , जहा तर्क और सवाल बेमानी हो गए . और एक सरकार बन गयी. जब सब थिर हुआ और लोग पूछने लगे कि हम जिस हांका में शामिल थे वो तो दिखाओ . काला धन की वापसी , महगाई , बेरोजगारी ,भ्रष्टाचार वगैरह वगैरह  . ये सवाल अभी उठ ही रहे थे कि एक नया हांका आया . प्रधानमंत्री धन जमा योजना . सरकार ने कहा कि भागो बैक की  तरफ . हांका उठा कि - सरकार प्रत्येक खाते में लाखों रूपया डाल देगी और लोग रातों रात लखपति बन जायंगे . गो कि यह इस सरकार की मूल सोच का हिस्सा नहीं है . यह योजना मनमोहन जी के जमाने में ही लागू की जा चुकी थी लेकिन उसका नाम और सुविधा अलग थी . कि कोइ भी खाता धारक किसी भी राष्ट्रीय कृत बैंक से पांच हजार रूपये तक 'उधार ' ले सकता है . इस सरकार ने उसे हांका में डाल दिया .भीड़ भागी  बैंक की तरफ .खाते खुलवाने की होड़ में सारे करतब दिखाई पड़े . कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक इस हांके से तर हो गए . लछ्मीना कहारिन , बिरजू पंडित , लम्मरदार सिंह वगैरह जो इस हांके के जोरदार धावक रहे ,मुह बाए खड़े रह गए जब उनके सवाल - कि कितना पैसा आया खाते में ? का उत्तर यह मिला कि - कैसा पैसा ? इस में पैसा डालोगे नहीं तो आएगा कहाँ से ? दूसरा सवाल हांका में ठेले गए मजलूमों ने उठाया - सरकार ने हमारे खाते में कुछो नहीं डाला ? बैक ने घुडकी दी . यह सवाल सरकार से पूछो . सरकार का जवाब वही होगा जो काले धन की वापसी पर था -वजीरे तिजारत जनाब अरुण जेटली ने जो संसद में दिया था - सरकार ने कब कहा था कि वह कालाधन वापस लायेगी ? संसद खामोश हो गयी . यह सच है कि सरकार ने कभी नहीं कहा कि वह कालाधन वापस लायेगी . वो तो चुनाव का हांका था . चुनाव से पूछो . सरकार उसका क्या जवाब दे ?   
     अब इस सरकार ने समझ लिया है कि देश को जंगली करतब से कैसे चलाया जाय . इसके लिए उसके पास तरह तरह के कारकून हैं . कोऊ मुखहीन ,विपुल मुख काहू . आपने चुनाव के समय जो वायदे किये थे उसे टालने और उस अघोषित कार्यक्रम को लागू करने के लिए एक हांका लगा दीजिए बस . सवाल तो सवाल दबेगा अपने गुप्त कार्यक्रम लागू करने की पृष्टि भूमि बनेगी . उदाहरण देखिये - ' घर वापसी ' / ये हांका वो लगा रहे हैं जिन्होंने आजादी की लड़ाई के समय -मुसलमानों भारत छोड़ो ' का हांका लगाया था . उन्हें बेघर किया था . घर के नाम पर मुल्क तोड़ने में लीग की मदद की थी . मुल्क टूट कर आजाद हुआ . तोड़ने का अपराध इन पर न लगे ,इसके लिए सबसे पहले ' अखंड भारत ' की रामनामी ओढ़ कर सामने खड़े हो गए . आज भी उनकी कांख में विशुद्ध हिन्दू गोत्रवाद की कटार लटकी हुयी है . एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना है जिसमे मात्र हिंदू हों दूसरे नहीं . इन्हें अब मुसलमानों से कम ईसाईयों से ज्यादा खौफ है ,धर्म परिवर्तन के मसले पर . इस लिए ए एक बिल् लाना  चाहते हैं ,  कि धर्म परिवर्तन को पहले  रोका जाय . सरकार की यह पहली प्राथमिकता है कि वह एक क़ानून बनाने जिससे  आप अपनी चाहत का धर्म न चुन सकें . नागरिक अधिकार में कटौती .
   मुसलमानों के प्रति इनकी नाराजगी जग जाहिर है . उनकी बढ़ती आबादी से इन्हें चिंता होती है . उसे रोकने के लिए इनके हान्का बाजों ने पहले दस फिर पांच अब चार का नारा दिया है .आप इस हांके के साथ हैं या फिर विरोध में और जम कर अपने गुस्से का इजहार कर लीजिए फिर सरकार बीच में आयेगी और संतति क़ानून बना कर बता देगी कि आपको कितने बच्चेपैदा करना है . इस तरह के हांका बाजी से उनको दो फायदे मिल रहे हैं ,एक - जिन मुद्दों पर ये चुन कर आये हैं वो दरकिनार हो जायंगे और दूसरा ये अपनी गुप्त नियति को नीति की शक्ल देकर अगले हांके की तैयारी में व्यस्त हो जांयगे . क्यों कि इस सरकार के पास न तो कोइ दिशा है  जो आगे की तरफ ले जाय ,न ही कोइ व्यापक दृष्टि है जो देश को विकास की डगर पकड़ा सके . ' एक  नेता , एक झंडा , एक राष्ट्र ' इनका नारा ही नहीं सोच का मजबूत हिस्सा रहा है . ये उसी डगर पर हैं लेकिन एक बात भूल जाते हैं कि इस मुल्क में जनतंत्र और संवाद की निरंतरता जन जन तक पहुँच चुकी है. और वह इसे  धर्म के रूप में अख्तियार कर चुकी है . जो भी इसके विपरीत जा कर किसी और तंत्र की बात करेगा या उधर बढ़ेगा वह गर्त में जायगा . 
       इस देश का शासन तंत्र बहुदलीय है . और जनतंत्र के खांचे में है . बहु दलीय व्यवस्था में केवल सत्ता पक्ष ही ही तक सत्ता महदूद नहीं रहती . प्रतिपक्ष की भी भूमिका होती है . सदन एक मंच है जिस पर सवाल उठते हैं और उसका जवाब सरकार को देना पड़ता है . सदन में प्रधान मंत्री की ना मौजदगी इस बात की गवाह है कि सरकार मुद्दों पर बात करने से घबडा रही है . या उसके पास वाजिब जवाब ही नहीं है . इतना ही नहीं जितनी बार प्रधानमंत्री सदन में आये हैं उन्हें बार बार माफी ही मागनी पडी है . चाहे वह 'हरामजादा ' का सवाल हो या साक्षी महराज की बात . गो कि ये सब उल जलूल बातों के बीच से अपने को छिपा ले जाने का करतब प्रधानमंत्री भले ही खेल जायं लेकिन कब तक और कितनी बार ? .... और यह भी सच है कि प्रतिपक्ष अपनी भूमिका का निर्वहन भी उस तरह से नहीं कर पा रहा जिस तरह से होना चाहिए . जब देश का प्रधान मंत्री अपने मंत्री के बेहूदे वक्तव्य ( हरामजादे ) पर सफाई दे रहे थे तो उन्होंने दो बाते कहीं - एक कि कम पढ़ी लिखी हैं . चलिए यह पाच्य है क्यों कि हम जिस तरह की पढाई में उलझे पड़े हैं उससे कोइ गुणात्मक सोच विकसित नहीं हो  सकती . दूसरा तर्क निहायत ही भद्दा था जब नेता सदन यह कहे कि वे 'गाँव ' से आती हैं . मतलब साफ़ था कि गाँव के लोगों के पास एक असभ्य भाषा है . उनके पास बोलने की तमीज नहीं है . जब सदन की सच्चाई कत्तई अलहदा है . भारतीय समाज की सामाजिक बुनावट ही गांवन से शुरू होती है और गांवों पर जा कर टिक जातीहै . इतना ही नहीं संसद के जितने भी मुखर वक्ता हैं सब के सब गांवों के ही रास्ते से इस हवेली तक पहुंचे हैं . लेकिन एक भी कुर्सी से प्रतिवाद की आवाज नहीं उठी .
      प्रतिपक्ष ने निराश किया है . सबसे ज्यादा साम्यवादियों ने . मजदूर , किसान , मजलूम की बात करनेवाले साम्यवादियों की चुप्पी उनके किम्कर्ताव्य विमूढ़ की स्थिति बता रहा  है याफिर उनकी चालाकी . क्यों कि उन्हें भी जनतंत्र से , बहुदलीय व्यवस्था से , और विकेंद्रित सत्ता से परहेज रहा है ,यह बात दीगर है कि कुछ सूबों में उन्हें भी जनतंत्रीय व्यवस्था से गद्दी तक पहुचने की सुविधा मिल चुकी है . वे इस वक्त किसी ऐसे अवसर की तलास में हैं जो देश के जनतंत्र को कमजोर कर दे और इन्हें आगे बढ़ने में सहूलियत हासिल हो जाय . साम्यवादियों का यह चतुराई इन्हें बार बार मारता रहा है लेकिन ये अपनी आदत से बाज नहीं आते .४७ में अंग्रेजो की  तानाशाही का समर्थन इन दोनों ताकतों ने किया हुआ है . ७५ में आपातकाल का का भी समर्थन दोनों ने सार्वजनिक रूप से किया हुआ है . एक ने माफीनामालिख कर दूसरे ने खुला समर्थन देकर . मजे की बात यह कि जिस इंदिरागांधी ने तानाशाही क प्रयोग किया था उन्हों ने सार्वजनिक रूप से जनता सेमाफी माँगा लेकिन ये दोनों उसपर आज तक चुप्पी साधे  पड़े हैं . 
   अब प्रतिपक्ष की नहीं बल्कि जनतंत्र की हिफाजत की जिम्मेवारी कांग्रेस की बनती है . उसकी चुप्पी अखरती है .लेकिन अभी वक्त है कि वह संसद और सड़क को गरम करे और उन सवालों को उठाये जो देश की समस्या है . बेरोजगारी , महगाई , भ्रष्टाचार आदि . लेकिन यह ख़याल रहे कि सवाल भर उठा देना किसी सियासी  पार्टी का कर्तव्य भर नहीं है ,उसका निदान भी जनता के सामने रखती चले और उस पर जनमत को देखे . और यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि इन सब स्मस्याओं का निदान केवल और केवल कांग्रेस के पास है बशर्ते वह अपनी दृढ इच्छा शक्ति से उसपर उतरे . उदाहरण के लिए ' दाम बाँधो ' ' फिजूल खर्ची पर रोक ' विकेंद्रित और कुटीर उद्योग ' 
२६ जनवरी कांग्रेस की बहुत पुरानी तारीख है . उसे नयी और परिमार्जित की जा सकती है क्या ? 

Sunday, June 29, 2014

कालखंड पर लिखी इबारत .....
चंचल 
सत्तर और अस्सी दशक के बीच का काल खंड ,आजादी के बाद का स्वर्णिम काल है . सियासत , साहित्य . कला के उन्मुक्त निखार का उदय है . सामाजिक सरोकार से जुड़े जितने मुद्दे इस काल खंड पर उठते हैं वे ही आजतल किसी न किसी बहाने छाये हुए हैं . इसी काल खंड पर संसद और सड़क की आंच, गाँव गाँव,  घर घर ,और जन जन तक पहुचती है . देश, संसद को अपना आइना मान कर अपनी शक्ल देखता है .जब गरीबी और गैर बराबरी समाज से उठ कर संसद में जगह ही नहीं बनाती बल्कि संसद की अंग्रेजियत खीच कर सड़क का देसज सच अपने जद में ले लेता है . और इसकी शुरुआत होती है ६३ के तीन उप चुनाव के नतीजे के बाद . तीन उप चुनाव है , मुजफ्फरपुर , फरुक्खाबाद और जौनपुर . तीन दिग्गज चुनाव मैदान में हैं . मुजफ्फरपुर से जे बी कृपलानी , फरुक्खाबाद से डॉ लोहिया और जौनपुर से पंडित दींन  दयाल उपाध्याय . दो सीट प्रतिपक्ष के हाथ लगती है एक पर कांग्रेस जीतती है . मुजफ्फर पुर से कृपलानी , फरुक्खाबाद से डॉ लोहिया और जौनपुर से कांग्रेस के राजदेव सिंह जीत कर संसद में आते हैं . आजादी के बाद पहली दफा पंडित नेहरू सरकार के खिलाफ  अविश्वास का प्रस्ताव आता है . संसद में पहली बार हिन्दी गूंजती है . संसद में पहली  बार देश का मजबूर  , मजलूम , दबा कुचला किसान मेहनतकश मजूर अपने किस्से को सुनता है .वहाँ उसपर चर्चा होती है . डॉ लोहिया सरकार को अर्दभ में लेते हैं .  प्रति व्यक्ति औसत आमदनी के सवाल पर . तत्कालीन वित्तमंत्री मोरार जी रणछोड़जी देसाई कटघरे में खड़े होते हैं . पंडित नेहरू के प्रिय राम मनोहर (लोहिया ) नेहरू को चुनौती देते हैं - हिन्दुस्तान में प्रतिव्यक्ति आमदनी तीन आने है . बिट मंत्री झूठ बोल रहा है . वित्तमंत्री सत्रह आने से नीचे आते है तेरह आने पर अड् जाते हैं . डॉ लोहिया कहते हैं - अगर सरकार अपनी बात को सच साबित कर दे तो हम राजनीति से हट जायंगे और सरकार गलत हुयी तो अपने प्रधान मंत्री से कहो वो अपने पद से इस्तीफा दे दें . संसद सन्नाटे में है . यह पहली बार ऐसा हुआ है की पंडित नेहरू को खुली चुनौती मिल रही है . ' तीन आने बनाम तेरह आने ' नाम से बहुचर्चित यह बहस आज भी ज़िंदा है . ( राजनीति में दखल रखनेवाले हर शख्स को यह किताब -' लोक सभा में लोहिया ' पढनी चाहिए ) लोकसभा में चली यह बहस पुस्तक के रूप में छाप कर गाँव गाँव तक पहुचाई गयी . एक नई परम्परा की शुरुआत हुयी की उसका चुना हुआ प्रतिनीधि सासद में क्या बोलता है / जनता को यह जानकारी होनी चाहिए . ७७ के पहले और उसके बाद भी समाजवादियों ने इस परम्परा को चालू रखा . जनता और उसके चुने हुए प्रतिनिधि के बीच संवाद शुरू हुआ लेकिन अब लुप्त है . क्यों ? यह अलग का लेकिन महत्वपूर्ण सवाल  है जो सांसदों को उघार करेगा .आज देश को जरूरत है की वह अपने चुने हुए प्रतिनिधि से जवाब मागे .अगर यह नहीं हुआ तो संसदीय व्यवस्था चरमरा जायगी . 

Wednesday, February 26, 2014

बसंत ,शिवरात्रि ,खजुराहों और कालिदास 
चंचल 
       फाल्गुन बदी चतुर्दसी जब बसंत अपने सम्पूर्ण वेग के साथ उफान पर होता है वातावरण मेमंज्री की  मादक खुशबू हवा के झोंके के साथ मन को सहला रही होती है ,बागों में कोयल की कू चतुर्दिक गूंजती है ,नदी के किनारे बैठा पपीहा , उसपर बैठी अपनी प्रियतमा को आवाज दे रहा होता है और बन में मोर पिहंकता है तब शिव का योग उनकी साधना ,समाधि भंग होती है .  ...नेत्र खुलते ही शिव स्व से निकल समष्टि में विचरण करने लगते हैं . कोमल लताएँ ठूठ दरख्तों का आलिंगन कर रही हैं ,बगैर किसी परिधान के . नयी कोपलें निकल आती हैं ठूंठ गांठो से . मदार के फूल उर्ध्गामी हुए नीले आसमान में सफ़ेद छीट का बिम्ब बनाए बैठे हैं . कचनार की अधखिली कली खुलने को आतुर है . पोखरे के शांत जल को बस्वारी के बांस आहिस्ता आहिस्ता सक्लाते हैं .पोखर में कंपन उठता है . मीन मुह खोले मेहदी के झरे फूल को लील लेना चाहती है . शिव चकित हैं प्रकृति के इस बदलाव पर . त्रिनेत्र से देखते हैं . किसने किया यह सब जो उद्वेलित कर रहा है समूचे ब्रह्माण्ड को ? उत्तर मिलता है - 'काम ' आये हैं शिव को जगाने . काम प्रवेश लें इसकी सूचना लेकर बसंत आया है माघ पंचमी को ही . शिव को काम पर गुस्सा आता है और उसे भष्म कर देते हैं . काम की पत्नी रति विलाप करती है . विरह की पीड़ा बहुत दुःख दाई होती है . रति के विलाप से शिव भी हिल जाते हैं .और काम को अमरत्व देते हैं . यह अनंग होगा लेकिन सब में समान तीब्रता से ज़िंदा रहेगा . यह प्रकृति का स्थायी भाव होगा रति . विलाप मत करो . रति काम की पत्नी है . सौंदर्य की पराकाष्टा . दक्ष की पुत्री है . गौरी की सगी बहन . गौरी शिव की ब्य्ह्ता . कथा बहुत लंबी है . आज ही के दिन शिव और पार्वती का मिलन होता है . आज की रात को शिव और पार्वती रतिदान करते हैं .  प्रकृति और पुरुष का मेल . श्रृष्टि की संरचना . प्रथम आलिंगन होता है . कालिदास कावर्णन देखिये 'कुमार संभवंम में . कभी वक्त मिले तो सुधी पाठक जन इस प्रथममिलन की यात्रा को जरूर देखें . और अगर सजीव चित्रण देखना हो तो खजुराहों देखें . रतिबंध की अनोखी प्रस्तुति . मूर्तिशिल्प का अदभुत प्रस्तुतीकरण . आज सब याद आ रहे हैं . हम पाखंडी लोग फूल लिए घूम रहे हैं. शिव बनो ... जहां तक बंन सके उतना तो बनो . पार्वती तुम्हारे पास है . आलिंगन दो . आज दोनों के मिलन का दिन है . अस्तु 

Sunday, February 9, 2014

बंबई ....बरोबर 
चंचल 
      बम्बई से न्योता रहा .की यम कालेज के व्यवस्थापक मुन्ना  पांडे का . जाने का मन नहीं था . इसकी दो वजहें हैं .एक- सामान ढोने का मन नहीं करता .दो -शहर से खौफ लगता है ,इसलिए टाल मटोल करता रहा लेकिन मुन्ना भी तो वही जिद पर अड़े रहे और मनीष जी ने मजबूर कर दिया कि 'चलना ही है ' ..भारतीय की एक पुश्तैनी सोच रही है जो बदस्तूर चली जा रही है एक पंथ दो काज वाली . सोचा लगे हाथ 'बहुधंधी ' 'किस्बत '(किस्बत कहे तो पुराने जमाने में नाइयों के पास टिन का एक डिब्बा हुआ करता था जिसमे मूड़ने के लिए अस्तूरा ,नह काटने के लिए नहन्नी और जुल्फ सवारने के लिए कंघी हुआ करती थी . भिगोने के लिए कटोरी भी .आज इस नए जमाने में जब कि हर समझदार संभ्रांत शहरी नाईगिरी करने पर आमादा है उसके पास भी एक किस्बत है जिसे नयी भाषा में लैप-टाप कहते हैं . इसमें भी सारे औजार हैं . इसे भी जो देखता है उसकी हजामत बढ़ जाती है ) भी ठीक करा लूंगा . चुनांचे हमने राजू (राणा सिंह ) को इसकी सूचना दे दी और चला मुरारी हीरो बनने . कम से कमतर कपड़ों में रहने की आदत पड  गयी है .खादी सिद्धांतः पहनता हूँ . खादी पहनने के पीछे सादगी और स्वच्छता का मर्म छिपा होता है . इसे नील टीनोपाल , कलफ और इस्तरी अपवित्र करते हैं इस लिए जो जैसा मिला उसे पहनता हूँ . डंके  की  की चोट पर . झोला उठाया और चल दिये ......
        लाल बहादुर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे बनारस को देख कर कोफ़्त होती है . वहाँ न ही शास्त्री की सादगी है ,न ही काशी की ठसक . नकली न्यूयार्क की भोंडी नक़ल की इमारत है .कम से कमतर देसी उपस्थिति . खानपान में वही खराब खाद्य प्लास्टिक लपेटे ,एक का तीन में बिकता धंधा . इन 'हरामखोर ' ठेकोदारों और 'रिश्वत बाज ' नौकरशाहों को इतनी भी अकल नहीं है कि जिन विदेशियों को लुभाने के लिए तुम सुविधा दे रहे हो और उन्हें बुला रहे हो वो तुम्हारी इन इमारतों को देखने नहीं आते . वो तो पहले से ही डिब्बा बंद खाना ' से अघाए और ऊबे लोग हैं . उन्हें हिन्दुस्तान में तो हिन्दुस्तान दिखाओ . इंडियन एयर लाइन की उड़ान भरा तो उसमे राहत मिली . भारतीय परिवेश में साडियों में लिपटी महिलाओं की मुस्कुराती छवि से मन खिला . और इसी खिले मन से मुम्बई पहुचा .
  हर शहर की अपनी खुशबू होती है . उसका मिजाज होता है और उसके हवा और पानी की अलग तासीर होती है . हवाई अड्डे के बाहर निकलते ही बम्बई हमसे लिपट गयी . यह उसकी अदा है . धूप में ताप है पर छाँव में खुनक . लगता है कोइ आँचल से बना हिला रहा है आहिस्ता आहिस्ता . क्यों राजू ?....बरोबर ! वह मुस्कुरा दिया . और हम बरोबर हो गए . मुन्ना तिवारी कल शहर में मिलेंगे ,बोल कर विदा हो लिए और हम मुन्ना पांडे के साथ राजू के घर सातवें माले पर मराठी नाश्ते के बाद कल्याण की तरफ रवाना हो गए . कल्याण बम्मई में नहीं है . एक जिला है . बाएं भिमंदी है दायें कल्याण . और हम कल्याण में हैं .

Tuesday, January 7, 2014

उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश की सरकार कब बनेगी ? 
चंचल 
         ... विषयान्तर में तीन उदाहरण देना चाहता हूँ . उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी , पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सालिग राम जायसवाल और उत्तर प्रदेश से ही आये केन्द्र में स्वास्थ्यमंत्री बने राज नारायण जी  का . डॉ सम्पूर्णा नन्द उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे और नारायण दत्त तिवारी विधायक . एक दिन तिवारी जी मुख्यमंत्री से मिले और बोले अल्मोडा में ऐ सड़क चाहिए . संपूर्णानंद जी ने कहा यह तो बहुत खुशी की बात है जाओ बनाओ . तिवारी जी ने कहा सरकार कुछ मदद करेगी ? डॉ संपूर्णानंद ने कहा बिलकुल मदद करेगी , तुम जिस सड़क को बनाओगे कोइ रोकेगा नहीं . और दूसरा जब सड़क  बन जाय तो हमें बताना कोइ मंत्री भेज  देंगे उसके उदघाटन के लिए . डॉ संपूर्णानंद अपने मजाकिया व्योहार के लिए सब में लोक प्रिय थे . अल्मोडा में ऐ सड़क बनी जिसके लिए नारायण दत्त तिवारी ने अपने कंधे पर पत्थर और मिट्टी ढोए . एक काम करने का तरीका यह था . दूसरा सुनिए -सालिग राम जायसवाल समाजवादी थे , इलाहाबाद के थे . डॉ लोहिया की मृत्यु के बाद समाजवादी आंदोलन जब बिखराव की तरफ बढ़ा तो बहुत सारे समाजवादी दिग्भ्रमित हो रहे थे कि किधर चलना है / उनमे से एक सालिग राम जायसवाल भी रहे . निहायत ईमानदार .लड़ाकू और प्रतिबद्ध . श्रीमति इंदिरागांधी ने जायसवाल जी को बुलाया और बोली कि बहुत हो चुका बाबू जी अब आप कांग्रेस में आ जाइये आपकी जरूरत है . और इंदिरागांधी ने उन्हें उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य मंत्री बना दिया . सूबे के दाक्रों का रेला लग गया 'मंत्री ' के यहाँ . सब की एक ही माग कि हमें अमुक हस्पताल में रखवा दीजिए . मंत्री जी का एक ही सुझाव - दरखास्त लिख कर लाये हो ? .. तो उसी के बगल में मेरी तरफ से आर्डर लिख दो मै दस्तखत कर देता हूँ . यह होता रहा . इ़क दिन स्वास्थ्य सचिव पूरी फ़ाइल लेकर आया और मंत्री जी को बताया कि ,मंत्री जी कैसे काम चलेगा कई हास्पिटल ऐसे हैं जहां दर्जनों डाक्टर पहुँच रहे है और कई हास्पिटल ऐसे हैं जहां डाक्टर हैं ही नहीं . मंत्री जी का दो टूक जवाब था - तो तुम किस लिए हो . इसे ठीक करना तुम्हारा काम है उसे ठीक करो .तीसरा उअदाहरण देखिये देश के स्वास्थ्य मंत्री बने राज नारायण जी . उनका वायदा था हर गाँव में डाक्टर मुहैया कराना . उन्होंने हर गाँव में मामूली से मानदेय और आवश्यक दवाओं के साथ स्वास्थ कर्मी बना दिये . सबसे मजेदार वाकया हुआ संसद में कांग्रेस प्रतिपक्ष में थी उधर स किसी ने नेता जी सवाल पूछा -स्वास्थ मंत्री जी ,देश की चिकित्सा व्यवस्था कैसी है ? राज नारायण जी ने ब हैसियत स्वस्थ मंत्री के बोलने खड़े हुए और लगे स्वास्थ विभाग की बखिया उधेड़ने . भूल गए की सरकार में हैं . किसी ने टोका कि आप यह क्या बोल रहे हैं ? नेता जी ने तुरत जवाब दिया -पचासोसाल से यह हाल हुआ है हम एक दिन में कैसे ठीक कर देंगे ?
        आज सवाल का जवाब सच में नहीं मिलता .मंत्री असलियत को ढकने के लिए बोरा कंधे पर रख कर चलता है .

Tuesday, December 10, 2013

चिखुरी /चंचल
कुर्सी दौड़ चालो है .......
                           तीनो जन ...इकट्ठे ? कीन उपाधिया, लखन कहार और उमर दरजी . तीनो सजे सवरें हैं .  तेलफुलेल , से चकाचक . लोगों ने देखा तीनो मुह लटकाए चले आ रहे हैं .न कोइ बात चीत ,न हंसी मजाक , बस सरपट बढे आ रहे हैं चौराहे की तरफ . जहां आसरे की दूकान पर मजमा पहले से ही लगा बैठा है . दो चार कदम रह गया होगा तभी लाल्साहेब ने सवाल दागा -ये तीनो ....किधर से भाई ? तीनो ने कुछ नहीं बोला . बस गंभीर बने रहे . वक्त की नजाकत देखते हुए कयूम मिया ने सहलाया -अरे भाई पहले बैठने तो दो , बेचारे पता नहीं कहाँ से थके-मांदे चले आ रहे हैं ,पता नहीं इन पर क्या गुजरा है , ... आओ कीन .. हियाँ आओ .. कहाँ से लौटे हो बेटवा ? कीन कुछ जवाब देते उसके पहले ही उमर दरजी ने जवाब दिया -गए रहे टोनामेंट देखने ...
  -टोनामेंट नहीं ,टूर्नामेंट ..
जो भी हो वही देखने गए रहे ,
तो हुआ क्या ?
एक से बढ़कर एक खेल हुआ . महीनों से तो चल रहा था . 'जलेबी दौड़ 'देखा . मजा आ गया गुरू , क्या खेल है ? दोनों हाथ पीछे बंधे रहे , एक दो के नहीं ,पूरे झुण्ड के झुण्ड . जलेबी ससुरी धागे में लटकी .. कभी इधर ,कभी उधर , बाकी खेल्नेव्वाले मुह बाए कूद लगाते रहे . पर मिला उन्ही को जिनका मुह चौड़ा रहा ...
और का हुआ . ?
-तिनटंगी दौड़ . इसमें अकेले नहीं दौड़ा जाता . ...दो को मिल कर दौडना होता है . एक का बांया पैर दूसरे के दाहिने पैर से कस कर बांध दिया जा है ,फिर रेस होती है . .. एक हुआ 'बोरा दौड़ ' यह और मजेदार दोनों पैर बोरे में डाल दिया जाता है और बोरे को कमर के पास बांध देते हैं ,फिर उनका रेस देखो . ..अभी बात पूरी भी न हो पायी थी कि मद्द् पत्रकार की मोटर साइकिल आकर रुकी . लोग बताते हैं कि जब मद्दू की मोटर साइकिल रुकती है तब उनकी पत्रकारिता चलती है . चुनांचे आते ही आते मदु चालू हो गए - क्या राजनीति हो रही है भाई ? जवाब दिया कीन उपाधिया ने - राजनेति नहीं गुरू , टूनामेंट की बात हो रही है . मद्दू ने समझाया - कीन ! दोनों एक ही है . लखन कहार चकराये 'दोनों एक ही है ? जलेबी , बोरा , तीन टंगी ....? लेकिन चुप रह गए . कोइ न कोइ तो पूछेगा ही . वह क्यों फसने जाय . बहर हाल मद्दू आये और चिखुरी के बक्गल में बैठ गए .
      आज की क्या खबर है चिखुरी काका ? चिखुरी ने अखबार  बगर रख दिया . चश्मा उतार ही रहे थे कि उमर ने बयान देना शुरू कर दिया - आज की खबर ? कुर्सी दौड़ चल रही है ,हम तो ऊब कर भाग आये . हमारा कंडीडेट तो पहले ही राउंड में गिर गया . .....' लाल्साहेब को मौक़ा मिल गया -ओमर मिया ! पूरा बताओ न , कैसे क्या हुआ ?
उमर ने ,बीड़ी सुलगाया . बीड़ी उलट कर जोर से धुँआ निकाला . आँखे लाल की . फिर बताना शुरू किया .
       हम तीनो जन यहाँ से होत भिनसार  पाठशाला पे पहुच गए जहा टूनामेंट होत रहा . खेलय वाले कम देखय वाले ज्यादा . तिल रखने की भी जगह नहीं . कोइ कुर्सी पर कोइ पेड़ पर कोइ साइकिल पे इसी में हम भी तीन जन .लखन कहार मजे में रहे गमछा रहा उस पर बैठ गए . हमने ईंट खोज निकाला , कीन उपाधिया को कुछ नहीं मिला तो 'पनही ' पर ही जम गए . इतने में क्या हुआ कि पहले सीटी बजी . एकदम सन्नाटा . फिर लोड स्पीकर का भोम्पा बोला ..दिल्ली मेरी दिल्ली .. दिली .. दिल्ली .. दिल्ली ... ' रेकाट' की सूई दिली पे फस गयी . सीटी वाले साहेब ने जोर से आवाज दी -जे नहीं चलेगा कोइ धार्मिक बजाओ ... रेकाड बोला - आरा हीले ,बलिया हीले , छपरा .. रोको जल्दी रोको ... नौटंकी समझे हो का . यह टूनामेंट है . कोइ दमदार गाना लगाओ . दो पढ़े लिखे लोग उसकी मदद के लिए भेजे गए . तब कहीं जा कर देशप्रेम मिला . इन्साफ की डगर पे . बच्चो दिखाओ चल के .. यह देश है तुमारा .. तुम्हारा .. तुम्हारा .. 'और देश फंस गया . खेल रोक दिया गया . अब तय हुआ कि कि एक कुर्सी बीच में रहेगी .उसके घेर कर दौडने वाले दो होंगे . और जब सीटी बजे तो एक को उस कुर्सी पर बैठ जाना है . जो बैठ जायगा वह जीत जायगा . कई बार सीटी बजी लेकिन कोइ भी बैठने को तैयार नहीं . तब से यही चल रहा है .सीटी बजती है दोनों एक दूसरे को देखते हैं पर बैठे को राजी नहीं हैं .
  -सो क्यों ?
सच्चाई का है ये तो 'ऊपरवाला ' जाने लेकिन मुहा मुही यही हो रही है कि किसी ने कुर्सी के उस असल मुकाम पर 'केंवाच ' रगड़ दिया है . जिस पर तशरीफ रखी जाती है .जो भी बैठेगा तशरीफ खुजलाते हुए भागेगा पर खुजलाना कम नहीं होगा .राम भरोस बनिया तो आप बीती बताता रहा कि एक बार वो भी फंस चुका है , ऐसी खुजली शुरू हुई कि पूछो मत बताने में शर्म आती है .
-लेकिन यह केवांच का होता है ?
 चिखुरी मुस्कुराए .-यह एक दरख्त का फूल है जो देखने में तो बहुत खूबसूरत होता है लेकिन इनके रोंये में  एक अजीब सी फितरत होती है खुजली की .. तो सुन लो पंचो केवांच से बचना चाहिए .
और दिल्ली की खबर क्या है भाई ?
 अब सुनो ... इनका सवाल देखो ....

Tuesday, December 3, 2013

चिखुरी / चंचल
हम तुम से मोहब्बत करके  सलम .....

                (    यह सुलेख उन दोस्तों के नाम है जिन्हें तानाशाही नहीं पसंद है .इसमें रामबचन पांडे पूर्व अध्यक्ष छात्र संघ काशी विश्वविद्यालय का संशोधन नोट किया जाय कि यह उस  पीढ़ी के लिए है जो जम्हूरी निजाम चाहती है )
 ....यह लो एक खबर और ... मोहब्बत के जुर्म में जेल ..
तुम से एक बात कहा है कि जब भी अखबार बांचो ,सलीके से . लंठई मत किया कर .इ टीवी ना है अखबार है . समझे ? और उमर  दर्जी समझ गया कि अखबार लिखना ही सलीका नहीं रखता , उसका पढ़ना भी सलीका मागता है. चुनांचे उसने चिखुरी की डाट का जवाब सलीके से दिया और 'जनाब ' कहकर फर्सी सलाम मारा . चिखुरी ने उमर से कहा - चल मोटी -मोटी बता ,
मोटी मोटी ? शहर में मोटी रहें भले ही लेकिन उन्हें छपने की छूट नहीं है , हम अहमदाबाद रह के आये हैं . लोग पहले खा  पी के मोटी होती हैं फिर दुबला होने के लिए सड़क दर सड़क घूमती हैं .उमर अभी बहुत कुछ बोलता लेकिन छप हो जाना पड़ा क्यों कि अखबार का . पहला पन्ना कोलई दूबे के हाथ में है - बुड़बक हो ,उसे मार्निंग वाक् कहते हैं .
कयूम को मौक़ा चाहिए होता है -इस्वाक में क्या होता है ?कयूम सवाल नहीं पूछते ,सवाल की गाँठ खोजते हैं .सो कोलई को विस्तार में जाना ही पड़ा .- पुरुष और महिला अल सुबह पार्क में चले जाते हैं . चुस्त पजामा और ढीली कुर्ती . जोर जोर से सांस निकालते हैं बंद कमरे का मशीन वाला हवा बाहर छोड़ते हैं और पेड़ पौधों की खुशबूदार हवा अंदर खींचे हुए तेज रफ़्तार से चलते हैं . महिलायें आगे रहती हैं पुरुष पीछे . ऐसा क्यों ? लखन कहार का सवाल टेढ़ा था . चिखुरी पलटे- इस लिए कि पुरुष  बत्तमीज होता है . कोलई चौके -ये लो .ताबक तोड़ दो ख़बरें .
सुना जाओ अभी चाय पक रही है .
पक नहीं रही है , दूध ही फट गया . आसरे ने ऐलान किया और बर्तन को फिर से धोने लगा . लाल्साहेब की आँख गोल हुई -कमाल है इस जमाने में भी दूध फटे लगा ? देखते देखते ज़माना खराब हुआ है . लाल्साहेब चालू हो गए - अभी कल मी बात है दूध फटने न पाए इसके लिए कितनी साफ़ सफाई रखनी पड़ती थी ,एक के घर में घी बनता था तो पूरा गाँव जान जता था . अबतो न कोइ महक न स्वाद . सब कुछ नकली .लखन ने एक अलग का किस्सा सुनाया . ''' पप्पू क भौजी बैगन खरीद कर ले गयी थी . एक बैगन बचा कर रखदी थी कि सुबह आलू मिला के चोखा बनाएंगे ,लेकिन सुबह क्या देखती है कि बैगन फूल के लौकी हो गया है . पूरे गाँव में कोहराम .पता चला आजकल सब्जियों को भी इन्फेक्सन दिया जाता है .
      इन्फेकन नहीं इंजेक्सन कहो .
     एकै मतलब हुआ .
लेकिन इ भी तो पता चले कि पप्पुआ क भौजी  बैगन रखे कहाँ रही ? एक साथ कई ठहाके लगे . लेकिन सबसे देर तक हँसते हैं कयूम मिया और उनके हँसने का तरीका कत्तई  आलग है . वे थोड़े थोड़े देर के अंतराल पर फिस्स ... फिस्स   करते रहेंगे .
   खबर तो सुनो , कोलई ने जोर का हांका मारा . और लोगों के कां उधर हो गए . एक साथ दो खबर . दोनों का मामला एक है ..
  मामला मत सुनाइये खबर पढ़िए . ..तहलका के संपादक पर बलात्कार का आरोप .
यह तहलका क्या है भाई ?  मद्दू ने बताया -तहलका ? यह हंगामा से मिलता जुलता है . उसके कोइ संपादक हैं तरुण तेजपाल उन्होंने ,,,,,,,
किसके साथ किया ?
उसका नाम नहीं है .
दूसरा ?
एक साहब है अमित शाह उन्होंने एक लड़की की जासूसी कराई वो भी अपने साहेब के लिए .
पूरा दिन खराब हो गया .कहते हुए चिखुरी ने मद्दू को उकसाया . -आपै बताओ भाई तुम भी अखबार से हो . का लगते हो अखबार के ? मद्दू इस सवाल के लिए तैयार  नहीं थे ,झिझकते हुए बोले -संबाददाता ...... हुआ यूँ कि ये जो साहब हैं तरुण जी अपने किसी महिला संपादिका से जबरदस्ती करने लगे और लगे 'लिफ्ट' मागने ' बस बात खुल गयी लिफ्ट की वजह से . अब पुलिस तरुण को गोवा ले जा रही है क्यों कि लिफ्ट वही गोवा में ही पडी है .और दूसरी ?
दूसरी खबर और भी नाजुक है .....गुजरात के कलेत्टर थे प्रदीप शर्मा . इसलिए उन्हें गुजरात की सरकार ने गिरफ्तार कर के जेल में डाल दिया.ताकी लोगों को पता तो चले कि जब इतने ऊंचे ओहदेदार को जेल में डाला जा सकता है तो बाकी किसकी औकात ? कभी सुना कि वहा कोइ कुछ बोला हो ? कोइ सवाल उठा हो ? इसे कहते हैं तर्ज ये हुकूमत . इसे ही कहते हैं 'गुजरात माडल . ' इस माडल में हर कोइ चौकन्ना रहता है . कोइ किसी से बात नहीं करता बात करनी है तो पहले जेल जाओ ,जमानत कराओ ,बाहर निकलो ,बात करो .फिर नयी धारा में जेल जाओ . इसी नुस्खे को पूरे देश में लगाने का इंतजाम किया जा रहा है . बशर्ते जनता समझे .लेकिन इस साथ साल में जनता भी बदजुबान हो गयी है ,अपने ही नेता से जुबान लड़ाती है . भाई नेता जी जो बोलें सब सही .उस पर सवाल मत उठाओ .उठाओगे   तो भोगो गे .साहेब कुछ भी कर सकते हैं किसी के भी गर की खाना तलाशी ले सकते हैं लेकिन साहेब की तरफ मत देखो . शर्मा जी को देखो , भाई चुप चाप चुप ही रहते क्यों झाकने लगे . बस चलो जेल क्यों कि शर्मा जी उस सी डी  को जानते हैं जो अमित के साहेब और साहेब की महबूबा के बारे में है .
इ सी डी का होती है भाई .लखन ने गंभीर सवाल पूछा . चिखुरी ने घुड़का - जवानी भी जा रही है और सी डी नहीं जानते ? भाजपा तो जानते हो न ? यह उसका खेल है . सटीक लगता है . यह एक तरह का तावा होता है इसमें गाना बजाना .नाचना कूदना बातचीत सब होती है . कहते हैं कि साहेब उस सी डी में हैं .और लोग यह भी कहते हैं कि इसी सीडी से साहेब ने संजय जोशी का खेल  खत्म किया था अब वही सीडी खुद के गले में फंस गयी है . लाल्साहेब बीच में आ गए -बोया पेड़ बबूल का ... ये अमित शाह कौन है भाई ?
... लोग बताते हैं इसकी पैदाइस शिकागो में हुई है .कई तरह की पढाई किया पर सुधरा नहीं ,गुजरात आगया और सरकार कामंत्री बन गया .
और ये साहेब कौन हैं ?
साहेब कहते हैं मुख्यमंत्री को .
और साहेब क्या कहते हैं ?
खलक खुदा का ,
हुकुम शहर कोतवाल का ,
हर खास व आम को आगाह किया जाता है कि -
डॉ धर्मवीर भारती की कविता पूरे सुर में बाचते हुए नवल उपधिया आगे बढ़ गए .