Friday, June 26, 2015

कल २५ जून को वीपी सिंह का जन्म दिन है .भाई संदीप वर्मा ने लखनऊ प्रेस क्लब में कार्यक्रम रखा है . समय रहता तो जरूर भाग लेता और डंके की चोट पर कहता कि वीपी सिंह को वीपी बनाने में हम भी शामिल रहे . यकीन न हो तो भाई विभूति नारायण राय ( बड़े पुलिस अधिकारी , और उस समय इलाहाबाद में ही तैनात रहे ) संतोष भारती , डीपी त्रिपाठी या भाई रमेश दीक्षित से दरियाफ्त कर लीजिए . इतनी सफाई इस लिए दे रहा हूँ कि अब समाजवादी भी हमसे चिहुंकने लगा है कहेगा - झूठ पकड़ा गया ' . वीपी से हम चिढते रहे . क्यों कि वे कांग्रेसी थे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे . और हम समाजवादी थे . एक दिन वीपी देश के वित्त मंत्री बने प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी . किसी बात पर दोनों में अनबन हो गयी और वे सरकार से बाहर कर दिये गए . अचानक वीपी को याद आया कि गुमनामी में  मरने से अच्छा है कोइ खेल किया जाय और वह एक पन्ना खीसे में डाल कर निकल पड़े कि बोफोर्स तोप में दलाली हुयी उसका सबूत हमारे पास है बस विरोधी दलों को एक मसाला मिल गया . और वीपी सिंह एलाहाबाद के चुनाव में उतर गए . संतोष भारती उनके साठ लग लिए . संतोष जी की चौथी दुनिया वीपी सिंह का मुखपत्र बन गया . एक दिन संतोष भारती ने हमे उठाया और लेजाकर वी पी के घर गिरा दिया . यह हमारी पहली मुलाक़ात थी . और हम सीधे किचेन में पहुँच गए , जहां संजय सिंह , संतोष भारती ,योगेश मिश्रा पहले से गिरे पड़े थे . उसमे एक हम भी शामिल हो गए . सबसे पहले हमने यह काम किया कि उनके पुश्तैनी नाचघर जिसका नाम था ऐश महल जहां वी पी सिंह विश्राम करते थे उसपर कागद चिपकवा कर नाम को ढंका . क्यों कि तब तक बाहर नारा लगने लगा था - राजा नहीं फ़कीर है , देश की तकदीर है . सीता जी उनकी धरमपत्नी और उनकी बहन राजा प्रतापगढ़ की पत्नी निहायत ही जीवंत और हंसमुख रही कभी कोइ बोर नहीं होने पाया . जिस दिन नाम करण था उसके दो दिन पहले संजय सिंह ने कहा यार किसी तरह जार्ज साहेब को बुलाओ उनका रहना जरूरी है . जार्ज से बात हुयी किसी तरह आने को राजी हुए गो कि देश के तमाम  गैर कांग्रेसी नेता प्रयाग में कुम्भ लगाए बैठे थे . जार्ज ने जाते समय हमारी चप्पल भी लेते गए , इस पर लिख चुका हूँ .  शाम तक ऐश महल में इन्तजार होता रहा कि अमिताभ बच्चन ने पर्चा भरा कि नहीं . और जब यह तय हो गया कि अमिताभ नहीं आ रहा है उसकी जगह पर शास्त्री के लड़के को कांग्रेस उतार रही है तो ऐश महल में एक नया बखेड़ा शुरू हो गया . वीपी फ़ैल गए कि हम चुनाव ही नहीं लड़ेंगे . यह कैसे सालता इसे कल 
कल बड़ी बक बक हुयी . इमरजेंसी को लेकर . एक चैनल ने फोन किया - आप इमरजेंसी में जेल गए थे ?
- जी गया नहीं था , ले जाया गया था .
- कैसी रही जेल यात्रा ?
- सुखद रही
- यातना दी गयी थी ?
- जी नहीं .
- क्या हुआ था ?
- सेवा हुयी थी बिलकुल दामाद की तरह
- क्या बात कर रहे हैं , सब जानते हैं सारे नागरिक अधिकार बंद थे प्रेस पर प्रतिबन्ध था . लोग बधिया किये जा रहे थे ..
- यह सब कहाँ हुआ था भाई ?
- इसी देश में .
- हम इस देश में कहाँ थे ? हम तो जेल देश में थे . वहाँ कोइ नागरिक अधिकार नहीं बंद था . गरियाते हुए गए थे ,दिन भर अपना नागरिक अधिकार भोगते ,कोइ रोक टोक नहीं थी , अंडा से सुबह का जलपान करते शाका हारी मंशा हारी भोजन उठाते दंड बैठक करते बैडमिन्टन खेलते संघी जब रोता तो उसे दिलासा देते . और भी बहुत कुछ . ताला जंगला लालटेन सब ठीक रहा . चौवन किलो में गए थे अट्ठावन में बाहर निकले भाई तुमने गलत जगह नंबर मिला लिया है इमरजेंसी पर कार्यक्रम देना है तो उनसे पूछो जिन्होंने इमरजेंसी देखा था , जिया था .यह वो लोग हैं जो बाहर थे ,धूमिल को सुनिए -
      लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो , उस घोड़े से पूछो
     जिसके मुह में लगाम है
लेकिन एक बात बताओ ये चालीस साल बाद क्यों चीख रहे हो इमरजेंसी ?
- नयी पीढ़ी को बताने के लिए .
- परले दर्जे के मूर्ख हो . जिस पीढ़ी ने नागरिक अधिकार को लंगडाते हुए तक न देखा हो , जिसने बधिया होना जाना ही न हो , जिसे  बात करने पर पाबंदी तक की जानकारी न हो उसे क्या बताओगे ? वह चैनल बदल कर बिद्याबालन के पास चला जायगा .पत्रकारिता की पूंछ उखाडोगे तो पिछवाड़ा खंडहड हो जायगा . बात माफी नामा पर करो कि वक्त आता है तो किस तरह झुक कर सलाम किया जाता है .

Wednesday, June 24, 2015

कल २५ जून को वीपी सिंह का जन्म दिन है .भाई संदीप वर्मा ने लखनऊ प्रेस क्लब में कार्यक्रम रखा है . समय रहता तो जरूर भाग लेता और डंके की चोट पर कहता कि वीपी सिंह को वीपी बनाने में हम भी शामिल रहे . यकीन न हो तो भाई विभूति नारायण राय ( बड़े पुलिस अधिकारी , और उस समय इलाहाबाद में ही तैनात रहे ) संतोष भारती , डीपी त्रिपाठी या भाई रमेश दीक्षित से दरियाफ्त कर लीजिए . इतनी सफाई इस लिए दे रहा हूँ कि अब समाजवादी भी हमसे चिहुंकने लगा है कहेगा - झूठ पकड़ा गया ' . वीपी से हम चिढते रहे . क्यों कि वे कांग्रेसी थे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे . और हम समाजवादी थे . एक दिन वीपी देश के वित्त मंत्री बने प्रधानमंत्री थे राजीव गांधी . किसी बात पर दोनों में अनबन हो गयी और वे सरकार से बाहर कर दिये गए . अचानक वीपी को याद आया कि गुमनामी में  मरने से अच्छा है कोइ खेल किया जाय और वह एक पन्ना खीसे में डाल कर निकल पड़े कि बोफोर्स तोप में दलाली हुयी उसका सबूत हमारे पास है बस विरोधी दलों को एक मसाला मिल गया . और वीपी सिंह एलाहाबाद के चुनाव में उतर गए . संतोष भारती उनके साठ लग लिए . संतोष जी की चौथी दुनिया वीपी सिंह का मुखपत्र बन गया . एक दिन संतोष भारती ने हमे उठाया और लेजाकर वी पी के घर गिरा दिया . यह हमारी पहली मुलाक़ात थी . और हम सीधे किचेन में पहुँच गए , जहां संजय सिंह , संतोष भारती ,योगेश मिश्रा पहले से गिरे पड़े थे . उसमे एक हम भी शामिल हो गए . सबसे पहले हमने यह काम किया कि उनके पुश्तैनी नाचघर जिसका नाम था ऐश महल जहां वी पी सिंह विश्राम करते थे उसपर कागद चिपकवा कर नाम को ढंका . क्यों कि तब तक बाहर नारा लगने लगा था - राजा नहीं फ़कीर है , देश की तकदीर है . सीता जी उनकी धरमपत्नी और उनकी बहन राजा प्रतापगढ़ की पत्नी निहायत ही जीवंत और हंसमुख रही कभी कोइ बोर नहीं होने पाया . जिस दिन नाम करण था उसके दो दिन पहले संजय सिंह ने कहा यार किसी तरह जार्ज साहेब को बुलाओ उनका रहना जरूरी है . जार्ज से बात हुयी किसी तरह आने को राजी हुए गो कि देश के तमाम  गैर कांग्रेसी नेता प्रयाग में कुम्भ लगाए बैठे थे . जार्ज ने जाते समय हमारी चप्पल भी लेते गए , इस पर लिख चुका हूँ .  शाम तक ऐश महल में इन्तजार होता रहा कि अमिताभ बच्चन ने पर्चा भरा कि नहीं . और जब यह तय हो गया कि अमिताभ नहीं आ रहा है उसकी जगह पर शास्त्री के लड़के को कांग्रेस उतार रही है तो ऐश महल में एक नया बखेड़ा शुरू हो गया . वीपी फ़ैल गए कि हम चुनाव ही नहीं लड़ेंगे . यह कैसे सालता इसे कल 

Tuesday, June 23, 2015

 बात बतकही
भाजपा सियाह खाने का ऊंट है /चंचल
     '........ अगर आप शतरंज के खेल  से वाकिफ नहीं हैं तो सियासत में मत आइये , जनहित के और भी कई काम हैं वहीं कहीं अपने आपको फंसा लीजिए . मसलन मिट्टी ,गिट्टी,लोहा या कोयला  और बालू की खदान में जुट जाइए और फिर आइये सियासत में . एक दिन हम सूबों की सियासत देख रहे थे . जनाब लोग जो हमारी रहबरी करते है ,मोटी रकम उठाते हैं और हमारे सवालों को सूबे की पंचाईत  में उठाने के जिम्मेवारी लेते हैं वो अतिरिक्त समय में और विकास के लिए ठेकेदारी भी करते हैं .कहते हुए भीखइ मास्टर ने चुप्पी साध ली क्यों कि इस मौजू विषय पर बोलनेवाले कई और मुह रहे जो खुले पड़े है बस मौक़ा चाहिए . यह न सांसद है विधान सभा यह गाँव की सांसद है जो सलीके से चलती है और किसी को अपनी वाजिब बात्काहने का मौक़ा देती है यह बात दीगर है कि यह बहस तभी तक जारी रहती है जब तक के लाल साहेब चाय न परोस दें . बाज दफे तो लाल साहेब जान बूझ कर चाय छानने में देर करते हैं कि चाय पीनेवालों का कोरम तो पूरा हो जाय . आज भी ऐसा ही रहा सो लाल साहेब को खुद सवाल उठाना पड़ा - ये बताओ पंचो ! यह राजनीति क्या होती है ? इस एक सवाल ने सब को घेर लिया . लेकिन मद्दू पत्रकार ( पूरा नाम है महंथ दुबे पुराने जमाने के है . उन दिनों 'दिनमान ' सीधे सवालों की कठिन पत्रिका मानी जाती थी और उसको पढ़नेवाले पत्रकार लोग ज्यादा होते थे एक दिन उन्होंने देखा कि पत्रकार चाहे तो अपना नाम सिकोड़ ले और विषय को भरपूर जगह दे दे इसी में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपना नाम स द स लिखा तो महंथ दुबे भी मदू हो गए जो कालान्तर में मद्दू के नाम से जाने गए ) को कुछ न कुछ तो समझाना ही था - राजनीति ,राजनीति होती है . इसमें लोंगो का होना जरूरी होता है यह बगैर आदमी के नहीं चल सकती चुंकी इसे चलना पड़ता हैतो लंबे समय तक यह पैदल चली . इस राजनीति को गांधी , नेहरु , डॉ लोहिया , अच्युत पटवर्धन , आचार्य नरेंद्र देव जैसे लोग पैडल चले या सरकार की गाड़ी से चले ,टिकस लेकर . बाद के लोगों ने रवायत बदली और अपनी गाड़ी से अपनी सेना के साथ चलने लगे .आज के जमाने राजनीति संदूक और बन्दूक के साथ चलती है . इसे कहते हैं राजनीति . समझे . ? लम्मरदार ने टोका - एकबार हमने डॉ लोहिया को सुना था जब वे पंडित नेहरु के खिलाफ फूलपुर से चुनाव लड़ रहे थे बोले थे राजनीति लोगों को बेहतर जिंदगी बसर करने का सलीका है . मद्दू को राहत मिली - चलिए इसे भी मान लेतेहैं . तो यह हुआ राजनीति . यह राजनीति तीन तरह की होती है .  एक - राजनीतिक .दो - गैर राजनीतिक .तीन राजनीति विरोधी . इन तीनो में एक बात साफ़ होती है कि एक तरह की सोच रखनेवाले लोग एक गिरोह बनाते हैं . यह गिरोह अपने काम काज की वजह से तीन खांचे खड़ा होता है . आज हम इस तीसरे गिरोह जिसे हम संघ के नाम से जानते आये है की बात करेंगे . और चर्चा इस गिरोह पर चल पडी . - सुनो पंचो ! एक होते हैं जो आगे देखू होते हैं ,असल में ये ही राजनीतिक होते है . जैसे कांग्रस और उस घर से अलगौझी करके बाहर निकले समाजवादी . दूसरे - अगल बगल देखू . चीं में क्या हो रहा है रूस में क्या हो रहा है उसके मुताबिक़ चलते फिरते हैं इसमें साम्यवादी आते है . और तीसरे हैं जो पीछे देखते है . इन्हें देखो तो ये बहुत मजेदार गिरोह है . अतीत जीवी हैं . बाप घी खाए रहा पहुंचा सूँघो के तर्ज पर चलता है . देश में दूध और घी की नदिया बहती थी , हम नदियों में घी बनाने की तरकीब बताएँगे . पहले जमींदारी वापस लाओ . मंदिर बनाओ . घर तो बनते रहेंगे . यह एक गोत्र का देश रहा ,इसे उसी गोत्र के पास भेजो . एक गोत्र , एक झंडा , एक नेता . बस एक और एक . इसके अलावा सब लफ्फाजी . और अगर लफ्फाजी ही करनी है तो उतरो मैदान में . हम साबित करदेंगे कि  दुनिया में हमसे बड़ा कोइ लफ्फाज नहीं . तक्षशिला पाकिस्तान में नहीं नालंदा के बगल बिहार में सुशील मोदी के घर में है . देखने के लिए आँख चाहिए . तालियों की गडगडाहट बता रही है हम कितने बलवान थे और फिर होंगे . भूख , महगाई , काला धन ? कौन चीख रहा है ? बंद रखो जुबान . हम बताते हैं . भूख लगे तो योगा करो . किसने टोंका ?  योग पुरानी चीज है , उसमे 'आ ' लगाकर चलाओ पश्चिम में में खूब चलेगा . तुम पवनमुक्त आसान करो पूरे जोर से . हम अपने पड़ोसी को बताएँगे कि आँख मत दिखाओ जब इस आसन में इतनी आवाज है तो ज़रा तोप के बारे में अंदाज लगाओ . काला धन ? इसका जवाब ऐसे वक्त पर देने के लिए ब कायदे कई रफूगर होते है मसलन जेटली साब ! आप बोलिए हमे देश में बोलने की मोहलत नहीं है . और वो एलान रफू हो गया - किस सरकार ने कहा था हम काला धन लायेंगे ? वाकई वो बयां तो सरकार बनाने के लिए था , बनने कके बाद थोड़े ही .इसे कहते हैं जुमला . भारतीय जुमला पार्टी . समझे कि नहीं ? नवल उपधिया जो इस सांसद के स्थायी सदस्य है ऐसे सुन रहे थे ,जैसे सत्नारायण  की कथा . आखीर में बोले - हे देवता !इ सब कब तक झेलना पड़ेगा ? यह तुम्हारी अपनी खाल की मोटाई पर है ,, वरना तुम चाहो तो कल बदल सकता है . डॉ लोहिया को सुना है न ? एक बार फिर सुन लो - ज़िंदा कौम पांच साल तक इन्तजार नहीं करती .

 आपातकाल ,आफतकाल
चंचल
       आपातकाल लगा  २५ जून १९७५ को और हम गिरफ्तार हो गए .ठीक उसी तरह जैसे जे पी . चंद्रशेखर , मोहन धरिया , मधुलिमये समेत वे तमाम नेता जो श्रीमती  इंदिरा गांधी का ' तख्ता पलट ' रहे थे . इनमे समाजवादी , संघी , अकाली दल वगैरह शामिल रहे . १८ जनवरी १९७७ को श्रीमती इंदिरा गांधी ने घोषणा की कि छठी लोक सभा का चुनाव मार्च में होगा . और हम लोग मार्च में जेल से छूट गए . इतनी सी बात है इसे कहते हैं आपातकाल . इमरजेंसी . क्यों लगा आपातकाल ? इसे एक सूत्र में कहा जाय तो देश की आजादी के बाद यह पहली लड़ाई थी जो सत्ता शक्ति और जनशक्ति के बीच हो रही थी .जनतंत्र की खूबी है कि वह इन दोनों ,सत्ताशक्ति और जन शक्ति के तनाव पर ज़िंदा रहती है . अगर जनशक्ति जीतती है तो अराजकता आती है और अगर सत्ताशक्ति जीतती है तो तानाशाही आती है . यहाँ दोनों जीते हैं . पहले जन जीता , फिर सत्ता जीती . इस जन शक्ति की शुरुआत की कहानी बहुत मजेदार है . इसके लिए एक विषयान्तर ले रहा हूँ .
      .७७ में जेल से छूट  कर आया था , उन दिनों एक पत्रिका निकलती थी 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान ' मनोहर श्याम जोशी इसके संपादक थे . उनके कमरे में गया तो वहा हमारे मित्र रमेश दीक्षित पहले से ही मौजूद थे . देखते ही जोशी जी ने सवाल पूछा - कैसी रही जेल यात्रा ? हमने कहा सुखद . दूसरा सवाल था - आपातकाल से लड़ कर आये हो क्या अनुभव् रहा ? हम आपातकाल से कहाँ लड़े ? हम तो समोसा की लड़ाई में लगे रहे .जोशी जी चौंके . - समोसा ?हमने कहा जी हाँ . आपातकाल तो २५ जून को लगा और सारे नेता उसी रात पकड़ लिए गए तो लड़ा कौन ? अकेले  जार्ज फर्नांडीस और उनके २५ साथी थे जो आपातकाल से लड़े हैं बाद बाकी सब समोसावाले हैं . फिर पूरी बात हुयी . उन्होंने कहा इसे लिख दो . हमने हामी भर ली और अक्सर जो हम जैसे कई अन्य उनके साथ करते आये रहे वही किया - पहले कुछ नगद दे दीजिए . ( जोशी जी के साथ हम लोगों के ऐसे ही रिश्ते रहे . जब भी हम और हमारे जैसे उनके दफ्तर में पहुँचते जोशी जी जान जाते कि क्यों आया है . कई बार तो बगैर कुछ बात हुए या बगैर मागे जेब में हाथ दाल कर नोट निकालते और बढ़ा देते - लो और जाओ अभी लिखना है . जोशी जी मुस्कुराए -जिंदगी भर समाजवादी ही बने रहोगे ?बात वही खत्म नहीं हुयी . यह बात हमने मधुजी को बता दिया कल जेल पर लिखने जा रहा हूँ.मधुजी से दो बातों के लिए डाट खाया एक - बोले अभी पार्टी बनी नहीं और लगे तोड़ने का उपक्रम करने ? (उन्ही मालुम था जेल में बंद संघी किस तरह रहे हैं ) दूसरा - तुम किस कांग्रेसी के सामने क्रांतिकारी बनोगे ? सब के सब जेल काटे हुए हैं उसी में इनका परिवार तक बर्बाद हो गया .और लिखना बंद हो गया . इसकी जगह पर हमने जोशी जी को ' .... और  टिकट बंट गया ' दिया और छपा . जो उसवक्त नहे लिख पाया था , आज उसी को याद कर रहाहूँ .
     ७३ में अहमदाबाद के छात्रावासों में मिलनेवाला समोसा व अन्य खाद्य सामग्री अचानक महगी हो गयी वजह थी कि मूंगफली का तेल अचानक महगा हो गया था . इसके खिलाफ छात्रों ने आंदोलन शुरू किया . मुख्यमंत्री थे चिमन भाई पटेल और छात्र आदोलन का नेतृत्व कर रहे थे हमारे मित्र उमाकांत माकड और मनीषी जानी . आंदोलन बढ़ता गया . छात्रों ने विधायको से इस्तीफे लिए . उनके घरों को घेर कर इस्तीफे दिल्वाये . नतीजा हुआ कि विधान सभा में कोरम के अभाव में स्पीकर ने विधान सभा भंग कर चुनाव कराये जाने की माग की जिसे राज्यपाल ने स्वीकार कर लिया . जून ७५ में गुजरात का चुनाव हुआ और कांग्रेस पराजित हुयी . बाबू भाई पटेल मुख्यमंत्री बने . कांग्रेस को दूसरा झटका लगा १२ जून को जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दिया और छ साल तक चुनाव से वंचित रहने का फैसला सुनाया . इसी बीच रेल हड़ताल हुयी जिसने कांग्रेस सरकार की चूलें हिला दी . जार्ज फर्नांडिस इसके हीरो थे . अन्तः आंतरिक सुरक्षा का हवाला देते हुए इंदिरा सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर दी .और आंदोलन से जुड़े तमाम नेताओं को रात में ही गिरफ्तार कर लिया गया .इस में कांग्रस के वे लोग भी शामिल रहे समाजवादी भूमि से आये थे और जिन्होंने १९६९ ,नेकीराम नगर कांग्रस में जब श्रीमती इंदिरा गांधी कांग्रस से निकाली गयी तोयही समाजवादी लोग थे .इनमे चन्द्र शेखर . मोहन धारिया , कृष्णकांत . अर्जुन अरोड़ा और रामधन प्रमुख थे .
      जेल यात्रा का विस्तार बहुत जगह लेगा लेकिन संक्षेप में - जेल को समाजवादियों और अकालियों ने हँसते हँसते काटा क्यों कि ये आदी रहे . संघ के लिए दिक्कत हुयी क्यों कि उनका वर्गीय चरित्र जेल काटने का नहीं है लिहाजा उन्होंने माफी नामा लिखा कि संघ को जेल के बाहर किया जाय और संघ के गण लोग इंदिरा गांधी के बीस सूत्रीय और संजय के छाए सूत्रीय कार्यक्रम को आगे बढायेंगे . लेकिन श्रीमती गांधी ने उनके माफीनामे पर कोइ प्रतिक्रया भी भी दी . सच कहा जाय तो महज दो लोग आपात से लड़े है. एक जार्ज फर्नांडिस जिसे इतिहास में बडौदा डायनामाईट के नाम से जाना जाता है और दूसरे अकाली दल के लोग . जत्थे में निकलते थे और आपातकाल के विरोध में नारा लगाते थे , गिरफ्तारी देते थे . 

Friday, January 16, 2015

हम कहाँ जा रहे हैं 
चंचल 
                 हिंदी पट्टी का एक शब्द और क्रिया रही है हांका .यह जंगल ,जीवन और जानवर से जुड़ा एक सामूहिक उपक्रम रहा है . जंगली जानवर का शिकार , उससे बचाव और उसे पाने के लिए लोंगों का एक दल जोर जोर से चीखते हुए ,हाथ में जो भी रहे उसे पीटते हुए एक साथ दौड़ते थे ,जिससे सारे जानवर डर कर भागते थे . और शिकारी उसका शिकार करता था . वन संपदा और जानवर सुरक्षा के नाम पर इस क्रिया को रोक दिया गया . सरकार ने इसे प्रतिवंधित कर दिया है . नयी सरकार ने इस हांका को अब सियासत में उतार कर समाज पर प्रयोग कर रही है . इसका रूप , आकार , भाषा और करतब को नए ढंग से प्रयोग कर रही है और सफल भी हो रही है . इसे सटीक भाषा दी जाय तो यह कहने में ज्यादा सुविधा होगी कि हम हांका के दौर से गुजर रहे हैं . इसका पहला और सफल प्रयोग संसद के चुनाव में देखा गया . एक हांका उठा . ठीक हाँका की तरह . क्या , क्यों , कौन , किधर जैसे तमाम वाजिब सवाल दर किनार हो गए और लोग दौड़ पड़े . जनतंत्र के मूल ढाँचे पर यह पहला और कारगर हमला था , जहा तर्क और सवाल बेमानी हो गए . और एक सरकार बन गयी. जब सब थिर हुआ और लोग पूछने लगे कि हम जिस हांका में शामिल थे वो तो दिखाओ . काला धन की वापसी , महगाई , बेरोजगारी ,भ्रष्टाचार वगैरह वगैरह  . ये सवाल अभी उठ ही रहे थे कि एक नया हांका आया . प्रधानमंत्री धन जमा योजना . सरकार ने कहा कि भागो बैक की  तरफ . हांका उठा कि - सरकार प्रत्येक खाते में लाखों रूपया डाल देगी और लोग रातों रात लखपति बन जायंगे . गो कि यह इस सरकार की मूल सोच का हिस्सा नहीं है . यह योजना मनमोहन जी के जमाने में ही लागू की जा चुकी थी लेकिन उसका नाम और सुविधा अलग थी . कि कोइ भी खाता धारक किसी भी राष्ट्रीय कृत बैंक से पांच हजार रूपये तक 'उधार ' ले सकता है . इस सरकार ने उसे हांका में डाल दिया .भीड़ भागी  बैंक की तरफ .खाते खुलवाने की होड़ में सारे करतब दिखाई पड़े . कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक इस हांके से तर हो गए . लछ्मीना कहारिन , बिरजू पंडित , लम्मरदार सिंह वगैरह जो इस हांके के जोरदार धावक रहे ,मुह बाए खड़े रह गए जब उनके सवाल - कि कितना पैसा आया खाते में ? का उत्तर यह मिला कि - कैसा पैसा ? इस में पैसा डालोगे नहीं तो आएगा कहाँ से ? दूसरा सवाल हांका में ठेले गए मजलूमों ने उठाया - सरकार ने हमारे खाते में कुछो नहीं डाला ? बैक ने घुडकी दी . यह सवाल सरकार से पूछो . सरकार का जवाब वही होगा जो काले धन की वापसी पर था -वजीरे तिजारत जनाब अरुण जेटली ने जो संसद में दिया था - सरकार ने कब कहा था कि वह कालाधन वापस लायेगी ? संसद खामोश हो गयी . यह सच है कि सरकार ने कभी नहीं कहा कि वह कालाधन वापस लायेगी . वो तो चुनाव का हांका था . चुनाव से पूछो . सरकार उसका क्या जवाब दे ?   
     अब इस सरकार ने समझ लिया है कि देश को जंगली करतब से कैसे चलाया जाय . इसके लिए उसके पास तरह तरह के कारकून हैं . कोऊ मुखहीन ,विपुल मुख काहू . आपने चुनाव के समय जो वायदे किये थे उसे टालने और उस अघोषित कार्यक्रम को लागू करने के लिए एक हांका लगा दीजिए बस . सवाल तो सवाल दबेगा अपने गुप्त कार्यक्रम लागू करने की पृष्टि भूमि बनेगी . उदाहरण देखिये - ' घर वापसी ' / ये हांका वो लगा रहे हैं जिन्होंने आजादी की लड़ाई के समय -मुसलमानों भारत छोड़ो ' का हांका लगाया था . उन्हें बेघर किया था . घर के नाम पर मुल्क तोड़ने में लीग की मदद की थी . मुल्क टूट कर आजाद हुआ . तोड़ने का अपराध इन पर न लगे ,इसके लिए सबसे पहले ' अखंड भारत ' की रामनामी ओढ़ कर सामने खड़े हो गए . आज भी उनकी कांख में विशुद्ध हिन्दू गोत्रवाद की कटार लटकी हुयी है . एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना है जिसमे मात्र हिंदू हों दूसरे नहीं . इन्हें अब मुसलमानों से कम ईसाईयों से ज्यादा खौफ है ,धर्म परिवर्तन के मसले पर . इस लिए ए एक बिल् लाना  चाहते हैं ,  कि धर्म परिवर्तन को पहले  रोका जाय . सरकार की यह पहली प्राथमिकता है कि वह एक क़ानून बनाने जिससे  आप अपनी चाहत का धर्म न चुन सकें . नागरिक अधिकार में कटौती .
   मुसलमानों के प्रति इनकी नाराजगी जग जाहिर है . उनकी बढ़ती आबादी से इन्हें चिंता होती है . उसे रोकने के लिए इनके हान्का बाजों ने पहले दस फिर पांच अब चार का नारा दिया है .आप इस हांके के साथ हैं या फिर विरोध में और जम कर अपने गुस्से का इजहार कर लीजिए फिर सरकार बीच में आयेगी और संतति क़ानून बना कर बता देगी कि आपको कितने बच्चेपैदा करना है . इस तरह के हांका बाजी से उनको दो फायदे मिल रहे हैं ,एक - जिन मुद्दों पर ये चुन कर आये हैं वो दरकिनार हो जायंगे और दूसरा ये अपनी गुप्त नियति को नीति की शक्ल देकर अगले हांके की तैयारी में व्यस्त हो जांयगे . क्यों कि इस सरकार के पास न तो कोइ दिशा है  जो आगे की तरफ ले जाय ,न ही कोइ व्यापक दृष्टि है जो देश को विकास की डगर पकड़ा सके . ' एक  नेता , एक झंडा , एक राष्ट्र ' इनका नारा ही नहीं सोच का मजबूत हिस्सा रहा है . ये उसी डगर पर हैं लेकिन एक बात भूल जाते हैं कि इस मुल्क में जनतंत्र और संवाद की निरंतरता जन जन तक पहुँच चुकी है. और वह इसे  धर्म के रूप में अख्तियार कर चुकी है . जो भी इसके विपरीत जा कर किसी और तंत्र की बात करेगा या उधर बढ़ेगा वह गर्त में जायगा . 
       इस देश का शासन तंत्र बहुदलीय है . और जनतंत्र के खांचे में है . बहु दलीय व्यवस्था में केवल सत्ता पक्ष ही ही तक सत्ता महदूद नहीं रहती . प्रतिपक्ष की भी भूमिका होती है . सदन एक मंच है जिस पर सवाल उठते हैं और उसका जवाब सरकार को देना पड़ता है . सदन में प्रधान मंत्री की ना मौजदगी इस बात की गवाह है कि सरकार मुद्दों पर बात करने से घबडा रही है . या उसके पास वाजिब जवाब ही नहीं है . इतना ही नहीं जितनी बार प्रधानमंत्री सदन में आये हैं उन्हें बार बार माफी ही मागनी पडी है . चाहे वह 'हरामजादा ' का सवाल हो या साक्षी महराज की बात . गो कि ये सब उल जलूल बातों के बीच से अपने को छिपा ले जाने का करतब प्रधानमंत्री भले ही खेल जायं लेकिन कब तक और कितनी बार ? .... और यह भी सच है कि प्रतिपक्ष अपनी भूमिका का निर्वहन भी उस तरह से नहीं कर पा रहा जिस तरह से होना चाहिए . जब देश का प्रधान मंत्री अपने मंत्री के बेहूदे वक्तव्य ( हरामजादे ) पर सफाई दे रहे थे तो उन्होंने दो बाते कहीं - एक कि कम पढ़ी लिखी हैं . चलिए यह पाच्य है क्यों कि हम जिस तरह की पढाई में उलझे पड़े हैं उससे कोइ गुणात्मक सोच विकसित नहीं हो  सकती . दूसरा तर्क निहायत ही भद्दा था जब नेता सदन यह कहे कि वे 'गाँव ' से आती हैं . मतलब साफ़ था कि गाँव के लोगों के पास एक असभ्य भाषा है . उनके पास बोलने की तमीज नहीं है . जब सदन की सच्चाई कत्तई अलहदा है . भारतीय समाज की सामाजिक बुनावट ही गांवन से शुरू होती है और गांवों पर जा कर टिक जातीहै . इतना ही नहीं संसद के जितने भी मुखर वक्ता हैं सब के सब गांवों के ही रास्ते से इस हवेली तक पहुंचे हैं . लेकिन एक भी कुर्सी से प्रतिवाद की आवाज नहीं उठी .
      प्रतिपक्ष ने निराश किया है . सबसे ज्यादा साम्यवादियों ने . मजदूर , किसान , मजलूम की बात करनेवाले साम्यवादियों की चुप्पी उनके किम्कर्ताव्य विमूढ़ की स्थिति बता रहा  है याफिर उनकी चालाकी . क्यों कि उन्हें भी जनतंत्र से , बहुदलीय व्यवस्था से , और विकेंद्रित सत्ता से परहेज रहा है ,यह बात दीगर है कि कुछ सूबों में उन्हें भी जनतंत्रीय व्यवस्था से गद्दी तक पहुचने की सुविधा मिल चुकी है . वे इस वक्त किसी ऐसे अवसर की तलास में हैं जो देश के जनतंत्र को कमजोर कर दे और इन्हें आगे बढ़ने में सहूलियत हासिल हो जाय . साम्यवादियों का यह चतुराई इन्हें बार बार मारता रहा है लेकिन ये अपनी आदत से बाज नहीं आते .४७ में अंग्रेजो की  तानाशाही का समर्थन इन दोनों ताकतों ने किया हुआ है . ७५ में आपातकाल का का भी समर्थन दोनों ने सार्वजनिक रूप से किया हुआ है . एक ने माफीनामालिख कर दूसरे ने खुला समर्थन देकर . मजे की बात यह कि जिस इंदिरागांधी ने तानाशाही क प्रयोग किया था उन्हों ने सार्वजनिक रूप से जनता सेमाफी माँगा लेकिन ये दोनों उसपर आज तक चुप्पी साधे  पड़े हैं . 
   अब प्रतिपक्ष की नहीं बल्कि जनतंत्र की हिफाजत की जिम्मेवारी कांग्रेस की बनती है . उसकी चुप्पी अखरती है .लेकिन अभी वक्त है कि वह संसद और सड़क को गरम करे और उन सवालों को उठाये जो देश की समस्या है . बेरोजगारी , महगाई , भ्रष्टाचार आदि . लेकिन यह ख़याल रहे कि सवाल भर उठा देना किसी सियासी  पार्टी का कर्तव्य भर नहीं है ,उसका निदान भी जनता के सामने रखती चले और उस पर जनमत को देखे . और यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि इन सब स्मस्याओं का निदान केवल और केवल कांग्रेस के पास है बशर्ते वह अपनी दृढ इच्छा शक्ति से उसपर उतरे . उदाहरण के लिए ' दाम बाँधो ' ' फिजूल खर्ची पर रोक ' विकेंद्रित और कुटीर उद्योग ' 
२६ जनवरी कांग्रेस की बहुत पुरानी तारीख है . उसे नयी और परिमार्जित की जा सकती है क्या ? 

Sunday, June 29, 2014

कालखंड पर लिखी इबारत .....
चंचल 
सत्तर और अस्सी दशक के बीच का काल खंड ,आजादी के बाद का स्वर्णिम काल है . सियासत , साहित्य . कला के उन्मुक्त निखार का उदय है . सामाजिक सरोकार से जुड़े जितने मुद्दे इस काल खंड पर उठते हैं वे ही आजतल किसी न किसी बहाने छाये हुए हैं . इसी काल खंड पर संसद और सड़क की आंच, गाँव गाँव,  घर घर ,और जन जन तक पहुचती है . देश, संसद को अपना आइना मान कर अपनी शक्ल देखता है .जब गरीबी और गैर बराबरी समाज से उठ कर संसद में जगह ही नहीं बनाती बल्कि संसद की अंग्रेजियत खीच कर सड़क का देसज सच अपने जद में ले लेता है . और इसकी शुरुआत होती है ६३ के तीन उप चुनाव के नतीजे के बाद . तीन उप चुनाव है , मुजफ्फरपुर , फरुक्खाबाद और जौनपुर . तीन दिग्गज चुनाव मैदान में हैं . मुजफ्फरपुर से जे बी कृपलानी , फरुक्खाबाद से डॉ लोहिया और जौनपुर से पंडित दींन  दयाल उपाध्याय . दो सीट प्रतिपक्ष के हाथ लगती है एक पर कांग्रेस जीतती है . मुजफ्फर पुर से कृपलानी , फरुक्खाबाद से डॉ लोहिया और जौनपुर से कांग्रेस के राजदेव सिंह जीत कर संसद में आते हैं . आजादी के बाद पहली दफा पंडित नेहरू सरकार के खिलाफ  अविश्वास का प्रस्ताव आता है . संसद में पहली बार हिन्दी गूंजती है . संसद में पहली  बार देश का मजबूर  , मजलूम , दबा कुचला किसान मेहनतकश मजूर अपने किस्से को सुनता है .वहाँ उसपर चर्चा होती है . डॉ लोहिया सरकार को अर्दभ में लेते हैं .  प्रति व्यक्ति औसत आमदनी के सवाल पर . तत्कालीन वित्तमंत्री मोरार जी रणछोड़जी देसाई कटघरे में खड़े होते हैं . पंडित नेहरू के प्रिय राम मनोहर (लोहिया ) नेहरू को चुनौती देते हैं - हिन्दुस्तान में प्रतिव्यक्ति आमदनी तीन आने है . बिट मंत्री झूठ बोल रहा है . वित्तमंत्री सत्रह आने से नीचे आते है तेरह आने पर अड् जाते हैं . डॉ लोहिया कहते हैं - अगर सरकार अपनी बात को सच साबित कर दे तो हम राजनीति से हट जायंगे और सरकार गलत हुयी तो अपने प्रधान मंत्री से कहो वो अपने पद से इस्तीफा दे दें . संसद सन्नाटे में है . यह पहली बार ऐसा हुआ है की पंडित नेहरू को खुली चुनौती मिल रही है . ' तीन आने बनाम तेरह आने ' नाम से बहुचर्चित यह बहस आज भी ज़िंदा है . ( राजनीति में दखल रखनेवाले हर शख्स को यह किताब -' लोक सभा में लोहिया ' पढनी चाहिए ) लोकसभा में चली यह बहस पुस्तक के रूप में छाप कर गाँव गाँव तक पहुचाई गयी . एक नई परम्परा की शुरुआत हुयी की उसका चुना हुआ प्रतिनीधि सासद में क्या बोलता है / जनता को यह जानकारी होनी चाहिए . ७७ के पहले और उसके बाद भी समाजवादियों ने इस परम्परा को चालू रखा . जनता और उसके चुने हुए प्रतिनिधि के बीच संवाद शुरू हुआ लेकिन अब लुप्त है . क्यों ? यह अलग का लेकिन महत्वपूर्ण सवाल  है जो सांसदों को उघार करेगा .आज देश को जरूरत है की वह अपने चुने हुए प्रतिनिधि से जवाब मागे .अगर यह नहीं हुआ तो संसदीय व्यवस्था चरमरा जायगी .