Sunday, February 9, 2014

बंबई ....बरोबर 
चंचल 
      बम्बई से न्योता रहा .की यम कालेज के व्यवस्थापक मुन्ना  पांडे का . जाने का मन नहीं था . इसकी दो वजहें हैं .एक- सामान ढोने का मन नहीं करता .दो -शहर से खौफ लगता है ,इसलिए टाल मटोल करता रहा लेकिन मुन्ना भी तो वही जिद पर अड़े रहे और मनीष जी ने मजबूर कर दिया कि 'चलना ही है ' ..भारतीय की एक पुश्तैनी सोच रही है जो बदस्तूर चली जा रही है एक पंथ दो काज वाली . सोचा लगे हाथ 'बहुधंधी ' 'किस्बत '(किस्बत कहे तो पुराने जमाने में नाइयों के पास टिन का एक डिब्बा हुआ करता था जिसमे मूड़ने के लिए अस्तूरा ,नह काटने के लिए नहन्नी और जुल्फ सवारने के लिए कंघी हुआ करती थी . भिगोने के लिए कटोरी भी .आज इस नए जमाने में जब कि हर समझदार संभ्रांत शहरी नाईगिरी करने पर आमादा है उसके पास भी एक किस्बत है जिसे नयी भाषा में लैप-टाप कहते हैं . इसमें भी सारे औजार हैं . इसे भी जो देखता है उसकी हजामत बढ़ जाती है ) भी ठीक करा लूंगा . चुनांचे हमने राजू (राणा सिंह ) को इसकी सूचना दे दी और चला मुरारी हीरो बनने . कम से कमतर कपड़ों में रहने की आदत पड  गयी है .खादी सिद्धांतः पहनता हूँ . खादी पहनने के पीछे सादगी और स्वच्छता का मर्म छिपा होता है . इसे नील टीनोपाल , कलफ और इस्तरी अपवित्र करते हैं इस लिए जो जैसा मिला उसे पहनता हूँ . डंके  की  की चोट पर . झोला उठाया और चल दिये ......
        लाल बहादुर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे बनारस को देख कर कोफ़्त होती है . वहाँ न ही शास्त्री की सादगी है ,न ही काशी की ठसक . नकली न्यूयार्क की भोंडी नक़ल की इमारत है .कम से कमतर देसी उपस्थिति . खानपान में वही खराब खाद्य प्लास्टिक लपेटे ,एक का तीन में बिकता धंधा . इन 'हरामखोर ' ठेकोदारों और 'रिश्वत बाज ' नौकरशाहों को इतनी भी अकल नहीं है कि जिन विदेशियों को लुभाने के लिए तुम सुविधा दे रहे हो और उन्हें बुला रहे हो वो तुम्हारी इन इमारतों को देखने नहीं आते . वो तो पहले से ही डिब्बा बंद खाना ' से अघाए और ऊबे लोग हैं . उन्हें हिन्दुस्तान में तो हिन्दुस्तान दिखाओ . इंडियन एयर लाइन की उड़ान भरा तो उसमे राहत मिली . भारतीय परिवेश में साडियों में लिपटी महिलाओं की मुस्कुराती छवि से मन खिला . और इसी खिले मन से मुम्बई पहुचा .
  हर शहर की अपनी खुशबू होती है . उसका मिजाज होता है और उसके हवा और पानी की अलग तासीर होती है . हवाई अड्डे के बाहर निकलते ही बम्बई हमसे लिपट गयी . यह उसकी अदा है . धूप में ताप है पर छाँव में खुनक . लगता है कोइ आँचल से बना हिला रहा है आहिस्ता आहिस्ता . क्यों राजू ?....बरोबर ! वह मुस्कुरा दिया . और हम बरोबर हो गए . मुन्ना तिवारी कल शहर में मिलेंगे ,बोल कर विदा हो लिए और हम मुन्ना पांडे के साथ राजू के घर सातवें माले पर मराठी नाश्ते के बाद कल्याण की तरफ रवाना हो गए . कल्याण बम्मई में नहीं है . एक जिला है . बाएं भिमंदी है दायें कल्याण . और हम कल्याण में हैं .

Tuesday, January 7, 2014

उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश की सरकार कब बनेगी ? 
चंचल 
         ... विषयान्तर में तीन उदाहरण देना चाहता हूँ . उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी , पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सालिग राम जायसवाल और उत्तर प्रदेश से ही आये केन्द्र में स्वास्थ्यमंत्री बने राज नारायण जी  का . डॉ सम्पूर्णा नन्द उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे और नारायण दत्त तिवारी विधायक . एक दिन तिवारी जी मुख्यमंत्री से मिले और बोले अल्मोडा में ऐ सड़क चाहिए . संपूर्णानंद जी ने कहा यह तो बहुत खुशी की बात है जाओ बनाओ . तिवारी जी ने कहा सरकार कुछ मदद करेगी ? डॉ संपूर्णानंद ने कहा बिलकुल मदद करेगी , तुम जिस सड़क को बनाओगे कोइ रोकेगा नहीं . और दूसरा जब सड़क  बन जाय तो हमें बताना कोइ मंत्री भेज  देंगे उसके उदघाटन के लिए . डॉ संपूर्णानंद अपने मजाकिया व्योहार के लिए सब में लोक प्रिय थे . अल्मोडा में ऐ सड़क बनी जिसके लिए नारायण दत्त तिवारी ने अपने कंधे पर पत्थर और मिट्टी ढोए . एक काम करने का तरीका यह था . दूसरा सुनिए -सालिग राम जायसवाल समाजवादी थे , इलाहाबाद के थे . डॉ लोहिया की मृत्यु के बाद समाजवादी आंदोलन जब बिखराव की तरफ बढ़ा तो बहुत सारे समाजवादी दिग्भ्रमित हो रहे थे कि किधर चलना है / उनमे से एक सालिग राम जायसवाल भी रहे . निहायत ईमानदार .लड़ाकू और प्रतिबद्ध . श्रीमति इंदिरागांधी ने जायसवाल जी को बुलाया और बोली कि बहुत हो चुका बाबू जी अब आप कांग्रेस में आ जाइये आपकी जरूरत है . और इंदिरागांधी ने उन्हें उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य मंत्री बना दिया . सूबे के दाक्रों का रेला लग गया 'मंत्री ' के यहाँ . सब की एक ही माग कि हमें अमुक हस्पताल में रखवा दीजिए . मंत्री जी का एक ही सुझाव - दरखास्त लिख कर लाये हो ? .. तो उसी के बगल में मेरी तरफ से आर्डर लिख दो मै दस्तखत कर देता हूँ . यह होता रहा . इ़क दिन स्वास्थ्य सचिव पूरी फ़ाइल लेकर आया और मंत्री जी को बताया कि ,मंत्री जी कैसे काम चलेगा कई हास्पिटल ऐसे हैं जहां दर्जनों डाक्टर पहुँच रहे है और कई हास्पिटल ऐसे हैं जहां डाक्टर हैं ही नहीं . मंत्री जी का दो टूक जवाब था - तो तुम किस लिए हो . इसे ठीक करना तुम्हारा काम है उसे ठीक करो .तीसरा उअदाहरण देखिये देश के स्वास्थ्य मंत्री बने राज नारायण जी . उनका वायदा था हर गाँव में डाक्टर मुहैया कराना . उन्होंने हर गाँव में मामूली से मानदेय और आवश्यक दवाओं के साथ स्वास्थ कर्मी बना दिये . सबसे मजेदार वाकया हुआ संसद में कांग्रेस प्रतिपक्ष में थी उधर स किसी ने नेता जी सवाल पूछा -स्वास्थ मंत्री जी ,देश की चिकित्सा व्यवस्था कैसी है ? राज नारायण जी ने ब हैसियत स्वस्थ मंत्री के बोलने खड़े हुए और लगे स्वास्थ विभाग की बखिया उधेड़ने . भूल गए की सरकार में हैं . किसी ने टोका कि आप यह क्या बोल रहे हैं ? नेता जी ने तुरत जवाब दिया -पचासोसाल से यह हाल हुआ है हम एक दिन में कैसे ठीक कर देंगे ?
        आज सवाल का जवाब सच में नहीं मिलता .मंत्री असलियत को ढकने के लिए बोरा कंधे पर रख कर चलता है .

Tuesday, December 10, 2013

चिखुरी /चंचल
कुर्सी दौड़ चालो है .......
                           तीनो जन ...इकट्ठे ? कीन उपाधिया, लखन कहार और उमर दरजी . तीनो सजे सवरें हैं .  तेलफुलेल , से चकाचक . लोगों ने देखा तीनो मुह लटकाए चले आ रहे हैं .न कोइ बात चीत ,न हंसी मजाक , बस सरपट बढे आ रहे हैं चौराहे की तरफ . जहां आसरे की दूकान पर मजमा पहले से ही लगा बैठा है . दो चार कदम रह गया होगा तभी लाल्साहेब ने सवाल दागा -ये तीनो ....किधर से भाई ? तीनो ने कुछ नहीं बोला . बस गंभीर बने रहे . वक्त की नजाकत देखते हुए कयूम मिया ने सहलाया -अरे भाई पहले बैठने तो दो , बेचारे पता नहीं कहाँ से थके-मांदे चले आ रहे हैं ,पता नहीं इन पर क्या गुजरा है , ... आओ कीन .. हियाँ आओ .. कहाँ से लौटे हो बेटवा ? कीन कुछ जवाब देते उसके पहले ही उमर दरजी ने जवाब दिया -गए रहे टोनामेंट देखने ...
  -टोनामेंट नहीं ,टूर्नामेंट ..
जो भी हो वही देखने गए रहे ,
तो हुआ क्या ?
एक से बढ़कर एक खेल हुआ . महीनों से तो चल रहा था . 'जलेबी दौड़ 'देखा . मजा आ गया गुरू , क्या खेल है ? दोनों हाथ पीछे बंधे रहे , एक दो के नहीं ,पूरे झुण्ड के झुण्ड . जलेबी ससुरी धागे में लटकी .. कभी इधर ,कभी उधर , बाकी खेल्नेव्वाले मुह बाए कूद लगाते रहे . पर मिला उन्ही को जिनका मुह चौड़ा रहा ...
और का हुआ . ?
-तिनटंगी दौड़ . इसमें अकेले नहीं दौड़ा जाता . ...दो को मिल कर दौडना होता है . एक का बांया पैर दूसरे के दाहिने पैर से कस कर बांध दिया जा है ,फिर रेस होती है . .. एक हुआ 'बोरा दौड़ ' यह और मजेदार दोनों पैर बोरे में डाल दिया जाता है और बोरे को कमर के पास बांध देते हैं ,फिर उनका रेस देखो . ..अभी बात पूरी भी न हो पायी थी कि मद्द् पत्रकार की मोटर साइकिल आकर रुकी . लोग बताते हैं कि जब मद्दू की मोटर साइकिल रुकती है तब उनकी पत्रकारिता चलती है . चुनांचे आते ही आते मदु चालू हो गए - क्या राजनीति हो रही है भाई ? जवाब दिया कीन उपाधिया ने - राजनेति नहीं गुरू , टूनामेंट की बात हो रही है . मद्दू ने समझाया - कीन ! दोनों एक ही है . लखन कहार चकराये 'दोनों एक ही है ? जलेबी , बोरा , तीन टंगी ....? लेकिन चुप रह गए . कोइ न कोइ तो पूछेगा ही . वह क्यों फसने जाय . बहर हाल मद्दू आये और चिखुरी के बक्गल में बैठ गए .
      आज की क्या खबर है चिखुरी काका ? चिखुरी ने अखबार  बगर रख दिया . चश्मा उतार ही रहे थे कि उमर ने बयान देना शुरू कर दिया - आज की खबर ? कुर्सी दौड़ चल रही है ,हम तो ऊब कर भाग आये . हमारा कंडीडेट तो पहले ही राउंड में गिर गया . .....' लाल्साहेब को मौक़ा मिल गया -ओमर मिया ! पूरा बताओ न , कैसे क्या हुआ ?
उमर ने ,बीड़ी सुलगाया . बीड़ी उलट कर जोर से धुँआ निकाला . आँखे लाल की . फिर बताना शुरू किया .
       हम तीनो जन यहाँ से होत भिनसार  पाठशाला पे पहुच गए जहा टूनामेंट होत रहा . खेलय वाले कम देखय वाले ज्यादा . तिल रखने की भी जगह नहीं . कोइ कुर्सी पर कोइ पेड़ पर कोइ साइकिल पे इसी में हम भी तीन जन .लखन कहार मजे में रहे गमछा रहा उस पर बैठ गए . हमने ईंट खोज निकाला , कीन उपाधिया को कुछ नहीं मिला तो 'पनही ' पर ही जम गए . इतने में क्या हुआ कि पहले सीटी बजी . एकदम सन्नाटा . फिर लोड स्पीकर का भोम्पा बोला ..दिल्ली मेरी दिल्ली .. दिली .. दिल्ली .. दिल्ली ... ' रेकाट' की सूई दिली पे फस गयी . सीटी वाले साहेब ने जोर से आवाज दी -जे नहीं चलेगा कोइ धार्मिक बजाओ ... रेकाड बोला - आरा हीले ,बलिया हीले , छपरा .. रोको जल्दी रोको ... नौटंकी समझे हो का . यह टूनामेंट है . कोइ दमदार गाना लगाओ . दो पढ़े लिखे लोग उसकी मदद के लिए भेजे गए . तब कहीं जा कर देशप्रेम मिला . इन्साफ की डगर पे . बच्चो दिखाओ चल के .. यह देश है तुमारा .. तुम्हारा .. तुम्हारा .. 'और देश फंस गया . खेल रोक दिया गया . अब तय हुआ कि कि एक कुर्सी बीच में रहेगी .उसके घेर कर दौडने वाले दो होंगे . और जब सीटी बजे तो एक को उस कुर्सी पर बैठ जाना है . जो बैठ जायगा वह जीत जायगा . कई बार सीटी बजी लेकिन कोइ भी बैठने को तैयार नहीं . तब से यही चल रहा है .सीटी बजती है दोनों एक दूसरे को देखते हैं पर बैठे को राजी नहीं हैं .
  -सो क्यों ?
सच्चाई का है ये तो 'ऊपरवाला ' जाने लेकिन मुहा मुही यही हो रही है कि किसी ने कुर्सी के उस असल मुकाम पर 'केंवाच ' रगड़ दिया है . जिस पर तशरीफ रखी जाती है .जो भी बैठेगा तशरीफ खुजलाते हुए भागेगा पर खुजलाना कम नहीं होगा .राम भरोस बनिया तो आप बीती बताता रहा कि एक बार वो भी फंस चुका है , ऐसी खुजली शुरू हुई कि पूछो मत बताने में शर्म आती है .
-लेकिन यह केवांच का होता है ?
 चिखुरी मुस्कुराए .-यह एक दरख्त का फूल है जो देखने में तो बहुत खूबसूरत होता है लेकिन इनके रोंये में  एक अजीब सी फितरत होती है खुजली की .. तो सुन लो पंचो केवांच से बचना चाहिए .
और दिल्ली की खबर क्या है भाई ?
 अब सुनो ... इनका सवाल देखो ....

Tuesday, December 3, 2013

चिखुरी / चंचल
हम तुम से मोहब्बत करके  सलम .....

                (    यह सुलेख उन दोस्तों के नाम है जिन्हें तानाशाही नहीं पसंद है .इसमें रामबचन पांडे पूर्व अध्यक्ष छात्र संघ काशी विश्वविद्यालय का संशोधन नोट किया जाय कि यह उस  पीढ़ी के लिए है जो जम्हूरी निजाम चाहती है )
 ....यह लो एक खबर और ... मोहब्बत के जुर्म में जेल ..
तुम से एक बात कहा है कि जब भी अखबार बांचो ,सलीके से . लंठई मत किया कर .इ टीवी ना है अखबार है . समझे ? और उमर  दर्जी समझ गया कि अखबार लिखना ही सलीका नहीं रखता , उसका पढ़ना भी सलीका मागता है. चुनांचे उसने चिखुरी की डाट का जवाब सलीके से दिया और 'जनाब ' कहकर फर्सी सलाम मारा . चिखुरी ने उमर से कहा - चल मोटी -मोटी बता ,
मोटी मोटी ? शहर में मोटी रहें भले ही लेकिन उन्हें छपने की छूट नहीं है , हम अहमदाबाद रह के आये हैं . लोग पहले खा  पी के मोटी होती हैं फिर दुबला होने के लिए सड़क दर सड़क घूमती हैं .उमर अभी बहुत कुछ बोलता लेकिन छप हो जाना पड़ा क्यों कि अखबार का . पहला पन्ना कोलई दूबे के हाथ में है - बुड़बक हो ,उसे मार्निंग वाक् कहते हैं .
कयूम को मौक़ा चाहिए होता है -इस्वाक में क्या होता है ?कयूम सवाल नहीं पूछते ,सवाल की गाँठ खोजते हैं .सो कोलई को विस्तार में जाना ही पड़ा .- पुरुष और महिला अल सुबह पार्क में चले जाते हैं . चुस्त पजामा और ढीली कुर्ती . जोर जोर से सांस निकालते हैं बंद कमरे का मशीन वाला हवा बाहर छोड़ते हैं और पेड़ पौधों की खुशबूदार हवा अंदर खींचे हुए तेज रफ़्तार से चलते हैं . महिलायें आगे रहती हैं पुरुष पीछे . ऐसा क्यों ? लखन कहार का सवाल टेढ़ा था . चिखुरी पलटे- इस लिए कि पुरुष  बत्तमीज होता है . कोलई चौके -ये लो .ताबक तोड़ दो ख़बरें .
सुना जाओ अभी चाय पक रही है .
पक नहीं रही है , दूध ही फट गया . आसरे ने ऐलान किया और बर्तन को फिर से धोने लगा . लाल्साहेब की आँख गोल हुई -कमाल है इस जमाने में भी दूध फटे लगा ? देखते देखते ज़माना खराब हुआ है . लाल्साहेब चालू हो गए - अभी कल मी बात है दूध फटने न पाए इसके लिए कितनी साफ़ सफाई रखनी पड़ती थी ,एक के घर में घी बनता था तो पूरा गाँव जान जता था . अबतो न कोइ महक न स्वाद . सब कुछ नकली .लखन ने एक अलग का किस्सा सुनाया . ''' पप्पू क भौजी बैगन खरीद कर ले गयी थी . एक बैगन बचा कर रखदी थी कि सुबह आलू मिला के चोखा बनाएंगे ,लेकिन सुबह क्या देखती है कि बैगन फूल के लौकी हो गया है . पूरे गाँव में कोहराम .पता चला आजकल सब्जियों को भी इन्फेक्सन दिया जाता है .
      इन्फेकन नहीं इंजेक्सन कहो .
     एकै मतलब हुआ .
लेकिन इ भी तो पता चले कि पप्पुआ क भौजी  बैगन रखे कहाँ रही ? एक साथ कई ठहाके लगे . लेकिन सबसे देर तक हँसते हैं कयूम मिया और उनके हँसने का तरीका कत्तई  आलग है . वे थोड़े थोड़े देर के अंतराल पर फिस्स ... फिस्स   करते रहेंगे .
   खबर तो सुनो , कोलई ने जोर का हांका मारा . और लोगों के कां उधर हो गए . एक साथ दो खबर . दोनों का मामला एक है ..
  मामला मत सुनाइये खबर पढ़िए . ..तहलका के संपादक पर बलात्कार का आरोप .
यह तहलका क्या है भाई ?  मद्दू ने बताया -तहलका ? यह हंगामा से मिलता जुलता है . उसके कोइ संपादक हैं तरुण तेजपाल उन्होंने ,,,,,,,
किसके साथ किया ?
उसका नाम नहीं है .
दूसरा ?
एक साहब है अमित शाह उन्होंने एक लड़की की जासूसी कराई वो भी अपने साहेब के लिए .
पूरा दिन खराब हो गया .कहते हुए चिखुरी ने मद्दू को उकसाया . -आपै बताओ भाई तुम भी अखबार से हो . का लगते हो अखबार के ? मद्दू इस सवाल के लिए तैयार  नहीं थे ,झिझकते हुए बोले -संबाददाता ...... हुआ यूँ कि ये जो साहब हैं तरुण जी अपने किसी महिला संपादिका से जबरदस्ती करने लगे और लगे 'लिफ्ट' मागने ' बस बात खुल गयी लिफ्ट की वजह से . अब पुलिस तरुण को गोवा ले जा रही है क्यों कि लिफ्ट वही गोवा में ही पडी है .और दूसरी ?
दूसरी खबर और भी नाजुक है .....गुजरात के कलेत्टर थे प्रदीप शर्मा . इसलिए उन्हें गुजरात की सरकार ने गिरफ्तार कर के जेल में डाल दिया.ताकी लोगों को पता तो चले कि जब इतने ऊंचे ओहदेदार को जेल में डाला जा सकता है तो बाकी किसकी औकात ? कभी सुना कि वहा कोइ कुछ बोला हो ? कोइ सवाल उठा हो ? इसे कहते हैं तर्ज ये हुकूमत . इसे ही कहते हैं 'गुजरात माडल . ' इस माडल में हर कोइ चौकन्ना रहता है . कोइ किसी से बात नहीं करता बात करनी है तो पहले जेल जाओ ,जमानत कराओ ,बाहर निकलो ,बात करो .फिर नयी धारा में जेल जाओ . इसी नुस्खे को पूरे देश में लगाने का इंतजाम किया जा रहा है . बशर्ते जनता समझे .लेकिन इस साथ साल में जनता भी बदजुबान हो गयी है ,अपने ही नेता से जुबान लड़ाती है . भाई नेता जी जो बोलें सब सही .उस पर सवाल मत उठाओ .उठाओगे   तो भोगो गे .साहेब कुछ भी कर सकते हैं किसी के भी गर की खाना तलाशी ले सकते हैं लेकिन साहेब की तरफ मत देखो . शर्मा जी को देखो , भाई चुप चाप चुप ही रहते क्यों झाकने लगे . बस चलो जेल क्यों कि शर्मा जी उस सी डी  को जानते हैं जो अमित के साहेब और साहेब की महबूबा के बारे में है .
इ सी डी का होती है भाई .लखन ने गंभीर सवाल पूछा . चिखुरी ने घुड़का - जवानी भी जा रही है और सी डी नहीं जानते ? भाजपा तो जानते हो न ? यह उसका खेल है . सटीक लगता है . यह एक तरह का तावा होता है इसमें गाना बजाना .नाचना कूदना बातचीत सब होती है . कहते हैं कि साहेब उस सी डी में हैं .और लोग यह भी कहते हैं कि इसी सीडी से साहेब ने संजय जोशी का खेल  खत्म किया था अब वही सीडी खुद के गले में फंस गयी है . लाल्साहेब बीच में आ गए -बोया पेड़ बबूल का ... ये अमित शाह कौन है भाई ?
... लोग बताते हैं इसकी पैदाइस शिकागो में हुई है .कई तरह की पढाई किया पर सुधरा नहीं ,गुजरात आगया और सरकार कामंत्री बन गया .
और ये साहेब कौन हैं ?
साहेब कहते हैं मुख्यमंत्री को .
और साहेब क्या कहते हैं ?
खलक खुदा का ,
हुकुम शहर कोतवाल का ,
हर खास व आम को आगाह किया जाता है कि -
डॉ धर्मवीर भारती की कविता पूरे सुर में बाचते हुए नवल उपधिया आगे बढ़ गए .

Thursday, November 14, 2013

श्रद्धांजलि /
हरेकृष्ण देवसरे के बहाने .....
        वे बाल साहित्य के लिए आये थे ,और 'बाल दिवस ' के ही दिन महा प्रस्थान  पर निकल गए . (१४ नवंबर २०१३ ) उन्होंने हिन्दी में जो शोध किया था वह बच्चों के साहित्य पर था . उन्होंने कई दर्जन किताबे लिखी सब बच्चों के लिए . रेडियो ,दूरदर्शन पर जो काम किये वे सब बच्चों को केन्द्र में रख कर . हमारी उनकी मुलाक़ात तब हुई जब वे बच्चों की पत्रिका 'पराग ' के संपादक हो कर आये . उन दिनों हम पराग में ही थे . यहाँ हम विषयान्तर कर रहे हैं .
       'पराग' टाइम्स घराने की पत्रिका रही और बच्चों से लेकर बड़ों तक इसे चाव से पढते थे . यह वह दौर है जब टाइम्स घराना अपना निजाम बदल रहा था . नयी पीढ़ी आ चुकी थी . अशोक जैन , रामाजी जैन विदा हो रहे थे उनकी जगह आरहे थे समीर जैन .ऋचा जैन . रमेश जैन जिन्होंने बहुत मेहनत मसक्कत से टाइम्स घराने के तानेबाने को कस कर बनाया हुआ था ,उन्हें हासिये पर डाल दिया गया था . एक नयी सोच लेकर 'बच्चे ' उत्साहित थे . लेकिन उन्हें लगा कि जब तक 'स्थापित ' नामो को हटाया नहीं जायगा तब तक उनकी मनमानी नहीं चल पायेगी . पला काम हुआ कि 'सारिका ' से कमलेश्वर को हटाने का तरीका एक ही है उसे बंबई से दिल्ली कर दिया जाय . वही हुआ और कमलेश्वर जी ने जिन्होंने बंबई में अपनी जड़े जमा ली थी ने दिल्ली आने से मना कर दिया . 'माधुरी ' हिन्दी एक मात्र सिनेमा पत्रिका से अरविन्द जी को हटना पड़ा . और बाद में उसे भी बंद कर दिया गया . इलस्ट्रेटेड वीकली से खुशवंत जी पहले ही बाहर आगये थे . धर्मवीर भारती 'धर्मयुग से रिटायर हो चुके थे . मामला बड़ा गड्ड मद्द हो चुका था . दिनमान के सम्पादक बनाए गए कन्हैया लाल नंदन . नंदन जी को मालुम था कि उनके मातहत होकर सर्वेश्वर जी काम नहीं करेंगे . इस लिए सर्वेश्वर जी को पराग का संपादन सौपा गया . यहाँ एक और दिलचस्प घटना घटी .
  एक दिन सर्वेश्वर जी ने हमसे कहा कि मै पराग में आ जाऊं . हमने कहा जो भी काम हो बताइये हम तो हैं ही .बोले नहीं तुम्हारा नाम 'पराग ' में जायगा वह भी एक कार्टूनिस्ट की हैसियत से . हम वाकई तैयार नहे थे लेकिन उनकी बात भी नही टाल सकता था .  अचानक पर्सनल डिपार्टमेंट से हमें सन्देश मिला कि आज ग्यारह बजे आपका इंटरव्यू है . मै पहुचा . उन दिनों टाइम्स एक फ़ार्म भरवाता था जिसमे एक कालम होता था कि आप कितने 'तनखाह ' तक में काम करने को तैयार हैं ? हा,मने उसमे छ हजार लिखा . (उन दिनों संपादक की भी तनखाह इतनी नहीं करती थी ) अंदर गया .मुख्य कुर्सी पर रमेश चंद जैन बैठे थे ,बाकियों को हम नहीं पहचानते थे .सारी तक झक तनखाह  को लेकर हुई . रमेश जी ने सर्वेश्वर जी से फोन पर बात की और फोन हमें हमें पकड़ा दिया . सर्वेश्वर जी ने कहा - पंडित जी आप दस्तखत कर के  चले आइये . हमने वही किया और पराग में आ गया .
      एक साल बाद अचानक सर्वेश्वर जी का निधन हो गया . और उनकी जगह आये डॉ हरेकृष्ण देवसरे . हम उनसे परचित नहीं थे . और हमने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया . उन्ही दिनों हमारी दोस्त रंगमंच की एक बड़ी कलाकार दीपा साही जो आजकल केतन मेहता  से शादी करने के बाद दीपा मेहता के नाम से जानी जाती हैं और फ़िल्मी दुनिया की बड़ी हस्ती हैं , टाइम्स में ऋचा जैन की सलाहकार होकर आ गयी थी ,उनसे हमने कहा कि यार अब हम नौकरी नहीं करेंगे .बहर हाल दीपा और ऋचा ने हमें बुला कर आस्वस्थ किया कि कोइ दिक्कत नहीं होगी .
    दूसरे दिन देवसरे जी ने हमें बुलाया और लंबी बातचीत हुई .फिर हम दोनों के बीच बड़े अच्छे रिश्ते बने और आखीर तक रहा . उनका इस तरह से जाना अखर रहा है .
उन्ही देवसरे जी को उन तमाम बच्चों की तरफ से पुष्पांजलि अर्पित करता हूँ जिनके लिए वे आजीवन लिखते रहे .
नमन

यादें /चंचल
दीनदयाल हर गलत से लड़ते रहे 
दीनदयाल ता उम्र संघ विरोधी रहे . बेहिचक ,बेख़ौफ़ , उससे लड़ते रहे . भाषा से कर्म से . ७७ में हम जेल से छूट कर आये थे . देबूदा ( स्वर्गीय देवब्रत मजुमदार ) यह तय कर चुके थे कि हमें ही चुनाव लड़ाएंगे . गोकि  हम इस पक्ष में नहीं थे . लेकिन देबू दा ने मधु जी को(स्वर्गीय मधु लिमये ) को पहले समझा चुके थे कि उसे ही लड़ाना है . हमने जब मधू जी से कहा कि हमें संसद का चुनाव लड़ने दीजिए तो मधुजी ने मना कर दिया . बोले नहीं तुम्हे विश्वविद्यालय का चुनाव लड़ना है . बहरहाल हम आ गए . सयुस में दीनदयाल एक हस्ताक्षर रहे . दो जन थे जो दीनदयाल से बेख़ौफ़ बात करते थे एक देबू दा जो दीनदयाल को बगैर जी लगाए बोलते थे दूसरे थे राम बचन पांडे (छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और समाजवादी ) वो तो बाज दफे दीनदयाल को 'कनवा' तक बोलते थे . दीन दयाल के पास सयुस के अलावा एक संगठन और था . जो कुछ भी कर सकता था . मसलन आंदोलन के समय किसी भी इमारत में आग लगा देना , पुलिस से कैसे भिडा जाता है , किसी की भी सभा को कैसे उखाडा जाता है आदि आदि .
उस चुनाव में संघियों ने हमपर आरोप लगाया -'गेस्ट हाउस 'कांड का जवाब दो . बंदे मातरम . दीन दयाल जी ने उसका काट निकाला -'हाफ पैंट खोल के बोलो बन्देमातरम ' दीनदयाल की यह खोज रात भर में विश्वविद्यालय के अंदर और बाहर प्रचलित हो गयी .यहाँ तक कि महिला छात्रावासों में भी यह नारा गुजने लगा . हमारे खिलाफ विद्यार्थी परिषद से भाई महेंद्र नाथ चुनाव लड़ रहे थे . हम दोनों आपातकाल में साथ साथ जेल में रहे थे . हमारे बहुत अच्छे दोस्त भी रहे . लेकिन थे संघी . एक दिन हम लोग टंडन जी के यहाँ चाय पी रहे थे . इतने में महेंद्र नाथ सिंह भी वहीं आ गए . महेंद्र नाथ ने कहा भी दीन दयाल जी !मेरे ऊपर भी तो कुछ दया करिये हम लोग एक ही जिला जवार (दोनों बलिया से रहे ) से हैं .दीन दयाल ने अपनी भाषा में जवाब दिया -नाट! नाट जी !! इतने में रामबचन पांडे ने दूसरा प्रस्ताव दिया- महेंदर जी ,आप दीन दयाल की शादी करवा दीजिए . जोर का ठहाका लगा . दीनदयाल ने शर्त रखी ,लेकिन वह समुच होनी चाहिए . महेंदर ने कहा यही तो दिक्कत है , दीन दयाल भाई ऐसी जगह से गलत हैं कि सब को आसानी से दिखाई पड़ जाता है . दीनदयाल ने अकाट्य तर्क दिया - जो दोनों आँख से समूचहैं उन्होंने ही क्या उखाड़ लिया है . ?
इसका किसी के पास जवाब नहीं था .
        चुनाव हुआ . हम जीते . हर तीसरे दिन दीन दयाल जी आ जाते . आफिस से सादा कागद लेते . हमारे सामने रख देते . बोलते काम के नहीं हो इस पर इस्तीफा लिख दो . और हम चुपचाप लिख्देते . दीन दयाल जी उस कागद को जेब में डालते और चुप चाप निकल जाते . एक दिन पांडे जी ( छात्र संघ के चपरासी थे ,हमारे अभिभावक थे ) हमारे पास आये और बोले -यह दीन दयाल हर दूसरे दिन एक कागद बर्बाद करता है ,यहाँ से इस्तीफा लिख्व्वायेगा बाहर गेट तक जाते जाते फाड़ कर फेंक देता है . हमने कहा क्या करें पांडे जी . पांडे जी ने कहा मै उससे बात करूँगा . बात आयी गयी हो गयी . एक दिन पांडे जी आये और मेरे हाथ में दोतीन इस्तीफा देते हुए बोले इसे अपने दराज में रखे रहा करो जब वह इस्तीफा मागे तो उसे यही दे दिया करो . मैंने वही किया . दो दिन बाद फिर दीनदयाल जी नमूदार हुए . किसी काम नहीं हो इस्तीफा लिखो . मैंने सफ़ेद कागद ले लिया और दराज से निकाल कर एक इस्तीफा दे दिया . दीन दयाल चले गए . थोड़ी देर बाद फिर लौटे . हमसे बोले -थाने फोन करो . हमने पूछा क्यों ,क्या हुआ ? छात्रसंघ में चोरी हुयी .
    किसकी चोरी ?
    पांडे जी का सब सामान गायब है .
    पांडे जी का ? क्या गायब हुआ है ?
    उनकी चुनौटी, खैनी की पुडिया , कुछ जरूरी कागजात .
    हमने कहा जाने दीजिए दीन दयाल जी ,उनके चुनौटी और खैनी का दाम मै दे देता हूँ .
    लेकिन कागजात ?
    किस चीज का कागजात ?
    बहुत कीमती है .
मैंने पांडे जी को बुलाया . -पांडे जी कागजात क्या थे ?
पांडे जी हंस दिये . दीन दयाल समझ गए . अच्छा चुनौटी और खैनी का पैसा निकालो . और हमने बीस रूपये दे दिये .
'हाट डाग' के आर्डर पर भरत सिंह उखड गए थे ,इसपर कल .

Tuesday, November 12, 2013

चिखुरी/ चंचल
एक रफूगर की तलाश है ....
किस्सा वही पुराना है .
मियाँ उसे बाद में बताना ,पहले ररा नाऊ को सुन लिया जाय ,काहे से कि उसे सैलून खोलना है .पंचाईत का मुह जो कयूम की तरफ था घूम कर ररा नाई की तरफ हो गया . गो कि कई लोगों को इस तबादले 'पोजीशन 'में दिक्कत दर पेश आयी .कोलई दूबे की धोती जो बेंच के 'फांस' में फसी पडी थी वह मसक गयी . लिहाजा उन्हें खड़ा होना पड़ा और गर्दन को  पीछे की तरह से मोड़ा जैसे वहाँ पीछे कोइ बड़ी वारदात हो गयी हो . मद्दू जो पत्रकार भी हैं ने मइके को लपक लिया -वाह गुरू हू ब हू खजुराहों लग रहे हो .कोलई का उखड़ना बनता था .मामूली धोती नहीं है जो अभी फटी है कंधे कौच्का कर बोले -कुतिया छाप मारकीन नहीं है .. कुछ और बोलते लेकिन उधर मामला और भी पेचीदा हो चुका है . ररा की बात सुनने के लिए लखन नेजब ईंट को ही घुमाना चा हा जिसपर वो बैठे तो ईंट बे काबू हो गयी और बगल में पड़े लम्मरदार के सोंटे से टकरा गयी .चूंकी सोंटों में लचक तो होती नहीं चुनाचे सोंटा उठा और तड़ाक से लम्मरदार के ही 'नरहड' सजा टकराया ( नरहड कहते हैं पैर के घुटने और ऐड़ी के बीच की वह हड्डी जो सामने रहती है .इसकी मुकम्मिल जानकारी हिन्दुस्तान की पुलिस के पास होता है ) अव्वल तो लम्मरदार  को कुछ समझ में ही नहीं आया कि यह हुआ क्या क्यों कि चोट में दम था और जब चोट में दम होता है चोट सबसे पहले मा को बुलाती है . चाहे वह कुकुर हो चाहे लम्मरदार .भाषा अलग हो सकती है लेकिन चीख की गति एक ही होती है . लम्मरदार चीखे -अरे माई रे ... कई हाथ बढ़ गए लम्मरदार के पैर की तरफ . ज्यों ज्यों दर्द कम होता गया लम्मरदार की जुबान कैची होती गयी . इस कैंची ने कईबार खुल्लाल खुल्ला लखन की मा के साथ कई तरह के रिश्ते कायम किये .फिर लम्मरदार पलते ररा नाई की तरफ .बहरहाल यह सब हुआ .और होता रहता तब तक बीच में आसरे ने चाय बाटनी शुरू कर दी .. लो लम्मरदार चाय पियो सब दर्द गायब .'
चाय इतनी कमाल की चीज होती है ? उमर दरजी जन्म क मुरहा है .बरबखत  कुबात बोलता है .
तुम काजानो चाय की महिमा . चाय पिलाय के नखडू परधान हो गया . इसकी तासीर में गजब की ....
दरबारी मास्टर अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाए थे कि किन उपधिया हत्थे से उखड गए - आस्तर सुना जाय , हम बेवक़ूफ़ ना हैं आप कहाँ से बोल रहे हैं हम सब समझ रहे हैं .इस बखत चाय पे बहस चलाने से क्या मतलब ? ऊ बचपन में चाय भले बचत रहा मुला  बेमानी त ना करत रहा . आपन पार्टी देखो ,करोड़ो खा के डकार तक ...
किसकी बात कर रहे हो भाई ?
ऊ अपने नेता को समझ लिए .बस . छोडो उसे . ररा  को सुना जाय . बोलो ररा क्या कह रहे थे?
बोफोर्स गया रहा डिल्ली. (बोफोर्स ररा नाई का लड़का है ,यह उसी दिन पैदा हुआ था जिस दिन वीपी सिंह ने बोफोर्स का कागद खीसे से निकाल कर दिखाया था . यह बात दीगर है कि उसे कोइ माई क लाल आज तक नहीं पढ़ पाया जब उसके चलते एस सरकार बदल गयी . आर ररा की बीवी ने एक बच्चे को जनम तक दे दिया और अब वह दिल्ली मेकिसी सैलून में 'बँगला ' काटता है ) पूरे सात महीने बाद लौटा है . बता रहा था कि उसने वहाँ पर  जयप्रकाश नारायण को देखा .उनके पीछे बैताली झोला लटकाए रेस कोर्स का रास्ता पूछ रहा है . जयप्रकाश नारायण उसे सलाह दे रहे हैं कि रेस कोर्स का झंझट छोड. जाकर आपनी घर देख . बाप नाराज होकर घर छोड़ गया है उसे मना . संजय तोर भाई रहा उसे बेदखल किये हो ,उसे खोज . अपनी औरत के बुला ला , और एक बात कां खोल के सुन ले 'उधार के बाप से न वरासत बदलती है , न ही वसीयत मिलती है . .. बोफ्र्स्वा कहत रहा बैतालिया क दाढ़ी बहुत बढ़ गयी रही ,हम दौड़े कि उसे बना दें पर जब तक हम पहुँचते तब तक ऊ टेशन की तरफ बढ़ गया रहा .
लम्मरदार से नहीं रहा गया . - अबे ररा के बच्चे ! जे पीकेमारे कितना दिन हुआ ? कुछ मालुम है ? औ तै कहत बाते कि ऊ बैताली से मिले रहे .. अबे चल सैलून .. /चिखुरी ने रोका - देख भाई लम्मरदार ये ज़माना ही कुछ अंड बन्ड हो गया है . एक ने तो यहाँ तक कह डाला कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी और विवेकानद के बीच बात चीत होती थी . और मुखर्जी वही करते थे जो विवेकानंद  जी सलाह देते . तो ररा ने अगर यह कह दिया तो क्या गलत कहा ?
लम्मरदार ने बड़े सलीके से कहा -भाई बड़े लोगों के पास बातों के रफूगर होते हैं . बहुत महीन रफू करते हैं .पिछली बार रफू किया न कि सिकंदर बिहार की डर से भागा था .क्यों कि झेलम तक बिहार था . यह भी रफू हो जायगा .
नवल ने वाजिब सवाल उठाया -रफू सीखने का कोइ इसकूल है ,
कयूम मुस्कुराए . - दाखिला लेना है का बेटा ? ..
मिल जाय तो अच्छा रहेगा .
तो पहले यह तय कर लो रफू क्या करना है ?.. कयूम की बात नवल समझ चुके थे . कयूम की तरफ मुस्कुराकर देखे और जाते जाते एक झटका दे गए - मोरा सैयां गवन लिए जाय ,करौना की छैयां छैयां ...