Friday, September 6, 2013

अन्न भोग  
अन्न महज पेट भरने की सामग्री भर नहीं है . पेट को अन्न की जरूरत भी नहीं  होती और न ही अन्न को पेट पसंद करता है . भूख दिमाग में लगती है . बेचारा पेट अपनी बनावट और बुनावट के लिए दिमाग की बेगारी करता है . बाज दफे तो पेट दिमाग के बर् खिलाफ जाकर हड़ताल तक कर बैठता है . जो भी हो लेकिन अन्न की जरूरत तो होती ही है . 
    प्रकृति में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो अन्न को खाता ही नहीं उससे खेलता भी है . अपने रूचि के अनुरूप अन्न को बदलता है . इस अन्न बदलाव पर आज फेसबुक पर अंजना चौहान सिंह का एक आलेख है 'जंक फ़ूड ' के खिलाफ . हमने देखा कि इतना खूबसूरत और ज्ञानवर्धक आलेख बहुत  हल्के से चला जा रहा है . इसलिए हम अंजना जी के साथ उनके किचेन तक जाने की इजाजत  चाहता हूँ . हमारे पास कई टिप्स हैं . 
         'अन्न की पूजा करो ' यह प्राण है .
वेद की ऋचा है जिसका भाष्य उपनिषद करता है . कई वामपंथी जो संस्कृत से , वेद उपनिषद से चिढते हैं उनसे कहता हूँ मित्र 'अन्न ' पर की गयी वेद ,उपनिषद की मान्यता से आप इनकार भले ही करें लेकिन खाने के लिए अन्न ही खोजेंगे हथौड़ा और रिंच नहीं हजम कर पायंगे . दक्षिण पंथी इनसे भी दो कदम आगे है . वह इस ज्ञान को 'तुन' के लाल कपड़े में लपेट कर फूल चढ़ा देगा और झुक कर आगे बढ़ जायगा . संस्कृत ज्ञान का भण्डार है पर ये पोंगापंथी अपनी हरकतों से बाज नहीं आयेंगे . 
   एक दिन भाई धर्मेन्द्र राय ने किसी की युक्ति को फेस बुक पर जस का तस दर्ज किया - आप अपनी जिंदगी में कभी किसी पुलिस अधिकारी से मिल लिए या किसी डाक्टर से मिल लिए तो उसे आजीवन याद करते रहते हैं लेकिन जिससे हर दिन तीनबार मिलते हैं उसे कत्तई नहीं याद करते .वह है अन्न और अन्नदाता . ' 
    इस अन्न के साथ आदमी के बच्चे ने बड़ा मजाक किया है . उसका रूप बिगाड़ कर . उसे सुधारने की जरूरत है जिससे आदमी का बच्चा तो सुधरा रहे . 
        अन्न ग्रहण पर फिर संस्कृत पर आ रहा हूँ . संस्कृत ज्ञान कहता है - भोजन को पहले देखो . एक सौंदर्यबोध पैदा होगा थाली में सजे अन्न से . उसकी महक लो , दूसरी इंद्री जागृत होगी . उसे छुओ . स्पर्श करो . फिर उसका स्वाद लो आहिस्ता आहिस्ता इस अन्न का मूल तत्व आपकी जननेंद्रिय को विकसित करेगी . यह है अन्न महिमा . 
   आखीर में किसका अन्न खाते हो . यह बहुत जरूरी है . इसका सबसे खूब सूरत उदाहरण महा भारत में मिलता है . भीष्म पितामह घायल होकर गिर गए हैं . सूर्य के उत्तरायण होने पर ही प्रंका त्याग करेंगे . सो सांझ को जब कौरव पांडव युद्ध विराम करते हैं तो अपने मुखिया से नीति सीखने भीष्म के पास इकट्ठा होते हैं और भीष्म नीति की शिक्षा देते हैं . एक दिन जब भीष्म बोल रहे थे तो द्रौपदी ने ठहाका लगाया . अर्जुन को गुस्सा आगया , वे द्रौपदी की तरफ दौड़े . कृष्ण बीच में आ गए और बोले कि पहले उससे पूछो तो सही कि वह हंसी क्यों . द्रौपदी ने भीष्म से कहा -आज आप नीति की शिक्षा दे रहे हैं उस समय आपकी नीति कहाँ थी जब चीर हरण हो रहा था ? छल से युधिष्ठिर को ठगा जा रहा था ,,,,, भीष्म ने बहुत खूबसूरत जवाब दिया था - बेटी ! मै अन्न दोष से पीड़ित था . यह अन्न दोष आज के समाज की सबसे बड़ी बीमारी है . भ्रष्टाचार , राजनीति , मीडिया सब के सब अन्न दोष से पीड़ित हैं .
सिंहावलोकन

हम और मै .
.... उन दिनों ....
काशी विश्वविद्यालय बनारस के दाहिने सिस्से को काट-छांट कर बसाया गया है . यह एक बेहतर शिक्षण संस्थान भर नहीं है ,अपने आपमें एक मुकम्मिल 'एल्बम है .इसे पलटते जाइए और डूबते उतराते रहिये . अनोखी जगह  है . इस संस्थान में दाखिला लेना , अपने आपमें एक 'घटना ' होती है . और घटना बनने की ललक हर नौजवान में होती है . हम भी नौजवान रहे ( आज भी हूँ ) सो हमने भी यहा दाखिले का सपना देखा और चल पड़े सपना को पूरा करने .
गाँव के एक कालेज से इंटर की मार्कशीट , मोमजामे में दो पराठे , एक ढेला गुड़ . चालीस रूपये नकदी . पैंट और कमीज . बस इतना ही सब था . पर दाखिला नहीं मिला . दोस्तों ने खूब चिढाया ' बाप मरे अंधियारे बेटा पावर हाउस ' बहर लौट आया . यह कहते हुए कि चलो जब यहाँ महादेवी वर्मा जी दाखिला नहीं ले पायी तो मेरी क्या औकात . दिल मजबूत किया और काशी का मध्य क्षेत्र पकड़ा . काशी विद्यापीठ . 'शास्त्रियों ' का धर्मस्थल . बापू की डाली हुई नीव पर अपने तमाम अभावों के बीच टन कर खड़ा यह विश्वविद्यालय आजादी की लड़ाई का केन्द्र रहा है . दाखिला ले लिया . यहाँ लगे हाथ जिक्र कर दूं कि हम भाग्यशाली रहे ,हमारे कुलपति थे - राजाराम शास्त्री . दाखिले के तुरत बाद जेल जाना पड़ गया . हुआ यूँ कि उन दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे चौधरी चरण सिंह . उन्हें समाजवादियों से चिढ़ थी . और प्रदेश के तमाम विश्वविद्यालयों , विद्यालयों के छात्र संघों पर समाजवादी युवजन सभा का कब्जा रहा . यह मुख्यमंत्री को रास नहीं आता था . सो उन्होंने छात्र संघों को बंद करने का फरमान निकाल दिया . 'आ बैल मुझे मार ' आंदोलन शुरू हो गया . उसी झटके में हम भी नेता हो गए . चौधरी चरण के मंच पर चढ़ कर उनसे माइक छीन लिया . बस इतना ही अपराध था . और जेल चला गया . इसकी चर्चा रही . डेढ़ महीने बाद जब लौटा तब तक अखबारों ने हमें उड़ने की जगह दे दी थी .उस समय काशी विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष थे भाई मार्कंडे सिंह . उन्होंने हमें विश्वविद्यालय में दाखिला दिलवा दिया . और मै फाइन आर्ट्स का छात्र बन गया .
         फाइन आर्ट्स उन दिनों विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए 'दर्शनीय स्थल ' था . क्यों कि यह अकेला विभाग था जहां लड़के लडकियां उन्मुक्त भाव से रहते थे . साथ साथ . यहीं पर हमने पहली बार 'लड़की ' से बात करना सीखा . उनके साथ चाय पीना सीखा . यह हमारे  तमीज का पहला कायदा था .
                                                                                                              जारी -

Thursday, March 21, 2013

आओ लौट कर संजू ....
...... प्रिय संजू .
प्यार . 
हम मिले नहीं . क्यों कि इस बीच तुम सियासत के एक दलाल अमर सिंह के चक्कर में फंस चुके थे . लेकिन हमारी सोच , हमारी नियति और हमारा जुडाव   तुम्हारे साथ वैसा ही है जैसा पहले था यानी सुनील साहेब के रहते हुए . आज यह खत तुम्हे इस लिए लिख रहा हूँ कि तुम्हे अपने किये का प्रायश्चित तो करना ही है . लेकिन बच्चे ! याद रखना जेल बहुत अच्छी बशर्ते उसे सही ढंग से जियो . इसके लिए तुम्हे यह करना होगा कि सबसे पहले यह मान कर चलना कि तुम जेल में नहीं हो . तुमने अपनी मर्जी से एक जगह का चुनाव किया है कि हमें कुछ दिन यहां गुजारना है . बस . और  समझा दूँ ? मेरे बच्चे ( यह संबोधन इस लिए है कि सुनील दत्त साहेब हमारे अच्छे दोस्तों में रहे हैं , कभी राज (बब्बर ) से पूछ लेना . ) थोरो को जब जेल में डाला गया तो उसने माना ही नहीं कि वह जेल में है . जेल एक मनोविज्ञान है उसे नकार दो बस . हस्ते खेलते वक्त गुजर जायगा . मनो विज्ञान समझा कि नहीं ? हम बताते हैं - एक दिन तुमने फैसला किया कि हम अपने कमरे में ही बन्द रहेंगे लेकिन उसकी चाभी हमारे पास ही होगी . तुम्हे यह एहसास रहेगा कि जब मर्जी होगी हम बाहर निकल लेंगे . तुम्हे कोइ दिक्कत नहीं होगी . लेकिन अगर कोइ तुम्हे एक कमरे में बन्द करके उसकी चाभी अपने पास रख ले तो तुम दो घंटे में ही घुटन महसूस करोगे . संजू यह ,मान कर  चलना कि चाभी तुम्हारे पास है और तुम तीन साल बाद यहाँ से निकलो गे . बस . 
      अब यह तीन साल गुजारोगे कैसे ? उसे सुन लो . अपने माहौल से दोस्ती रखना . जेल का हर अधिकारी तुम्हारे परिवार का सदस्य है . उससे सलीके से पेश आना . वहाँ जितने छोटे बनोगे उतना ही बड़ा बनाता है जेल माहौल . सब को मोहब्बत करना . खूब पढाई करना . हम तुम्हे गांधी , लोहिया , नेहरू , आचार्य नरेंद्र देव की किताबे भेजेंगे . उन्हें गंभीरता से पढ़ना . खूब खेलना . थक जाना . रात बहुत अच्छी गुजरेगी . सुबह हस्ते हुए उठना . ' आपको क्या चाहिए ' पूछना . बहुत कुछ सीख कर मेरा बच्चा वापस आएगा . तप  कर . संजू ! जब तक तुम लौटोगे तुम एक बहुत बड़े कलाकार हो कर लौटोगे . तुइ दूसरा नहीं होगा बच्चे म्हारे लिए एक स्क्रिप्ट तैयार रहेगी . मै लिख रहा हूँ . 
           जेल जाते समय कलम , लिखने का कागद जर्रोर्र रखना मेरे बच्चे . आखीर में बोल दूँ - आज तुमने इतिहास रच दिया है मेरे बच्चे एक ऐक्टर ऐसा है जिसके पास जिंदगी के सारे अनुभव हैं यहा तक कि जेल के भी और वह है संजू . संजू तुम्हे जो कुछ भी चाहिए हम मुहैया कराएगे . 
      सन्जो०ओ लौट कर आओ . तुम अकेले होगे . कोइ दूसरा नहीं होगा बच्चे .
चंचल 

Saturday, March 9, 2013

महा शिव रात्रि : अग्नि और सोम के मिलन की रात है .........................
                        
भारतीय मिथक और मिथक चरित्रों से जुड़ी कहानियों  के बारे दो अतिरंजित धारणाएं हैं . एक पश्चिम की कथित वैज्ञानिक (?) अवधारणा जो इन मिथकों को गप्प कहकर खारिज कर देते हैं . दूसरे अपने यहाँ के पोंगापंथी हैं जो इन चरित्रों और इनसे जुड़ी कथाओं को सिन्दूर लगा कर अछत और नौवेद्य चढ़ा कर तहखाने में  सहेज कर रख देते हैं . ये दोनों सोच घातक है . हमारे ये मिथक हमारे अतीत के समाज , धर्म , राजनीति और्सबसे बड़ी बात जीवनशैली को समझने में मदद करते हैं . देश काल और परिस्थिति को समझने में पर्त दर पर्त खुलते चलते हैं . इतना ही नहीं ये कथा कई दरवाजो के सांकल बजा कर बताते हैं कि हम कहाँ थे . उदाहरण के लिए महा शिव रात्रि को ही उठाइये . 
       आज की रात जिसे हमारे मनीषी पुरखों ने ' महाशिवरात्रि ' कहा उस कथा पर जाने के पहले एक निवेदन करना चाहता हूँ - आज फाल्गुन , बदी( शुक्ल पक्ष ) की तेरस है . कल चतुर्दसी है . इस चतुर्दसी को ही महाशिवरात्रि कहते हैं . आज की रात और कल के रात की भोर को देखियेगा . सुबह के साढ़े चार बजे से पांच बज कर या सुबह होने तक . पूरब की ओर निहारियेगा . अद्भुत्नाजारा होता है . सूरज और चाँद साथ साथ निकलते हैं या थोड़ा आगे पीछे . सुरमई चादर से दो चहरे निकलते हैं . एक सूर्य का और दूसरा चंद्रमा का . आज की भोर दोनों का ताप समान होगा . अग्नि और सोम मिलते हैं लंबे अंतराल के बाद . दोनों का चेहरा सिंदूरी आभा से दमकता दिखाई पड़ेगा . अब कथा देखिये . यह रात शिव और पार्वती के समभोग की रात है . उत्सव , उमंग , उत्साह और उत्कंठा की रात है .  सालों साल योग साधना से उठा योगी भोग की कामना लिए आया है , दूसरी तरफ लंबी आराधना में लीन रही पार्वती को उनका मनचाहा प्रेमी मिला है . तप  से, ताप से ताए दो तपी भोग के लिए तत्पर हैं . दोनों का ताप बराबर है . ( सुबह को निहार कर आस्वस्थ  हो लीजिए ) यह है शिव और पार्वती के समभोग की रात . धुप अन्धेरा . हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा .समूची प्रकृति रुकी पडी है . कहीं कोइ स्पंदन नहीं . सब कुछ ठहर गया लगता है . रति क्रीडा में दोनों लीन हो गए हैं . उस अँधेरे में प्रेम और प्यास की एक ज्योति  जलती है श्रृजन की . योग और भोग की महान कथा महाशिवरात्रि हजारों हजार साल से चली आ रही है और चलती जायगी . मानवीय संवेदना , स्वभाव और मनोविज्ञान की ऐसी कथा शायद ही कहीं मिले . उत्सवधर्मी समाज समभोग की रात को पूजता है , श्रृजन के श्रोत को सामूहिक रूप से स्वीकारता ही नहीं उसके मर्म से जुड जाता है . अब इसकी अंतर कथा भी देखते जाइए . 
   दक्ष की दो बेटियाँ हैं . सती और रति .सती का ब्याह शिव के साथ होता है और रति का कामदेव के साथ . दक्ष अपने द्वारा आहूत यग्य में शिव को नहीं बुलाते इसमें कामदेव का भी सहयोग रहता है . सती जबरन पहुह्ती है और सती हो जाती हैं . शिव के दूत पहुच कर यग्य को नष्ट कर देते है लेकिन  कामदेव और अग्नि ,जिसमे सती जल कर प्रान त्यागी इन दोनों के प्रति शिव में रोष व्याप्त हो गया . और दोनों को उन्होंने भष्म किया . एक को योग साधना से विरत करने के आरोप में दूसरे को समभोग में खलल डालने के लिए . कथा कथा के अंदर बहते प्रवाह को उसे बिम्ब और प्रतीक के खाचे में रख कर टटोलिए बहुत कुछ मिलेगा . यह मधुमास है . कामदेव की रचना है . जब शंकर जैसा तपी कामदेव से नहीं बच पाया तो इन पोंगा पंथियों पर क्यों उलझा जाय . 
     चलिए विद्यापति . कालिदास मलिक मोहम्मद जायसी को बांचा जाय . इसमें कोइ किसी से कम नहीं है . कालिदास ऋतु संहार , कुमार संभवं और मेघ दूत में बहुत कुछ कह जाते हैं , विद्यापति की विरहनी मैथिल भाषा से निकलती है दुनिया की हर भाषा में अंगीकार हो जाती है . और पद्मावत ? .... क्या बात है बिम्ब , प्रतीक . अवधी का प्रान है जायसी . पद्मावत में .... जाने दीजिए इसे संघी भी पढेंगे हमें मालुम है फिर भी कहे देता हूँ - 'श्रीफल युग्म  ( बेल ) पर द्राक्ष ( अंगूर ) जैसा सुसोभित होता है , कुच बर्णन है . और ..... बस चलिए मदनोत्सव मनाये . शिव को लगा रहने दीजिए . आज महा शिव रात्रि है . 

Wednesday, February 13, 2013

वह योग और भोग का तपी है 
कह दूं कि शंकर योगी है तो वाम पंथ कहेगा पोंगापंथ बघार रहा है .शंकर भोगी है कहूँ तो पोंगापंथियों  की आत्मा (?) आहत होगी . ये तंत्र और मंत्र वाले दोनों मिल कर भारतीय सभ्यता की जड़ उखाड रहे हैं . उनका कहना है कि भारत के पास उसका अपना इतिहास नहीं है . इसके जो भी चरित्र हैं सब मिथक हैं . कहानियों में पिरोये गए ये चरित्र कालखंड का निर्धारण नहीं करते . बात वाजिब है लेकिन इन मिथकीय चरित्रों को लेकर गढी गयी कहानियां क्या कहती हैं ? इन कहानियों को गढ़नेवाले समाज की सभ्यता किस ऊँचाई पर रही होगी ,उसे इसी से नापा जा सकता है कि हजारों हजार साल से ये कहानिया , इनके पात्र आज भी ज़िंदा हैं . ऋतुराज के आगमन पर एक चरित्र उठा रहा हूँ इसे देखें . ( यह आलेख ब्राजील की वीरा रेइस के इस सवाल के जवाब में लिखा कि ' इस्प्रिंग '  के बारे में भारतीय मिथक क्या कहता है )
       शंकर एक चरित्र है . वह देवता है . औघडी है . दानी है . योगी है . भोगी है .वह पूज्य है . उसके लिंग की पूजा होती है . दुनिया की किसी भी सभ्यता में लिंग पूजन नहीं है . पश्चिम में तो कत्तई नहीं . मध्येसिया में कई बार इसका जिक्र होता है लेकिन बहुत बाद में . लिंग शंकर का प्रतीक है और प्रतिनिधि भी . केवल एक चरित्र की कथा हमारी सभ्यता का का खुलासा कर देती है कि हम किस ऊँचाई पर थे . प्रकृति के साथ हमारे क्या रिश्ते थे . कल बसंत पंचमी है . सूर्य के नजदीक जाकर पृथ्वी इस कोण पर झुकती है की मौसम में खुनकी आजाती है . शिशिर उतर रहा है ग्रीष्म उभर रहा है पर दोनों एक दूसरे को काटते नहीं ,एक दूसरे से लिपट जाते है . दोनों एक दूसरे को इस तरह से लपेटते हैं कि दोनों का वजूद एक दूसरे में लींन  हो जाता है , इसे नाम दिया गया बसंत ऋतु . मदन महीना . समूची प्रकृति में  मद समाहित हो जाता है . एक कथा शुरू होती है . ---
     कैलास की एक गुफा में एक योगी ध्यान में चला गया है . ' ध्यान ' में जाना  चरम आनंद है.और जब आनद चरम पर होता है तो वह अनंग होता है ,अस्तित्वहीन . वहाँ शरीर नहीं रह जाता . इस आनद को केवल दो जानते हैं , योगी और भोगी . शिव दोनों है . आज वह योग में है .  सती  अपने पिता के घर जाकर अपने पति के तिरस्कार का फल देती हैं खुद को जला कर . प्यार का अदभुत उदाहरण देती हैं , शिव सती  के शरीर को लिए भटकते है . शरीर गल गल कर गिरता है . आज उसे पीठ बोलते हैं . और जब सती नहीं रही तो वह योग में चला गया . देवताओं को दिक्कत हुई . शिव को उठाया कैसे जाय ? पंचाइत् में फैसला हुआ , शैलपुत्री पार्वती सती हैं अपने पति को चाहती हैं और शिव योग में हैं ' योग भंग ' का विधान तय हुआ . प्रकृति को बसंत मय करने का . ' कामदेव ' को कहा गया कि वे जाकर योगी शिव के ध्यान को भंग करें . कामदेव चले और समूची प्रकृति ' काम ' की उत्प्रेरक बन गयी . ठूठे पेड़ों में भी कोपलें फूटने लगी . बयार में खुनकी आ गयी . कामदेव ने शिव को  छुआ . ध्यान भंग हुआ पार्वती सामने खड़ी मिली . प्रथम आलिंगन .. योग का अनूठा प्रयोग है . पर छणिक अगर कोइ इस मिलन को साध ले और दूर तक चले तो यह मोक्ष भी देता है . यह प्यार है . भारतीय सभ्यता ने इसे पराकाष्टा तक पहुचाया है . सम्भोग को पूज्य बनाया . शिव उसके प्रकीक बनते हैं . अचानक उस योगी को याद आता है कि वह तो साधना में था यह भंग कैसे हुआ ? तोडी देरमे तीसरे नेत्र ने दिखाया कि काम देव आये हैं . औघडी उठा और कामदेव को भष्म कर दिया . हाहा कार मच गया . कामदेव की पत्नी रति विलाप करते हुए शिव के पास आयी . रति के विलाप ने शिव कोपिघ्ला दिया . शिव ने कहा कामदेव को बरदान देता हूँ वह ज़िंदा रहेगा पर शरीर में नहीं वह अनंग होगा . हर एक में होगा , हर जगह होगा , तब से कामदेव अनंग हो गए हर एक में व्याप्त होगये . कोइ इससे अछूता नहीं है . कल वही कामदेव आ रहे हैं उन्कास्वागत करिये .
   इस बसंत को देखना हो तो गाँव चलिए . आम के बगीचे के अमराई देखिये . ... धमार गा रहेहैं नवल उपधिया - चंचल ,चपल, नवल नटनागर .. अंगिया मुल्तानी क मार .. फिरे गलियन में विरह भरी अलबेली ...........

Saturday, January 26, 2013

गांधी की जरूरत ......अब ?
गणतंत्र के पूर्वसंध्या पर तीन चार जबानी जमा खर्च हुए . देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे का बयान कि संघ आतंकवादी संगठन है . ... इस बयान पर भाजपा का ऐलान कि वह संसद को नहीं चलने देगी .कांग्रेस ने अपने आपको शिंदे के बयान से अलग कर लिया . ठीक ऐनवक्त पर संघ  से जुड़ी एक देवी जी प्रभा शर्मा ने फेस बुक पर नाथूराम गोडसे द्वारा बापू की की गयी ह्त्या को जायज ठहराते हुए गोडसे की तारीफ़ की गयी है .(गो कि जब यह मामला संघी घराने के पास जाय गा तो वह साफ़ साफ़ इनकार कर देंगे कि यह देवी जी संघ से नहीं हैं .प्रज्ञा ठाकुर की तरह ) इसी फेस बुक पर पूजा शुक्ला जी ने एक बेहतरीन पीस दिया है ' स्टेनली वोल्पार्ट ' की उस पुस्तक का अंश जिसमे आजादी के आगमन पर बापू कितने अकेले हो गए थे .
        यहाँ हम सबसे पहले शिंदे के बयान को उठाते हैं .शिंदे ने सही कहा है . उसके लिए कितने सुबूत की जरूरत है ? अगर आतंकवाद की सही परिभाषा परिभाषित कर के देखा जाय . इनका इतिहास आतंक से शुरू होता है . गुरू गोलवरकर की पुस्तक बंच आफ थाट को बाचिये . सीधे सीधे एक कौम दूसरी कौम को  धौंस देती है ,अगर भारत में रहना है तो ......../ आजादी के बाद गांधी की ह्त्या , बाबरी मस्जिद का  गिराना , जैन हवाला के पैसे पर राजनीति करना और वह पैसा जो एक तरफ आतंकियों के पास  जा रहा है दूसरी तरफ अडवानी के पास . गुजरात में मुसलमानों की जघन्य ह्त्या , ( कृपया इसे दंगा  न कहें , यह इक तरफ़ा हमला रहा है . इसके मंत्री अपराधी बने हैं , कितने सबूत चाहिए . माले गाँव , समझौता एक्सप्रेस हमला , आदि आदि अभी अदालत में है ... /
        कांग्रेस में बैठे वातानुकूलित आफिसर किसी भी तरह के जोखिम से दूर रहना चाहते हैं . इसकी एक वजह है कि उन्हें यह नहीं मालुम कि कांग्रेस दो है एक सरकार और दूसरा संगठन . संगठन को खुल कर शिंदे के साथ आना चाहिए था . /
       आजादी दरवाजे पर खड़ी है . भारत टुकड़े में बट रहा है . साम्प्रदायिक दंगे हो रहें हैं . ह्त्या बलात्कार ,लूट .... गांधी अकेला है . ( इस पर अलग से लिखूंगा ) लेकिन पूजाजी ने जिस पुस्तक का जिक्र किया है उसे पढ़ना चाहिए .इसी विषय पर बापू के सचिव प्यारेलाल की पुस्तक लास्ट फेज आफ महात्मा गांधी ' और डॉ लोहिया की पुस्तक ' गिल्टी मैन आफ इंडियाज पार्टीशन' देखी जा सकती है .

Thursday, January 10, 2013

आज 'शास्त्री जी ' की पुण्यतिथि है .........
............ सोमवार को  भोजन बन्द . यह आदेश नहीं था , एक छोटे कद के बड़े दिलवाले विनम्र प्रधानमंत्री का निवेदन था अपनी देश की जनता के नाम .न कोइ ताम झाम न पर्चा न भोंपू . एक सहज भाषा में कही गयी बात देश ने गाँठ बांध लिया .
   इस एक ' निवेदन ' ने अमेरिका को खुली चुनौती दे दी . खालीपेट रहेंगे लेकिन हाथ नहीं फैलायेंगे . पी यल ४८० ... अमरीकी बाजरा और मक्का गेहूं लेने से इनकार . पाकिस्तान को पसंद आया . भारत की विपत्ति में मौक़ा नहीं चूकना है हमला कर दो . हमला हुआ . शास्त्री ने नारा दिया - जय जवान , जय किसान ' . अदभुत सोच . जवान देश की सीमा सहेजे और किसान देश का सीना मजबूत करे . हम दोनों जगहों पर जीते .  इतिहास में एक और सुनहरा पन्ना जुड़ा . सारी दुनिया हतप्रभ थी . अमरीकी टैंक जो पाकिस्तान को दिए गए थे , भारत के जांबाजों ने उसे खिलौने की तरह तोड़ा . पाकिस्तान झुक गया . उसे रातो रात अपनी राजधानी बदलनी पडी . यह पाकिस्तान की हार ही  नहीं थी पाकिस्तानी अवाम का सीना भी सिकुड़ गया . पाकिस्तान की सरकार अपनी जनता से लगातार झूठ बोले जा रही थी उसका रेडियो ऐलान करता - हम यहाँ जीते , हम वहाँ आगे बढ़ गए , लेकिन जो जमीन पर हो रहा था इसका अंदाजा अवाम ने लगा लिया था . ( इसका एक जिक्र पाकिस्तान के प्रसिद्ध लेखक इन्तजार हुसैन ने अपने उपन्यास ' आगे समंदर  है ' में किया है )
   सोवियत रूस ने बीच बचाव किया , समझौता हुआ . उसी रात शास्त्री जी का दिल का दौड़ा पड़ने से निधन हो गया . इसके पहले दिन दुनिया के सारे अखबारों ने एक फोटो छापे थे . ताशकंद हवाई अड्डे पर अयूब खान और लालबहादुर शास्त्री के . अयूब झुके खड़े हैं और शास्त्री जी ऊपर की ओर तने खड़े हैं . मानवीय संरचना भी कई बार परिस्थिति का का बयान करने लगती हैं . यहाँ भी यही हुआ . अयूब सात फिट से भी बड़ा सैनिक तानाशाह और कहाँ शास्ती जी का कद .
         गरीबी और अभाव से निकले शास्त्री जी गांधी के पक्के अनुयायी थे ,राम नगर ( बनारस के गंगा उसपार ) से पैदल चल कर काशी विद्यापीठ पढ़ने आते थे . गंगा तैर कर इस पार आना ......
आज पूरा राष्ट्र शास्त्री जी को नमन कर रहा है .